सफल शिया महिलाएं 3



सफल महिला श्रंखला के अन्तर्गत हम ईरान की कुछ और सफल महिलाओं से आपको परिचित करवा रहे हैं।

श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे

हर देश के विकास और प्रगति का एक कारक, प्रबंधन के विभिन्न स्तरों पर योग्य व सक्षम महिलाओं व पुरुषों को नियक्ति है। इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में लोगों की नियक्ति की एक महत्त्वपूर्ण शर्त, उस क्षेत्र में उनका दक्ष होना और अपने कार्य के प्रति कटिबद्ध होना है। इसी मध्य बहुत सी सफल महिलाएं प्रबंधन के विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं। आज के कार्यक्रम में हम आपको एक ऐसी उदाहरणीय महिला से परिचित कराने जा रहे हैं जो देश के प्रबंधन के एक उच्च स्तरीय पद पर कार्यरत हैं।

ईरान की सफल महिलाओं में एक श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे लारीजानी है। श्रीमती मुजतहिद ज़ादे का जन्म वर्ष 1957 में उत्तरी ईरान के लारीजान नगर में हुआ। उन्होंने तरबीयते मुदर्रिस विश्वविद्यालय से स्वास्थ के विषय में एमए की डिग्री प्राप्त की। पहलवी शासन के विरुद्ध श्रीमती मजतहिद ज़ादे का राजनैतिक संघर्ष उस समय आरंभ हुआ जब उनके पति शाह की जेल से ज़मानत पर रिहा हुए थे और यह संघर्षकर्ता परिवार देश से पलायन कर गया था। देश से बाहर छात्रों के इस्लामी गुटों को सुव्यवस्थित करना, संघर्ष के क्षेत्र में इस शक्तिशाली महिला की प्रभावी गतिविधियां समझी जाती हैं। इसी प्रकार एलेक्ट्रानिक के विषय में शिक्षा ग्रहण करना और यूरोपीय व अमरीकी छात्रों के इस्लामी संघों में गतिविधियां, श्रीमती मुजतहिद ज़ादे के प्रभावी व उल्लेखनीय कारनामे हैं।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद इस परिश्रमी महिला ने इस्लामी क्रांति के लक्ष्यों की सेवा का बीड़ा उठाया। इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभिक दिनों में श्रीमती मुजतहिद ज़ादे की सामाजिक व राजनैतिक गतिविधियों में इस्लामी क्रांति संरक्षक बल, सिपाहे पासदारान को दी जाने वाली राजनैतिक सीख व सेवा की ओर संकेत किया जा सकता है। उन्होंने लेबनान में अपने पति सैयद मोहसिन मूसवी के ईरान के प्रभारीराजदूत नियुक्त किए जाने के बाद इस देश के शीया मुसलमानों के मध्य लेबनान के वंचित वर्ग को जागरूक करने के लिए विभिन्न भाषण दिए।

ईरान के विरुद्ध सद्दाम शासन द्वारा थोपे गये युद्ध के दौरान श्रीमती मुजतहिद ज़ादे ने स्वेच्छा से अधिकतर अभियानों के दौरान घायलों को सहायता पहुंचाने का दायित्व संभाला। श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे पवित्र प्रतिरक्षा काल के सामाप्त होने के बाद युवा पीढ़ी के संबंध में अपनी ज़िम्मेदारियों के आभास के कारण शिक्षा मंत्रालय में इसलिए स्थानांतरित हो गयीं ताकि इस माध्यम से समाज और युवा पीढ़ी के लिए अधिक प्रभावी रहें। वर्तमान समय में श्रीमती मुजतहिद ज़ादे शहीद बहीश्ती मेडिकल कालेज के नर्सों के संकाय के स्वास्थ गुट की प्रबंधक व प्रोफ़ेसर हैं। इसके अतिरिक्त श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे परिवार व महिला संबंधी मामलों के केन्द्र की प्रमुख और इसी संबंध में राष्ट्रपति की सलाहकार की ज़िम्मेदारी भी निभा रही हैं।

मानवाधिकारों का व्यवहारिक किया जाना, श्रीमती मुजतहिद ज़ादे की चिंताओं में से है इस आधार पर ईरान की यह उदाहरणीय महिला आंतरिक गतिविधियों के अतिरिक्त ग़ैर सरकारी परिधि में बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों में भाग ले चुकी हैं। श्रीमती मुजतहिद ज़ादे की उल्लेखनीय गतिविधियों के कारण वर्ष 2009 में उन्हें उदाहरणीय या आवर्श महिला के रूप में सम्मानित किया गया और राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद की ओर सेउन्हे प्रशंसा पत्र दिया गया।

यह बात उल्लेखनीय है कि श्रीमती मुजतहिद ज़ादे के पति सैयद श्री मोहसिन मूसवी उन ईरानी कूटनयिकों में से थे जिनका अन्य कूटनयिकों के साथ वर्ष 1982 में ज़ायोनी शासन ने पूर्वी बैरूत से अपरहण कर लिया था। सैयद मोहसिन मूसवी और बैरूत में ईरानी दूतावास में कार्यरत उनके तीन अन्य साथियों का ज़ायोनी शासन के पिठ्ठु फ़्लाजिस्टों ने अपहरण कर लिया है और उनके बारे में आज तक कुछ पता नहीं चल सका है। उदाहरणीय पत्नी व मां श्रीमती मुजतहिद ज़ादे ने पति के बारे में कोई सूचना न होने और प्रतीक्षा के इन समस्त वर्षों में बड़े ही धैर्य व संयम से अपने उस पुत्र का प्रशिक्षण किया जो अपहरण के समय दो वर्ष का था और उन्होंने साथ ही परिवार व समाज के क्षेत्र में सक्रिय व सफल कार्य अंजाम दिए। ईरान की इस परिश्रमी महिला ने अपने पति के अपहरण के विषय को आग बढ़ाने और ज़ायोनी शासन की इस पाश्विक कार्यवाही की निंदा करने के लिए विदेशों की विभिन्न यात्राएं कीं और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में वे उपस्थित हुईं। इन समस्त कार्यवाहियों और ईरान के प्रयासों के बावजूद ज़ायोनी शासन अभी तक श्रीमती मुजतहिद ज़ादे के पति सहित अपहरित ईरानी कूटनयिकों को लौटाने पर तैयार नहीं हुआ है।

वर्तमान समय में श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे परिवार व महिला संबंधी मामलों के केन्द्र की प्रमुख और इसी संबंध में राष्ट्रपति की सलाहकार की ज़िम्मेदारी भी निभा रही हैं। एक साक्षात्कार में हमने इस उदाहरणीय ईरानी महिला से पूछा कि इस पद को स्वीकार करने के पीछे उनका क्या उद्देश्य है तो उन्होंने कहा कि अपना दायित्व निभाने, ईश्वरीय बंदों की सेवा विशेषकर प्रभावशाली वर्ग महिलाओं की सेवा और इसी प्रकार प्रभावी व महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में परिवार को सुदृढ़ करने में सहायता की यह मांग थी कि मैं इस पद को स्वीकार करूं।

श्रीमती मरियम मुजतहिद ज़ादे इस केन्द्र के क्रियाकलापों व कार्य करने की शैली के बारे में कहती हैं कि परिवार के आधार को सुदृढ़ करने पर आधारित डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद की सरकार की नीतियों की परिधि में इस केन्द्र का नाम परिवार व महिला मामलों के केन्द्र रखा गया और यह केन्द्र अपनी गतिविधियां अंजाम दे रहा है। इस केन्द्र की गतिविधियों में से एक महिलाओं विशेषकर अभिवावक महिलाओं का समर्थन करना है। इसी प्रकार परिवार के आधारों को सुदृढ़ करने व महिलाओं की क्षमता को बढ़ाने की परिधि में यह केन्द्र ईरानी समाज की महिलाओं व महिलाओं के मामलों के कार्यालयों के मध्य एक पुल की भांति है जो देश के प्रांतों व कार्यकारी संस्थाओं में गतिविधियां कर रही हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान महिलाओं की समस्याओं की पहचान व उसके निवारण के लिए परिवार व महिला मामलों के केन्द्र ने विभिन्न विधेयकों को पारित करके उचित कार्यवाहियां की हैं। इन कार्यवाहियों में महिलाओं के कार्य करने के घंटों में कमी का विधेयक, अभिवावक महिलाओं को समय से पहले सेवानिवृत्त करने का विधेयक और इसी प्रकार शिक्षा पर बल देते हुए परिवार के आधारों को सुदृढ़ करने व महिलाओं को सक्षम बनाने के प्रयास का नाम लिया जा सकता है।

परिवार और महिला मामलों के केन्द्र की हालिया कुछ परियोजनाओं में, परिवार के आधारों को सुदृढ़ करना, महिलाओं के स्वास्थ की समीक्षा, पिछड़ेपन से संघर्ष, ग्रामीण व क़बाईली महिलाओं को सक्षम बनाना, जनसंस्थाओं का समर्थन, आंतरिक संपर्क व समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय संबंध जैसी राष्ट्रीय परियोजनाओं की ओर संकेत किया जा सकता है। श्रीमती मुजतहिद ज़ादे का मानना है कि परिवार और महिला मामलों के केन्द्र का दायित्व, महिलाओं से संबंधित मामलों पर कार्यवाही करना है।

श्रीमती मुजतहिद ज़ादे आज समाज में ईरानी महिलाओं की भूमिका के बारे में कहती हैं कि इस्लामी क्रांति की सफलता के तीन दशकों के बाद परंपराओं के टकराव व आधुनिकीकरण के काल में विश्वास के साथ सभी लोगों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण विषय आत्म पहचान व संतुलन की रक्षा है कि महिलाओं के मामलों की सूक्ष्मता के दृष्टिगत इस सिद्धांत पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। क्योंकि इतिहास में महिलाओं पर बहुत हुए अत्याचारों की जड़ शासकों और सत्तासीन संस्कृतियों के सीमा से बढ़ने या सीमा से घटने में निहीत है। आज पश्चिम की सभ्यता और नारीवाद की विचारधारा ने भी परिवार और महिलाओं पर अधिक व बड़ा अत्याचार किया है। मानना है कि महिला तीसरी सहस्त्राब्दी में नीतियों में संतुलन के न पाये जाने की बलि चढ़ी है। इसलिए मेरा मानना है कि परिवार और महिलाओं के मामलों के नीति निर्धारकों पर बहुत भारी दायित्व है कि वह दूरदर्शिता के साथ आधुनिकीकरण व परंपराओं के मंच पर असंतुलन नामक बड़ी समस्या का निवारण करें। अलबत्ता आत्मविश्वास और हम कर सकते हैं कि भावना को प्रचलित करना, इस वैश्विक महामारी से छुटकारा पाने का महत्त्वपूर्ण मार्ग हो सकता है।

सौभाग्य की बात यह है कि वर्तमान समय में हमारी महिलाएं भी बड़ी दूरदर्शिता के साथ हर मंच पर उपस्थित हैं और आत्मविश्वास और ज्ञान अर्जित करके विभिन्न क्षेत्रों में संभावित रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं चाहे वह शिक्षा, चिकित्सा, प्रबंधन या व्यायाम कोई भी क्षेत्र हो। हम इस सफलता को ईश्वरीय उपहार मानते हैं कि इस्लाम धर्म का अनुसरण करने के कारण इस धर्म की विभूतियां व अनुकंपाएं इस महान राष्ट्र पर अपनी छत्रछाया किए हुए हैं।

श्रीमती मुजतहिद ज़ादे का यह मानना है कि यदि इस्लाम या इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर पालन किया जाए तो समस्त क्षेत्रों में क़ानूनों में मनुष्यों के अधिकारों पर ध्यान दिया जाएगा और निश्चित रूप से महिलाओं के मामलों में संवेदना का अधिक से अधिक आभास करके क़दम बढ़ाया जाएगा। वह कहती हैं कि सौभाग्य की बात यह है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाओं के संबंध में सकारात्मक दृष्टिकोण पाये जाते हैं और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई भी इस वर्ग की भूमिका पर सदैव बल देते हैं। इसी आधार पर देश के विकास कार्यक्रमानुसार विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं के विकास और उनको श्रेष्ठ स्थान पर पहुंचाने और महिलाओं की जागरूकता व ज्ञान में वृद्धि पर विशेष ध्यान दिया गया है। इस परिधि में इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य वैज्ञानिक संगठनों में महिलाओं की उपस्थिति है।

श्रीमती मुजतहिद ज़ादे ईरान में महिलाओं के भविष्य के बारे में कहती हैं कि अतीत पर नज़र डालने और समाज में महिलाओं के स्थान के बारे में पुनर्विचार करने से हम पर विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की प्रगति स्पष्ट हो जाती है। जैसा कि आज अतीत का दर्पण है और कल भी आज का दर्पण होगा और पिछले तीस वर्षों की तुलना में महिलाओं की प्रगति भविष्य में इस वर्ग की प्रगति की सूचक है। महिलाओं के संबंध में एक नीतिनिर्धारक व कार्यक्रम बनाने वाले के रूप में हमें आशा है कि हम इस प्रकार कार्य करें कि वांछित स्थिति की ओर महिला समाज को गतिप्रदान करें। उन्होंने उन समस्त कार्यक्रमों में जो महिलाओं के भविष्य के लिए बनाए गये हैं, मांग की है कि इस वर्ग को प्राथमिकता दी जाए और उनका मानना है कि यदि कार्यक्रम भी महिला समाज की आवश्यकता की विपरीत दिशा में बने तो आरंभिक चरण में विशेषज्ञों द्वारा इसमें सुधार व पुनर्विचार किया जाएगा। इस आधार पर महिलाओं की आवश्यकताओं से विरोधाभास रखने वाले कार्यक्रमों का क्रियान्वयन असंभव है।

 

श्रीमती नीलोफ़र अरदलान

महिलाओं के स्वास्थ्य कोसुधारने में प्रभावशाली शैलियों में से एक, व्यायाम तथा खेलकूद है। निःसन्देह, व्यायाम बहुत सी बीमारियों से बचाता है यहां तक कि कुछ बीमारियों का उपचार भी व्यायाम से किया जाता है। इस्लाम ने पुरूषों और महिलाओं दोनों को व्यायाम की बहुत सिफ़ारिश की है। किंतु महिलाओं के व्यायाम में जिस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह उनकी शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं और व्यायाम या खले का उनके व्यक्तित्तव व उनके मान-सम्मान के अनुरूप होना है। महिलाओं के लिए इस्लाम ने इसी प्रकार के व्यायाम और खेलों को स्वीकार किया है। वर्तमान समय में इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाएं विभिन्न प्रकार के खेलों में भाग लेती हैं और उनकी उपस्थिति अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी सक्रिय रूप से दिखाई देती हैं। कुछ ईरानी महिलाओं के मनपसंद खेलों में से एक फ़ुटबाल है। ईरानी महिलाएं अपने व्यक्तित्तव तथा इस्लामी आवरण की रक्षा करते हुए खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेती हैं और बहुत से अवसरों पर वे मेडल भी प्राप्त करती हैं।

ईरानी की महिला फुटबाल खिलाड़ियों में से एक श्रीमती नीलोफ़र अरदलान हैं। उनका जन्म ८ ख़ुरदादा १३६५ बराबर २९ मई सन १९८५ को हुआ। उन्होंने फ़िज़िकल एजूकेशन में बीए किया। नीलोफ़र अरदलान, ईरान की राष्ट्रीय महिला फ़ुटबाल तथा रेलवे की महिला फुटबाल टीमों की कैप्टन हैं। उन्होंने इस्लामी देशों के खेलों के प्रथम टूर्नामेंट में १४ वर्ष की आयु में २१ गोल मारकर उस टूर्नामेंट में "गोल" की उपाधि अर्जित की। उन्होंने इन्हीं खेलों के दूसरे चरण में २० गोल मार कर अपनी उपाधि को सुरक्षित रखा जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया है वह कोई संयोग नहीं था।

जिस समय श्रीमती नीलोफ़र अरदलान जून २०११ में फुटबाल प्रतियोगिता में भाग लेने के उद्देश्य से राष्ट्रीय टीम के साथ जार्डन पहुंची तो उस समय उनको यह नहीं पता था कि फुटबॉल के अंतर्राष्ट्रीय महासंघ फ़ीफ़ा के अधिकारी इस्लामी आवरण के कारण उन्हें खेलने से रोक देंगे। वे कहती हैं कि जब हम जार्डन पहुंचे तो पहले दिन तकनीकी स्टाफ की बैठक में, जिसमें मैंने कैप्टन के रूप में भाग लिया, घोषणा की गई कि हमारी टीम प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकेगी। अब आप सोचिए ऐसे में उन खिलाड़ियों पर क्या गुज़री जिन्होंने इस प्रतियोगिता के लिए छह-सात महीनों तक कठिन अभ्यास किया था और जो इस प्रतियोगिता से कुछ परिणाम प्राप्त करना चाहते थे। जार्डन की टीम के हालैण्डी कोच ने आकर हमें ढारस बंधाई और हमारे दुख को बांटा। उन्होंने कहा कि वास्तव में तुमपर अत्याचार हुआ है। एक मुसलमान महिला होने के नाते तुमको भी फुटबाल खेलने का पूरा अधिकार है क्योंकि फ़ीफ़ा का नारा है कि फुटबाल सबके लिए है किंतु अपनी इस कार्यवाही से उसने दर्शा दिया है कि वर्तमान समय में मुसलमान महिलाओं के लिए फुटबाल पर रोक लग गई है।

श्रीमती अरदलान जो ईरान की महिला फुटबाल टीम के साथ फ़ीफ़ा के राजनीति से प्रेरित व्यवहार से क्षुब्ध हैं कहती हैं कि यद्यपि इस्लामी आवरण के प्रयोग के कारण ईरान की महिला टीम फुटबाल प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं ले सकी जो उसका लक्ष्य था किंतु उसने उससे भी बड़ा लक्ष्य प्राप्त किया है। इस बात से उन लोगों की पोल खुल गई जो महिलाओं और पुरूषों के समान अधिकार के दावे करते हैं। इस कार्यवाही ने यह भी दर्शा दिया कि पश्चिम, महिला को मात्र उपकरण के रूप में देखता है। वह संदेश जिसे स्थानांतरित करने के लिए संचार माध्यमों को लंबे समय की आवश्यकता पड़ती उसे ईरानी महिला खिलाड़ियों ने मात्र कुछ मिनटों में अति प्रभावी माध्यम से स्थानांतरित किया और यह दिखा दिया कि ईरानी महिलाएं इस्लामी मूल्यों की सुरक्षा के प्रति सदैव संकल्पबद्ध हैं। खेल का आरंभ और उसका समापन एक ही सीटी से हुआ और उन खिलाड़ियों ने, जिनके हिजाब को हटवाने के लिए फुटबाल एक बहाना था, इस भेदभाव पर पड़ा पर्दा हटाया तथा इस्लामी गणतंत्र ईरान के तिरंगे ध्वज के साथ बड़े ही गर्व से फुटबाल के मैदान का चक्कर लगाया। उनका यह कहना था कि यदि फ़ीफ़ा सौ बार भी अपने नारे के विपरीत अर्थात "फुटबाल सबके लिए है" उनको प्रतियोगिता में भाग न लेने दे तब भी वेकिसी भी स्थिति में अपने ईरानी-इस्लामी आवरण को अलग नहीं करेंगे।

उल्लेखनीय है कि पर्दा या इस्लामी आवरण उन मूल्यों में से है जिसकी सुरक्षा मुसलमान महिलाएं हर क्षेत्र में करती हैं और वे इसको अपनी गतिविधियों में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं समझतीं। ईरान की महिला खिलाड़ी भी प्रतियोगिताओं में उपस्थिति के लिए धार्मिक मूल सिद्धांत के रूप में अपने इस्लामी आवरण तथा मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा पर बल देती हैं। किंतु खेद की बात है कि उन्हें इस मार्ग में फ़ीफ़ा की ओर से बाधा का सामना करना पड़ा है। हाल ही में जार्डन में, जो पश्चिम एशिया में फीफा का मुख्यालय है, इस्लामी देशों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में एक बैठक हुई। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि फ़ीफा को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। अल्बत्ता ईरान की फ़ुटबालिस्ट और फुटसालिस्ट महिला खिलाड़ियों ने फुटबाल फैड्रेशन में ईरान की महिला खिलाड़ियों के प्रतिनिधियों के समर्थन से यह प्रयास किये हैं कि फीफा और उसके अधिकारियों को यह समझाया जाए कि इस्लामी आवरण खेल में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं है। जैसाकि इस्लामी देशों में महिला फुटबाल खिलाड़ी इस्लामी आवरण के साथ फुटबाल की प्रतियोगिताओं में भाग लेती हैं और उन्हें कोई समस्या नहीं पेश आती।

पश्चिमी एशिया की प्रतियोगिता में ईरान की राष्ट्रीय महिला टीम की सफलता के पश्चात इस टीम की कप्तान श्रीमती अरदलान से जब पूछा गया कि आपने फुटबाल का चयन क्यों किया तो उन्होंने कहा, मैं ऐसे परिवार में पली-बढ़ी जिसमें फुटबाल को बहुत महत्व प्राप्त था। यही कारण है कि आरंभ से ही मुझमें फुटबाल के प्रति बहुत लगाव था और मैं इससे बहुत प्रेम करती थी। टेलिविज़न पर दिखाए जाने वाले फुटबाल मैच को मैं कभी नहीं छोड़ती थी। वर्ष १९९६ में जब ईरान में फुटसाल खेल आरंभ हुआ तो मैं उन प्रथम लोगों में से थी जिन्होंने इस खेल में अपना नामांकन करवाया था किंतु यह पूर्ण रूप से संयोग ही था। हुआ यह कि मैं अपने पिता के साथ "हेजाब" नामक स्टेडियम में वालीबाल और वास्केटबाल का नामांकन करवाने वहां पर गई थी। वहां पर मैंने फुटसाल के क्लासों में भाग लेने के लिए विज्ञापन देखा तो मैंने इसमें अपना नाम लिखवा लिया। फुटसाल में अपना नाम लिखवाकर मैं खुशी से पागल हुई जा रही थी।

श्रीमती अर्दलान को खेल के चयन में अपने घर की ओर से कभी कोई रूकावट नहीं रही। वे कहती हैं कि मेरे पिता सदैव ही मुझको प्रेरित करते हुए कहते थे कि फुटबालिस्ट होने की क्षमता तुम्हारे भीतर मौजूद है और एक दिन तुम एक बड़ी खिलाड़ी बन सकती हो। मैं जब भी अभ्यास से वापस आती वे कहते थे कि और अधिक अभ्यास करो ताकि उससे अधिक सक्षम बनो जितनी अभी हो।

खेल में हिजाब के बारे में श्रीमती अर्दलान कहती हैं कि जब फ़ार्स की खाड़ी के तटीय देशों में टूर्नामेंट होते हैं तो वहां के वातावरण में पाई जाने वाली आर्द्रता के कारण बहुत कठिनाई होती है किंतु इस्लामी नियमों के अनुपालन और राष्ट्रीय सम्मान की सुरक्षा के उद्देश्य से हम इस्लामी आवरण में ही खेलने पर गर्व करते हैं और इसी हालिया टूर्नामेंट में जिसमें हमने दूसरा स्थान प्राप्त किया यह सिद्ध कर दिया कि हिजाब या पर्दा, महिलाओं की सफलता में बाधा नहीं है।

जब इस सफल ईरानी महिला से यह पूछा गया कि प्रतियोगिताओं में तथा खेल के दौरान हिजाब क्या उनके लिए समस्या नहीं बनता तो उन्होंने कहा कि हिजाब से हमें कोई समस्या नहीं है। हालांकि गर्मियों के मौसम में गर्मियों के कारण काम कुछ कठिन हो जाता है किंतु हमने इसे स्वेच्छा से स्वीकार किया है। मैंने जो भी प्रगति की है वह इसी हिजाब में की है। मैं समझती हूं कि फीफा बहुत कठोरता दिखा रहा है। फ़ीफ़ा को चाहिए कि वह मुसलमान महिलाओं की परिस्थितियों को स्वीकार करे ताकि वे अपने इस्लामी हिजाब के साथ फुटबाल खेल सकें। हम पश्चिमी एशिया की प्रतियोगिता में सफलता अर्जित नहीं कर सके किंतु आगे प्रगति कर सकते हैं। अभी भी हमें आशा है कि इस समस्या का समाधान किया जाएगा क्योंकि हमारे देश में युवा लड़कियों की फुटबाल की बहुत अच्छी टीमें हैं यदि उनपर पैसा लगाया जाए तो आगामी कुछ वर्षों में यह एक अच्छी राष्ट्रीय टीम के रूप में सामने आ सकती हैं।

ईरान की महिला फुटबाल टीम को परिचित करवाने में श्रीमती अर्दलान और ईरान की हिजाब वाली टीम का पर्दे के साथ फुटबाल खेलने पर बल बहुत प्रभावी रहा है। यह मुसलमान महिला फुटबालिस्ट कहती हैं कि इस विषय ने हमारी महिला फुटबाल टीम को हर ओर परिचित करवा दिया। इससे पूर्व शायद बहुत से लोगों को यह पता ही नहीं था कि हमारे यहां महिलाओं की फुटबाल टीम है।

वर्तमान समय में ईरानी महिलाएं अपने परिवार के समर्थन से अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर खेल के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ईरान की पर्देदार महिला फुटबालिस्ट श्रीमती नीलोफ़र अर्दलान कहती हैं कि मैं घर में सारे काम स्वयं ही अच्छे ढंग से करने की चेष्टा करती हूं। वे कहती हैं कि फुटबाल के लिए किये जाने वाले अभ्यास के दृष्टिगत मैं अपने जीवनसाथी के सहयोग के बिना अकेले ही घर के सारे काम नहीं कर सकती। वे घर के कामों को बहुत महत्व देती हैं। वे कहती है कि राष्ट्रीय टीम के लिए अभ्यास सुबह और शाम दो चरणों में मैं करती हूं और कभी-कभी सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक टीम के अभ्यास में व्यस्त रहती हूं ऐसे में घर के कामों के लिए कम ही समय निकल पाता है। किंतु जब राष्ट्रीय टीम के अभ्यास की छुटटी रहती है तो मैं अपना अधिक समय घर पर और रसोई में गुज़ारती हूं। में चाहती हूं कि अपने पति के पसंद के खाने बनाऊं।

ईरानी माताएं अपनी संतान के प्रति विशेष प्रेम रखती हैं। ईरान की राष्ट्रीय महिला फुटबाल टीम की कैप्टन तथा हाफबैक खिलाड़ी, एक दक्ष फुटबालिस्ट होने के साथ ही एक बलिदानी पत्नी और माता भी हैं। श्रीमती नीलोफ़र अर्दलान भी अन्य ईरानी माताओं की भांति अपनी संतान से बहुत प्रेम करती हैं। उनका दो वर्षीय एक बच्चा है। कठिन प्रयास करने वाली यह महिला, माता होने के संबन्ध में कहती है कि फुटबालिस्ट होने की तुलना में मां बनना बहुत कठिन है। वास्तव में बच्चे के जन्म के आरंभ के तीस-चालीस दिन बहुत कठिन होते हैं और मैंने धीरे-धीरे यह सीख लिया कि जीवन कैसे बिताया जाए।

 

श्रीमती परवीन सलीही

आरंभ में किसी भी समाज का सामाजिक व राजनैतिक जीवन, मनुष्यों की सभी व्यवहारिक व ग़ैर व्यवहारिक क्षमताओं से लाभ उठाने, चाहे वे महिलाएं हों या पुरुष, सामाजिक व राजनैतिक क्षेत्रों में जागरूक व कटिबद्धतापूर्ण भागीदारी की देन है। प्राचीन काल से ही ईरानी महिलाएं, समाज में महिलाओं की उपस्थिति के लिए अत्याचारी सरकारों ने जो रूकावटें उत्पन्न की थीं उसके दृष्टिगत, राजनैतिक व सामाजिक क्षेत्रों में सदैव उपस्थित रहीं और उन्होंने अत्याचारी शासकों द्वारा इस्लामी व मानवीय मूल्यों को पैरों तले रौंदने का विरोध किया। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद समाज में महिलाओं ने अपना स्थान प्राप्त किया और अपनी व्यक्तिगत व सामाजिक ज़िम्मेदारियों से अवगत हुईं। इस अवसर पर महिलाओं का प्रभावी व्यवहार और स्तर, इस्लामी क्रांति द्वारा पुनर्जीवित मूल्यों का सूचक व ऐसे पुरुष व महिलाओं के संघर्ष का परिणाम है जिन्होंने इस्लामी क्रांति से पूर्व पहलवी अत्याचारी शासन से संघर्ष में बहुत कठिनाईयां सहन कीं। कार्यक्रम के इस भाग में इस्लामी क्रांति से पूर्व की एक संघर्षकारी महिला से आपको परिचित कराने जा रहे हैं।

इस्लामी क्रांति की सफ़लता से पहले और बाद में राजनैतिक क्षेत्र में सक्रिय महिलाओं में श्रीमती परवीन सलीही की ओर संकेत किया जा सकता है। श्रीमती परवरीन सलीही वर्ष 1957 में इस्फ़हान नगर में जन्मीं। उन्हें बचपन से ही समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उपस्थित होने और ज्ञान प्राप्त करने का शौक़ था। उन्होंने एक पर्देदार व समाज के मामलों की संवेदनशील महिला के रूप में पहलवी के अत्याचारी शासन पर्ण काल की बहुत सी पथभ्रटताओं का विरोध किया । इसीलिए विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें शासन की ओर से विभिन्न समस्याओं का सामना हुआ। श्रीमती सलीही ने वर्ष 1972 में संघर्षकर्ता और योग्य युवा डाक्टर लब्बाफ़ी नेजाद से विवाह किया। एक दूसरे के सहयोग से इस दंपति की राजनैतिक गतिविधियों ने नया रूप धारण कर लिया चूंकि इन संघर्षकारी पति व पत्नी ने एक दूसरे के क़दम से क़दम मिलाकर शाह के घुटनभरे शासन से संघर्ष किया और फिर दोनों को ही गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया। उस समय श्रीमती सलीही की आयु 18 वर्ष थी, सबसे पहले उन्हें मृत्युदंड की सज़ा दी गयी और बाद में कम आयु के कारण उन्हें दो वर्ष के कारावास का दंड सुनाया गया किन्तु उनके पति को मौत की सज़ा सुनाई गयी जिसके बाद उन्हें शहीद कर दिया गया। शाह की जेल में इस संघर्षकारी महिला को शारीरिक व मानसिक यातनाएं दी गयीं।

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद ज्ञान प्राप्त करने में रूचि के कारण उन्होंने इस्फ़हान के चिकित्सा विश्वविद्यालय में प्रसूतिविद्या के विषय में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। उन्हें माता और बच्चों के संबंध में अधिक अध्ययन में बहुत रूचि थी इसी रूचि के कारण उन्होंने इसी महाविद्यालय में मातृ व शिशु स्वास्थ के विषय में एम.ए की पढ़ाई की और डिग्री प्राप्त की।

इस सक्रिय महिला की व्यवसायिक फ़ाईलों में बहुत सी कार्यकारिणी ज़िम्मेदारियां पंजीकृत हैं। उन्होंने ईरान की संसद मजलिसे शूराए इस्लामी में एक काल तक तेहरान के लोगों का प्रतिनिधित्व किया। वह इस समय सीमा में संसद की उपचार व स्वास्थ समिति की सदस्या बनीं और इस दौरान उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों विशेषकर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ के लिए ध्यानयोग्य सेवाएं भी अंजाम दीं। इसी प्रकार यह कठिन परिश्रम करने वाली महिला अपनी शैक्षिक गतिविधियों के दृष्टिगत, ईरानी संसद मजलिसे शूराए इस्लामी के महिलाओं और परिवारों के लिए अनुसंधान केन्द्र की परिवार व महिला शोध ईकाई की प्रबंधक बनायी गयी। श्रीमती सलीही 15 वर्षों तक ईरान के रेडियो टेलीवीजन केन्द्र में परिवार व महिला मामलों के कार्यालय की प्रमुख सहित विभिन्न पदों पर असीन रहीं और उन्होंने महिलाओं के संबंध में विभिन्न गतिविधियां अंजाम दी हैं और अब भी उनकी गतिविधियां जारी हैं। वर्ष 2006 में पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम की प्राणप्रिय पुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हेरा सलामुल्लाह अलैहा के शुभ जन्म दिवस के अवसर पर जो ईरान में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, श्रीमती परवीन सलीही को राष्ट्रपति द्वारा उदाहरणीय महिला के रूप में सम्मानित किया गया। इसी प्रकार इस उदाहरणीय महिला ने धार्मिक व शैक्षिक क्षेत्रों में बहुत से आलेख लिखे हैं और विभिन्न देशों की यात्रा करके तथा बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय कांफ़्रेंसों व सेमीनारों में उपस्थित होकर परिवार और महिला, महिला और संचार माध्यम, मातृत्व की भूमिका इत्यादि बहुत से विषयों के बारे में इस्लामी दृष्टिकोंण पेश किया।

जैसा कि हमने इससे पहले बताया था कि डाक्टर मुर्तज़ा लब्बाफ़ी नेजाद से विवाह करने के बाद, एक दूसरे के सहयोग से इस दंपति की राजनैतिक गतिविधियों ने नया रूप धारण कर लिया और इसी मार्ग में उनके पति शहीद और उन्हें दो वर्ष के कारावास की सज़ा मिली। वह अपने संघर्ष और इस क्षेत्र में अपने पति की भूमिका के बारे में बताती हैं। उनका मानना है कि उनके सफल जीवन का रहस्य, उनके पति का उनके साथ रहना था यद्यपि यह अवधि बहुत कम रही है। वह कहती हैं कि महिलाएं राजनैतिक क्षेत्रों सहित समस्त क्षेत्रों में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय व प्रभावी गतिविधियां अंजाम दे सकती हैं। वह कहती हैं कि मैं अपनी कुछ सफलताओं का श्रेय अपने पति को देती हूं, उनकी आत्मा महान थी, ईश्वर का भय रखने वालों के साथ जीवन व्यतीत करना, वैभवभरा है, वह ऐसे लोग हैं जिन्होंने स्वयं अपने आप को और अपने इर्द गिर्द के वातावरण को अपने प्रकाश से प्रकाशमयी कर दिया। महापुरुषों के सोच विचार और व्यवहार लोगों को ईश्वर की याद दिलाते हैं। मैंने उनसे सीखा कि ईश्वर का उत्तम बंदा कौन है। मैंने मुख्य रूप से सीखा कि हमें ईश्वर का बंदा होना चाहिए और उसकी उपासना करनी चाहिए। ईश्वर की बंदगी में ही हमारे सारे कार्यों का अर्थ प्राप्त होगा। एक ईश्वरीय बंदे का ज्ञान, लक्ष्यपूर्ण और ईश्वर व लोगों की सेवा के लिए होना चाहिए।

उदाहरणीय महिला के रूप में श्रीमती सलीही का मानना है कि लोगों के अध्यात्मिक व भौतिक विकास में परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। वह इस बारे में कहती हैं कि मैं अपनी सफलता में अपने परिवार को बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानती हूं, मैंने सदैव इस बात का प्रयास किया कि समाज की एक सक्रिय सदस्य रहूं और लाभदायक कार्य करूं। यहां तक कि मेरा प्रयास इस बात पर था कि जिस विषय की मैं शिक्षा प्राप्त करूं वह समाज के लिए लाभदायक हो। मेरा मानना है कि व्यक्ति की सफलता में परिवार की भूमिक बहुत ही प्रभावी होती है। समाज में किसी भी व्यक्ति की सकारात्मक व नकारात्मक विशेषता परिवार से पैदा होती है। स्पष्ट सी बात है कि हर व्यक्ति अपने व्यवहार की 70 प्रतिशत चीज़ें परिवार से सीखता है। हर व्यक्ति के नैतिक व आस्था संबंधी रूझहान इत्यादि परिवार में ही अस्तित्व में आते हैं और पलते बढ़ते हैं। परिवार में महिला भी केन्द्रीय भूमिका निभाती है। राजनेताओं को चाहिए कि वह एक पीढ़ी के प्रशिक्षण और समाज के निर्माण में महिला की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर अधिक ध्यान दें।

श्रीमती सलीही के दो संतानें हैं जिनका उन्होंने बहुत ही अच्छे ढंग से प्रशिक्षण किया है और वह उन्नति की सीढ़ीयां तय कर रहे हैं, इस प्रकार से कि उनका एक पुत्र विशेषज्ञ डाक्टर है और अपनी मां की भांति अपने समाज की सेवा कर रहा हैं।

श्रीमती सलीही का यह मानना है कि महिलाओं और पुरुषों को अपनी नैतिक विशेषताओं को सुदृढ़ करना चाहिए क्योंकि ईश्वर ने भी अपने दूतों को मानवीय चरित्र को परिपूर्ण करने के लिए भेजा है। उनका मानना है कि महिलाओं और पुरुषों को धर्म और ईश्वरीय दूतों की शैलियों से प्राप्त नैतिकता का पालन करना चाहिए। श्रीमती सलीही का मानना है कि वर्तमान समय में विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं को उस अत्याचार को समाप्त करना चाहिए जो बहुत पहले से उनपर किया जा रहा है। उनका यह मानना है कि आज स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार किया जा रहा है। वर्तमान समय में महिलाएं विशेषकर पश्चिम और यूरोप में आधुनिक दासों के रूप में लोगों की इच्छा पूरी करने का एक साधन बन गयीं हैं। बहुत संभव है कि बहुत सी महिलाएं अब भी इस बात से अवगत न हों कि उनका विलासी लोगों के हाथों शोषण किया जा रहा है। ज़ोरज़बरदस्ती, पूंजीवाद, और अनुचित लाभ उठाने जैसा पश्चिम पर छाया हुआ वातावरण महिलाओं का शोषण कर रहा है। विदित रूप से अच्छे दिखने वाले नारों से लाभ उठाकर उपकरणों की भांति उनका प्रयोग किया जा रहा है। ऐसा होना चाहिए कि वर्तमान समय में अपनी जागरूकता में वृद्धि और अपने ज्ञान व आध्यात्म को विकसित करके महिलाओं से इस लाभ उठाने की इस प्रक्रिया और साम्राज्य को समाप्त कर देना चाहिए।

यह संघर्षकारी महिला क्षेत्र और विश्व में इस्लामी चेतना और इस परिवर्तन में मुसलमान महिलाओं की प्रभावी भूमिका के दृष्टिगत, यह मानती हैं कि राजनैतिक व विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं के संघर्ष के अनुभव, विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। वह कहती हैं कि बहरैनी, मिस्री, लीबियाई महिलाएं आज अपनी जागरूकता को ईरान के प्रयासों का ऋणी मानती हैं। वे ईरानी महिलाओं से प्रेरणा लेकर धैर्य और संघर्ष के साथ निकट भविष्य में सफलता प्राप्त कर सकती हैं। श्रीमती सलीही मध्यपूर्व की महिलाओं के लिए सफलता और वर्चस्ववादियों से उनकी मुक्ति की कामना करती हुई कहती हैं कि यह बहुत बड़ा चमत्कार है कि शत्रुओं की इतनी अधिकशक्ति के बावजूद क्षेत्र की जनता जागरूक हुई और क्रांति लाई। ईश्वर का वचन सच्चा है और हम ईश्वर से उनके लिए एकता, एकजुटता और डटे रहने की दुआ करते हैं।