पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के आचरण की रोशनी



 

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम इतिहास के विभिन्न चरणों में मुसलमानों के मध्य एकता और संपर्क का बड़ा स्रोत रहे हैं। चूंकि मुसलमान उनके पवित्र अस्तित्व से अथाह प्रेम व स्नेह रखते हैं इसीलिए पैग़म्बरे इस्लाम समस्त मुसलमानों की आस्था का पात्र हैं। वास्तव में यह आकर्षक केन्द्र, मुसलमानों के दिलों में प्रेम की भावना जागने और इस्लामी मतों के एक दूसरे से निकट होने का कारण है। इसी आधार पर बारह से सत्तरह रबीउल अव्वल तक को जो दो कथनों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम के शुभ जन्म दिन की तारीखों के बीच का फ़ासला है, एकता सप्ताह नाम दिया गया। पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पवित्र अस्तित्व की छत्रछाया में मुसलमान एक दूसरे से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं ताकि उनकी सुदृढ़ एकता से इस्लामी जगत और अधिक फले फूले और उसमें निखार आए।

ईश्वर ने मुसलमानों से जिस चीज़ का सबसे अधिक आग्रह किया है वह एकता की रक्षा है। पवित्र क़ुरआन के सूरए आले इमरान की आयत संख्या 103 में आया हैः और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े  रहो और आपस में मतभेद पैदा न करो और ईश्वर की अनुकंपा को याद करो कि तुम लोग आपस में शत्रु थे, उसने तुम्हारे दिलों में प्रेम व स्नेह पैदा किया तो तुम उसकी अनुकंपा से भाई भाई बन गये और तुम नरक के किनारे पर थे तो उस ने तुम्हें निकाल लिया और ईश्वर इसी प्रकार अपनी निशानियां बयान करता है कि शायद तुम मार्गदर्शन प्राप्त कर लो।

निसंदेह मुसलमानों के मध्य एकता उन मूल सिद्धांतों व केन्द्रिय बिन्दुओं में से है जिसकी आवश्यकता इतिहास के किसी भी काल में मुसलमान बुद्धिजीवियों पर छिपी नहीं रही। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के आचरण में सबसे महत्त्वपूर्ण विषय इस्लामी एकता था। यह विषय और इसका व्यवहारिक होना भी हितैषी धर्म गुरूओं की मूल चिंताओं में रहा है।

पूरी दुनिया के मुसलमान चाहे वे शीया मुसलमान हों या सुन्नी, एकेश्वरवाद, प्रलय, पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी, अनदेखे संसार और पवित्र क़ुरआन पर आस्था व ईमान रखते हैं। वे एक ही क़िबले की ओर रुख़ करके नमाज़ पढ़ते हैं और एक निर्धारित महीने अर्थात रमज़ान में रोज़े रखते हैं और निर्धारित समय पर हज के लिए निकलते हैं और इसी प्रकार ज़कात भी देते हैं। इन सब संयुक्त बिन्दुओं के बावजूद, इस्लाम के शत्रुओं के षड्यंत्र और कुछ लोगों की अज्ञानता के कारण मुसलमानों के मध्य कुछ मतभेद पैदा हो गये। एकता सप्ताह, एक ऐसा अवसर है जिससे मुसलमान अतीत की स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकते हैं, अपने भविष्य के बारे में भी सोच सकते हैं और अपनी एकता को सुदृढ़ करके इस्लाम के पक्के शत्रुओं की आशाओं को निराशा मे परिवर्तित कर सकते हैं।

वर्तमान समय में एकता सप्ताह ऐसी स्थिति में आया है कि एक ओर इस्लामी समाज के विदेशी शत्रुओं और दूसरी ओर अज्ञानी व तकफ़ीरी गुटों ने मुसलमानों के मध्य हिंसा और युद्ध की आग भड़का रखी है और जैसे ही उन्हें अवसर हाथ लगता है, शत्रुता के बीज बो कर और एक दूसरे को लड़वा वातावरण को दूषित करते हैं।

स्पष्ट है कि शत्रुता और मतभेद के वातावरण में इस्लामी समाज की प्रगति की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है इसीलिए मुसलमानों के मध्य हिंसा और शत्रुता फैलाने में, मतभेद के वायरस से ख़तरनाक कोई भी वायरस नहीं है। प्रसिद्ध शीया मुसलमान धर्म गुरू आयतुल्लाह नासिर मकारिम शीराज़ी के अनुसार, इस्लामी इतिहास में किसी भी समय मुसलमानों के मध्य एकता की आवश्यता का उतना आभास नहीं किया गया जितना आज के समय में किया जा रहा है। अमरीका, यूरोपीय संघ, इस्राईल और इनके पिट्ठू इस्लामी देश एक साथ मिल गये हैं ताकि विश्व में इस्लाम की प्रगति को रोक सकें और विश्व के विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर मध्यपूर्व में इस्लामी सरकार को विफल बना सके।

इन परिस्थितियों में इस्लामोफ़ोबिया के विभिन्न हथकंडों से मुक़ाबले के लिए इस्लामी जगत की प्रसिद्ध हस्तियों के अतिरिक्त बहुत से साधारण व सामान्य लोगों ने जोश में आकर इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम को परिचित करवाने का बीड़ा उठाया। इसी परिधि में पिछले वर्ष मुसलमान ब्रिटिश महिलाओं ने सफ़ेद गुलाब से सजे पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्ण कथन को लोगों को भेंट किया ताकि पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही का अनुसरण करते हुए शांति की ओर क़दम बढ़ाएं। इन महिलाओं का कहना था कि लोगों को गुलाब भेंट करके उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के प्रेम, मित्रता और भाई चारे के संदेश को लोगों तक पहुंचाया है। जिस प्रकार से इस्लाम के शत्रु इस्लाम के चमकते हुए सूर्य पर धूल डालने का प्रयास कर रहे हैं, विश्ववासी भी बहुत सूक्ष्मता से इस्लाम के बारे में चिंतन करते हैं और पैग़म्बरे इस्लाम की जीवनी का गहराई से अध्ययन करते हैं।

प्रसिद्ध ईसाई शायर और लेखक रियाज़ मअलूफ़ कहते हैं कि हे फ़ातेमा के पिता, हम आपको चाहते हैं और आपका बड़ा आदर व सम्मान करते हैं, आपके लाये हुए नियम, न्याय, एकता, सत्य और दूरदर्शिता के नियम हैं, यद्यपि मैं आपके धर्म में आस्था नहीं रखता, हमारे चर्च में बजने वाले घंटों की ध्वनि, अज़ान की आवाज़ से मिलकर ईश्वर का गुणगान करती है और आपके लिए प्रेम, सहृदयता और भाईचारे का नारा लगाती है।

आज ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे जो यह नहीं जानते कि पैग़म्बरे इस्लाम एकेश्वरवाद और एकता के पैग़म्बर थे। उन्होंने समस्त लोगों को एकेश्वरवाद की छत्रछाया में एकत्रित किया और बहुत अधिक कठिनाइयां सहन करने के बाद, युक्ति और अपनी नैतिकता से जो ईश्वर पर उनकी आस्था का फल था, अरब के पिछड़े हुए लोगों और बिखरे हुए क़बीलों के मध्य जो छोटी से छोटी बात पर चालीस चालीस वर्ष तक युद्ध करते थे, स्नेह व सहृदयता पैदा की और इस्लामी एकता के आधार पर नवीन सभ्यता और आदर्श समाज की आधार शिला रखी। अलबत्ता समाज में सदैव से भतभेद रहे है किन्तु इस मतभेद को युद्ध और संघर्ष का कारण नहीं बनना चाहिए। मनुष्यों, राष्ट्रों और जातियों के मध्य पाये जाने वाले मतभेद की जड़ ऐतिहासिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों में निहित है किन्तु एकता और सहयोग मनुष्य की प्रवृत्ति में शामिल है  जिसका मुख्य स्रोत, मनुष्य का सामाजिक होना है। यही कारण है कि इस्लामी एकता, दिलों के मध्य एकता है और इसका व्यवहारिक होना भौतिक कारणों पर निर्भर नहीं है बल्कि यह एकेश्वरवाद और प्रलय पर आस्था से निकला है किन्तु वह एकता जो राजनैतिक, राष्ट्रीय, क़बीलों, वर्गों या भौगोलिक आधार पर अस्तित्व में आती है, वह वास्तविक एकता नहीं है और यह स्थाई भी नहीं होती।



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