आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती



 

ईरान की इस्लामी क्रांति की एक महत्वपूर्ण हस्ती, आयतुल्लाह डाक्टर, सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन कुशल प्रशासन, गहन चिंतन और रचनात्मकता में व्यतीत किया। आयतुल्लाह बहिश्ती सदैव स्वंय को युवाओं के सामने ज़िम्मेदार समझते थे और युवाओं के सांस्कृतिक व वैचारिक विकास के लिए यथासंभव प्रयास करते थे। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह सैयद अली खामेनई शहीद बहिश्ती के बारे में कहते हैं कि शहीद बहिश्ती का पूरा अस्तित्व युवाओं के मार्गदर्शन के प्रति रूचि से भरा हुआ था।

वर्ष १९२८ में पतझड़ के एक ठंडे दिन में बहिश्ती परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ जिससे इस घर में खुशी की लहर दौड़ गयी। बच्चे के माता पिता ने उसका नाम सैयद मोहम्मद रखा। सैयद मोहम्मद के पिता इस्फहान धार्मिक शिक्षा केन्द्र के प्रसिद्ध धर्मगुरु थे और सदैव लोगों की सेवा के लिए तत्पर रहते थे। उनकी माता भी अच्छे घर से संबंध रखती थी तथा धार्मिक शिक्षाओं का कड़ाई से पालन करती थीं। चार वर्ष की आयु में सैयद मोहम्मद को मदरसे भेजा गया ताकि वे कुरआन की शिक्षा प्राप्त कर सकें। उन्होंने बहुत जल्द कुरआन के साथ साथ लिखना और पढ़ना भी सीख लिया जिसके कारण उनके परिवार वालों और जान पहचान वालों को अत्याधिक आश्चर्य भी हुआ। सात वर्ष की आयु में उन्होंने स्कूल में दाखिले की परीक्षा भी बड़े अच्छे नंबरों से पास की और उनके नंबर इतने अच्छे थे कि वे पहली कक्षा के बजाए छठीं कक्षा में नाम लिखवा सकते थे किंतु कम आयु होने के कारण उनका नाम चौथी क्लास में लिखा गया।

शहीद बहिश्ती स्कूल में पढ़ने लगे तथा हाईस्कूल व इन्टर मीडिएट में उन्होंने फेंच भाषा पढ़ी। उन्हें स्कूल अत्याधिक मेधावी छात्रों में गिना जाता था किंतु वर्ष १९४१ की घटनाओं और रज़ा शाही पहलवी के देश निकाले के बाद धार्मिक शिक्षाओं के लिए ईरान का वातावरण अधिक बेहतर हुआ और चूंकि सैयद मोहम्मद एक धार्मिक घराने से संबंध रखते थे इस लिए उन्हें धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने की अत्याधिक इच्छा थी। इसी लिए उन्होंने कालेज छोड़ा और १४ वर्ष की आयु में सद्र नामक धार्मिक पाठशाला दाखिला लिया। सैयद मोहम्मद ने उन पाठों को जिसे अन्य छात्र दस वर्षों में पढ़ते थे मात्र चार वर्ष में समाप्त कर लिया। वे अपनी तीव्र बुद्धि, व्यवहार और विनम्रता के कारण अन्य छात्रों और शिक्षकों में अत्याधिक लोकप्रिय थे। शहीद बहिश्ती में ज्ञान की जो प्यास थी उसे उन्होंने धार्मिक शिक्षाओं तक ही सीमित नहीं रखा। उन्होंने पश्चिम ज्ञान प्राप्त करने के लिए अग्रेज़ी भाषा पढ़ना आरंभ किया हालांकि उस काल में धार्मिक छात्र अग्रेज़ी भाषा में रूचि नहीं रखते थे किंतु सैयद मोहम्मद ने अग्रेज़ी पढ़ी और धार्मिक शिक्षा के एक बड़े केन्द्र कुम चले गये।

कुम में इमाम खुमैनी, आयतुल्लाह बुरुजर्दी और अल्लामा तबातबाई जैसे महान धर्मगुरु शिक्षा दीक्षा में व्यस्त थे। सैयद मोहम्मद इन महान गुरुओं की सेवा में उपस्थित हुए और उच्च इस्लामी शिक्षा प्राप्त की। वे अपने समस्त गुरुओं में, इमाम खुमैनी स विशेष श्रद्धा रखते थे और इसी लिए बाद में वे इमाम खुमैनी के संघर्षों में उनके एक महत्वपूर्ण सहयोगी बने। शहीद बहिश्ती जब कुम में थे तो धर्मगुरू होने के बावजूद अग्रेज़ी पढ़ाते थे और इस प्रकार से अपना खर्च निकालते थे। वे अपनी अन्य गतिविधियों के बारे में कहते हैं कि वर्ष १९४७ में अर्थात कुम पहुचंने के एक वर्ष बाद आयतुल्लाह मुतह्हरी तथा कुछ अन्य साथी जिनकी संख्या १८ हो गयी थी जमा हुए और हम सूदूर गांवों में जाकर लोगों को शिक्षा देते थे। हम ने यह काम दो वर्षों तक किया।

शहीद बहिश्ती ने स्वंय को धार्मिक शिक्षाओं तक ही सीमित नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपना इन्टर मीडिएट भी पूरा किया तथा विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा तेहरान युनिवर्सिटी में वे धर्म के विषय पर अध्ययन में व्यस्त हो गये। वे हर सप्ताह कुम से तेहरान यात्रा करते किंतु उनकी थकन ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में बाधा नहीं बनी। अन्ततः वर्ष १९५१ में उन्होंने स्नातक की डिग्री प्राप्त की और बाद में दर्शनशास्त्र में तेहरान विश्वविद्यालय से पीएचडी के लिए अध्ययन भी आंरभ किया किंतु  राजनीतिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों  में अत्याधिक व्यवस्तता के कारण वे अपना थेसस पेश नहीं कर सके किंतु वर्ष १९७४ में उन्होंने यह काम किया और इस प्रकार से पीएचडी की डिग्री लेने में सफल हुए। उन्होंने वर्ष १९५२ में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद अपने रिश्तेदारों में ही एक पवित्र व धर्म परायण लड़की से विवाह कर लिया था। उनके दो बेटियां और दो बेटे थे।

शहीद बहिश्ती शिक्षा के अतिरिक्ति राजनतिक व संस्कृति के क्षेत्र में भी असाधारण रूप से सक्रिय थे। डाक्टर मुसद्दिक और आयतुल्लाह काशानी के नेतृत्व में ईरान में तेल के राष्ट्रीय करण आंदोलन में शहीद बहिश्ती ने इस आंदोलन में भूमिका निभाई वे इस साम्राज्यविरोधी आंदोलन के समर्थन में विभिन्न स्थानों पर भाषद देते किंतु तेल के राष्ट्रीय करण के आंदोलन की विफलता के बाद डाक्टर बहिश्ती की समझ में यह बात आ गयी कि धर्मगुरू एक संगठित संस्था के बिना तानशाहों के विरुद्ध संघर्ष को प्रभावी रूप से जारी नहीं रख सकते। इसी लिए उन्होंने निर्णय लिया कि सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ा कर युवाओं को क्रांति के लिए तैयार करें। पश्चिम पर निर्भर ईरान की शाही सरकार ईरान को एक पश्चिमी समाज में बदल देना चाहती थी ताकि धीरे धीरे ईरान में धर्म को भुला दिया जाए। इसी लिए शहीद बहिश्ती ने धर्म व विज्ञान नामक एक पाठशाला कुम में स्थापित की। इस पाठशाला की स्थापना का उद्देश्य युवाओं में धर्म की ओर रूझान में वृद्धि थी ताकि युवा, धर्म और राजनीति को अलग अलग न समझें बल्कि इन दोनों को एक साथ समझें। शहीद बहिश्ती ने इस प्रकार युवाओं में मन में धर्म प्रेम का बीज बोया ताकि उन्हें ईरान में इस्लामी आंदोलन के लिए तैयार किया जाए। शहीद बहिश्ती की एक अन्य सेवा, कुम के छात्रों और शिक्षकों के लिए एक केन्द्र ही स्थापना है। इस केन्द्र में अग्रेजी तथा अन्य आधुनिक विषयों की धार्मिक छात्रों को शिक्षा दी जाती। उन्होंने इसी प्रकार एक धार्मिक पाठशाला की भी स्थापना की जिसका उद्देश्य धर्म पर की जाने वाली आपत्तियों का उत्तर दिया जाए।

शहीद बहिश्ती ने इसी प्रकार कुछ बुद्धिजीवियों के सहयोग से एक अध्ययनसमिति बनायी जिसने इस्लामी में सत्ता के विषय पर मूल्यवान अध्ययन किये। इसी दौरान शाही खुफिया एजेन्सी सावाक ने उन्हें तेहरान रहने पर विवश कर दिया किंतु तेहरान में भी वे चुप नहीं बैठे बल्कि उनकी गतिविधियां ईरान की राजधानी में भी जारी रहीं। वर्ष १९६४ में उन्होंने डाक्टर बाहुनर के सहयोग से धार्मिक स्कूलों के लिए किताबों का संकलन किया वे इस प्रकार से  यह चाहते थे कि पढ़ाई जाने वाली किताबों से विदेशियों की छाप खत्म हो।

आयतुल्लाह बहिश्ती ने इसी प्रकार तेहरान में कुछ अन्य छात्रों की सहायता से बैठकों का आयोजन किया जिसमें तेहरान के विभिन्न क्षेत्रों से छात्र भाग लेते और विभिन्न विषयों पर चर्चा करते। इस प्रकार की बैठकों में भाषण देने की ज़िम्मेदारी अधिकांश शहीद बहिश्ती की होती थी। पूरी चर्चा को रिकार्ड किया जाता और फिर उसे पर्चे के रूप में युवाओं में बांटा जाता। इस प्रकार की बैठकों प्रायः शहीद बहिश्ती के घर में आयोजित होती थीं। शहीद बहिश्ती इस प्रकार से युवाओं को कुरआन के संदेश से परिचित कराना चाहते थे।

शहीद बहिश्ती सदैव धर्म के मार्ग में काम करते थे और उनका मानना था कि राजनीति और धर्म एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं और वे मुसलमानों को यह समझाते थे कि उन्हें हर प्रकार के राजनीतिक व सामाजिक मामलों में भूमिका निभानी चाहिए। डाक्टर बहिश्ती अपने एक भाषण में कहते हैं कि मुसलमानों को समाज और उस से बढ़ कर विश्व के मामलों में भूमिका निभानी चाहिए, मुसलमान को एसा नहीं होना चाहिए कि अपने खाने पीने की व्यवस्था हो जाए तो चुप बैठ जाए।

 

आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती-२

अच्छे भविष्य के निर्माण के लिए समय और परिस्थितियों की पहचान बुद्धिजीवियों की विशेषता होती है। आयतुल्लाह मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती भी उन बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता से वर्तमान और भविष्य को एक दूसरे से जोड़ दिया। यह महान बुद्धिजीवी, ईरानी व इस्लामी मान्यताओं के समर्थक थे और इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन्होंने क्रांति से पूर्व ही इसकी भूमिका तैयार की। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई शहीद बहिश्ती की गतिविधियों के बारे में कहते हैं कि इमाम खुमैनी द्वारा आरंभ किये गये संघर्ष और आंदोलन के कर्ता धर्ता इमाम खुमैनी के बाद शहीद बहिश्ती ही थे। वे अपनी दूरदर्शिता से सही समस्याओं का निवारण कर देते और उनकी देख रेख में बहुत से गुप्त संगठन शाही सरकार के विरुद्ध सक्रिय थे। शाही खुफिया एजेन्सी सावाक का यह मानना था कि यदि श्री बहिश्ती को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया तो ईरान में दूसरे खुमैनी का उदय हो जाएगा और उन्हें इससे भय रहता था क्योंकि शहीद बहिश्ती वास्तव में एसे ही थे।

शहीद बहिश्ती वर्ष १९६२ में इमाम खुमैनी के नेतृत्व में आंदोलन आरंभ होने के साथ ही इस आंदोलन से जुड़ गये। वे संघर्ष व आंदोलन में सक्रिय मुख्य धर्मगुरुओं में से एक थे। शाही सरकार की खुफिया एजेन्सी सावाक सदैव उन पर गहरी नज़र रखती थी और उन्हें कई बार जेल में भी बंद किया। वर्ष १९६४ में जर्मनी के हम्बर्गनगर में रहने वाले मुसलमानों ने, आयतुल्लाहिल उज़मा बुरुजर्दी की आर्थिक सहायता से बनायी जाने वाली मस्जिद के लिए एक धर्मगुरु की मांग की। ईरान में शाही सरकार की ओर से चूंकि शहीद बहिश्ती के लिए खतरा बढ़ता जा रहा था इस लिए उनके मित्र धर्मगुरुओं ने सलाह दी कि वे जर्मनी चले जाएं। शहीद बहिश्ती वर्ष १९६५ में जर्मनी के नगर हम्बर्ग गये और पांच वर्षों तक वहां रहे। इस दौरान उन्होंने जर्मन भाषा भी सीख ली और जर्मनी में व्यापक स्तर पर अपनी गतिविधियां आरंभ की। उन्होंने फार्सी भाषी छात्रों के इस्लामी संगठन की हम्बर्ग में आधारशिला रखी। इस संदर्भ में वे स्वंय कहते हैं कि मैं हम्बर्ग में रह रहा था किंतु मेरी गतिविधियों का दायरा पूरा जर्मनी, आस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड तथा ब्रिटेन के कुछ भागों तक फैला हुआ था। इसी प्रकार स्वीडन, हालैंड, बेल्जियम, अमरीका, इटली और फ्रांस से भी पत्रों द्वारा संपर्क था। मैंने इस्लामी छात्र संगठनों की बधार शिला रखी , उनके साथ सहयोग किया और उन्हे सलाह दी और उनके सम्मेलनों में भाषण दिया। मस्जिद से जो पैसा मिलता था उसे में इन्हीं संगठनों पर खर्च करता। हमने हम्बर्ग की मस्जिद में रात दिन सक्रिय रहने वाला एक इस्लामी छात्र संगठन बनाया था।

डाक्टर बहिश्ती ने इस केन्द्र का नाम ईरानियों की मस्जिद से बदल कर हम्बर्ग इस्लामी केन्द्र रखा जिसके कारण गैर ईरानी मुसलमान भी इस मस्जिद में जाने लगे। वे जब तक जर्मनी में रहे विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में व्यस्त रहे। इस दौरान उन्होंने मनुष्य के जीवन में आस्था, कौन सा धर्म, इस्लाम, संघर्ष का धर्म और युरोप में इस्लाम की वाणी  जैसी पुस्तकें भी लिखीं। इसी प्रकार वे युरोप के बुद्धिजीवियों के साथ बैठकें आयोजित करते और इस्लाम पर पश्चिम की आपत्तियों व शंकाओं का उत्तर देते और उनका निवारण करते।

वर्ष १९६६ में वे जर्मनी से हज करने गये और इसी अवसर पर उन्होंने तुर्की, सीरिया और लेबनान की भी यात्रा की तथा अन्य देशों के संघर्षकर्ताओं से वार्ता की। वर्ष १९६९ में इराक़ के नजफ नगर में वे इमाम खुमैनी की सेवा में गये और जर्मनी में ज़ायोनी शासन के विरुद्ध बयान जारी किया। अन्ततः वर्ष १९७० में असीम अनुभवों के साथ वे ईरान लौट आए। जर्मनी से ईरान वापसी के बाद फिर कभी भी सावाक ने उन्हें ईरान से बाहर नहीं जाने दिया। उन्होंने तेहरान में अपनी गतिविधियां पुनः आरंभ कीं। कुरआन की समीक्षा की क्लास रखी और युवाओं से वार्ता हेतु बैठकों का आयोजन किया। डाक्टर बहिश्ती अपने भाषण में इस्लामी जगत विशेषकर फिलिस्तीन से संबंधित विषयों को बहुत अधिक महत्व देते थे और कहते थे कि जब तक इस्लामी सरकारों में एकता नहीं होगी उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होगी।

वर्ष १९७८ में जब ईरानी जनता और शाही सरकार  के विरुद्ध टकराव अपनी चरम सीमा पर पहुंचने लगा तो वह समय इस्लामी क्रांति के लिए अत्यन्त संवेदनशील काल रहा है। शहीद बहिश्ती, शाह के विरूद्ध लोगों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। यही कारण है कि सावाक ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा कि ईरान में इमाम खुमैनी की गतिविधियों को आगे बढ़ाने वाले मुख्य व्यक्ति बहिश्ती हैं। इमाम खुमैनी ने अक्तूबर वर्ष १९७८ में पेरिस पलायन के बाद क्रांति परिषद की रचना की ताकि अंतरिम सरकार बना कर कानूनी रूप से सरकार के गठन तक देश का संचालय कर किया जा सके। जिन लोगों को आरंभ में ही इस परिषद का सदस्य बनाया उनमें डाक्टर बहिश्ती भी थे।

अन्ततः दसियों हज़ार शहीदों का खून रंग लाया और फरवरी वर्ष १९७९ में ईरान में इस्लामी क्रांति सफल हो गयी। क्रांति की सफलता के बाद की संवेदनशील परिस्थितियों में और विभिन्न भ्रष्ट दलों और धड़ों की उपस्थिति में किसी एसे संगठन की बहुत अधिक आवश्यकता थी जो इमाम खुमैनी के विचारों के आधार पर आगे बढ़ता हो इसी लिए शहीद बहिश्ती ने मार्च १९७९ में वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई तथा अन्य साथियों के सहयोग से जुम्हूरी इस्लामी पार्टी की आधार शिला रखी। यह दल, क्रांति के श्रद्धा रखने वालों का संगठन था और जनता में इसे अत्याधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। आयतुल्लाह बहिश्ती शहीद होने तक इस पार्टी के महासचिव रहे।

उन्होंने इसी प्रकार विशेषज्ञ संसद के लिए होने वाले चुनाव में भाग लिया और संविधान की रचना के लिए विशेषज्ञ परिषद के सदस्य बने। उन्होंने इस्लमी गणतंत्र ईरान के संविधान की रचना में सक्रिय भूमिका निभाई और उनका एक महत्वपूर्ण काम, ईरान के संविधान में वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व के स्थान को मज़बूत करना रहा है। यह संविधान इमाम खुमैनी की पुष्टि के बाद संसद में पारित हो गया। इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान के पारित होने के बाद इमाम खुमैनी ने शहीद बहिश्ती की विशेषताओं व दक्षताओं के दृष्टिगत उन्हें न्यायपालिका का प्रमुख बनाया।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद अमरीका और क्रांति के शत्रुओं ने डाक्टर बहिश्ती को बदनाम करने का भरसक प्रयास किया क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि वे क्रांति के एक स्तंभ हैं और जनता में उन्हें अत्याधिक लोकप्रियता प्राप्त है। इन परिस्थितियों में भी शहीद बहिश्ती अत्यन्त धैर्य व संयम के साथ अन्य लोगों से सम्मान के साथ व्यवहार करते थे। उनका पवित्र मन उन्हें कभी भी क्रोध की अनुमति नहीं देता और न ही वे अपने विरोधियों के प्रति आक्रामक शैली अपनाते । वे सदैव तर्क व पारदर्शिता में विश्वास रखते थे। इसी लिए जनता में भी उनका विशेष सम्मान था। इसी लिए जब क्रांति के विरोधी, हर प्रकार से विफल हो गये तो उन्होंने उनकी हत्या का षडयंत्र रचा और २८ जून वर्ष १९८१ में जुम्हूरी इस्लामी दल में  आतंकवादी संगठन एमकेओ के एक एजेन्ट ने बम विस्फोट कर दिया जिसमें डाक्टर बहिश्ती और क्रांति की ७२ महत्वपूर्ण हस्तियां शहीद हो गयीं। इमाम खुमैनी ने डाक्टर बहिश्ती के शहीद हो जाने पर कहा कि बहिश्ती ने संघर्ष में जीवन बिताया और संघर्ष करते हुए मौत को गले लगाया वे शत्रुओं की आंखों का कांटा थे। इमाम खुमैनी ने इसी प्रकार शहीद बहिश्ती को एक राष्ट्र कहा और उनके व्यक्तित्व के बारे में इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग कियाः मैं बीस वर्षों से अधिक समय से उन्हें जानता था और इन अत्याचारियों ने कुछ फैला रखा था उसके विपरीत मैं उन्हें एक प्रतिबद्ध, संघर्षकर्ता, संचालक, राष्ट्रप्रेमी, इसलामी प्रेमी तथा अपने समाज के लिए लाभदायक समझता था।

 

आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद हुसैनी बहिश्ती-३

हर समाज में भविष्य उज्जवल बनाने के लिए उत्कृष्ट समाधान विचारक एवं शिक्षित लोग प्रस्तुत करते हैं। डा. मोहम्मद हुसैनी बहिश्ती भी ऐसी ही हस्ती थे कि जो धर्म में परिवर्तनीय शोध चाहते थे। विशेषकर वे इस्लामी धर्मशास्त्र में दक्ष थे और जानते थे कि इस्लाम एक गतिशील एवं गति प्रदान करने वाला धर्म है कि जो समय की विभिन्न परिस्थितियों में उत्कृष्ट व्यवहारिक समाधान पेश करता है। वे मानव जीवन के व्यक्तिगत एवं सामाजिक हर क्षेत्र में इस्लाम की भूमिका देखते थे। इस कारण इस्लामी समाधानों को कि जो समय की आवश्यकताओं के दृष्टिगत होते हैं, अधिक महत्व देते थे।

शहीद बहिश्ती के भाषणों एवं चिंताओं की जानकारी के बाद, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि स्वतंत्र मनुष्य शिक्षा-दीक्षा देना इस महान बुद्धिजीवि का मूल उद्देश्य था। डा. बहिश्ती की दृष्टि में स्वतंत्र मनुष्य वह मनुष्य है कि जो इच्छाओं, क्रोध और वासना की ज़ंजीरों तथा अपने विचारों पर दूसरों के वर्चस्व से मुक्ति प्राप्त कर ले। उनकी दृष्टि में इस प्रकार के मनुष्य का पालन पोषण एवं उत्पत्ति शिक्षकों एवं माता पिता के बुनियादी कर्तव्यों में से है। शहीद बहिश्ती कि जो युवाओं और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में एक दक्ष विशेषज्ञ भी थे, इस बारे में समस्त माताओं और पिताओं से सिफारिश करते हुए कहते हैं कि श्रीमान व श्रीमती बच्चे को अपना दृष्टिकोण रखने का अवसर दीजिए, उसे ग़लत तर्क देने दीजिए, ग़लत निष्कर्ष निकालने दीजिए तथा जहां तक बहुत अधिक नुक़सान न हो इस ग़लत निष्कर्ष के पीछे जाए और स्वयं अनुभव हासिल करे, ख़ुद क़रान में उल्लेख  है कि मैं मार्गदर्शन और सिफ़ारिश की किताब हूं किन्तु किन लोगों के लिए? चयन करने वाले मनुष्य के लिए... बच्चों को कड़वा अनुभव करने दीजिए। शहीद बहिश्ती इस प्रकार की सिफ़ारिशों द्वारा अपने रास्ते को उन आदर्शों एवं शैलियों से कि जो अनुभव और स्वतंत्रतापूर्वक चयन के अधिकार की भूमिका को नहीं मानते, अलग कर लेते हैं।

धार्मिक शिक्षा-दीक्षा के विशेषकर बचपन एवं युवावस्था में प्रभावी परिणाम सामने आते हैं। किन्तु कदापि बच्चों को ज़ोर जबरदस्ती एवं हिंसा द्वारा इस्लामी शिक्षा नहीं देनी चाहिए। शहीद बहिश्ती का मानना है कि इस प्रकार की शिक्षा-दीक्षा से अनिर्णायक पुतले बनते हैं, वे शिक्षकों एवं गुरूओं से मांग करते हैं कि स्वतंत्र सोच एवं चयनकर्ता विद्यार्थी बनाएं। वे कहते हैं कि तुम शिक्षक और गुरु चाहते हो कि बच्चों को बाध्य करो कि वे धर्म में आस्था रखने वाले एवं शिष्टाचारी बनें? इस प्रकार के बनावटी एवं सुन्दर पुतलों का मूल्य एक सुन्दर मूर्ति से अधिक नहीं होगा। आईए हम सभी निर्णय लें कि हमारे बच्चे इंसान बनें। इससे क्या तात्पर्य है? इससे तात्पर्य है कि उन्हें अधिकार प्राप्त हों और वे होशियार और स्वतंत्र हों, इन बच्चों के प्रति हमारी और आपकी भूमिका सहयोग की भूमिका होनी चाहिए, तेज़ और स्वस्थ विकास के लिए अधिक भूमि प्रशस्त करने वाले की भूमिका होनी चाहिए, न कि किसी ऐसे सांचे में ढालने वाले की भूमिका कि जो बच्चे की कोमल एवं नाज़ुक प्रतिभाओं को कठोर सांचे में डाले और उसे एक पुतले के रूप में ढाल दे।

आयतुल्लाह बहिश्ती के विचारों की एक और महत्वपूर्ण विशेषता बुद्धि के प्रति उनका दृष्टिकोण है। गहराई तक सोचने वाले इस विचारक की दृष्टि में बुद्धि एक ऐसा उपकरण है कि जो इंसान को मामलों के विश्लेषण की शक्ति प्रदान करता है। शहीद बहिश्ती विश्लेषक विचार को अत्यधिक महत्व देते हैं और उसे वास्तविकता तक पहुंचने एवं सही ज्ञान प्राप्ती के लिए महत्वपूर्ण कारक मानते हैं। उनका मानना है कि अगर शिक्षित एवं स्वतंत्र सोच रखने वाला व्यक्ति विश्लेषक बुद्धि रखता हो तो वो भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन में स्वस्थ जीवन एवं विकास व सफलता का मार्ग पा लेगा। वे इस संदर्भ में दिलचस्प बात कहते हैं कि इस्लाम पैग़म्बर की ईश्वरीय वाणी से शुरू नहीं होता है बल्कि मनुष्य के स्पष्तम ज्ञान से शुरू होता है तथा अपने मार्ग में ईश्वरीय वाणी एवं पैग़म्बर से मिलता है। इस कथन का अर्थ यह है कि अगर मनुष्य विश्लेषक एवं खोजी विचार रखता हो तो यह गतिशील और स्वस्थ विचार उसे सही रास्ता दिखाता है। सही सोच विचार अंततः इंसान को आकाश वाणी एवं ईश्वरीय आदेशों की वास्तविकता तक पहुंचा देता है। उस समय व्यक्ति सही विचार एवं ईश्वरीय संदेश की सहायता से वास्तविकता तक पहुंचने के मार्ग पर आगे पढ़ता है और इसके बाद से ईश्वरीय संदेश उसके ज्ञान एवं आचरण में भूमिका निभाता है। शहीद बहिश्ती आगे कहते हैं कि इस्लाम चाहता है कि अपने विश्लेषक विचारों के साथ स्पष्टतम बिंदुओं से आरम्भ करे और आगे बढ़े। जिस समय मनुष्य इस आधार पर आगे बढ़ता है तो वह ईश्वरीय संदेश और ईश्वरीय दूत तक एक वास्तविकता के रूप में पहुंचता है, और अगर न पहुंचे तो वास्तव में वह ईश्वरीय धर्म तक नहीं पहुंचा है।

निरंतर सोच विचार, इस बुद्धिजीवि की अन्य सिफ़ारिशों में से है। शहीद बहिश्ती की दृष्टि में स्वतंत्र इंसान उस समय बुद्धिमत्ता तक पहुंच सकता है कि जब वह बुनियादी विषयों के बारे में सदैव चिंतन मनन करता रहे। उनकी दृष्टि में विकसित विचार एवं दृष्टिकोण मनुष्य को पथभ्रष्टता के जाल एवं जनता को धोखा देने से मुक्ति दिलाता है तथा उत्तम एवं विकसित जीवन उपहार स्वरूप प्रदान करता है। वे समाजी स्तर पर जनता को धोखा देने एवं झूठ बोलने को एक विध्वंसकारी कार्य मानते हैं और उससे मुक़ाबले के लिए अधिकारियों एवं जनता को चिंतन मनन, सच्चाई एवं सही आचरण की सिफ़ारिश करते हैं। शहीद बहिश्ती की दृष्टि में मनुष्य के मार्ग दर्शन एवं समाज के सुधार के लिए जनमत को धोखा देने और लोकप्रियता के लिए हाथ पैर मारने से बचने को दो मूल शर्तें मानते हैं।

आयतुल्लाह बहिश्ती की दृष्टि में उत्तम सोच विचार क़रान मजीद की आयतों में चिंतन मनन करना है। इस ईश्वरीय पवित्र पुस्तक के बारे में उनका मानना है कि क़ुरान समस्त लोगों के उपयोग के लिए अवतरित हुआ है। क़ुरान धर्म में गहरी आस्था रखने वालों की पुस्तक है। ऐसी पुस्तक कि जो उज्जवल एवं प्रकाशमय है। वास्तविकताओं और कर्तव्यों को स्पष्ट एवं उल्लेख करने वाली।

शहीद बहिश्ती की दृष्टि में क़ुरान किसी विशेष वर्ग के लिए अवतरित नहीं किया गया है बल्कि उसकी प्रकाशमय आयतें सभी के लिए समझने योग्य एवं साहस प्रदान करने वाली हैं तथा वास्तविकता की खोज करने वालों का मार्ग दर्शन करती हैं। वे क़ुरान को समझने के संबंध में कहते हैं कि इतिहास में ऐसी घटनाएं घटी हैं कि जो लोग मुसलमान नहीं थे और इस्लाम के विरोधी थे, वे क़ुरान की कुछ आयतों को सुनते थे और जो अर्थ भी उनसे समझते थे इस्लाम से प्रेम करने लगते थे और सही मार्ग प्राप्त कर लेते थे। शहीद बहिश्ती की दृष्टि में क़ुरान की आयतों का पढ़ना और चिंतन मनन करना मुसलमानों से विशेष नहीं है बल्कि क़ुरान संपूर्ण मानव समाज से संबंधित है। इसी प्रकार वे क़ुरान में मौजूद सिद्धांतों को पैग़म्बरे अकरम (स) के काल से विशेष नहीं मानते बल्कि उनका मानना है कि क़ुरान सदैव के लिए एवं अंतरराष्ट्रीय पुस्तक है, कदापि क़ुरान की आयतों का अर्थ उनके अवतरित होने के काल से विशेष नहीं किया जा सकता बल्कि आयतों के अर्थ को अन्य समय और स्थान की परिस्थितियों पर विस्तृत किया जा सकता है। यद्यपित निश्चित रूप से क़ुरान के विशेषज्ञ और अधिक ज्ञानी लोग ही क़ुरान के अर्थ की गहराई तक कुछ सीमा तक ही पहुंच सकते हैं और उन्हें विभिन्न कालों पर विस्तृत कर सकते हैं।

युवावस्था में साहस और प्रेरणा, युवाओं के लिए डा. बहिश्ती की विशेष सिफ़ारिशों में से है। यद्यपि सार्थक साहस एवं प्रेरणा कि जो मनुष्य की प्रतिभा में विकास का कारण बने उनके दृष्टिगत है। वे इस संदर्भ में कहते हैं कि ख़ुशी, सकारात्मक विचारों का परिणाम एवं जीवन का प्राकृतिक तत्व है कि जो युवा के भविष्य निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जबकि निराशावादी विचार युवाओं के मार्ग में समस्याएं एवं रुकावटें खड़ी करने अलावा कोई काम नहीं करते।

एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि जितना भी युवा का साहस मज़बूत होगा, कठिन घटनाक्रमों के मुक़ाबले में अधिकतर प्रतिरोध करेगा, और कम ही क्रोध, घृणा, लालच, ईर्षा और प्रतिशोध के भंवर में फंसेगा। साहस एवं जोश कार्य एंव प्रगति का इंजन है। उसके बग़ैर कोई भी योजना व्यवहारिक नहीं होती है। साहस एवं जोश होता है कि जो ऊर्जा प्रदान करता है और एक प्याले का रूप धारण कर लेता है कि जो युवा को समस्त बाधाओं से पार कर देता है। अगर कहा गया है कि धर्म में आस्था पहाड़ को अपनी जगह से हिला देती है तो साहस एवं जोश के संबंध में भी कहा जा सकता है कि वह भी रास्ते से समस्त रुकावटें हटा देता है। शहीद बहिश्ती ने क़ुरान और पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण के आधार पर जो पहला शोध किया वह जीवन में ख़ुशी और प्रसन्नता था।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई डा. बहिश्ती के बारे में कहते हैं कि स्वर्गीय श्रीमान बहिश्ती अपने वातावरण की पैदावार नहीं थे, अर्थात यह वातावरण डा. बहिश्ती जैसों को अस्तित्व में नहीं लाता है। उनका निर्माण अपने वातावरण से हटकर दूसरे कारकों द्वारा भी हुआ था। उनकी विशेषताओं में उनकी समझ एवं विचार की शक्ति थी कि जो उनके व्यक्तित्व का अंग थी। उन्होंने बहुत ही समझदारी से स्वयं का संपूर्ण निर्माण किया था। शहीद बहिश्ती अच्छी एवं लोकप्रिय आदतों का समूह थे और मैंने व्यक्तिगत रूप से विगत में और वर्तमान में श्री बहिश्ती जैसा व्यक्ति नहीं देखा है। शहीद बहिश्ती की शहादत वास्तव में उनके व्यक्तित्व की पूरक थी और प्रकृतिक मौत निश्चित रूप से उनके लिए कोई हैसियत नहीं रखती थी।