इमाम रज़ा (अ) के कथन भाग 1



  जैसा कि रिवायत में आया है कि अहलेबैत ने फ़रमाया कि हमारी हदीसों और कथनों को सुनों और दूसरों को सुनाओ क्योंकि यह दिलों को रौशन करती हैं।

आज जब्कि इमाम रज़ा (अ) के जन्मदिन की तारीख़ें चल रही हैं तो आइये हम और आप इमाम रज़ा (अ) के पास चलते हैं और उनके सदाचार एवं अख़लाक़ के पाठ में समिलित होते हैं, क्यों कि अगर आप आज होते तो हम लोगों से यही फ़रमाते जो आज आपकी हदीसें और कथन हमसे कह रहे हैं।

इमाम रज़ा (अ) के चालीस कथन हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं

1. قال الرضا (ع) : مَن لم يقدر على ما يكفّر به ذنوبه، فليُكثر من الصلاة على محمد وآله ، فإنها تهدم الذنوب هدماً و قال الصلوات علی محمد و الہ تعدل عند اللہ عزوجل التسبیح و التھلیل و التکبیر

इमाम फ़रमाते हैं: जो भी अपने पापों और गुनाहों का प्राश्चित नही कर सकता है (अपनी जवानी के दिनों में किसी ने कुछ पाप किए लेकिन अब उनका प्राश्चित नही कर सकता, किसी का हक़ था खा लिया अब उसको वापस नही दे सकता, किसी नामहरम पर निगाह डाल दी ख़ुदा के हक़ को रौंद दिया) तो वह क्या करे? आप फ़रमाते हैं कि उसको मोहम्मद और आले मोहम्मद (आपके परिवार वालों) पर सलवात पढ़नी चाहिए यह सलवात इन पापों को समाप्त कर देती हैं उनको जड़ से उखाड़ देती है फिर आप फ़रमाते हैं कि ख़ुदा के नज़दीक इस सलवात का दर्जा तसबीह, (सुबहान अल्लाह) तहलील (अलहम्दोलिल्लाह) और तकबीर (अल्लाहो अकबर) के बराबर है।

۲۔ من لقی فقیرا مسلما فسلم علیہ خلاف سلامہ علی الغنی لقی اللہ عزوجل یوم القیامۃ و ھو غضبان

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि अगर किसी फ़क़ीर से किसी की भेंट हुई और उसको सलाम किया तो अगर उसका इस फ़क़ीर को सलाम किसी अमीर के सलाम से भिन्न हुआ तो क़यामत के दिन ख़ुदा से मुलाक़ात करेगा इस हालत में कि ख़ुदा उससे क्रोधित होगा।

क्योंकि वह हमसे प्रश्न करेगा कि क्यों तुमने लोगों के बीच भेदभाव किया? अगर वह फ़क़ीर हुआ और दूसरा अमीर तो यह सब ख़ुदा की करनी है, ख़ुदा ने उनको ऐसा बनाया है। याद रखों के फ़क़ीरी और माल दोनों ही इम्तेहान हैं।

 

इस्लाम में लोगों के बीच बरतरी केवल तक़वे और परहेज़गारी के आधार पर है। इस्लाम ने रंग, नस्ल, माल... आदि को उच्चता का प्रतीक नहीं माना है।

 

 

एक हदीस में आया है कि सलमान को सलमान हम अहलेबैत में से हैं इसलिए कहा गया क्योंकि वह समाज के ग़रीब लोगों के साथ मिलते जुलते थे उनके साथ उठते बैठते थे।

आगे एक रिवायत आएगी जिसमें ख़ुद इमाम रज़ा (अ) ने दिखाया है कि समाज के निचले तबक़े के साथ किस प्रकार व्यवहार किया जाता है, रिवायत में है कि जब दस्तरख़ान बिछाया गया तो पूछने वाले ने पूछा कि आप इन सूडानियों (काले लोगों) के साथ क्यों एक दस्तरख़ान पर बैठते हैं? आप यह सुनकर क्रोधित हो गए आपने फ़रमाया किः हमारे माता पिता एक हैं हम सब आदम और हव्वा की औलाद हैं, हस सब ख़ाली हाथ इस दुनिया मे आए हैं और ख़ाली हाथ ही चले जाएंगे,  उच्चता यह नही है कि कहां के हो, किस नस्ल के हो बल्कि सम्मान तो इसमें है कि तुम्हारा तक़वा कैसा है।

۳۔ عن ابی الصلت الھروی قال سالت الرضا عن الایمان فقال: الایمان عقد بالقلب و لفظ باللسان و عمل بالجوارح، لا یکون الایمان الا ھکذا

अबी सलत हेरवी कहते हैं कि मैने इमाम (अ) से ईमान के बारे में प्रश्न किया इमाम रज़ा (अ) ने फ़रमाया किः इमान की तीन क़िस्में हैं और इन तीनों को एक साथ होना चाहिए।

1. दिल से ईमान का होना।

2. ईमान का अपनी ज़बान से इज़हार होना चाहिए।

3. अमल होना चाहिए, ईमान के अनुसार तुम्हारे कार्य होना चाहिए।

और ईमाम, ईमान नही है मगर यह की यह तीनों चीज़ें एक साथ हों।

۴۔ من زارنی علی بعد داری اتیتہ یوم القیامۃ فی ثلاثۃ مواطن حتی اخلصہ من اھوالھا، اذا تظایرت الکتب یمینا و شمالا و عند الصراط و عند المیزان

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं किः अगर कोई इस दूरी में आकर मेरी ज़ियारत करे तो मैं तीन स्थानों पर उसकी सहायता करूँगा, और इन तीन मुसीबतों से नजात दिलाऊँगा (वह मुसीबत जिसमें हर कोई हर एक से दूर भागेगा माँ बेटे से, बेटा पाप से, भाई भाइ से यानी कोई किसी की सहायता करने वाला नही होगा उस समय मैं इमाम रज़ा (अ) तुम्हारी सहायता करूँगा और तुमको इस परेशानी से नजात दिलाऊँगा) वह तीन स्थान यह हैं:

1.जब तुम्हारे नामा ए आमाल तुम्हारे दाहिने और बांए हाथ दिये जाएंगे।

जब यह कहा जाएगा कि ऐ तुम लो यह तुम्हारे कार्यों का नतीजा यह तुम्हारा नामा ए आमाल है उस समय एक कार्यो होगा जो हमारी सहायता करेगा और वह होगा हमारी इमामे रज़ा (अ) की ज़ियारत।

2. पुले सिरात पर। कौन सा पुल? वह पुल जिसके बारे में कहा जाता है कि तलवार की धार से अधिक देज़ और बाल से अधिक बारीक होगा जहाँ हमारे पैरों के नीचे नर्क होगा।

3. जब तुम्हारे कार्यों का आंकलन किया जाएगा।

۵۔ لا یجتمع المال الا بخصال خمس ببخل شدید، و امل طویل، و حرص غالب  و قطیعه الرحم  و ایثار الدنیا علی الاخره

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि किसी के भी पास माल एकत्र नहीं हो सकता मगर यह कि उसके अंदर पाँच (बुरे) गुण हों:

1. बहुत अधिक कंजूस हो। केवल जमा करने के चक्कर में पड़ा रहे।

एक रिवायत में आया है कि हज़रत अली (अ) एक क़ब्रिस्तान में गए और वहां आपने अपने साथियो की तरफ़ देख कर उन मुर्दों से कहाः तुम्हारे घरों में दूसरे लोग रहने लगे, तुम्हारी औरतों ने शादियां कर लीं, तुम्हारा माल बट गया, यह हमारे पास तुम्हारे लिए समाचार थे। लेकिन तुम्हारे पास हमारे लिए क्या सूचना है? फिर इमाम अली (अ) ने फ़रमाया कि अगर इनको बोलने की अनुमति दी जाती तो वह यह कहतेः जो हमने खाया उसको खाया, जो कार्य करके अपनी आख़ेरत के लिए भेज दिये हम उनको देख रहे हैं और जो हमने दुनिया में छोड़ दिया उसका हिसाब दे रहे हैं।

तो अगर इन्सान को दौलत चाहिए तो उसके अंदर तीव्र प्रकार की कंजूसी होनी चाहिए, ऐसा होना चाहिए कि उसके सामने एक बीमार बिना इलाज के मरता रहे लेकिन उसपर कोई फ़र्क़ ना पड़े।

2. लम्बी लम्बी आरज़ूएं होना चाहिए।

आज जब्कि इन्सान को यह तक नहीं पता है कि कल क्या होगा वह जीवित भी रहेगा या नहीं रहेगा, फिर कैसी आरज़ू? करोड़ो चीज़ें कारण बनती हैं तब कहीं जाकर इन्सान सांस ले पाता है अगर इनमें से कोई एक भी कम हो जाए तो हमारी मौत हो जाएगी, आज आश्चर्य इन्सान की मौत पर नही होना चाहिए बल्कि आश्चर्य तो इन्सान के जीवित रहने पर होना चाहिए, कि किस प्रकार ख़ुदा ने इस सारी चीज़ों को एक लाइन में लगाया है ताकि इन्सान जीवित रह सके।

3. बहुत अधिक लालची हो।

4. अपने रिश्तेदारों से सम्बन्ध को तोड़ ले।

क्योंकि अगर ऐसा नहीं करेगा तो उसको अपनों के ग़मों में शरीक़ होना पड़ेगा उनकी आवश्यक्ता के समय ख़र्च करना पड़ेगा।

5. अपनी दुनिया के लिए आख़ेरत की बलि दे दे।

कहा गया है कि बहुत अधिक पैसा जमा करने के चक्कर में ना पड़ो अगर तुम को ख़ुदा पर भरोसा है तो जिस प्रकार कड़ाके की ठंड में जमी हुई बर्फ़ के बीच एक चिड़या को दाना मिल जाता है वैसे ही तुम्हारी रोज़ी भी तुमको मिल जाएगी।

۶۔ من علامات الفقہ: الحلم و العلم و الصمت انّ الصمت باب من ابواب الحكمة انّ الصمت يكسب المحبة، انہ دليل على كل خير 

फ़क़ीह और दीनदार इन्सान की निशानियाँ

1. हिल्म और सब्र होना चाहिए।

जो चीज़ समस्याओं को हल करती है या दुआ को क़ुबूल करवाती है वह है धैर्य रखना। आप एक अपाहिज व्यक्ति को देखिए कि अगर वह अपनी इस हालत पर सब्र कर ता है तो एक दिन वह दुनिया के सामने कामियाब होता है।

2. इल्म और ज्ञान।

यानी जो भी कार्य करता है उसके पास उस कार्य के लिए तर्क होता है क्यों यह खाया क्यों यह कपड़ा पहना आदि सब कुछ तर्क के अनुसार करता है।

3. ख़ामोशी। ख़ामोशी हिकमत के द्वारों में से एक द्वार हैं।

क्योंकि जो ख़ामोंशी रखता है वह सुनता है और सोंच की शक्ति पैदा करता है और यह दोनों चीज़ें वह हैं जो इन्सान को हिकमत तक पहुँचाती है। ख़ामोशी हर नेकी और अच्छे कार्य की कुंजी है।

ख़ामोशी दूसरो की मोहब्बत को लाती है और यह सदैव याद रखिए कि ईश्वर ने हमको दो कान दिये हैं जब्कि जीभ केवल एक दी है इसलिए हमको सुनना अधिक चाहिए और बोलना कम चाहिए।

7.ان اللہ عزوجل امر بثلاثہ، مقرون بھا ثلاثۃ اخر: امر بالصلاۃ و الزکاۃ فمن صلی و لم یزک لم تقبل منہ صلاتہ، و امر بالشکر لہ و للوالدین، فمن لم یشکر والدیہ لم یشکر اللہ، و امر باتقاء اللہ و صلۃ الرحم، فمن لم یصل رحمہ لم یتق اللہ عزوجل۔

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं: ईश्वर ने क़ुरआन में तीन चीज़ों के बारे में कहा है दूसरी तीन चीज़ों के साथ फिर आप फ़रमाते हैं: यह तीन चीज़ें जो कि दो दो के जोड़े में हैं बिना एक के दूसरी स्वीकार्य नहीं हैं।

1. ईश्वर ने फ़रमाया नमाज़ पढ़ों और ज़कात दो।

अब अगर कोई नमाज़ तो पढ़े लेकिन ज़कात ना दे तो उसकी नमाज़ भी स्वीकार्य नही है। (इस्लामी क़ानून के हिलाज़ से भी ऐसा ही है क्योंकि अगर कोई ज़कात ना दे तो उसका पैसा हराम होगा और हराम पैसे से वह वज़ु आदि करेगा कपड़े लेगा और इस हराम पैसे से ली गई चीज़ों में नमाज़ सही नही है।)

2. और ईश्वर ने आदेश दिया है कि धन्यवाद करों ईश्वर का और अपने माता पिता का।

ख़ुद क़ुरआन में ख़ुदा फ़रमाता हैः وَقَضَى رَبُّكَ أَلاَّ تَعْبُدُواْ إِلاَّ إِيَّاهُ وَبِالْوَالِدَيْنِ إِحْسَانًا सूरा असरा आयत 23

प्रिय पाठकों याद रखिए आज हमारे जीवन में जो बहुस सी समस्याएं हैं उनका कारण माता पिता का अपनी औलात के लिए दुआ ना करने और उनको आक़ (बेदख़ल) करने के कारण है।

याद रखिए यह बूढ़े लोगों के लिए अलग घर होना या जिसको हम वृद्धों का आश्रम कहते हैं यह इस्लाम की शिक्षा नही है।

इस्लाम की शिक्षा यह है कि रिवायत में आया है कि एक क़साई मूसा (अ) के दर्जे तक पहुँच गया। क्यों? क्योंकि वह अपने बूढ़े माता पिता की सेवा करता था। तो इस्लाम यह कहता है कि अपने माता पिता की सेवा करो जिस प्रकार उन्होंने तुम्हारे बचपन में तुम्हारी सेवा की थी ऐसा ना हो कि जब तुम बड़े हो जाओ तो उनको अलग भेज दो।

याद रखिए कि बहुत बार ऐसा होता है कि इन्सान जब तक उसके माता पिता जीवित होते हैं उनकी बहुत सेवा करता है लेकिन जब यही माता पिता मर जाते हैं तो उनके जीवन में सेवा करने वाले बच्चे उनकी मौत के बाद आक़ हो जाते हैं यानि उसके माता पिता ऊपर (बरज़ख़) उसके लिए बददुआ करते हैं।

इसीलिए इस रिवायत में आया है कि जो अपने माता पिता का धन्यवाद ना करे वह ईश्वर का धन्यवाद करने वाला नही हो सकता।

3. और ईश्वर ने आदेश दिया है कि तक़वा (परहेज़गाही) रखों और अपने परिवार वालों से रिश्ता रखो। उनसे सम्पर्क में रहो

8. قال: لا يَكُونُ الْمُؤْمِنُ مُؤْمِنًا حَتّى تَكُونَ فيهِ ثَلاثُ خِصال:1ـ سُنَّةٌ مِنْ رَبِّهِ. 2ـ وَ سُنَّةٌ مِنْ نَبِيِّهِ. 3ـ وَ سُنَّةٌ مِنْ وَلِيِّهِ. فَأَمَّا السُّنَّةُ مِنْ رَبِّهِ فَكِتْمانُ سِرِّهِ. وَ أَمَّا السُّنَّةُ مِنْ نَبِيِّهِ فَمُداراةُ النّاسِ. وَ أَمَّا السُّنَّةُ مِنْ وَلِيِّهِ فَالصَّبْرُ فِى الْبَأْساءِ وَ الضَّرّاءِ.

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि कोई मोमिन मोमिन नही हो सकता मगर यह कि यह तीन गुण उसमें पाए जाते हों

1. एक गुण ख़ुदा की तरफ़ से।

2. एक गुण उसके रसूल की तरफ़ से।

3. एक गुण इमाम की तरफ़ से।

ईश्वर की तरफ़ से गुण यह है कि दूसरे के राज़ों को फ़ाश ना करो। ख़ुदा ऍबों को छिपाने वाला है।

ख़ुदा हमारे बारे में सब कुछ जानता है चाहे वह सामने का हो या छिपा हुआ, वह हमारी नियतों की भी जानकारी रखता है, अगर वह सबके राज़ों को फ़ाश करने लगे तो कोई किसी दूसरे को मुंह दिखाने के क़ाबिल नही रहेगा। लेकिन वह किसी को नही बताता है तो अब जो भी ईश्वर का सच्चा बंदा है उसको ईश्वर की तरह होना चाहिए।

रसूल की तरफ़ से गुण यह है कि लोगों के साथ सहनशीलता दिखाए।

यानी यह ना हो कि अगर किसी ने कोई ग़ल्ती कर दी हो तो तुरन्त उसको सज़ा दी जाए या सबको बताया जाए बल्कि सहनशीलता दिखाओ इसी प्रकार अपने परिवार में भी पत्नी के साथ बच्चों के साथ माता पिता के साथ सहनशील रहो।

इमाम की तरफ़ से गुण यह है कि मुसीबत, समस्याओं और परेशानियों में धैर्य रखे।

इमाम अली (अ) ने क्या किया? उनका हक़ छीन लिया, उनके हाथों को बांधा लेकिन आप चुप रहे और किसी भी समय धैर्य को हाथ से नही जाने दिया।

9. اَلصَّغَائِرُ مَنَ الذُّنُوبِ طُرُقٌ اِلَی الْکَبَائِرِ مَنْ لَمْ یَخَفِ اللهَ فی الْقَلِیلِ لَمْ یَخَفْهُ فِی الْکَثِیرِ و لو لم یخوف اللہ الناس بجنۃ و نار لکان الواجب علیھم ان یطیعوہ و لا یعصوہ، لتفضلہ علیھم، و احسانہ الیھم، و ما بداھم بہ من انعامہ الذی ما استحقوہ

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते हैं कि छोटे गुनाहों से बचो, छोटे पाप बड़े गुनाहों तक पहुँचने का रास्ता हैं (एक बड़े से बांध में अगर छोटा सा भी छेद हो जाए तो पूरा बांध तबाह हो जाता है) और जो छोटे गुनाहों में ख़ुदा से नही डरता है वह बड़े गुनाहों में भी ख़ुदा से नही डरता है।

फिर आप फ़रमाते हैं कि अगर ईश्वर ने हमे डराया ना होता स्वर्ग और नर्क से (कि अगर पाप करोगे तो नर्क में डाले जाओगे) तब भी ईश्वर का अधिकार यह था कि उसके आदेशों की अवहेलना ना की जाए, पाप ना किया जाए, क्यों? क्योंकि उसने यह नेमतें हमें दी हैं, और उसने एहसान किया है।

अगर किसी को इस संसार की हर चीज़ दे दी जाती लेकिन उसको आँखें ना दी जाती, या वह अपाहिज होता या इसी प्रकार की कोई समस्या होती तो क्या करता। यह ख़ुदा है जिसने हमको यह नेमतें दी हैं।

आज शायद हमारा कोई भाई यह कहे कि हम ख़ुदा का शुक्र क्यों करे उसने हमको इतनी समस्याओं में घेर रखा है हमारा बच्चा बीमार है, मेरी नौकरी नही लग रही है, बेटी की शादी नही हो रही है... आदि

तो याद रखिए कि इस संसार में जो सबसे अधिक समस्याओं में घिरा हुआ है उसको भी ख़ुदा का शुक्र करना चाहिए।क्यों? क्योंकि उसने जो हमको नही दिया है हमको उसे मांगने का हक़ नही था और जो हमको दे दिया है हम उसके क़र्ज़दार हैं। हमको यह कहने का अधिकार नही है कि हे ईश्वर क्यों उसको इतना दिया और हमको इतना। यह सदैव ध्यान रखना चाहिए कि ख़ुदा ने जिसको जितना दिया है उससे उतना ही चाहा है उसका दायित्व भी उतना ही बड़ा है, एक अंधे इन्सान का दायित्व आँख वाले से भिन्न है इसी प्रकार हर इन्सान है।

इन्जील में है कि हज़रत ईसा (अ) ने कहा कि अगर शरीर का एक भाग आँख या दूसरा अंग गुनाह करे तो उसको काट कर अलग कर दो क्योंकि उस अंग को काट देना अच्छा है इससे कि वह अंग आग पकड़ ले और तुमको नर्क में पहुँचा दे।

बिलकुल सेब में पाए जाने वाले ख़राब भाग की तरह कि अगर उसको काट कर अलग नही किया गया तो वह पूरे सेब को ख़राब कर देगा।

याद रखिए कोई भी पाप छोटा या बड़ा नही होता है। हर पाप बड़ा है जिन पापों के बारे में हम यह सोचतें हैं कि छोटे हैं उनसे अधिक बचना चाहिए क्योंकि सम्भव है कि उसी पाप में ईश्वर का क्रोध छिपा हो।

۱۰۔ قال لا یتم عقل امرء مسلم حتی تکون فیہ عشر خصال: الخیر منہ مامول، و الشر منہ مامون، یستکثر قلیل الخیر من غیرہ، و یستقل کثیر الخیر من نفسہ، لا یسام من طلب الحوائج الیہ و لا یمل من طلب العلم طول دھرہ، الفقر فی اللہ احب الیہ من الغنی، و الذل فی اللہ احب الیہ من العز فی عدوہ، و الخمول اشھی الیہ من الشھرۃ، ثم قال: العاشر و ما العاشرۃ، قیل لہ: ماھی، قال: لا یری احدا الا قال: ھو خیر منی و اتقی۔

इमाम रज़ा (अ) फ़रमाते है कि किसी भी इन्सान की अक़्ल पूर्ण नही हो सकती मगर यह कि उसमे दस गुण पाए जाते हों

1. अगर कोई इन्सान समस्याओं में घिरा हो तो उसको उससे भलाई की आशा हो।

2. उसकी बुराई से लोग सुरक्षित हों।

3. दूसरे की कम भलाई को भी अधिक समझे।

4. अपनी अधिक भलाई को भी कम समझे।

5. अगर कोई उससे आवश्यकता रखता हो तो वह दुखी ना हो।

6. अपनी पूरी आयु में शिक्षा ग्रहण करने से थकता ना हो।

7. ईश्वर के रास्ते में ग़रीबी उसके लिए अच्छी हो (शैतान के रास्ते में) अमीरी से।

8. ईश्वर के रास्ते में अपमान उसके लिए अधिक प्रिय हो उसके शत्रु के रास्ते में सम्मान से।

9. गुमनामी उसके लिए अच्छी हो प्रसिद्धी से।

फिर आपने कहा दसवा, और तुम क्या जानों दसवां क्या है।

आपसे पूछा गया वह दसवां गुण क्या है?

आपने फ़रमाया

10. किसी को ना देखे मगर यह कहे कि वह मुझसे अच्छा है और मुझसे अधिक परहेज़गार है।

यह हदीस यहीं पर समाप्त हो जाती है लेकिन एक दूसरी हदीस में आया है कि आपने फ़रमाया कि अगर वह किसी ऐसे व्यक्ति को देखे जिसका ज़ाहिर अच्छा हो तो कहे देखों वह मुझसे उच्च हैं, और अगर किसी ऐसे व्यक्ति को देखे जिसका ज़ाहिर अच्छा ना हो तो कहे कि ख़ुदा मैं अपने बारे में जानता हूँ कि मैने कितने पाप किये हैं लेकिन यह ऐसा व्यक्ति है जिसकी आत्मा पवित्र है।

 

इमाम रज़ा (अ) के कथन भाग 2

हमारे प्रिय पाठकः सलामुन अलैकुम, आज फिर हम आपके सामने हैं इमामे रज़ा (अ) के कथनों के दूसरे भाग के साथ, जैसा कि आप जानते हैं कि हम अपने सामने इमाम रज़ा (अ) के चालीस कथनों को श्रंखलावार प्रस्तुत कर रहे हैं, तो यह उसी श्रंखला का दूसरा भाग है।

हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमको इन कथनों के अनुसार कार्य करने की तौफ़ीक़ दे (आमीन)

۱۱۔ امام رضا علیه السلام:

كلّما أحدث العباد من الذنوب ما لم يكونوا يعملون ، أحدث الله لهم من البلاء ما لم يكونوا يعرفون؛

11. जब भी लोग कोई ऐसा नया पाप करते हैं जो पहले ना किया गया हो तो ख़ुदा उनको एक ऐसी बला में डाल देता है जो पहले न आई हो।

۱۲۔ قال علیه السلام:

صاحِبُ النِّعْمَةِ یَجِبُ اَن یُوَسِّعَ علی عیالِهِ؛

12. जिसके पास नेमत हो उसके लिए अनिवार्य है कि परिवार के लिए ख़र्चे के बढ़ाए (कंजूसी ना करे)

۱۳۔ قال علیه السلام:

إنّ الله يبغض القيل والقـال و إضـاعة المـال و كثـرة السـؤال۔

13. ख़ुदा क़ील और क़ाल (इधर उधर की बातें करना) अधिक बोलने, माल और सम्पत्ति को बरबाद करने, और बहतु अधिक इच्छाएं रखने को पसंद नहीं करता है

۱۴۔ عن رجل من اهل بلخ، قال:

كنت مع الرضا «عليه السلام» في سفره إلي خراسان، فدعا يوما بمائدة له، فجمع عليها مواليه من السودان و غيرهم.

 فقلت: جعلت فداك! لو عزلت لهؤلاء مائدة؟

 فقال: مه إنّ الرّبّ - تبارك و تعالي - واحد، و الأم واحدة، و الأب واحد، و الجزاء بالاعمال

14. बलख़ का रहने वाला एक व्यक्ति कहता हैः इमाम रज़ा (अ) के साथ एक यात्र में जब आप ख़ुरासान जा रहे थे मैं आपके साथ था। एक दिन आपने अपने दस्तरख़ान पर सारे गोरे और काले दासों को खाने के लिए बुलाया,

मैंने आपसे कहाः मैं आप पर क़ुरबान जाऊँ, अच्छा तो यह था कि इनके लिए अलग दस्तरख़ान बिछाया जाता।

आपने फ़रमायाः चुप रहो, जान लो कि सबका ईश्वर एक है, सब एक ही माँ बाप (आदम और हव्वा) की औलाद हैं, हर एक का सवाब और सज़ा भी उसके कार्यों के अनुसार है।

۱۵۔ قال عليه السّلام:

اَلنَظَر اِليَ ذُريتِنّا عِبادَةٌ،

فَقيلَ لَهُ : يابنَ رَسُولِ اللهِ، النَّظَرُ اِليَ الاَئِمَةٍ مِنْكُمْ عِبادةٌ اَمْ اَلنَظُر اليَ جَميع ذُريةَ النبي عليه السّلام؟

فَقالَ: بَلِ اَلنَظُر اليَ جَميع ذُريةِ النَّبي عَبادَة‏ ما لَمْ  يُفارِقُوا مِنهاجَهُ وَلَم يَتَلَوَّثوا بِالَمُعاصي

15. हमारे परिवार वालों और औलाद को देखना इबादत है।

कहा गया कि हे अल्लाह के नबी के बेटेः मासूम इमामों को देखना इबादत है या पैग़म्बर की सारी औलादों (चाहे वह मासूम हों या ना हों) को देखना इबादत है?

आपने फ़रमायाः पैग़म्बर (स) की हर औलाद को देखना इबादत है जब तक कि वह पैग़म्बर के रास्ते और आपकी शैली से अलग ना हो गए हों और पापो एवं गुनाहों में ना लिप्त हो गए हों।

۱۶۔ قال علیه السلام:

من أحب عاصياً فهو عاص و من أحب مطيعاً فهو مطيع و من أعان ظالماً فهو ظالم و من خذل ظالماً فهو عادلٌ.

 إنَّهُ ليس بين الله و بين أحد قرابة و لا تنال ولاية الله إلاّ بالطاعة؛

16. जो भी किसी पापी को दोस्त रखे वह भी पापी और गुनाहगार है, और जो भी ख़ुदा के आदेशों का पालन करने वाले को दोस्त रखे वह भी पालन करे वाला है, और जो भी किसी अत्याचारी या ज़ालिम की सहायता करे वह भी अत्याचारी है, और जो अत्याचारी को ज़लील करे वह आदिल है।

जान लो कि ख़ुदा  से किसी की रिश्तेदारी नहीं है और किसी को भी ख़ुदा की दोस्ती और विलायत नहीं मिलेगी मगर यह कि वह उसके आदेशों का पालन करे।

۱۷۔ قال علیه السلام:

اَلسَّخىُّ يَأكُلُ مِن طَعامِ النّاسِ لِيَأكُلوا مِن طَعامِهِ ، والبَخيلُ لا يَأكُلُ مِن طَعامِ النّاسِ لِئَلاّ يَأكُلوا مِن طَعامِهِ؛

17. उदार (सख़ी) इन्सान लोगों के खाने से खाता है ताकि वह भी उसके खाने से खाएं, और कंजूस व्यक्ति लोगों के खाने से नहीं खाता है ताकि वह भी उसके खाने से न खाएं।

۱۸۔ قال علیه السلام:

عَظِّمُوا كبارَكم و صِلُوا أرحامكم فليس تَصِلوُنَهُم بشىءٍ أفضل من كف الاذى عنهم؛

18 अपने सम्मानित व्यक्तियों और पीरों का सम्मान करो, और रिश्तोदारों से मेल जोर रखों, और उनके साथ कोई भी मेल जोल इससे अच्छा नहीं है कि उनको परेशान ना करो और तकलीफ़ ना दो।

۱۹۔ سئل {عليه‏ السلام}

أ تکون الارض و لا امام فيها؟

فقال (عليه‏ السلام): إذاً لساخت بأهلها.

19. इमाम रज़ा (अ) से सवाल किया गयाः

क्या यह हो सकता है कि धरती अपने स्थान पर रहे जब्कि कोई मासूम उसपर ना हो?

आपने फ़रमायाः ऐसी अवस्था में (कि जब कोई मासूम धरती पर ना हो) ज़मीन अपने रहने वालों को निगल जाएगी। (यानी हर समय में इस ज़मीन पर किसी ना किसी मासूम का रहना आवश्यक है ताकि धरती अपने स्थान पर रहे।)

 ۲۰۔ قال عليه السلام:

مَن استغفر الله بلسانه و لم يندم بقلبه فقد استهزأ بنفسه

و مَن سأل الله التوفيق و لم يجتهد فقد استهزأ بنفسه

و من سأل الله الجنة و لم يصبر علي الشدائد فقد استهزأ بنفسه

و من تَعَوَّذَ بالله مِنَ النار و لم يترك شهوات الدنيا فقد استهزأ بنفسه

و من ذكر الموت و لم يَستَعِدَّ له فقد استهزأ بنفسه

و من ذكر الله تعالي و لم يَشتَق الي لقائه فقد استهزأ بنفسه

20. जो अपनी ज़बान से तो क्षमा और माफ़ी मांगे लेकिन आत्मा और दिल लज्जित ना हो, तो निसंदेह उसने अपना मज़ाक़ उड़ाया है।

और जो भी कामियाबी और जीत चाहता हो लेकिन उसके लिए प्रयत्न ना करे उसने अपना उपहास किया है।

और जो भी ख़ुदा से जन्नत चाहे लेकिन कठिनाइयों और मुसीबतों में सब्र और धैर्य ना रखे उसने अपना मज़ाक़ उड़ाया है।

और जो भी ख़ुदा से नर्क की आग से बचने की इच्छा करे लेकिन अपनी इच्छाओं और दुनिया को प्राप्त करने की इच्छा को ना छोड़े उसने अपना उपहास किया है।

और जो भी मौत को याद करे लेकिन स्वंय को मरने के लिए तैयार ना करे वास्तव में उसने अपना मज़ाक़ उड़ाया है।

और जो भी ख़ुदा को याद करे लेकिन (मौत से) उस से मिलने की तमन्ना ना करे उसने अपना उपहास किया है।

 

इमाम रज़ा (अ) के कथन भाग 3

 

۲۱۔ قال امام الرضا علیه السلام:

لیس العبادة كثرة الصیام و الصلاة، و انما العبادة كثرة التفكر فی أمر الله؛

21. इबादत अधिक रोज़े रखने और नमाज़ पढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि ख़ुदा के बारे में अधिक चिंतन करना इबादत है (ईश्वर की गढ़ी गई स्रष्टि के बारे में चिंतन करना)

बिहारुल अनवार और वसाएलुश्शिया में आया हैः नमाज़ रोज़े से अधिक महत्वपूर्ण है।

۲۲۔ قال علیه السلام

صديق كل امرء عقله و عدوّه جهله

22. हर इन्सान की अक़्ल और बुद्धि उसकी दोस्त है और अज्ञानता और जानकारी का ना होना उसकी दुश्मन।

۲۳۔ سئل علیه السلام عن خیـار العبـاد؟ فقــالعلیه السلام

الذیـن إذا أحسنوا استبشروا, إذا أساؤوا استغفروا و إذا أعطوا شکـروا, و إذا ابتلو صبروا, و إذا غضبوا عفوا

23. ईश्वर के बेहतरीन बंदों के बारे में प्रश्न किया गया, तो आपने फ़रमायाः बेहतरीन बंदे वह हैं कि जब अच्छा कार्या करते हैं तो प्रसन्न होते हैं, और जब बुरा कार्य करते हैं तो क्षमा मांगते हैं, और जब उनको कुछ दिया जाए तो शुक्र और अभिवादन करते हैं, और जब किसी मुसीबत और कठिनाई में पड़ जाएं तो धैर्य रखते हैं, और जब क्रोधित होते हैं तो क्षमा कर देते हैं।

۲۴۔ قال علیه السلام

إنَّ الَّذِی یَطْلُبُ مِنْ فَضْلٍ یَکُفُّ بِهِ عِیَالَهُ أَعْظَمُ أَجْراً مِنَ الْمُجَاهِدِ فِی سَبِیلِ اللَّهِ؛

24. जो भी संसारिक कार्यों के लिए कोशिश करता है अपनी रोज़ी तो मांगता है ताकि उससे अपने परिवार का भरण पोषण करे तो उसका सवाब ख़ुदा के लिए जिहाद करने वाले से अधिक है।

۲۵۔ قال علیه السلام

يأتـى علـى الناس زمـان تكون العافية فيه عشرة أجزاء: تسعة منها فى اعتزال الناس و واحد فى الصمت.

25. लोगों पर एक ऐसा समय आएगा कि जब सलामती के दस भाग होंगे जिसमें से नौ भाग लोगों से दूर रहने में और एक भाग चुप रहने में होगा।

۲۶۔ قال علیه السلام

ليـس لبخيل راحة, و لا لحسـود لذة و لا لملـوك وفـاء ولا لكذوب مــروة

26. कंजूस के लिए सुकून नहीं है, और जलने वाले के लिए मज़ा और प्रसन्नता नहीं है, बादशाहों के लिए वफ़ा नहीं है, और झूठे के पास मुरुव्वत नहीं है।

۲۷۔ قال علیه السلام

«أَلاَخُ الاَكْبَرُ بِمَنْزِلَةِ الاْأبِ».

27. बड़ा भाई बाप के बराबर होता है।

۲۸۔ روی عن عبدالعظیم، عَنْ أَبِی الْحَسَنِ الرِّضَا(علیه السلام) قَالَ: «یَا عَبْدَ الْعَظِیمِ! أَبْلِغْ عَنِّی أَوْلِیَائِیَ السَّلَامَ وَ قُلْ لَهُمْ أَنْ لَا یَجْعَلُوا لِلشَّیْطَانِ عَلَى أَنْفُسِهِمْ سَبِیلًا وَ مُرْهُمْ بِالصِّدْقِ فِی الْحَدِیثِ وَ أَدَاءِ الْأَمَانَةِ وَ مُرْهُمْ بِالسُّکُوتِ وَ تَرْکِ الْجِدَالِ فِیمَا لَا یَعْنِیهِمْ وَ إِقْبَالِ بَعْضِهِمْ عَلَى بَعْضٍ وَ الْمُزَاوَرَةِ فَإِنَّ ذَلِکَ قُرْبَةٌ إِلَیَّ وَ لَا یَشْتَغِلُوا أَنْفُسَهُمْ بِتَمْزِیقِ بَعْضِهِمْ بَعْضاً فَإِنِّی آلَیْتُ عَلَى نَفْسِی إِنَّهُ مَنْ فَعَلَ ذَلِکَ وَ أَسْخَطَ وَلِیّاً مِنْ أَوْلِیَائِی دَعَوْتُ اللهَ لِیُعَذِّبَهُ فِی الدُّنْیَا أَشَدَّ الْعَذَابِ وَ کَانَ فِی الْآخِرَةِ مِنَ الْخاسِرِینَ»؛

28. हज़रत अब्दुल आज़ीम (अ) इमाम रज़ा (अ) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमायाः हे अब्दुल अज़ीम मेरी तरफ़ से मेरे दोस्तों के यह संदेश देना और उनसे कहना कि शैतान को स्वंय पर नियंत्रण करने के लिए रास्ता ना  दें और उनको आदेश देना कि बोलने और अमानत में सच्चाई रखें, और जो चीज़ उनके काम की ना हो उसमें ख़ामोश रहें, आक्रमकता को छोड़ दें, एक दूसरे के क़रीब आएं और एक दूसरे से भेंट करें और यह मुझ से क़रीब होने का माध्यम हैं, और एक दूसरे से लड़ने में अपने आप को व्यस्त ना करें, क्योंकि मैं ने स्वंय से क़सम खाई हैं कि जो भी ऐसा करेगा और मेरे दोस्तों में से किसी को क्रोधित करेगा उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि इस संसार में उसको कठिन अज़ाब दे और आख़ेरत में वह हानि उठाने वालों में से होगा।

۲۹۔ قال علیه السلام

من القی جلباب الحیاء فلا غیبة له

29 जो भी शर्म और लज्जा के पर्दे को चाक कर दे तो उसकी ग़ीबत (किसी की पीठ पीछे उसके बारे में बात करना) जाएज़ है।

۳۰۔  قال علیه السلام

لاتدعوا العمـل الصالـح و الاجتهاد فى العبادة اتکالا على حب آل محمد (صلی الله علیه و آله و سلم) و لا تدعوا حب آل محمـد(صلی الله علیه و آله و سلم) لامرهـم اتکـالا علـى العبـادة فـانـه لایقـبل احـدهـمـا دون الاخر

30 कभी भी अच्छे कार्यों और ख़ुदा की अराधना को कोशिश को अहलेबैत की मोहब्बत की आशा में ना छोड़ो (यानि यह ना कहो कि हम अहलेबैत के मानने वाले हैं तो हमको इबादत से क्या लेना) और कभी भी अहलेबैत की दोस्ती को अपनी इबादत पर भरोसा करते हुए ना छोड़ना, क्योंकि कभी भी एक दूसरे के बिना स्वीकार नहीं किया जाएगा।

 

इमाम रज़ा (अ) के कथन भाग 4

۳۱۔ قال الرضا علیه السلام:

«اَفضَلُ المالِ ما وَقی بِهِ العِرضُ وَاَفضَلُ العَقلِ مَعرِفةُ الاِنسان ِ نَفسَهُ»

31. बेहतरीन माल वह माल है जो इन्सान के सम्मान की रक्षा करे और बेहतरीन अक़्ल अपने आप को पहचानना है।

۳۲۔ قال علیه السلام:

فِي الدِّيكِ الْأَبْيَضِ خَمْسُ خِصَالٍ مِنْ خِصَالِ الْأَنْبِيَاءِ؛ مَعْرِفَتُهُ بِأَوْقَاتِ الصَّلَاةِ وَ الْغَيْرَةُ وَ السَّخَاءُ وَ الشَّجَاعَةُ وَ كَثْرَةُ الطَّرُوقَةِ۔

32. सफ़ेद मुर्ग़े में नबियों के गुणों में से पाँच गुण पाए जाते हैं:

1. नमाज़ के समय की पहचान (ख़ुदा की इबादत के समय को जानते हैं और उसकी इबादत करते हैं)

2. ग़ैरत।

3. सख़ावत (उदारता)।

4. बहादुरी।

5. नामूस (अपनी औरतो) की रक्षा।

۳۳۔ قال علیه السلام:

شِيعَتُنا الْمُسَلِّمُونَ لِأمْرِنا الْآخِذُونَ بِقَولِنا، الْمُخالِفُونَ لِأعْدائِنا فَمَنْ لَمْ يَکنْ کذالِک فَلَيْسَ مِنّا۔

33. हमारे शिया हमारे सामने सर झुकाए हैं, और हमारे आदेशों का पालन करते हैं, और हमारे शत्रुओं के विरोधी हैं, तो जो भी ऐसा न हो वह हमसे नहीं है।

۳۴۔ قال فی سفره إلی المأمون، فی النیشابور:

سمعت أبی موسی بن جعفر یقول سمعت أبی جعفربن محمد یقول سمعت ابی محمدبن علی یقول سمعت ابی علی بن الحسین یقول سمعت ابی الحسین بن علی بن ابی طالب یقول سمعت ابی امیرالمؤمنین علی بن ابی طالب یقول سمعت رسول الله صلی الله علیه وآله وسلم یقول سمعت جبرئیل یقول سمعت الله جل جلاله یقول:

لااله الاالله حصنی فمن دخل حصنی امن من عذابی

 قال فلمّا مرّت الراحلة نادانا

 "بشروطها وانا من شروطها"

34. इमाम रज़ा (अ) अपनी ख़ुरासान यात्रा में (जो कि मामून की इच्छा बल्कि ज़बरदस्ती से हुआ था,) जब नैशापूर पहुँचे तो वहां के विद्वान एकत्र हो गए और आपसे कहा कि उनके लिए कोई हदीस बयान करें।

इमाम ने महमिल से अपना सर बाहर निकाला और फ़रमायाः मैंने अपने पिता मूसा बिन जाफ़र (अ) से सुना और उन्होंने अपने पिता इमाम सादिक़ (अ) से सुना और उन्होंने अपने पिता मोहम्म्द इब्ने अली (इमाम बाक़िर) (अ) से सुना और उन्होंने अपने पिता अली बिनुल हुसैन (इमाम सज्जाद) (अ) से सुना और उन्होंने हुसैन बिन अली (अ) से सुना और उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) से सुना और उन्होंने रसूले ख़ुदा (स) से सुना कि आपने फ़रमायाः मैंने जिब्रईल से सुना कि ख़ुदा फ़रमाता है "ला इलाहा इल्लललाह मेरा मज़बूत क़िला है और जो भी मेरे किले में प्रवेश कर जाए वह मेरे अज़ाब से सुरक्षित है"।

रावी कहता हैः जब इमाम का क़ाफ़िला चल पड़ा तो आपने हमको संबोधित कर के फ़रमायाः

इसके लिए शर्तें है और मैं (यानी मासूम इमाम की इमामत का विश्वास रखना) उसकी एक शर्त हूँ।

۳۵۔ قال علیه السلام:

مَن تَذَكَّرَ مُصابَنا و بَكی لما ارتُكِبَ منّا، كان معنا فی درجتنا یوم القیامة،

و من ذكر بمصابنا فبكی و أبكی لم تبك عینه یوم تبكی العیون،

ومن جلس مجلساً یحیی فیه أمرنا لم یمت قلبه یوم تموت القلوب؛

35.जो भी हमारी मुसीबतों को याद करे और हम पर होने वाले अत्याचारों के लिए रोए वह क़यामत के दिन हमारे साथ और हमारे मर्तबे में होगा।

और जो भी हमारी मुसीबतों को याद करके ख़ुद रोए और दूसरों को रुलाए, तो उसकी आँखे उस दिन नही रोएंगी जब सबकी आँखें रो रही होंगी।

और जो भी उस बैठक में जहां हमारा अम्र (अहलेबैत के अहकाम और अक़ीदे) ज़िन्दा किया जाता है बैठे तो उसका दिल उस दिन नहीं मरेगा जब सबके दिल मुर्दा होंगें।

۳۶۔ سُئِلَ {عليه السلام} عَنْ حَدِّ التَّوَكُّلِّ؟ فَقالَ {عليه السلام}:

أَنْ لا تَخافَ أحَدًا إِلاَّاللّهَ

36. तवक्कुल और भरोसे के बारे में आपसे प्रश्न किया गया। आपने फ़रमायाः

यह है कि ख़ुदा के अतिरिक्त किसी से ना डरो।

۳۷۔ قال علیه السلام:

التَوَدُّدُ اِلَی الناسِ نِصفُ العَقل؛

37. लोगों से दोस्ती को प्रकट करना आधी अक़्ल है।

۳۸۔ قال علیه السلام:

رَحِمَ اللَّهُ عَبْداً أَحْيَا أَمْرَنَا،

 فَقُلْتُ لَهُ وَ كَيْفَ يُحْيِي‏أَمْرَكُمْ‏؟

قَالَ: يَتَعَلَّمُ عُلُومَنَا وَ يُعَلِّمُهَا النَّاسَ، فَإِنَّ النَّاسَ لَوْ عَلِمُوا مَحَاسِنَ كَلَامِنَا لَاتَّبَعُونا۔

38. ख़ुदा रहम करे उस बंदे पर जो हमारे अम्र को जीवित करे।

(हदीस का रावी हेरवी कहता हैः) मैंने पूछा आपका अम्र किस प्रकार जीवित होता है?

आपने फ़रमाया हमारे इल्म और शिक्षा को ग्रहण करे और लोगों को बताए, निंसंदेह अगर लोग हमारे कथनों की अच्छाई और ख़ूबी को जान लें तो वह हमारा अनुसरण करेंगे।

 ۳۹۔ قال علیه السلام:

معني قول القائل: بسم الله، أي أسِمَ علي نفسي بِسِمَةٍ مِن سِمات الله عزوجل، و هي العبودية

قال: فقلت: ما السِّمَة؟

قال: العلامة

39. जो यह कहता है कि बिस्मिल्लाह उसका अर्थ यह है कि मैं अपने अस्तित्व में ख़ुदा की निशानियों में से एक निशानी लगाता हूँ, और वह निशानी बंदगी और ख़दा की इबादत है।

मैने पूछा सेमत का क्या मतलब है?

आपने फ़रमायाः निशानी और चिन्ह।

۴۰۔ قال علیه السلام:

عليكم بصلاه الليل فما من عبد مومن يقوم آخر الليل فيصلي ثمان ركعات و ركعتي الشفع و ركعة الوتر و استغفر الله في قنوته سبعين مرة الاّ أجيرَ من عذاب القبر و من عذاب النار و مُدَّ لَهُ في عُمرِهِ و وُسِّعَ عليه في معيشته۔

 ثم قال‌ عليه السلام: ان البيوت التي يصلي فيها بالليل يزهر نورها لاهل السماء كما يزهر نور الكواكب لاهل الارض

40. तुम पर ज़रूरी है कि नमाज़े शब पढ़ो, कोई ऐसा बंदा नहीं है कि जो रात के अंतिम पहर में उठे और आठ रकअत (चार दो रकअती ) नमाज़ पढ़े और दो रकअत नमाज़े शफ़अ पढ़े और एक रकअत नमाज़ वित्र पढ़े और नमाज़ वित्र के क़ुनूत में 70 बार इस्तिग़फ़ार (खु़दा से अपने पापों के लिए क्षमा याचना) करे, मगर यह कि वह क़ब्र के अज़ाब और नर्क की आग से सुरक्षित होगा। उसकी आयु लम्बी होगी और उसके जीवन और रोज़ी में बरकत होती है।

फिर आपने फ़रमायाः जान लो कि जिन घरों में रात में नमाज़ पढ़ी जाती है, उनका प्रकाश आसमान वालों के लिए प्रकाशमयी होगा जिस प्रकार सितारों का प्रकाश ज़मीन पर रहने वालों के लिए प्रकाश देता है।