पैग़म्बरे इस्लाम का जीवन, एकता व समरसता का केन्द्र



 दया व कृपा के प्रतीक, अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के शुभ जन्म दिवस का अवसर है। आमुल फ़ील में 17 रबीउल औवल को संसार उस महान इंसान की ज्योति से जगमगा उठा कि जिसे जन्म के चालीस वर्ष बाद ईश्वर की ओर से यह दायित्व सौंपा गया कि शिष्टाचार को उसके चरम बिंदु पर पहुंचाए और इंसान को कल्याण व मोक्ष का मार्ग दिखाए। इस महान हस्ती ने अज्ञानता, अत्याचार, अन्याय और हिंसा से भरे हुए युग में विश्ववासियों को भाईचारे से सुसज्जित जीवन का ढंग सिखाया। उन्होंने दुनिया को संदेश दिया  हे लोगो, अज्ञानता और अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त इंसानो, कहो कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं है ताकि मोक्ष पा जाओ।

पैग़म्बरे इस्लाम ने इस ज्योतिमय संदेश की छाया में दुनिया के इंसानों के सामने सबसे संपूर्ण और सर्वश्रेष्ठ धर्म पेश किया तथा अपने मिशन का मूल्यवान उपहार अर्थात इस्लाम प्रदान किया। जिन लोगों ने इस्लाम को स्वीकार किया और ईश्वर के अनन्य होने और पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी की गवाही दी उन्हें मुसलमान होने का गौरव प्राप्त हो गया। पैग़म्बरे इस्लाम के महान अस्तित्व की बरकत से, युद्ध और मारकाट की आग ठंडी पड़ गई और इस्लाम की जीवनदायक शिक्षाओं की छत्रछाया में लोगों में सहानुभूति और प्यार की भावना जागी। विशेष शिष्टाचार के कारण क़ुरआने मजीद में पैग़म्बरे इस्लाम की प्रशंसा की गई है और इस बात को सराहा गया है कि उनकी दया और करुणा से लोगों के दिलों को झुकाया। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस्लाम की छाया में कठोर स्वभाव के लोगों को भी दयावान बना दिया और उन्हें अति प्रभावी और महान इंसानों में बदल दिया। किंतु आज एक समूह जो विचलित और दिगभ्रमित हो गया है और अज्ञानता के कारण जिसकी बुद्धि पर ताले पड़े हुए हैं ईश्वर और पैग़म्बरे इस्लाम के नाम पर मुसलमानों के ही विरुद्ध अति भयानक अपराध अंजाम दे रहा है और इस पर गर्व भी करता है। क्य यह कहना सही नहीं है कि मुसलमानों का यह समूह पैग़म्बरे इस्लाम से पहले वाले अज्ञानता के काल ओर नहीं लौट गया है?

दया व करुणा के प्रतीक पैग़म्बर के शुभ जन्म दिवस पर हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस्लाम के सही मार्ग से भटके हुए लोगों के दिलों को पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन शैली की ज्योति से प्रकाशमान करे तथा मुसलमानों के बीच एकता की भावना मज़बूत करे।

एकता व एकजुटता उन सिद्धांतों और नियमों का भाग है जिन पर पैग़म्बरे इस्लाम ने हमेशा बल दिया। पैग़म्बरे इस्लाम ने इसके लिए बड़े प्रयत्न भी किए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस बारे में कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम ने सामाजिक खाइयों को एकता की भावना से भरा और दूरियों को समाप्त किया। आज इस्लामी जगत की एकता का अर्थ यह है कि सभी मुस्लिम समुदाय अपनी समानताओं जैसे ईश्वर, क़ुरआन, पैग़म्बरे इस्लाम, पैग़म्बरे इस्लाम की जीवन शैली आदि को आधार बनारक एक दूसरे के निकट आएं और इस्लाम जगत के सामने उत्पन्न होने वाले ख़तरों से निपटें। इसका अर्थ यह है कि हम सांप्रदायिक, राजनैतिक, नस्ली और भाषाई विवादों से स्वयं को दूर रखें।

एकता व समरसता का माहौल उत्पन्न करने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम ने जो उपाय किए उनमें से एक उनका बर्ताव और सुलूक है। पैग़म्बरे इस्लाम का अच्छा बर्ताव और सहानुभूतिपूर्ण सुलूक हमेशा मतभेदों को दबाने और अच्छे इंसानों को अपनी ओर आकर्षित करने में प्रभावी रहा है। पैग़म्बरे इस्लाम के चमत्कारिक प्रेमपूर्ण बर्ताव के कारण बहुत से विरोधी भी उने श्रद्धालु बन गए। इस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम का शिष्टाचार एकता व प्रेम का ध्रुव बन गया।

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने सामाजिक क्षमताओं की सूक्ष्मता से समीक्षा करके सबको एकेश्वरवाद की ओर ले जाने की भूमि समतल की। पैग़म्बरे इस्लाम जब मक्का नगर से पलायन करके मदीना नगर पहुंचे तो अनेक गुटों के बीच समझौते हुए । यह समझौते उस समय के इस्लामी समाज में एकता व एकजुटता उत्पन्न करने के प्रभावी उपाय समझे जा सकते हैं। एक मदीने की सार्वजनिक संधि थी जो मदीने के क़बीलों और समूहों से पैग़म्बरे इस्लाम ने की। एकजुटता व राष्ट्रीय एकता उत्पन्न करने का यह सर्वोच्च मार्ग था क्योंकि क़बीलों के बीच एकता राजनैतिक एकता की भूमिका थी।

पैग़म्बरे इस्लाम के साथ मक्के से पलायन करके मदीना जाने वालों को मुहाजिर अर्थात पलायनकर्ता कहा गया जबकि मदीना वासियों को अंसार कहा गया। दोनों समूहों के बीच होने वाला समझौता भी एकता व धार्मिक एकजुटता की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण क़दम था। पैग़म्बरे इस्लाम ने दोनों के बीच भाईचारे का समझौता करवाया और इस समझौते के आधार पर अंसार अर्थात मदीनावासियों ने पलायन करके आने वाले मुहाजिरीन को अपनी संपत्ति में भागीदार बना लिया। इस समझौते के एक भाग में इस प्रकार कहा गया हैः मुसलमान एक दूसरे के मित्र और सहायक हैं तथा अत्याचार और अतिक्रमण का सामना होने की स्थिति में एकजुट रहेंगे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले एक समुदाय के अंग होंगे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले एक दूसरे के साथ अन्याय नहीं करेंगे। यदि मुसलमानों के बीच कोई मतभेद हो जाए तो ईश्वर और उसके पैग़म्बर द्वारा उस मतभेद का समाधान किया जाएगा।

भाईचारे का यह समझौता जातिवाद को नकारकर ईमान तथा एकेश्वरवाद की भावना के आधार पर किया गया। क़ुरआन के सुरए हुजोरात की आयत नंबर दस में ईश्वर ने ईमान लाने वालों को एक दूसरे का बंधु घोषित किया है। क़ुरआन कहता है कि ईमान लाने वाले एक दूसरे के भाई हैं तो अपने दो भाइयों में संधि कराओ। ईश्वरीय भय के मार्ग पर चलो ताकि शायद तु ईश्वरीय कृपा के पात्र बन जाओ। इस प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम ने भाईचारे का माहौल बनाकर अनेक ख़तरों और समस्याओं का रास्ता बंद कर दिया।



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