इमाम जवाद (अ) के कथन भाग 1



 بسم الله الرحمن الرحیم

۱۔ قالَ الإمام الجواد علیه السلام

مَنْ أصْغی إلی ناطِق فَقَدْ عَبَدَهُ، فَإنْ كانَ النّاطِقُ عَنِ اللهِ فَقَدْ عَبَدَاللهَ، وَ إنْ كانَ النّاطِقُ یَنْطِقُ عَنْ لِسانِ إبلیس فَقَدْ عَبَدَ إبلیس۔

1. जो भी किसी कहने वाले की बात को सुने और उस पर ध्यान दे, यह ऐसा ही है जैसे उसने उसकी पूजा की हो, तो अगर वह कहने वाला ईश्वरीय हो (ख़ुदा की बात कहता हो) तो उसने ख़ुदा की इबादत की है, और अगर कहने वाला शैतान की ज़बान बोल रहा हो तो उसने शैतान की पूजा की है।

۲۔ قال له رجلٌ: أوصِنی

قال علیه السلام: و تَقَبَّل؟

قال: نعم. قالَ علیه السلام:

تَوَسَّدِ الصَّبْرَ، وَ اعْتَنِقِ الْفَقْرَ، وَ ارْفَضِ الشَّهَواتِ، وَ خالِفِ الْهَوی، وَ اعْلَمْ أنَّكَ لَنْ تَخْلُو مِنْ عَیْنِ اللهِ، فَانْظُرْ كَیْفَ تَكُونُ۔

2. एक व्यक्ति ने इमाम जवाद से कहा मुझे नसीहत कीजिए, आपने फ़रमायाः क्या (नसीहत) स्वीकार करोगे? उसने कहाः हां, आपने फ़रमायाः धीरज और सब्र को अपनी तकिया बनाओ, और ग़रीबी को आग़ोश में ले लो, और शहवतों (इच्छाओं) को दूर फेंक दो, और नफ़्स की ख़्वाहिशों का विरोध करो, और जान लो कि तुम कभी भी ख़ुदा की आँख से ओझल नहीं हो, तो ध्यान रखों कि क्या कर रहे हो।

۳۔ قالَ علیه السلام:

الْمُؤمِنُ یَحْتاجُ إلی ثَلاثِ خِصال: تَوْفیق مِنَ اللهِ عَزَّ وَ جَلَّ، وَ واعِظ مِنْ نَفْسِهِ، وَ قَبُول مِمَّنْ یَنْصَحُهُ۔

3. मोमिन को तीन चीज़ की आवश्यक्ता होती है

1. ख़ुदा की तरफ़ से तौफ़ीक़।

2. अपने आप को नसीहत करने वाला हो।

3. जो भी उसको नसीहत करे उसको स्वीकार करे।

۴۔ قال علیه السلام:

أَوْحَی اللّهُ إِلی بَعْضِ الاْنْبِیاءِ: أَمّا زُهْدُکَ فِی الدُّنْیا فَتُعَجِّلُکَ الرّاحَةَ، وَ أَمّا إِنْقِطائُکَ إِلَیَّ فَیُعَزِّزُکَ بی، وَ لکِنْ هَلْ عادَیْتَ لی عَدُوًّا وَ والَیْتَ لی وَلِیًّا۔

4. ख़ुदा ने एक नबी पर वही (आकाशवाणी) कीः तुम्हारा दुनिया से ज़ोहद और उससे दूरी, तुम्हारी राहत और आराम की तरफ़ तेज़ी है, और तुम्हारा मेरी तरफ़ आना मेरे नज़दीक तुम्हारी इज़्ज़त और सरदारी है,

लेकिन क्या तुमने मेरे दुश्मन से दुश्मनी और मेरे दोस्त से दोस्ती की है?

(यानी क्या तुमने तवल्ला और तबर्रा किया है)

۵۔ قال علیه السلام:

مَنْ غَلَبَ جَزَعُهُ عَلی صَبْرِهِ حَبِطَ أَجْرُهُ؛

5. जिसकी बेताबी और फ़रयाद उसके धैर्य से आगे निकल जाए उसका सवाब बरबाद हो जाता है।

۶۔ قال علیه السلام:

تَأخیرُ التَّوْبَةِ إِغْتِرارٌ وَ طُولُ التَّسْویفِ حَیْرَةٌ، وَ الاْعْتِذارُ عَلَی اللّهِ هَلَکَةٌ وَ الاِْصْرارُ عَلَی الذَّنْبِ أَمْنٌ لِمَکْرِ اللّهِ «فَلا یَأْمَنُ مَکْرَ اللّهِ إِلاَّ الْقَوْمُ الْخاسِرُونَ»؛(سوره اعراف، آیه 99}

6. तौबा में देरी करना धोखा खाना है, और अधिक आज, कल करना भटकना है, और ख़ुदा के मुक़ाबले में बहानेबाज़ी हलाकत और बरबादी है, पाप पर ज़िद (बार बार पाप करना और तौबा न करना) ख़ुदा की तदबीर (नीति) से ग़ाफ़िल रहना है (और ख़ुदा की तदबीर से वही ग़ाफ़िल रहता है जो हानि उठाने वाला है।)

۷۔ قال علیه السلام:

 «إِظْهارُ الشَّیْءِ قَبْلَ أَنْ یُسْتَحْکَمَ مَفْسَدَةٌ لَهُ

7. मज़बूत और शक्तिशाली होने से पहले किसी चीज़ को ज़ाहिर करना उसकी बरबादी का कारण होता है।

 ۸۔ قال علیه السلام:

 «مُلاقاتُ الاْخْوانِ نَشْرَةٌ وَ تَلْقیحٌ لِلْعَقْلِ وَ إِنْ کانَ نَزْرًا قَلیلاً

 8. हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी कहते हैं: मैंने इमाम जवाद (अ) से सुना कि आपने फ़रमायाः दीनी भाई से मुलाक़ात सुकून सोंच में ठहराव का कारण है इसी प्रकार अक़्ल के बढ़ने का कारण होता है चाहे बहुत कम ही हो।

۹۔ قال علیه السلام:

 «إِیّاکَ وَ مُصاحَبَةَ الشَّریرِ فَإِنَّهُ کَالسَّیْفِ الْمَسْلُولِ یَحْسُنُ مَنْظَرُهُ وَیَقْبَحُ أَثَرُهُ

9. बुरे और शरारती लोगों से दोस्ती और उठने बैठने से बचो, क्योंकि वह खिंची हुई तलवार की तरह है जिसको देखना अच्छा है लेकिन उसका प्रभाव बहुत बुरा है।

۱۰۔ قال علیه السلام:

«کَیْفَ یُضیِّعُ مَنْ أَللّهُ کافِلُهُ، وَ کَیْفَ یَنْجُوا مَنْ أَللّهُ طالِبُهُ وَ مَنِ انْقَطَعَ إِلی غَیْرِ اللّهِ وَکَلَهُ اللّهُ إِلَیْهِ

10. वह कैसे अकेला रह सकता है और बरबाद हो सकता है जिसका अल्लाह कफ़ील हो? और वह कैसे भाग सकता है जिसका ख़ुदा पीछा कर रहा हो? और जो भी ख़ुदा के अतिरिक्त किसी दूसरे की तरफ़ जाए ख़ुदा उसको उसी के हवाले कर देता है।

 

इमाम जवाद (अ) के कथन भाग 2

۱۱۔ قال الامام الجواد علیه السلام:

 «مَنْ عَمِلَ عَلی غَیْرِ عِلْم ما یُفْسِدُ أَکْثَرُ مِمّا یُصْلِحُ»

11. जो बिना किसी ज्ञान और जानकारी के कोई कार्य करे उसकी ख़राबी और बरबादी उसके सुधार और विकास से अधिक है।

۱۲۔ قال علیه السلام:

 «مَنْ أَطاعَ هَواهُ أَعْطی عَدُوَّهُ مُناهُ»

12. जो भी अपनी हवस (इच्छाओं का) अनुसरण करे उसने वास्तव में अपने शत्रु की इच्छा को पूरा किया है।

۱۳۔ قال علیه السلام:

مَن هَجَرَ المداراة قارنه المکروه، و من لم یعرف الموارد أعیَته المصادر، و مَنِ انْقادَ إلَی الطُّمَأنینَهِ قَبْلَ الْخِیَرَهِ فَقَدْ عَرَضَ نَفْسَهُ لِلْهَلَكَة

13. जो भी लोगों के साथ सहनशीलता को छोड़ दे परेशानी उसकी साथी बन जाती है, और जो भी किसी कार्य में प्रवेश के रास्ते को न जानता हो उस पर निकलने के रास्ते बंद हो जाते हैं, और जो भी किसी (चीज़ या इन्सान) पर बिना आज़माए और परीक्षा लिए भरोसा कर ले वास्तव में उसने स्वंय को बरबादी के रास्ते पर खड़ा कर दिया है।

۱۴۔ قال علیه السلام:

 «أَلثِّقَةُ بِاللّهِ ثَمَنٌ لِکُلِّ غال وَ سُلَّمٌ إِلی کُلِّ عال»

14. ख़ुदा पर भरोसा हर अनमोल चीज़ की क़ीमत, और हर इज़्ज़त और ऊँचाई की सीढ़ी है।

۱۵۔ قال علیه السلام:

«لا تَکُنْ وَلِیًّا لِلّهِ فِی الْعَلانِیَةِ، عَدُوًّا لَهُ فِی السِّـرِّ»

15. ज़ाहिर में ख़ुदा के दोस्त और अंदर से ख़ुदा के दुश्मन न रहो (इस प्रकार न रहो कि तुम्हारा ज़ाहिर तो मोमिन जैसा हो लेकिन अंदर से तुम ख़ुदा के दुश्मन और मुनाफ़िक़ हो)

۱۶۔ قال علیه السلام:

عِزُّ المُؤمِنِ فی غِناهُ عَنِ النَّاسِ

16. मोमिन की इज़्ज़त लोगों से बेनियाज़ (किसी की तरफ़ हाथ न फैलाना) होने में है।

۱۷۔ قال علیه السلام:

مازارَ اَبی (علیه السلام) اَحَد فَاَصابَهُ اَذًی مِنُ مَطَرٍ اَو برد أو حَرٍ اِلّا حَرَّمَ اللهُ جَسَدَهُ عَلیَ النّارِ

17.( हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी कहते हैं: मैंने सुना कि इमाम जवाद (अ) ने फ़रमायाः) कोई भी ऐसा नहीं है जो मेरे पिता (आठवें इमाम) की ज़ियारत के लिए जाए और बारिश या सर्दी या गर्मी से उसको तकलीफ़ हो, मगर यह कि ख़ुदा ने उसके शरीर को नर्क की आग पर हराम कर दिया है।

(हां यह ध्यान रखना चाहिए कि वह ज़ियारत के लिए जाए ना कि तफ़रीह और घूमने के लिए, और ख़ुद आपने (इमाम जवाद (अ) फ़रमाया है कि यह ज़ियारत मारेफ़त के साथ हो यानी यह मानता हो कि इमाम के आदेशों का पालन हम पर वाजिब किया गया है और वह पैग़म्बरे इस्लाम के जानशीन हैं)

۱۸۔ قال علیه السلام:

 «راکِبُ الشَّهَواتِ لا تُقالُ لَهُ عَثْرَتُهُ»

18. जो भी अपनी ख़्वाहिशों और दिली इच्छाओं की सवारी पर सवार है वह कभी भी फिसलने और गिरने से अमान में नहीं है।

۱۹۔ قال علیه السلام:

 «أَلاْیّامُ تَهْتِکُ لَکَ الاْمْرَ عَنِ الاْسْرارِ الْکامِنَةِ»

19. दिनों का बीतना पर्दों को उठा देता है और तुम्हारे लिए छिपे हुए रहस्यों को खोल देता है।

۲۰۔ قال علیه السلام:

مَنْ زارَ قَبْرَ عَمَّتی بِقُمْ، فَلَهُ الْجَنَّتهُ

20. जो भी मेरी फूफी (हज़रत मासूमा) की क़ुम (ईरान का एक पवित्र और धार्मिक शहर) में ज़ियारत करे उसके लिए जन्नत है।

 

इमाम जवाद (अ) के कथन भाग 3

۲۱۔ قال الامام محمّد التقی الجواد علیه السلام:

مَن استَفادَ اَخاً فِي اللهِ، فَقَد اسْتَفادَ بَيْتاً فِي الْجَنّةِ؛

21. जो भी दीनी भाई से ख़ुदा की राह में लाभ उठाए उसने वास्तव में जन्नत में एक घर से लाभ उठाया है।

۲۲۔ قيل له عليه السلام: ما بال هؤلاء المسلمين يكرهون الموت؟

قال علیه السلام: لأنّهم جهلوه فكرهوه، و لو عرفوه و كانوا من اولياء الله عزوجل لأحبوه، و لعلموا أنّ الاخرة خير لهم من الدنيا۔

 ثم قال علیه السلام: یا أبا عبدالله ما بال الصَّبیُّ و المجنون یمتنع من الدواء المنقی لبدنه و النافی للألم عنه؟

قال: لجهلهم بنفع الدواء۔

قال علیه السلام: و الذی بعث محمّداً صلّی الله علیه و آله و سلّم بالحقّ نبیّاً، إنّ من استعدَّ للموت حقَّ الاستعداد فهو أنفع له من هذا الدواء لهذا المتعالج، اما انهم لو عرفوا ما يؤدّي إليه الموت من النعيم لاستدعوه و أحبوه أشد ما يستدعي العاقل الحازم الدواء لدفع الافات و اجتلاب السلامات۔

22. इमाम जवाद (अ) से कहा गयाः क्यों यह मुसलमान मौत दूर भागते हैं?

आपने फ़रमायाः क्योंकि उनको मौत का वास्तविक्ता का ज्ञान नहीं है, अगर वह इसको जान लें और ख़ुदा के दोस्त (वली) हों तो निसंदेह मौत को पसंद करेंगे, वह जानते थे कि आख़ेरत उनके लिए दुनिया के जीवन से अच्छी है।

फिर आपने फ़रमायाः हे अल्लाह के बंदे, क्यों बच्चे और पागल दवा खाने से बचते हैं? जब्कि दवा उनके शरीर को सही और दर्द को दूर करती है।

उसने कहाः क्योंकि वह दवा के लाभ और फ़ायदे को नहीं जानते हैं।

इमाम ने फ़रमायाः उस ईश्वर की क़सम जिसने मोहम्मद (स) को सच्चा नबी बनाया, जान लो कि हर एक को मौत के लिए तैयार रहना चाहिए, मौत उसके लिए बीमार की दवा से अधिक अच्छी है, जान लो कि अगर वह जानते कि मौत के साथ क्या क्या नेमतें मिलेंगी तो उसको मांगते और उससे मोहब्बत करते, उस अक़लमंद आदमी से भी अधिक जो दवा को मांगता है बीमारी और बला को दूर करने के लिए और स्वास्थ प्राप्त करने के लिए।

۲۳۔ قال علیه السلام:

إنَّ مَن تَکَفَّلَ بأیتام آل محمد(صلّی الله علیه و آله و سلّم) المنقطعین عن امامهم، المتحیرین فی جهلهم، الاسراء فی أیدی شیاطینهم و فی أیدی النواصب من أعدائنا، فاستنقذهم منهم و أخرجهم من حیرتهم و قهر الشیاطین بِرَدِّ وساوسهم و قَهَرَ الناصبین بحجج ربهم و دلائل ائمتهم، لیفضلوا عند الله علی العابد بأفضل المواقع باکثر من فضل السماء علی الارض و العرش علی الکرسی والحجب علی السماء۔

 و فضلهم علی هذا العابد کفضل القمر لیلة البدر علی أخفی کوکبٍ فی السماء

23. निसंदेह जो भी आले मोहम्मद (स) के यतीमों की किफ़ालत और सरपरस्ती करे, वह यतीम जो अपने इमाम और रहबर से दूर हो गए हैं, और अज्ञानता और नादानी की घाटी में भटक रहे हैं, और क़ैदियों की तरह अपने शैतानों के हाथों में हैं, और हमारे शत्रु के हाथों और उनके अत्याचारों को झेल रहे हैं,  (जिसके नतीजे में परेशानियों और समस्याओं में घिरे हैं) अगर यह व्यक्ति उनको शत्रुओं से आज़ाद करा दे, और शैतानों को ज़लील कर दे उनके वसवसों को पलटा कर, और नासेबियो एवं अहलेबैत को बुराभला कहने वालों को अपमानित कर दे ईश्वरीय और हमारे तर्कों से, ऐसा व्यक्ति ख़ुदा के नज़दीक विद्वान है जिसका मर्तबा बहुत ऊँचा है इबादत करने वाले से, उतना ही ऊँचा है जितना आसमान ज़मीन से और अर्श कुर्सी से और ख़ुदा का पर्दा आसमान से।

और आलिम और इबादत करने वाले के मर्तबों में उतना ही अंतर है जितना चौदहवीं के चाँद और आसमान के सबसे अंधेरे सितारे में।

۲۴۔ قال علیه السلام:

 «نِعْمَةٌ لا تُشْکَرُ کَسَیِّئَة لا تُغْفَرُ۔»

24. वह नेमत जिसका शुक्र अदा न किया गया हो, उस पाप की भाति है जिसको क्षमा नहीं किया गया है।

(जिस प्रकार हम यह आशा रखते हैं कि हमारे पापों को क्षमा कर दिया जाए उसी प्रकार हमको नेमत मिलने पर शुक्र भी अदा करना चाहिए, और किसी भी नेमत का कम से कम शुक्र यह है कि अलहम्दो लिल्लाह कहा जाए)

۲۵۔ قال علیه السلام:

 كفي بالمرء خيانة ان يكون امينا للخونة۔

25. इन्सान के बेईमान होने के लिए इतना ही काफ़ी है कि उसपर बेईमान लोग विश्वास करते हों।

۲۶۔ قال علیه السلام:

قيل لمحمَّد بن علي (علیه السلام): ما الموت؟

قال: هو النوم الذي يأتيكم كلّ ليلة الاّ انه طويل لاينتبه منه الاّيوم القيمة

26. इमाम जवाद (अ) से पूछा गया: मौत क्या है?

आपने फ़रमाया: मौत वही नींद है जो हर रात तुमको आती है, मगर अंतर यह है कि मौत की अवधि लंबी होती है, और इन्सान उस नींद से जागता नहीं है मगर क़यामत के दिन।

۲۷۔ قال علیه السلام:

«أَلْقَصْدُ إِلَی اللّهِ تَعالی بِالْقُلُوبِ أَبْلَغُ مِنْ إِتْعابِ الْجَوارِحِ بِالاْعْمالِ»

27. इन्सान की नियत उसके शारीरिक कार्य जिसमें कठिनाइयाँ होती है से अधिक ख़ुदा के नज़दीक़ स्वीकार होती है।

(क्योंकि हर कार्य का आधार नियत है, और संभव है कि कोई इन्सान अच्छा कार्य करे लेकिन किसी दूसरे को दिखाने के लिए हो ना कि ख़ुदा के लिए लेकिन नियत एक ऐसी चीज़ है जो किसी को दिखाने के लिए नहीं की जा सकती है, यानी नियात में रियाकारी नहीं हो सकती है क्योंकि वह दिल से होती है लेकिन अमल में संभव है कि रियाकारी हो जाए।)

۲۸۔ قال علیه السلام:

لا تعادي احدا حتي تعرف الذي بينه و بين الله تعالي، فان كان محسنا فانه لا يسلمه اليك و ان كان مسيئاً فانَّ علمك به يكفيه فلا تعاده۔

28. कभी भी किसी से उस समय दुश्मनी न करो जब तक कि उसके और ख़ुदा के बीच जो कुछ भी है सबको जान न लो, तो अगर वह नेक बंदा है तो ख़ुदा उसको तुम्हारे हवाले नहीं करेगा (ख़ुदा अपने बंदे को तुम्हें नहीं देगा और फिर तुम्हारी दुश्मनी का कोई लाभ नहीं रह जाएगा) लेकिन अगर वह पापी है तो तुम्हारा उसके बारे में जान लेना ही काफ़ी है (यानी तुम जान गए हो कि ख़ुदा उसको उसके किए की सज़ा देगा) तो (दोनों स्थितियों में) उससे दुश्मनी न करो।

۲۹۔ قال علیه السلام:

 «قَدْ عاداکَ مَنْ سَتَرَ عَنْکَ الرُّشْدَ إِتِّباعًا لِما یهْواهُ۔»

29. जो भी तरक़्क़ी के रास्ते को तुमसे छिपाए अपने नफ़्स की ख़्वाहिश का अनुसरण करते हुए, वास्तव में उसने तुम पर अत्याचार किया है।

۳۰۔ قال علیه السلام:

«من لم یرض من اخیه بحسن النیۀ لم یرضَ منه بالعطیة»

 

30. जो भी अपने दीनी भाई से उसकी अच्छी नियत के कारण राज़ी न हो (यानी अपने भाई की अच्छी नियत को स्वीकार न करे) उसके उपहारों से भी वह राज़ी नहीं होगा।

 

इमाम जवाद (अ) के कथन भाग 4

۳۱۔ قال جوادالأئمة علیه السلام:

«أوصیک بتقوی اللّه فانّ فیها السّلامة من التّلف و الغنیمة فی المنقلب»

31. मैं तुमको वसीयत करता हूँ तक़वा और परहेज़गारी की, क्योंकि तक़वे से तुम बरबाद होने से बच जाओगे, और दिनों के परिवर्तन से लाभ भी उठाओगे (यानी ज़माने का बदलना तुमपर कोई प्रभाव नहीं डाल सकेगा)

۳۲۔ قال علیه السلام:

بالتّقوي نجي نوح و من معه في السفينة و صالح و من معه من الصاعقة و بالتقوي فاز الصّابرون و نجت تلك العُصب من المهالك۔

32. तक़वा और परहेज़गारी के माध्यम से नूह (अ) और जो लोग उनके साथ कश्ती में थे ने नजात पाई, और सालेह (अ) और उनके साथियों ने बिजली के अज़ाब से (जो उसको समाप्त करने के लिए आ रहा था) नजात पाई और तक़वा के माध्यम से संयम और धैर्य रखने वाले सफ़ल होते हैं, और इसी रास्ते से बहुत से लोग विनाश से बचते हैं।

۳۳۔ قال علیه السلام:

مَن شهد أمراً فكرهه كان کمن غاب عنه، و من غاب عن أمر فرضيه كان كمن شهده؛

33.जो किसी चीज़ मे हाज़िर हो लेकिन उसको पसंद ना करे (यानि केवल शारीरिक रूप से उपस्थित रहे) वह अनुपस्थित की तरह है, और जो किसी चीज़ में उपस्थित ना हो लेकिन उससे राज़ी हो तो वह ऐसे ही है जैसे वह उपस्थित था।

۳۴۔ کتب (علیه السلام) إلی بعض أولیائه:

أمّا هذه الدنيا فإنّا فيها معترفون، ولكن مَن كان هواه هوي صاحبه و دان بدينه فهو معه حيث كان، و الاخرة هي دارالقرار۔

34. इमामे जवाद (अ) ने अपने एक दोस्त को लिखाः निसंदेह हम अहलेबैत (अ) इस दुनिया में विवश होकर दूसरे की हुकूमत को स्वीकार करते हैं, लेकिन जिसकी भी ख्वाहिश उसके दोस्त की ख़्वाहिश की तरह हो और उसी के जैसा अक़ीदा और दीन रखने वाला हो, वह हर स्थान पर (मौत के बाद) उसके साथ होगा और आख़ेरत आराम और सुकून का घर है (यानि अगर तुम मेरे दीन पर होगे तो मौत के बाद भी मेरे साथ होगे)

۳۵۔ قال علیه السلام:

العلماء فی أنفسهم خانة إن کتموا النّصیحة،

35. आलिम और बुद्धिजीवी अगर नसीहत करने से मना करें तो उन्होंने तुम से ख़यानत की है।

۳۶۔ قال علیه السلام:

إنّ اخوان الثقة ذخائر بعضهم لبعض؛

36. निसंदेह भरोसेमंद भाई एक दूसरे के लिए ख़ज़ाना (पूँजी) हैं।

۳۷۔ قال علیه السلام:

لیس الحلیم الذی لا یتقی أحداً فی مکان التقوی؛

7. जो भी परहेज़गारी के स्थान पर किसी की सुरक्षा ना कर सके वह मुत्तक़ी नहीं है (वास्तविक मुत्तक़ी वह है जो दूसरों को तक़वे की तरफ़ बुलाए)

۳۸۔ قال علیه السلام:

الحلم لباس العالم فلا تعرین منه؛

38. धैर्य और संयम आलिम के शरीर का कपड़ा है, कभी भी इस कपड़े को ना उतारो (सच्चा और वास्तविक आलिम वह है जो धैर्य और संयम रखने वाला हो)

۳۹۔ عَنْ عَبْدِ الْعَظِیمِ بْنِ عَبْدِ اللَّهِ الْحَسَنِیِّ قَالَ قُلْتُ لِمُحَمَّدِ بْنِ عَلِیِّ بْنِ مُوسَی {علیه السلام}:

یا مولای إِنِّی لَأَرْجُو أَنْ تَکُونَ الْقَائِمَ مِنْ أَهْلِ بَیْتِ مُحَمَّدٍ الَّذِی یَمْلَأُ الْأَرْضَ قِسْطاً وَ عَدْلًا کَمَا مُلِئَتْ ظُلْماً و جَوْراً۔

فَقَالَ (علیه السلام): مَا مِنَّا إِلَّا وَ هُوَ قَائِمٌ بِأَمْرِ اللَّهِ عَزَّ وَ جَلَّ وَ هَادٍ إِلَی دِینِ اللَّهِ وَ لَکِنَّ الْقَائِمَ الَّذِی یُطَهِّرُ اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ بِهِ الْأَرْضَ مِنْ أَهْلِ الْکُفْرِ وَ الْجُحُودِ وَ یَمْلَؤُ الارضَ قِسْطاً و عَدْلًا۔

هُوَ الَّذِی یخْفَی عَلَی النَّاسِ وِلَادَتُهُ وَ یَغِیبُ عَنْهُمْ شَخْصُهُ وَ یَحْرُمُ عَلَیْهِمْ تَسْمِیَتُهُ وَ هُوَ سَمِیُّ رَسُولِ الله(ص) وَ کَنِیُّهُ وَ هُوَ الَّذِی تُطْوَی لَهُ الْأَرْضُ وَ یَذِلُّ لَهُ کُلُّ صَعْبٍ وَ یَجْتَمِعُ إِلَیْهِ مِنْ أَصْحَابِهِ عِدَّةُ أَهْلِ بَدْرٍ ثَلَاثُمِائَةٍ وَ ثَلَاثَةَ عَشَرَ رَجُلًا مِنْ أَقَاصِی الْأَرْضِ وَ ذَلِکَ قَوْلُ اللَّهِ عَزَّ وَ جَلَ: ‏ایْنَما تَکُونُوا یَأْتِ بِکُمُ اللَّهُ جَمِیعاً إِنَّ اللَّهَ عَلی‏ کُلِّ شَیْ‏ءٍ قَدِیرٌ [بقره: 148.] فَإِذَا اجْتَمَعَتْ لَهُ هَذِهِ الْعِدَّةُ مِنْ أَهْلِ الْإِخْلَاصِ أَظْهَرَ اللَّهُ أَمْرَهُ فَإِذَا کَمَلَ لَهُ الْعَقْدُ وَ هُوَ عَشَرَةُ آلَافِ رَجُلٍ خَرَجَ بِإِذْنِ اللَّهِ عَزَّ وَ جَلَّ فَلَا یَزَالُ یَقْتُلُ أَعْدَاءَ اللَّهِ حَتَّی یَرْضَی اللَّهُ عَزَّ وَ جَلَّ۔

قَالَ عَبْدُ الْعَظِیمِ: فَقُلْتُ لَهُ یَا سَیِّدِی وَ کَیْفَ یَعْلَمُ أَنَّ اللَّهَ عَزَّ وَ جَلَّ قَدْ رَضِیَ؟

قَالَ: یُلْقِی فِی قَلْبِهِ الرَّحْمَةَ۔

39. हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी (ख़ुदा उनसे राज़ी और प्रसन्न हो) कहते हैं: मैंने इमाम जवाद (अ) से कहाः हे मेरे मौला और आक़ा मुझे आशा है कि आप पैग़म्बर (स) के अहलेबैत (अ) के क़ाएम हों, वही जो धरती को उसी प्रकार न्याय और इन्साफ़ से भर देगा जिस प्रकार वह ज़ुल्म और अत्याचार से भरी होगी।

इमाम (अ) ने फ़रमायाः हम में से कोई भी अहलेबैत (अ) नहीं है मगर यह कि वह ईश्वर के आदेश क़ियाम करने वाला और मार्गदर्शन करने वाला है, लेकिन वह क़ाएम जिसके माध्यम से ख़ुदा धरती को काफ़िरों इन्कार करने वालो और विरोधियों से पवित्र कर देगा, वह, वह है जिसका जन्म लोगों से छिपा, और वह स्वंय ग़ायब है और लोगों पर हराम है कि उसके नाम को ज़बान पर जारी करें, वह रसूल का हमनाम और हम कुन्नियत है, वह, वह है जिसके पैरों के नीचे ज़मीन घूमती है, और हर कठिन कार्य उसके लिए आसान है उसके पास जंगे बद्र की संख्या (313) जितने लोग दूर दराज़ स्थानों से एकत्र होंगे और यही है क़ुरआन में ख़ुदा के इस कथन का अर्थः जहां भी होगे ख़ुदा तुमको एकत्र करेगा ख़ुदा हर कार्य की शक्ति रखता है (सूरा निसा आयत 77)

तो जब भी इतने लोग ख़ुलूस के साथ उसके पास एकत्र हो जाएंगे, ख़ुदा अपने आदेश को प्रकट कर देगा, और जब भी दस हज़ार लड़ने वाले लोगों ने उसके साथ अनुबंध किया तो इमाम क़ाएम (अ) ख़ुदा के आदेश से प्रकट हो जाएंगे, और लगातार ख़ुदा के शत्रुओं से इतना लड़ेगे कि ख़ुदा राज़ी हो जाए।

हज़रत अब्दुल अज़ीम कहते हैं: मैने कहा हे मेरे मौला उनको कैसे पता चलेगा कि ख़ुदा उनसे राज़ी हो गया है?

आपने फ़रमायाः ख़ुदा उनके दिल में रहम डाल देगा (यानि एक विशेष संदेश देगा जो उसके राज़ी होने को बताएगा)

۴۰۔ قال علیه السلام:

«وَ كُلُّ أُمَّةٍ قَدْ رَفَعَ اللَّهُ عَنْهُمْ عِلْمَ الْكِتَابِ حِينَ نَبَذُوهُ وَ وَلَّاهُمْ عَدُوَّهُمْ حِينَ تَوَلَّوْهُ»

40. हर वह क़ौम जो ख़ुदा की किताब से दूर हो जाए (और उस  पर अमल ना करे) और अपने शत्रुओं को दोस्ती और सरपरस्ती के लिए चुन ले निसंदेह ख़ुदा उनसे इल्म को ले लेगा।