वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-5



वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-5

 

वहाबियत की आधारशिला रखने वाले इब्ने तैमिया ने अपने पूरे जीवन में बहुत सी किताबें लिखीं और अपनी आस्थाओं का अपनी रचनाओं में उल्लेख किया है। उन्होंने ऐसे अनेक फ़त्वे दिए जो उनसे पहले के किसी भी मुसलमान धर्मगुरु ने नहीं दिए थे विशेष रूप से ईश्वर के बारे में। वह्हाबियों का मानना है कि ईश्वर वैसा ही है जैसा कि क़ुरआन की कुछ आयतों में उल्लेख है हालांकि ऐसी आयतों की क़ुरआन की दूसरी आयतें व्याख्या करती हैं और पैग़म्बरे इस्लाम व उनके पवित्र परिजनों के कथनों से भी ऐसी आयतों की तार्कपूर्ण व्याख्या की गयी है। किन्तु इब्ने तैमिया और दूसरे सलफ़ी क़ुरआन की आयतों की विवेचना व स्पष्टीकरण से दूर रहे और इस प्रकार ईश्वर के अंग तथा उसके लिए सीमा को मानने लगे।

इब्ने तैमिया और उनके प्रसिद्ध शिष्य इब्ने क़य्यिम जौज़ी ने अपनी किताबों में इस बिन्दु पर बल दिया है कि ईश्वर सृष्टि की रचना करने से पूर्व ऐसे घने बादलों के बीच में था कि जिसके ऊपर और न ही नीचे हवा थी, संसार में कोई भी वस्तु मौजूद नहीं थी और ईश्वर का अर्श अर्थात ईश्वर की परम सत्ता का प्रतीक विशेष स्थान पानी के ऊपर था।

इस बात में ही विरोधाभास मौजूद है। क्योंकि एक ओर यह कहा जा रहा है कि ईश्वर इससे पहले कि किसी चीज़ को पैदा करता, घने बादलों के बीच में था जबकि बादल स्वयं ईश्वर की रचना है। इसलिए यह कैसे माना जा सकता है कि रचना अर्थात बादल रचनाकार से पहले सृष्टि में मौजूद रहा है? क्या इस्लामी शिक्षाओं से अवगत एक मुसलमान इस बात को मानेगा कि महान ईश्वर को ऐसे अस्तित्व की संज्ञा दी जाए जो ऐसा बेबस हो कि घने बादलों में घिरा हो और बादल उस परम व अनन्य अस्तित्व का परिवेष्टन किए हो? इस्लाम के अनुसार कोई भी वस्तु ईश्वर पर वर्चस्व नहीं जमा सकती क्योंकि क़ुरआनी आयतों के अनुसार ईश्वर का हर वस्तु पर प्रभुत्व है और पूरी सृष्टि उसके नियंत्रण में है। इब्ने तैमिया के विचारों का इस्लामी शिक्षाओं से विरोधाभास पूर्णतः स्पष्ट है।

वह्हाबियों की आस्थाओं में एक आस्था यह भी है कि ईश्वर किसी विशेष दिशा व स्थान में है। वह्हाबियों का मानना है कि ईश्वर का शरीर होने के अतिरिक्त उसकी व्यवहारिक विशेषता भी है और शारीरिक तथा बाह्य दृष्टि से भी आसमानों के ऊपर है। इबने तैमिया ने अपनी किताब मिन्हाजुस्सुन्नह में इस विषय का इस प्रकार उल्लेख किया हैः हवा, ज़मीन के ऊपर है, बादल हवा के ऊपर है, आकाश, बादलों व धरती के ऊपर हैं और ईश्वर की सत्ता का प्रतीक अर्श आकाशों के ऊपर है और ईश्वर इन सबके ऊपर है। इसी प्रकार वे पूर्वाग्रह के साथ कहते हैः जो लोग यह मानते हैं कि ईश्वर दिखाई देगा किन्तु ईश्वर के लिए दिशा को सही नहीं मानते उनकी बात बुद्धि की दृष्टि से अस्वीकार्य है।

प्रश्न यह उठता है कि इब्ने तैमिया का यह दृष्टिकोण क्या पवित्र क़ुरआन के सूरए बक़रा की आयत क्रमांक पंद्रह से स्पष्ट रूप से विरोध नहीं रखता कि जिसमें ईश्वर कह रहा हैः पूरब पश्चिम ईश्वर का है तो जिस ओर चेहरा घुमाओगे ईश्वर वहां है। ईश्वर हर चीज़ पर छाया हुया व सर्वज्ञ है। और इसी प्रकार सूरए हदीद की आयत क्रमांक चार में ईश्वर कह रहा हैः जहां भी हो वह तुम्हारे साथ है।

अब सूरए सजदा की इस आयत पर ध्यान दीजिएः और फिर उसका संचालन अपने हाथ में लिया और उससे हटकर न तो कोई तुम्हारा संरक्षक है और न ही उसके मुक़ाबले में कोई सिफ़ारिश करने वाला है।

सूरए हदीद की आयत क्रमांक 4 में ईश्वर कह रहा हैः फिर सृष्टि का संचालन संभाला और जो कुछ ज़मीन में प्रविष्ट होता है वह उसे जानता है।

और अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 5 पर ध्यान दीजिएः वही दयावान जिसके पास पूरी सृष्टि की सत्ता है।

वह्हाबियों ने इन आयतों के विदित रूप के आधार पर ईश्वर की सत्ता के प्रतीक के लिए विशेष रूप व आकार को गढ़ लिया है कि जिसे सुन कर हंसी आती है। वह्हाबियों का मानना है कि ईश्वर का भार बहुत अधिक है और वह अर्श पर बैठा है। इब्ने तैमिया ने कि जिसका सलफ़ी अनुसरण करते हैं, अनेक किताबों में लिखा है कि ईश्वर अपने आकार की तुलना में अर्श के हर ओर से अपनी चार अंगुली से अधिक बड़ा है। इब्ने तैमिया कहते हैः पवित्र ईश्वर अर्श के ऊपर है और उसका अर्श गुंबद जैसा है जो आकाशों के ऊपर स्थित है और अर्श ईश्वर के अधिक भारी होने के कारण ऊंट की काठी की भांति चरमराता है जो चरमराहट भारी सवार के कारण होती है।

इब्ने क़य्यिम जौज़ी ने जो इब्ने तैमिया के शिष्य व उनके विचारों के प्रचारक तथा मोहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के पौत्र भी हैं, अपनी किताबों में ईश्वर का इस प्रकार उल्लेख किया है कि सुनने वाले को उसके बचपन की कलपनाएं याद आ जाती हैं। वे कहते हैः ईश्वर का अर्श कि जिसकी मोटाई दो आकाशों के बीच की दूरी जितनी है, आठ ऐसे पहाड़ी बकरों की पीठ पर टिका हुआ है कि जिनके पैर के नाख़ुन से घुटने तक की दूरी भी दो आकाशों के बीच की दूरी के बराबर है। ये पहाड़ी बकरे एक समुद्र के ऊपर खड़े हैं कि जिसकी गहराई दो आकाशों के बीच की दूरी के बराबर है और समुद्र सातवें आकाश पर स्थित है। ये बातें ऐसी स्थिति में हैं कि न तो पवित्र क़ुरआन की आयतें, न पैग़म्बरे इस्लाम और न ही उनके सदाचारी साथियों ने इस प्रकार की निराधार व अतार्किक विशेषताओं का उल्लेख किया है बल्कि उनका तो मानना है कि ईश्वर कैसा है इसका उल्लेख करना भी असंभव है।

हर चीज़ से ईश्वर के आवश्यकतामुक्त होने की आस्था धर्म व पवित्र क़ुरआन की महत्वपूर्ण शिक्षाओं में है और पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में इस विषय पर चर्चा की गयी है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के सूरए बक़रा की आयत क्रमांक 263 में ईश्वर कह रहा हैः ईश्वर आवश्यकतामुक्त और सहनशील है। इसी प्रकार सूरए बक़रा की आयत क्रमांक 267 में हम पढ़ते हैः ईश्वर आवश्यकतामुक्त है और सारी प्रशंसा उसी से विशेष है।

पवित्र क़ुरआन की इन आयतों में इस प्रकार के अर्थ को केवल चिंतन मनन द्वारा ही समझा जा सकता है। पवित्र क़ुरआन मानव समाज को निरंतर तर्क का निमंत्रण देता है और दावा करने वालों से कह रहा है कि यदि उनके पास अपनी बात की सत्यता का कोई तर्क है तो उसे बयान करे।

उदाहरण स्वरूप तर्क की दृष्टि से यह कैसे माना जा सकता है कि ईश्वर आठ पहाड़ी बकरों पर सवार है। क्योंकि यदि ईश्वर वास्तव में आठ बकरों पर सवार होगा तो उसे उनकी आवश्यकता होगी। जबकि अनन्य ईश्वर पवित्र है इस त्रुटि से कि उसे किसी चीज़ की आवश्यकता पड़े। इसी प्रकार इस भ्रष्ट विचार के आधार पर कि ईश्वर का अर्श आठ बकरों पर है, यह निष्कर्ष निकलेगा कि ये आठ बकरे भी जब से ईश्वर है और जब तक रहेगा, मौजूद रहेंगी। जबकि ईश्वर सूरए हदीद की चौथी आयत में स्वयं को हर चीज़ से पहले और हर चीज़ के बाद बाक़ी रहने वाला अस्तित्व कह रहा है और सलफ़ियों के आठ बकरों सहित दूसरी कहानियों से संबंधित किसी बात का उल्लेख नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहै अलैहे व आलेही व सल्लम ईश्वर की विशेषता के संबंध में कहते हैः तू हर चीज़ से पहले था और तुझसे पहले कोई वस्तु नहीं थी और तू सबके बाद भी है।

अर्श पर ईश्वर के होने का अर्थ ईश्वर की सत्ता है जो पूरी सृष्टि पर छायी हुयी है और पूरे संसार का संचालन उसके हाथ में है। अर्श से तात्पर्य यह है कि ईश्वर का पूरी सृष्टि पर नियंत्रण है और हर वस्तु पर उसका शासन है जो अनन्य ईश्वर के अभिमान के अनुरूप है। इसलिए अर्श पर ईश्वर के होने का अर्थ सभी वस्तुओं चाहे आकाश में हों या ज़मीन में चाहे छोटी हों चाहे बड़ी चाहे महत्वपूर्ण और चाहे नगण्य हों सबका संचालन उसके हाथ में है। परिणामस्वरूप ईश्वर हर चीज़ का पालनहार और इस दृष्टि से वह अकेला है। रब्ब से अभिप्राय पालनहार और संचालक के सिवा कोई और अर्थ नहीं है किन्तु सलफ़ी ईश्वर के अर्श की जो विशेषता बयान करते हैं वह न केवल यह कि धार्मिक मानदंडों व बुद्धि से विरोधाभास रखता है बल्कि उसे बकवास के सिवा और कुछ नहीं कहा जा सकता। सलफ़ी इसी प्रकार ईश्वर के अर्श से ऐसे खंबे अभिप्राय लेते हैं कि यदि उनमें से एक न हो तो ईश्वर का अर्श ढह जाएगा और ईश्वर उससे ज़मीन पर गिर पड़ेगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम जिन्हें पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने ज्ञान के नगर का द्वार कहा है, ईश्वर के अर्श की व्याख्या इन शब्दों में करते हैः ईश्वर ने अर्श को अपनी सत्ता के प्रतीक के रूप में बनाया है न कि अपने लिए कोई स्थान।

 

वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-6

 

वहाबी समुदाय का वैचारिक संस्थापक इब्ने तैमिया एकेश्वरवाद के संबंध में विभिन्न आस्था रखता है जो कभी तो मुसलमानों की आस्थाओं से भिन्न होती है और कभी विरोधाभास रखती है। ईश्वर के बारे में उसके विचारों में से एक उसने ईश्वर को धरती के अन्य जीवों की भांति चलता फिरता और गतिशील बताया है और उसका मानना है कि ईश्वर एक स्थान से दूसरे स्थान चलता रहता है। आसमान से उतरना और चढ़ना और आकाश पर चलना तथा विभिन्न प्रकार के सिहांसनों पर बैठना, अनन्य ईश्वर के बारे में इब्ने तैमिया की रोचक बातों में से है। इब्ने तैमिया मिनहाजुस्सुन्ना नामक पुस्तक में लिखता है कि ईश्वर हर रात में आकाश से ज़मीन पर उतरता है और अरफ़े की रात में धरती से बहुत निकट हो जाता है ताकि अपने बंदों की आवाज़ सुने और निकट से उसे स्वीकार करे। ईश्वर पहले आसमान पर आकर पुकारता है कि कोई है जो मुझे पुकारे और मैं उसकी दुआओं को स्वीकार करूं।

वहाबी समुदाय के आधार पर इसी प्रकार ईश्वर के लिए विभिन्न अवसरों पर भिन्न सिंहासनों व कुर्सियों को दृष्टिगत रखा गया है। मजमूउल फ़तावा नाम पुस्तक में इब्ने तैमिया के प्रसिद्ध शिष्य इब्ने क़ैय्यिम जौज़ी के हवाले से बयान हुआ है कि हर आसमान पर ईश्वर के लिए एक सिंहासन है, जब वह पहले आसमान पर उतरता है तो उस आसमान के विशेष सिंहासन पर बैठता है और कहता है कि है कोई प्रायश्चित करने वाला ताकि उसको मैं क्षमा करूं। वह सुबह तक वहां रहता है और सुबह के समय पहले आसमान के विशेष सिंहासन को छोड़ देता है, ऊपर जाता है और दूसरी कुर्सी पर बैठता है।

मोरक्को के प्रसिद्ध पर्यटक इब्ने बतूता अपने यात्रा वृतांत में इस संबंध में वहाबी धर्म गुरुओं की ओर से रोचक कथा बयान करते हैं, वे लिखते हैं कि मैंने दमिश्क़ की जामे मस्जिद में इब्ने तैमिया को देखा जो लोगों को उपदेश दे रहा था और कह रहा था कि ईश्वर पहले आसमान पर उतरता है, जैसा कि मैं अभी नीचे उतरूंगा, फिर वह मिंबर अर्थात भाषण देने के विशेष स्थान से एक सीढ़ी नीचे उतरा। इब्ने तैमिया की इस बात पर वहां उपस्थित मालिकी पंथ के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री इब्ने ज़ोहरा ने कड़ा विरोध किया किन्तु कुछ साधारण लोग जो इब्ने तैमिया की बातों पर विश्वास कर चुके थे, मिंबर के नीचे से उठे और इब्ने ज़ोहरा की पिटाई करने लगे। उनको हंबली न्यायाधीश की ओर से भी डांट फटकार लगाई गयी किन्तु हंबली न्यायधीश का क्रियाकलाप दमिश्क़ के शाफ़ई और मालेकी न्यायधीशों और धर्मशास्त्रियों के कड़े विरोध का कारण बना। इस आधार पर इस विषय की सूचना शासक को दी गयी और उसने भी इब्ने तैमिया को जेल में डाल देने का आदेश जारी कर दिया।

वास्तव में इब्ने तैमिया ईश्वर के लिए चलने फिरने की बात को मानते हुए भौतिक जीवों की भांति ईश्वर को भी आवश्यकता रखने वाला समझता है जो अपने बंदों से संपर्क बनाने के लिए आसमान से उतरता और चढ़ता है। यह ऐसी स्थिति में है कि गति भौतिक संसार से विशेष होती है और सर्वसमर्थ ईश्वर को अपने बंदों की बातें सुनने और उनकी दुआओं को पूरा करने के लिए इधर उधर जाने और विभिन्न सिंहासनों पर बैठने की आवश्यकता नहीं होती। सूरए क़ाफ़ की आयत क्रमांक सोलह में बल दिया गया है कि ईश्वर बंदे की गर्दन की रग से भी निकट है और सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 115 में कहा गया है कि और अल्लाह के लिए पूरब भी है और पश्चिम भी इसीलिए तुम जिधर भी रुख़ करोगे वहीं ईश्वर मौजूद है वह छाया हुआ भी है और ज्ञानी भी है। इस आधार पर यह परिणाम निकाला जा सकता है कि ईश्वर हर स्थान पर मौजूद है और उसे सुनने और हर कार्य के लिए इधर उधर जाने की आवश्यकता नहीं है। यह उपस्थिति सर्वसमर्थ ईश्वर की उसी शक्ति और ज्ञान से उत्पन्न हुई है जिसके बारे में पवित्र क़ुरआन ने बारम्बार बल दिया है। उदाहरण स्वरूप सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 284 में आया है कि ईश्वर समस्त वस्तुओं पर सक्षम है। वास्तव में क्षमता और ज्ञान ईश्वर की प्रसिद्ध विशेषताओं में है जिसे पवित्र क़ुरआन में क़ादिर, आलिम, क़दीर व अलीम जैसे शब्दों के साथ बारम्बार प्रस्तुत किया गया है। इस दशा में इब्ने तैमिया से पूछना चाहिए कि क्या वास्तव में संसार का रचयिता भौतिक जीवों की भांति अपने बंदों से संपर्क बनाता है या यह संपर्क, बिना शब्द के मनुष्य के हृदय और आत्मा द्वारा होता है?

इब्ने तैमिया ने अपने मन में ईश्वर के लिए एक सिंहासन या गद्दी  की कल्पना कर ली है और उसका यहां तक मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम अपने रचयिता के बग़ल में एक कुर्सी पर विराजमान होंगे जबकि पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम अपनी समस्त शान और वैभव के बावजूद स्वयं को ईश्वर का एक निचले दर्जे का बंदा कहने पर गर्व करते हैं और पवित्र क़ुरआन भी सूरए कहफ़ की आयत क्रमांक 110 में पैग़म्बरे इस्लाम (स) को संबोधित करते हुए कहता है कि आप कह दीजिए के मैं तुम्हारे ही जैसा एक मनुष्य हुं किन्तु मेरी ओर ईश्वर का विशेष संदेश वहि आता है कि तुम्हारा ईश्वर एक अकेला है इसीलिए जो भी उससे भेंट की आशा लगाए हुए है उसे चाहिए कि भला कर्म करे और किसी को अपने ईश्वर की उपासना में भागीदार न बनाए।

इब्ने तैमिया और उसका शिष्य इब्ने क़ैय्यिम जौज़ी इन सब बातों से भी आगे बढ़ गये और उन्होंने अपनी पुस्तकों में ईश्वर को एक नरेश की भांति बताया। मजमूउल फ़तावा नामक पुस्तक में इनके हवाले से आया है कि परलोक के दिनों में शुक्रवार के दिन ईश्वर अपनी शक्ति के विशेष स्थान अर्थात अर्श से नीचे उतरेगा और सिंहासन पर बैठेगा। ईश्वर का सिंहासन प्रकाशमयी मिंबरों के बीच होगा और ईश्वरीय दूत इन मिंबरों पर बैठ हुए होंगे। सोने के बने सिंहासन इन मिंबरों को घेरे हुए होंगे और शहीद और ईश्वर के सच्चे बंदे इस पर बैठे हुए होंगे। ईश्वर बैठक के आयोजन और सभा में उपस्थित लोगों से विस्तृत बात चीत करके सिंहासन से उठेगा और बैठक को छोड़कर अपने विशेष स्थान अर्श की ओर ऊपर रवाना हो जाएगा।

यह बात रोचक है कि वहाबी इस प्रकार की अस्पष्ट और निराधार बातों को बिना किसी आयत या हदीस के प्रमाण के प्रस्तुत करते हैं और विदित रूप से केवल अपनी कल्पनाओं के ताने बाने बुनते रहते हैं। न तो पवित्र क़ुरआन में और न ही सहाए सित्ता जैसी सुन्नियों की मान्यता प्राप्त पुस्तकों में इस प्रकार की बातें प्रस्तुत की गयी हैं। इस बारे में केवल यह कहा जा सकता है कि ईश्वर के बारे में इस प्रकार की अवास्तविक बातें इब्ने तैमिया और उसके अनुयाइयों के मस्तिष्क की उपज है। उन्होंने ईश्वर को बंदों की भांति बताने और उसके लिए शरीर की बात मानकर ईश्वर के श्रेष्ठ व उच्च स्थान को घटा दिया है। सुन्नी समुदाय के प्रसिद्ध धर्मगुरू इब्ने जोहबुल का कहना है कि इब्ने तैमिया जिस प्रकार से दावा करता है कि यह बात ईश्वर, उसके दूतों और ईश्वरीय दूतों के साथियों ने कही है, जबकि उसकी कही हुई बातों को इनमें से किसी ने कदापि नहीं कही है।

वहाबियों की रोचक आस्थाओं में से एक यह है कि वे क़िब्ले को ईश्वर के शारीरिक रूप से उपस्थित होने का स्थान मानते हैं और उनका मानना है कि नमाज़ के समय ईश्वर हर नमाज़ियों के सामने खड़ा होता है और उनसे कहता है कि नमाज़ियों को क़िब्ले की ओर नहीं थूकना चाहिए क्योंकि ईश्वर उसके सामने खड़ा होता है और इस कार्य के कारण ईश्वर को परेशानी और कष्ट होती है। यहां पर यह बात कहना चाहिए कि क़िब्ले की ओर मुंह करके खड़े होना, समन्वय और नमाज़ के समय मोमिनों के ध्यान के उद्देश्य से है। न यह कि ईश्वर उस दिशा में मौजूद है। ईश्वर हर स्थान पर मौजूद है और हर वस्तु से अवगत है। पवित्र क़ुरआन ने भी बहुत सी आयतों में इस बात पर बल दिया है कि (व हुआ अला कुल्ले शैइन क़दीर) अर्थात वह समस्त वस्तुओं पर सक्षम है। एक असीमित और अनंत अस्तित्व, समस्त चीज़ों से अवगत है और उसके नियंत्रण में संसार की पूरी वस्तुएं हैं। यदि ईश्वर के लिए किसी विशेष स्थान को मान लिया जाए, इस बात के अतिरिक्त कि उसे समय और काल के लिए आवश्यकता रखने वाला बताएं तो हमने ईश्वर को एक स्थान और समय में सीमित कर दिया। दूसरी ओर वहाबी कठमुल्लाओं द्वारा ईश्वर को किसी विशेष स्थान और समय में सीमित करने का यह अर्थ होता है कि ईश्वर इस समय दूसरे स्थान पर मौजूद नहीं है और यह ईश्वर की क्षमता में कमी का चिन्ह है क्योंकि ईश्वर असीमित और अनंत अस्तित्व है जिसमें कोई भी कमी या अक्षमता नहीं पाई जाती।

इब्ने तैमिया ने ईश्वर के बारे में और भी बहुत सी बातें बयान की हैं और अपनी दुसाहसी बातों से उसने ईश्वर की शान को कम करने का भरसक प्रयास किया किन्तु ईश्वर इन जैसे तुच्छ लोगों की बातों से बहुत ही उच्च है। पवित्र क़ुरआन एक स्पष्ट गवाह है जो वास्तविकता को चिंतन मनन करने वालों और ज्ञानी लोगों के समक्ष स्पष्ट करता है। सूरए शूरा की आयत क्रमांक गयारह में आया है कि कोई भी वस्तु ईश्वर जैसी नहीं है। शीया मुसलमानों के प्रसिद्ध वरिष्ठ धर्मगुरू और पवित्र क़ुरआन के व्याख्याकार आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी इस आयत की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि वास्तविकता में यह बात ईश्वर की समस्त विशेषताओं को पहचानने का मुख्य आधार है कि जिस पर ध्यान दिए बिना ईश्वर की किसी भी विशेषता पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि ईश्वर की खोज करने वालों के मार्ग में पड़ने वाली सबसे ख़तरनाक ढाल यही ईश्वर को बंदे जैसा बताने की ढाल है। इसी विषय के कारण लोग अनेकेश्वरवाद की खाई में गिर जाते हैं। दूसरे शब्दों में ईश्वर ऐसा अस्तित्व है जो हर दृष्टि से अनंत और असीमित है तथा उसके अतिरिक्त हर चीज़ की एक सीमा और एक अंत है। उदाहरण स्वरूप हमारे लिए बहुत से कार्य सरल हैं और कुछ कठिन, कुछ वस्तुएं हमसे निकट हैं तो कुछ दूर क्योंकि हमारा अस्तित्व सीमित है किन्तु उस अस्तित्व के लिए जो हर दृष्टि से असीमित है, सदैव बाक़ी व जारी रहने वाला है, सदैव से है और सदैव रहेगा, यह अर्थ कल्पना योग्य नहीं है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने भी नहजुल बलाग़ा में विभिन्न स्थानों पर ईश्वर की विशेषताओं को बयान किया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में ईश्वर की अनंत क्षमता, ऐसी है कि छोटे बड़े, भारी हल्के, शक्तिशाली और कमज़ोर समस्त जीव, सभी ईश्वर की सृष्टि और उसकी शक्ति के समक्ष समान हैं।

सुन्नी समुदाय के प्रसिद्ध धर्मगुरू इब्ने हजर मक्की अलफ़तावा अलहदीसा नामक पुस्तक में इब्ने तैमिया के बारे में लिखते हैं कि ईश्वर ने उसे अपमानित, पथभ्रष्ट, अंधा और बहरा कर दिया है और सुन्नी समुदाय के धर्मगुरूओं और हनफ़ी, मालिकी और शाफई पंथ के उसके समकालीन धर्मगुरूओं ने उसकी बातों और उसके विचार की भ्रष्टता को स्पष्ट रूप से बयान किया है, इब्ने तैमिया की बातें मूल्यों से रहित हैं और वह धर्म में नई बातें प्रविष्ट करने वाला, पथभ्रष्ट, पथभ्रष्ट करने वाला और असंतुलित व्यक्ति है। ईश्वर उसके साथ अपने न्याय के अनुसार व्यवहार करे और हमें उसकी आस्थाओं की बुराइयों और उसके संस्कारों व मार्गों से सुरक्षित रखे। 

 

वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-7

 

जैसा कि हमने उल्लेख किया कि ईश्वर के बारे में वहाबियों का यह विश्वास कि ईश्वर भौतिक विशेषताओं का स्वामी है, क़ुराने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र कथनों एवं सामान्यबोध के प्रतिकूल है, कहा जा सकता है कि यह धारणा केवल इब्ने तैमिया और उसके शिष्यों एवं अनुयाईयों की मानसिक उपज है। इब्ने तैमिया के इन्हीं पथभ्रष्ट विचारों के कारण सुन्नी विद्वानों ने उसका कड़ा विरोध किया और उसे जेल में डाल दिया गया। इब्ने तैमिया अपने पथभ्रष्ट विचारों पर अटल रहा यहां तक कि जेल में उसकी मौत हो गई और कदापि उसे सत्यता की प्राप्ति नहीं हुई। एकेश्वरवाद के बारे में वहाबियों के विश्वासों से संबंधित कार्यक्रम की एक अन्य कड़ी लेकर आपकी सेवा में उपस्थित हैं। इब्ने तैमिया ने मिन्हाज अलसुन्नाह एवं अल अक़ीदतुल हमुविय्या नामक पुस्तकों में एकेश्वरवाद से संबंधित अपने दृष्टिकोण का उल्लेख किया है। उसका मानना है कि ईश्वर की विशेषताओं में से एक दौड़ना है। उसका विश्वास है कि ईश्वर अपने सच्चे बंदों की ओर दौड़ता है ताकि उनके निकट आ जाये। इब्ने तैमिया अपनी दावे को सिद्ध करने हेतु पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस प्रस्तुत करता है किः ईश्वर कहता है कि यदि मेरा कोई बंदा एक बालिश्त मेरे निकट आयेगा तो मैं आधा मीटर उसके निकट जाऊंगा और यदि कोई आधा मीटर मेरी ओर बढ़ता है तो मैं एक मीटर से भी अधिक उसकी ओर बढ़ूंगा। और अगर कोई धीरे धीरे चलकर मेरे पास आयेगा तो मैं दौड़कर उसकी ओर जाऊंगा।

अपने बंदो की ओर ईश्वर के दौड़ने को इब्ने तैमिया ठीक शारीरिक रूप से दौड़ना समझता है, जबकि वह हदीस के वास्तविक अर्थ से अनभिज्ञ है। वास्तव में इस हदीस में ईश्वर के अपने बंदों से  हार्दिक एवं आध्यात्मिक रूप से निकट होने की ओर संकेत किया गया है और इस महत्वपूर्ण बिंदु का उल्लेख है कि जो बंदे ईश्वर से संपर्क करते हैं और उससे सहायता मांगते हैं ईश्वर उनकी प्रार्थना सुनता है और उनकी सहायता करता है। अतः जो भी कोई अधिक उपासना एवं प्रार्थना करेगा ईश्वर उस पर और भी अधिक कृपा करेगा।

इब्ने तैमिया द्वारा इस मूल्यवान हदीस का यह अर्थ निकालने से पता चलता है कि वह और उसके अनुयाई वहाबी ईश्वर को मनुष्यों के समान समझते हैं, इस लिए कि दौड़ना शरीर से विशेष है और शरीर की विशेषताओं में से है। सऊदी अरब के मुफ़्तियों की सर्वोच्च परिषद भी ईश्वर के दौड़ने को सही मानती है। सऊदी अरब के एक वरिष्ठ मुफ़्ती एक प्रश्न के उत्तर में फ़तवा देते हुए कहते हैं ईश्वर के चेहरे, हाथ, आंखें, पिंडली और उंगलियों के बारे में क़ुरान और हदीस में वर्णन है और इस पर सुन्नियों का विश्वास है... तथा पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ईश्वर के अनुरूप उसकी इन विशेषताओं को सिद्ध किया है। यद्यपि वहाबी सदैव अपनी ग़लत बातों को पैग़म्बरे इस्लाम की हदीसों और यहां तक कि क़ुरान की आयतों से जोड़ देते हैं, जब कि कहीं भी क़ुरान में और पैग़म्बरे इस्लाम की प्रामाणिक हदीसों में ईश्वर के दौड़ने की ओर संकेत नहीं किया गया है बल्कि इस्लामी ग्रंथों में ईश्वर को मानव विशेषताओं से मुक्त माना गया है।

दयालू परमात्मा ने क़ुराने मजीद को एक ऐसी पुस्तक के रूप में भेजा है कि जो स्वयं उसकी ओर हमारा मार्गदर्शन करे ताकि विभिन्न विचारों एवं दृष्टिकोणों और जीवन के भंवर एवं भूल भुलय्यों में रास्ता न भटक जायें। हम यहां आपका ध्यान क़ुरान मजीद की आयतों की ओर आकर्षित करना चाहते हैं ताकि ईश्वर से भय रखने वालों की ओर ईश्वर के दौड़ने से पैग़म्बरे इस्लाम (स) का वास्तविक तात्पर्य समझ में आ जाये। क़ुरान के अन्कबूत सूरे की 69वीं आयत में ईश्वर कहता है किः और वे कि जो हमारे मार्ग में श्रद्धा से प्रयास करेंगे निश्चिंत ही हम उन्हें अपने मार्ग की ओर मार्गदर्शित करेंगे, और ईश्वर भलाई करने वालों के साथ है। ईश्वर अपनी राह में प्रयास करने वालों को इस प्रकार प्रतिफल प्रदान करता है और उन पर अपनी विशेष कृपा करता है और वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीस में ईश्वर का अपने नेक बंदो की ओर दौड़ने से यही तात्पर्य है। क़ुरान में इस प्रकार की आयतें कि ईश्वर अपने बंदों को सही रास्ता दिखाता है अधिक हैं किन्तु न यह कि दौड़कर या किसी मानव गतिविधि द्वारा, इस लिए कि उसे इस प्रकार की गतिविधियों की आवश्यकता नहीं है।

इब्ने तैमिया का विश्वास है कि ईश्वर को देखा जा सकता है। इस संदर्भ में उसका कहना है कि हर वह वस्तु जिसका अस्तित्व जितना संपूर्ण होता है उतनी ही देखने के लिए उपयुक्त होती है, और चूंकि ईश्वर समस्त जीवों में सबसे संपूर्ण है इस लिए सबसे अधिक नज़र आने के लिए उपयुक्त भी है परिणामस्वरूप ईश्वर दिखाई दिया जाना चाहिए। (मिन्हाज अल सुन्नाह,1-217)

ईश्वर को देखने के विषय में वहाबियों ने सभी सीमाएं लांघ कर ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है कि हर बुद्धिमान व्यक्ति आश्चर्यचकित रह जाता है। इब्ने तैमिया का मानना है कि प्रलय के दिन ईश्वर भेस बदलकर लोगों के सामने आयेगा और अपना परिचय देगा और कहेगा कि मैं तुम्हारा ईश्वर हूं। परन्तु लोग उत्तर में कहेंगे हम तुझे नहीं पहचानते और तेरे मुक़बले में अपने ईश्वर की शरण चाहते हैं। यदि हमारा ईश्वर आ जाये तो हम उसे पहचान लेंगे। फिर ईश्वर अपने असली रूप में उनके सामने आता है और अपना परिचय देता है। तो वे लोग कहते हैं कि हां, तू हमारा ईश्वर है उसके बाद यह लोग ईश्वर के साथ स्वर्ग की ओर चले जाते हैं। (मजमू अल फ़तावा, 6-492)

क्या वहाबियों ने अपनी इन बातों से ईश्वर पर ऐसे कामों का आरोप नहीं लगाया है कि जिन्हें अंजाम देने से एक बुद्धिमान व्यक्ति भी बचता है? वास्तव में उन्होंने ईश्वर को मज़ाक़ बना लिया है। दूसरा प्रश्न यह कि क्या लोगों ने दुनिया में पहले कभी ईश्वर को देखा है कि जो प्रलय के दिन उसे उसके असली रूप में पहचान जायेंगे? क्या आपमें से किसी ने ईश्वर को देखा है या किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हो कि जिसने ईश्वर को देखा हो?

संभवतः क़ुरान की जिस आयत में स्पष्ट रूप से ईश्वर के दिखाई पड़ने को असंभव बताया गया है वह सूरए अनाम की एक सौ छटी आयत है जिसमें ईश्वर कहता हैः आंखें उसे नहीं देखतीं किन्तु वह समस्त आंखों को देखता है और वह समस्त अनुकंपाओं का दाता एवं हर चीज़ का जानने वाला है।

दूसरी आयत कि जिसमें भौतिक रूप से ईश्वर के दिखाई पड़ने की संभावना से इंकार किया गया है सूरए आराफ़ की 143वीं आयत है जिसमें ईश्वर कहता है कि जब मूसा निर्धारित स्थान पर आये और उनके पालनहार ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा, हे पालनहार, तू मुझे अपना दर्शन करा ताकि मैं तुझे देख सकूं, (ईश्वर ने) कहा, तुम मुझे कदापि नहीं देख सकते।

इन दो आयतों से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि इब्ने तैमिया की धारणा के विपरीत ईश्वर को कभी नहीं देखा जा सकता।

इब्ने तैमिया और दूसरे वहाबियों ने ईश्वर के संबंध में और भी ऐसी बातें कहीं हैं जिन पर एक उचटती हुई दृष्टि डालते हैं। उनका कहना है कि ईश्वर मच्छर पर बैठकर सवारी करता है, ईश्वर एक ऐसा युवा है कि जिसके घुंगराले बाल हैं, ईश्वर की आंखे आ जाती हैं और फ़रिश्ते उसकी देखभाल के लिए जाते हैं, ईश्वर पैग़म्बर से हाथ मिलाता है, ईश्वर के जूते सोने के हैं, ईश्वर की कमर, बाज़ू, और उंगलियां हैं, उसे आश्चर्य होता है और वह हंसता है इत्यादि...

इस प्रकार के अंधविश्वासों का हम पहले ही उत्तर दे चुके हैं कि ईश्वर की मानव सहित किसी भी चीज़ से तुलना नहीं की जा सकती और उसका शरीर नहीं है। पुनः क़ुरान की सहायता लेते हैं। सरए अन्कबूत की 68वीं आयत में ईश्वर उन लोगों को नास्तिक कहता है जो उस पर झूटे और अनेकेश्वरवादी आरोप लगाते हैं। वह कहता है कि उससे बड़ा अत्याचारी कौन है कि जो ईश्वर पर झूटा आरोप लगाये या उस पर सत्यता के उजागर हो जाने के बाद उसे झुटला दे? क्या नास्तिकों का स्थान नर्क में नहीं है?

नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली (अ) का दार्शनिक कथन है कि ... क़ुरान में एकेश्वरवाद के बारे में आया है कोई भी वस्तु उसके समान नहीं है, अतः किसी भी चीज़ को ईश्वर के समरूप समझना मिथ्या एवं भ्रम है, और जिस किसी ने भी ईश्वर को किसी चीज़ के समान समझा उसने लक्ष्य को गुम कर दिया, यदि इस प्रकार ईश्वर का गुणगान किया कि जिसका परिणाम समरूपता हो तो वास्तव में उसने प्राणी का वर्णन किया न कि स्वयं उसकाष इस लिए कि वह किसी भी चीज़ के समान नहीं है, इस लिए जिस किसी ने ईश्वर को किसी चीज़ के सदृश्य जाना तो उसने ईश्वर की अनुभूति प्राप्ति के मार्ग को छोड़ दिया और लक्ष्य को गुम कर दिया, और जो कोई ईश्वर की ओर इशारा करे या उसे अपने मन में सोचे तो वास्तव में उसने उसे नहीं पहचाना।

सुन्नियों के प्रसिद्ध विद्वान ग़ज़ाली का कहना है कि यदि कोई यह सोचे कि ईश्वर का शरीर है कि जो अनेक अंगो से मिलकर बना है तो वह बुत परस्त है, इस लिए कि हर शरीर प्राणी और सृजित है और हर काल के धार्मिक गुरूओं एवं विद्वानों की आम राय में प्राणी की उपासना नास्तिकता एवं बुत परस्ती है। (अल जामुल अवाम अन इल्मिल कलाम,209) अहले सुन्नत के एक दूसरे वरिष्ठ धर्म गुरू क़ुरतबी कि जिनका 671 हिजरी क़मरी में निधन हुआ उन लोगों के बारे में कि जो ईश्वर के शरीर पर विश्वास रखते हैं कहते हैं कि सही बात यह कि जो यह मानते हैं कि ईश्वर का शरीर है वे नास्तिक हैं। इस लिए कि उन लोगों में और बुत परस्तों में कोई अंतर नहीं है।

अनेक मुसलमान विद्वानों एवं इतिहासकारों का मानना है कि इब्ने तैमिया सहित कुछ मुसलमान ईश्वर के शरीर होने के संबंध में यहूदियों से प्रभावित हैं। शहरिस्तानी अपनी पुस्तक मिलल व नहल में लिखते हैं कि बहुत से यहूदी कि जो इस्लाम की ओर आकृषित हुए उन्होंने ईश्वर के शरीर से संबंधित अनेक हदीस गढ़ीं और उन्हें इस्लामी रंग दे दिया, ईश्वर के शरीर से संबंधित समस्त हदीसों का स्रोत तोरा है। प्रसिद्ध इतिहासकार इब्ने ख़लदून का भी कहना है कि इस्लाम के प्रारंभिक काल के मुसलमान पढ़े लिखे नहीं थे तथा ब्रह्माण्ड की सृष्टि और जीवन के दर्शन के बारे में यहूदी एवं ईसाइ धर्मगुरूओं से प्रश्न करते थे। इब्ने ख़लदून का मानना है कि हदीस की कुछ प्रमाणित पुस्तकों में भी ऐसी हदीसों की संख्या कम नहीं है कि जिन्हें यहूदियों ने गढ़ा है या उनकी सहायता से गढ़ा गया है।

 

वहाबियत, वास्तविकता और इतिहास-8

 

शेफ़ाअत अर्थात सिफ़ारिश के शब्द से सभी पूर्णरूप से अवगत हैं। जब भी अपराध, पाप और एक व्यक्ति की निंदा की बात होती है और कोई व्यक्ति मध्यस्थ बनता है ताकि उसे दंड से मुक्ति दिलाए तो कहते हैं कि अमुक व्यक्ति ने उसके लिए सिफ़ारिश की।

शेफ़ाअत का अर्थ होता है किसी व्यक्ति को होने वाली हानि को दूर करने के लिए मध्यस्थ बनना और उसके हितों की पूर्ति करना है। धार्मिक दृष्टि में शेफ़ाअत का अर्थ यह है कि ईश्वर के निकट बंदों में से एक मनुष्य के लिए पापों की क्षमा याचना करता है और ईश्वर से वितनी करता है कि अमुक व्यक्ति के पापों को क्षमा कर दे या उसके प्रकोप को कम कर दे। अन्य इस्लामी समुदायों और वहाबी पंथ के मध्य पाये जाने वाले मतभेदों में से शेफ़ाअत भी का मुद्दा है। अलबत्ता वहाबी भी मूल सिद्धांत के रूप में एक प्रकार की शेफ़ाअत को स्वीकार करते हैं किन्तु उनका मानना है कि शेफ़ाअत प्रलय के दिन से विशेष है कि शेफ़ाअत करने वाले मुसलमानों के पापों के संबंध में शेफ़ाअत करेंगे और शेफ़ाअत के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम का सबसे अधिक भाग होगा। वहाबियों की मूल बातें यह हैं कि किसी भी मुसलमानों को इस संसार में पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के निकट बंदों से शेफ़ाअत मांगने का कोई अधिकार नहीं है। जबकि पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के अन्य निकटवर्ती बंदों से शेफ़ाअत, पैग़म्बरे इस्लाम के काल से अब तक मुसलमानों के मध्य प्रचलित रही है। मुसलमानों के किसी भी बुद्धिजीवी और धर्मगुरू ने भी योग्य बंदो से शेफ़ाअत की बात का खंडन नहीं किया है किन्तु आठवीं हिजरी क़मरी के आरंभ में इब्ने तैमिया और उसके बाद मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब नज्दी ने ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से शेफ़ाअत को वर्जित घोषित कर दिया और इस दृष्टिकोण के विरोधियों को काफ़िर और अनेकेश्वरवादी बताया।

इन दोनों का मानना था कि पैग़म्बर, फ़रिश्ते और ईश्वर के निकटवर्ती बंदे जिस शेफ़ाअत के स्वामी हैं उसका संसार से कोई लेना देना नहीं है बल्कि उन्हें केवल प्रलय में शेफ़ाअत का अधिकार प्राप्त है। इस आधार पर यदि कोई बंदा इस संसार में अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से अपने और ईश्वर के मध्य मध्यस्थ बनाए और उनकी शेफ़ाअत पर नज़र रखे हुए हो तो उसका यह कार्य अनेकेश्वरवाद में गिना जाता है और वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी और का बंदा समझा जाता है। हर बंदे को प्रत्यक्ष रूप से केवल ईश्वर से आस लगाना चाहिए और कहे कि ईश्वर मुझे उन लोगों में शुमार कर जिनकी मुहम्मद (स) शेफ़ाअत करें। यह न कहो कि मुहम्मद, ईश्वर के निकट मेरी शेफ़ाअत कीजिए।

सलफ़ियों और मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के अनुयायियों ने शेफ़ाअत के विषय पर बहुत अधिक हंगामा मचाया है और अब तक शेफ़ाअत के विषय पर आतंक मचाते चले आ रहे हैं और शेफ़ाअत के मानने वालों के विरुद्ध बहुत उटपटांग बातें करते हैं।

सलफ़ियों ने ईश्वर के निकटवर्ती बंदों से शेफ़ाअत न करने पर कुछ तर्क पेश किए हैं। पहला यह है कि वे इस काम को अनेकेश्वरवाद समझते हैं क्योंकि उनका मानना है कि शेफ़ाअत मांगना, वास्तव में शेफ़ाअत करने वाले की उपासना है। अर्थात मनुष्य शेफ़ाअत की विनती करके मानो ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य से सहायता मांग रहा है और दूसरे को ईश्वर का समकक्ष ठहराता है।

वहाबी पंथ के संस्थापक मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब ने अपनी पुस्तक कश्फ़ुश्शुबहात में अनेकेश्वरवाद की चर्चा में दावा किया है कि शेफ़ाअत और तवस्सुल अर्थात किसी को मध्यस्थ बनाना अनेकेश्वरवाद का भाग है और इसीलिए वे बहुत से मुसलमानों को अनेकेश्वरवादी कहते हैं।

वास्तव में इस पंथ का दृष्टिकोण इस्लाम धर्म में प्रचलित दृष्टिकोणों से पूर्ण रूप से भिन्न है। सौभाग्य की बात यह है कि हम आपको यह बताएं कि शेफ़ाअत के विषय में वहाबी भ्रांतियों का शिकार हैं। इन भ्रांतियों के उत्तर में यह कहना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति से शेफ़ाअत की विनती को उसी समय अनकेश्वरवाद में गिना जाता है जब शेफ़ाअत करने वाले को ईश्वर, सृष्टि का रचयिता और लोक परलोक का स्वामी कहा जाए किन्तु वास्तव में ईश्वर के निकट बंदो से शेफ़ाअत की इच्छा अनेकेश्वरवाद नहीं है बल्कि शेफ़ाअत मांगने वाले शेफ़ाअत करने वाले को ईश्वर का निकटवर्ती बंदा जानते हैं जो न तो कदापि ईश्वर है और न ही ईश्वरीय काम करता है बल्कि चूंकि वे ईश्वर के निकटवर्ती थे इसीलिए उनमें शेफ़ाअत की योग्यता पैदा हो गयी। दूसरी ओर इस्लामी शिक्षाओं में आया है कि शेफ़ाअत करने वाले केवल ईश्वर की अनुमति की परिधि में ही पापियों और एकेश्वरवादियों की शेफ़ाअत कर सकते हैं और ईश्वर से उनके पापों को क्षमा करने का अह्वान करते हैं।

पवित्र क़ुरआन की आयतों के दृष्टिगत हमें यह पता चलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम और अन्य सच्चे लोगों से शफ़ाअत मांगना वास्तव में ईश्वरीय क्षमायाचना के लिए दुआ है। ईश्वर के निकट पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वरीय बंदों के निकट और उच्च स्थान के दृष्टिगत मुसलमान उनसे चाहते हैं कि वे उनके लिए दुआएं करें क्योंकि उनका मानना है कि ईश्वर अपने पैग़म्बर और निकटवर्ती बंदों की दुआओं को रद्द नहीं करता और उनकी दुआओं को अवश्य स्वीकार करता है और उनके माध्यम से पापियों के पाप को क्षमा कर देता है।

पवित्र क़ुरआन गवाही देता है कि लोगों के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम की क्षमा याचना पूर्ण रूप से प्रभावी और लाभदायक है। सूरए मुहम्मद की आयत क्रमांक 19 में आया है कि अपने पापों और ईमान वालों के लिए क्षमा याचना करो। इसी प्रकार सूरए तौबा की आयत संख्या 103 में आया है कि उनके लिए दुआएं करो, आपकी दुआएं उनकी शांति का स्रोत हैं।

जब लोगों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम की दुआएं इतनी लाभदायक हैं तो इस बात में क्या समस्या है कि उनसे अपने लिए दुआएं करने की विनती की जाए। दूसरी ओर दुआ करना शेफ़ाअत के अतिरिक्त क्या कोई और वस्तु है?

हदीस की किताबों में भी शेफ़ाअत शब्द का प्रयोग दुआ के अर्थ में बहुत अधिक किया गया है। यहां तक कि सुन्नी समुदाय की प्रसिद्ध पुस्तक सही बुख़ारी के लेखक ने अपनी पुस्तक में शेफ़ाअत शब्द से लाभ उठाया है। सही बुख़ारी सुन्नी समुदाय की सबसे मान्यता प्राप्त पुस्तकों में से एक है जिसके लेखक इमाम मुहम्मद बुख़ारी हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक के दो अध्यायों में लिखा कि पैग़म्बर और ईश्वर के निकटवर्ती बंदो से दुआ करने को शेफ़ाअत कहा जाता है। वे लिखते हैं कि जब भी लोगों ने इमाम से शेफ़ाअत की कि वे उनके लिए ईश्वर से वर्षा की मांग करें तो उन्हें उनकी मांग को रद्द नहीं करना चाहिए। इस आधार पर सुन्नी समुदाय के धर्म गुरू भी ईश्वर के अतिरिक्त अन्य लोगों से शेफ़ाअत को वैध समझते हैं।

एक अन्य स्पष्ट साक्ष्य जो इस बात का चिन्ह है कि शिफ़ाअत का अर्थ दुआ है, इब्ने अब्बास के हवाले से पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। इस कथन में आया है कि जब भी कोई मुसलमान मरता है और उसके जनाज़े पर चालीस लोग जिन्होंने अनेकेश्वरवाद नहीं किया, नमाज़ पढ़ें तो ईश्वर उसके संबंध में उनकी शिफ़ाअत को स्वीकार करता है।

मुर्दे के संबंध में चालीस लोगों की शिफ़ाअत इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं है कि उसके जनाज़े पर नमाज़ पढ़ने के समय उसके लिए ईश्वर से क्षमा याचना करें। इस आधार पर यदि शिफ़ाअत की प्रवृत्ति दुआ करना है तो इस दुआ की मांग करने को अनेकेश्वरवाद क्यों समझा जाता है?

शिफ़ाअत के विषय को रद्द करने में वहाबी कठमुल्लाओं का एक और तर्क यह है कि अनेकेश्वरवादियों के अनेकेश्वरवाद का कारण, मूर्तियों से शिफ़ाअत की विनती करना है और पवित्र क़ुरआन में भी इस विषय का वर्णन किया गया है। सूरए यूनुस की आयत संख्या 18 में आया है कि और यह लोग ईश्वर को छोड़कर उनकी उपासना करते हैं जो न हानि पहुंचा सकते हैं और न लाभ और यह लोग कहते हैं कि यह ईश्वर के यहां हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं। इस आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम और ईश्वर के निकटवर्ती बंदों से हर प्रकार की शिफ़ाअत मांगना, अनेकेश्वरवादियों के मूर्ति से शिफ़ाअत की विनती के भांति है।

वहाबियों की इस आस्था के उत्तर में यह कहना चाहिए कि इन दोनों शिफ़ाअतों में ज़मीन आसमान का अंतर है। अनेकेश्वरवादी, मूर्तियों को अपना ईश्वर समझते हैं इसीलिए वे उनसे शिफ़ाअत की विनती करते हैं जबकि एक मुसलमान व्यक्ति, ईश्वर के निकटवर्ती बंदे के रूप में ईश्वर के निकट व सच्चे बंदों से दुआ और उनसे शिफ़ाअत की विनती करता है।

मुसलमानों का मानना है कि पैग़म्बरे इस्लाम, शालीन मोमीनों और ईश्वर के निकटवर्ती बंदों और शहीदों के लिए शिफ़ाअत के स्थान की पुष्टि हो गयी है। कितना अच्छा है कि मनुष्य चाहे लोक में या परलोक में ईश्वर के निकट बंदों और उसके पैग़म्बर को ईश्वर के समक्ष अपना शिफ़ाअत करने वाला बनाए।