पैग़म्बरे इस्लाम का स्वर्गवास और इमाम हसन अलैहिस्सलाम की शहादत



 

ईश्वरीय दूतों ने धर्म के नेहाल की सिंचाई की क्योंकि उन्हें मानव समाजों में भलाई फैलाने का दायित्व सौंपा गया था। उनका उद्देश्य समाज में एकेश्वरवाद को फैलाना, न्याय की स्थापना और अंधविश्वास व अज्ञानता से लोगों को दूर कर परिपूर्णतः की ओर मार्गदर्शन था। ईश्वरीय दूतों की ज़ंजीर की अंतिम कड़ी पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम हैं। कृपा व मेहरबानी के प्रतीक पैग़म्बरे इस्लाम ने उस इमारत को पूरी किया जिसकी आधारशिला पहले वाले ईश्वरीय दूतों ने रखी थी। उनके निमंत्रण का आधार ईश्वरीय संदेश वही थी। यही कारण है कि उनके इस अमर निमंत्रण में कहीं कोई बुराई दिखायी नहीं देती। विद्वानों के शब्दों में जिस प्रकार सूर्य की किरण संसार में दिन का उजाला बिखेरती है वैसी ही भूमिका पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने भी लोगों के वैचारिक विकास तथा समाजों में रचनात्मकता व प्रगतिशीलता लाने में निभायी।

वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले ध्रुव की भांति थे। इसी प्रकार उनका अस्तित्व परिवर्तनों तथा लोगों को परिपूर्णतः की ओर ले जाने वाला स्रोत था। इतिहास के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम पर ईश्वरीय संदेश का उतरना मनुष्य की बुद्धि के खिलने का कारण बना। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने असभ्य लोगों के बीच से एक त्यागी व कृपालु राष्ट्र का प्रशिक्षण किया और इस्लामी नियमों का प्रसार कर शिक्षा की एक आम लहर पैदा की यहां तक कि बहुत जल्दी ही मुसलमानों ने तत्कालीन युग के सभी ज्ञान व तकनीक प्राप्त कर ली।

पवित्र क़ुरआन में अंतिम ईश्वरीय दूत की विभिन्न विशेषताओं का उल्लेख किया गया है और विभिन्न अवसरों पर उनके बारे में बताया गया है। ईश्वरीय संदेश में पैग़म्बरे इस्लाम के आज्ञापालन को ईश्वर के आज्ञापालन और उनकी अवज्ञा को ईश्वर की अवज्ञा की संज्ञा दी गयी है। ईश्वर अनेक आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम के व्यक्तित्व व शिष्टाचार की प्रशंसा करता है और सूरए अहज़ाब की आयत क्रमांक 56 में उन पर दुरुद भेजने के साथ ही उनके सम्मान में कहता हैः ईश्वर और उसके फ़रिश्ते पैग़म्बर पर दुरूद भेजते हैं। हे ईमान लाने वालो! उन पर दुरूद भेजो और सलाम करो और उनके आदेश के सामने नत्मस्तक रहो।

क़ुरआन के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम अपनी क़ौम के सदैव निरीक्षक व गवाह हैं और अपनी शिक्षाओं के माध्यम से लोगों को अच्छे जीवन का निमंत्रण देते हैं। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम अमर हैं। मोअज़्ज़िन की अज़ान में, नमाज़ियों की नमाज़ में और अत्याचार के विरुद्ध मुसलमानों के प्रतिरोध और पीड़ितों की न्याय प्राप्ति की इच्छा में। पैग़म्बरे इस्लाम जीवित हैं क्योंकि उनके द्वारा लाया गया ईश्वरीय संदेश व धर्म जीवित है।

जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इस नश्वर संसार से सदैव के लिए अपनी आंखे बंद की, उस समय हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने दर्द भरे मन से उन्हें संबोधित करते हुए कहाः मेरे माँ-बाप आप पर न्योछावर हों। आपके स्वर्गवास से वह कड़ी टूट गयी जो दूसरों के स्वर्गवास से नहीं टूटी थी और वह ईश्वरीय संदेश का उतरना एवं ईश्वरीय मार्गदर्शन है। आपके स्वर्गवास की त्रासदी सबके लिए है और आम लोग आपके स्वर्गवास पर शोकाकुल हैं। यदि आपने धैर्य व संयम का आदेश न दिया होता और व्याकुलता से न रोका होता तो इतना रोता कि हमारे आंसुओं का सोता ख़त्म हो जाता। यह हृदय विदारक पीड़ा सदैव मेरे मन में बाक़ी रहेगी और मेरा दुख सदैव बाक़ी रहेगा। मेरे माँ-बाप आप पर न्योछावर हों हे ईश्वरीय दूत! मुझे अपने ईश्वर के निकट याद कीजिएगा और भूलिएगा नहीं।                   

पैग़म्बरे इस्लाम मानव इतिहास की महानतम हस्ती हैं। मानवजाति का भलाई व सौभाग्य की ओर मार्गदर्शन करना इतना बड़ा दायित्व था जिसे ईश्वर ने उनके कंधे पर डाला और उन्होंने ने भी इस दायित्व को भलिभांति निभाया। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि वे आलेही व सल्लम ने अपनी सार्थक शिक्षा से दुनिया को प्रकाशमय किया और अज्ञानता के अधंकार से मुक्ति दिलायी। इस बात में शक नहीं कि विद्वान व विचारक दूसरों की तुलना में मानवता के मार्गदर्शन में इस महान हस्ती के योगदान को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। तत्कालीन ब्रितानी विद्वान मार्टिन लिंग्ज़, जो अब मुसलमान हो चुके हैं, पैग़म्बरे इस्लाम द्वारा लाए गए ईश्वरीय धर्म के प्रसार का दो कारण बताते हुए कहते हैः पहला कारण क़ुरआनी आयते हैं जिसमें मार्गदर्शन की क्षमता है और दूसरा कारण स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम का व्यक्तित्व है। पैग़म्बरे इस्लाम ऐसे व्यक्ति थे कि सब यह बात भलिभांति जानते थे कि वह इतने सच्चे हैं कि किसी को धोखा दें। और इतने बुद्धिमान हैं कि आत्ममुग्ध नहीं हो सकते। वह एक अमर व्यक्तित्व है जिसका ईश्वरीय संदेश से संबंध था और उनका संदेश मार्गदर्शन पर आधारित है।

डाक्टर लिंग्ज़ का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम ने सबसे बड़ा उपहार मानवजाति को यह दिया कि उसके सामने स्पष्ट भविष्य को पेश किया और यह वचन दिया कि अपनी क़ौम को उनके हाल पर नहीं छोड़ेंगे। वह लिखते हैः पैग़म्बरे इस्लाम ने यह भविष्यवाणी की कि अंतिम दिनों में दुनिया में छायी हुयी बुराइयों के बावजूद एक ईश्वरीय उत्तराधिकारी उठ खड़ा होगा जिसे लोग महदी अर्थात मार्गदर्शन करने वाले के नाम से याद करेंगे और कहा कि महदी मेरे वंश से होंगे और धरती को न्याय व सत्य से भर देंगे।

इमाम हसन अलैहिस्सलाम का उज्जवल जीवन, इस्लामी इतिहास के संवेदनलशील चरण का भाग है। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन में केवल 48 वसंत देखे किन्तु इस अल्पावधि में वे असत्य के ख़िलाफ़ निरंतर संघर्षरत रहे। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने अपने पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद जनता के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व संभाला और बहुत ही कम समय तक शासन किया। इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने मुसलमानों की इच्छा और उनकी ओर से आज्ञापालन के वचन के बाद शासन संभाला था। इस्लामी जगत का विशाल भाग उनके शासन के अधीन था किन्तु इस दौरान मोआविया की ओर से निरंतर अवज्ञा व विध्वंसक कृत्य किए गए जो उस समय सीरिया का शासक था। मोआविया की ओर से अवज्ञा और विध्वंसक कृत्य के कारण युद्ध छिड़ने की नौबत आ गयी और इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने भी युद्ध के लिए सेना तय्यार की किन्तु इस्लामी समाज की स्थिति ऐसी हो गयी थी कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने युद्ध करने में संकोच से काम लिया और उसी समय मोआविया ने इमाम हसन अलैहिस्सलाम को शांति संधि का प्रस्ताव दिया और इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने भविष्य को देखते हुए उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

प्रश्न यह उठता है कि इमाम हसन अलैहिस्सलाम ने शांति को युद्ध पर वरीयता क्यों दी? जबकि शासन करना उनका अधिकार था और मोआविया मुसलमानों का शासक बनने के योग्य नहीं था।



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