सफल शिया महिलाएं 2



सफल महिला श्रंखला के अन्तर्गत हम ईरान की कुछ और सफल महिलाओं से आपको परिचित करवा रहे हैं।

सुश्री ताहेरे सफ़्फ़ारज़ादे

सुश्री ताहेरे सफ़्फ़ारज़ादे कवयित्री, लेखिका, क़ुरआन की अनुवादक और बड़ी शिक्षिका थीं। उनका जन्म 18 नवंबर 1936 को किरमान प्रांत के सीरजान नगर में हुआ। उनका परिवार इस्लामी व आध्यात्मिक विचारों वाला था इसलिए वह आरंभ से ही अपने आस पास की चीज़ों को अलग दृष्टि से देखती थीं। सफ़्फ़ारज़ादे को बचपन से ही लिखने और साहित्यिक रचनाओं के अध्ययन में रूचि थी यहां तक कि प्राइमरी स्कूल से ही उन्होंने शायरी आरंभ कर दी थी। उन्होंने 13 वर्ष की आयु में पहला शेर कहा। शायरी में उन्होंने इतनी तेज़ी से प्रगति की थी कि जब वे हाइ स्कूल में थीं केरमान प्रांत के शिक्षा व प्रशिक्षण विभाग ने उन्हें साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित किया था। उन्हें क़ुरआन के स्मरण में इतनी रूचि थी कि छह वर्ष की आयु में उन्होंने क़ुरआन पढ़ना सीखा जो उनके लिए आगे चलकर क़ुरआन की अधिक जानकारी व पहचान की पृष्ठिभूमि बना।

सुश्री सफ़्फ़ारज़ादे ने तेहरान विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहत्य व भाषा में स्नातक किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश गयीं। विदेश से वापसी के पश्चात ज्ञान व संस्कृति के क्षेत्र में उन्होंने व्यापक प्रयास किए।

आपको यह भी बताते चलें कि तत्कालीन शाही शासन की गुप्तचर संस्था सावाक ने इस्लामी क्रान्ति से पूर्व ताहेरा सफ़्फ़ारज़ादे को सिर्फ़ इतनी सी बात पर विश्व विद्यालय से निकलवा दिया था कि उन्होंने हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मालिक अश्तर को लिखे पत्र को पद्य का रूप दे दिया था। पहलवी शासन इस पत्र को ख़तरनाक समझता था। शायरी में रूचि रखने वाले ६० के दशक में सफ़्फ़ारज़ादे को "कूदके क़र्न" अर्थात शताब्दी का बच्चा नामक उनकी कविता से याद करते हैं जबकि सत्तर के दशक में सफ़रे पंजुम अर्थात पांचवी यात्रा नामक किताब से उन्हें पहचानते हैं। सफ़्फ़ारज़ादे की शायरी के पांचवें संकलन में धार्मिक पृष्ठिभूमि में प्रतिरोध पर आधारित शेर हैं। उन्होंने शायरी में अपने व्यापक अध्ययन व साहित्यिक शोध से "तनीन" नामक एक नई काव्य शैली को परिचित कराया किन्तु धार्मिक व क्रान्तिकारी विचार रखने के कारण अत्याचारी पहलवी शासन के विरोध का उन्हें सामना करना पड़ा।

उन्हें वर्ष 1976 में धार्मिक प्रतिरोध पर आधारित शायरी करने के आरोप में विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया और उन्हें दूसरी बार घर में बैठना पड़ा। यह आदर्श ईरानी महिला, लगभग एकान्त के इस जीवन में भी प्रयास करती रहीं और अपना पूरा समय क़ुरआन और क़ुरआन की व्याख्या के अध्ययन में लगाया।

इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पश्चात सुश्री सफ़्फ़ाज़ादे ने विश्वविद्यालय में अपनी धार्मिक व वैज्ञानिक गतिविधियां तेज़ कीं। जैसा कि वर्ष 1992 में ईरान के उच्च शिक्षा व संस्कृति मंत्रालय ने उन्हें आदर्श शिक्षक की पदवी मिली। इस सफल महिला ने क़ुरआन के संबंध में अपने प्रयास जारी रखे और एक किताब की रचना की जिसका हिन्दी अनुवाद हैः क़ुरआन मजीद के मूलभूत विषयों का अनुवाद। क़ुरआनी संस्कृति के विस्तार में रुचि के अतिरिक्त सुश्री सफ़्फ़ारज़ादे ने अंग्रेज़ी भाषा में दक्षता के दृष्टिगत अंग्रेज़ी भाषा में क़ुरआन का अनुवाद भी किया। इस प्रकार अंग्रेज़ी व फ़ारसी भाषा में उनके द्वारा क़ुरआन के किए गए अनुवाद के छपने के पश्चात वर्ष 2001 में उन्हें ख़ादेमुल क़ुरआन अर्थात क़ुरआन की सेविका की उपाधि मिली। यह ईरानी महिला विचारक क़ुरआन के अनुवाद के लिए अपने प्रयास के संबंध में कहती हैः हालिया वर्षों में मैंने अपने आपसे क़ुरआन के अनुवाद को पूरा करने का जो प्रण लिया था, उस सिलसिले में मैंने किसी दिन सोलह घंटे से कम काम नहीं किया जो आठ घंटे की आधिकारिक शिफ़्ट का दुगुना है। वह पवित्र क़ुरआन की आयतों में चिंतन करने पर बहुत बल देती थीं। उन्होंने पवित्र क़ुरआन का अनुवाद करने का एक कारण ईश्वरीय निशानियों में चिंतन बताया और कहाः क़ुरआन की आयतों में चिंतन, बुद्धि की सत्यता तक पहुंचने का सबसे प्रभावी माध्यम है। चिंतन करना इतना अधिक महत्व रखता है कि ईश्वर मनुष्य को बार बार संबोधित करते हुए कह रहा हैः क्या तुम चिंतन नहीं करते? क्या तुम नहीं सोचते? वास्तव में ईश्वर यह कह रहा हैः चिंतन करो! सोचो! सोच विचार की क्षमता ही मनुष्य की ग़ैर मनुष्य से श्रेष्ठता व अंतर का कारण है। वास्तव में ईश्वर यह कह रहा है कि यदि सोच विचार नहीं करोगे तो मनुष्य के स्थान पर नहीं पहुंच पाओगे।

सुश्री सफ़्फ़ारज़ादे को प्रायोगिक एवं शोध कार्य का भी बहुत लंबा अनुभव था। वर्ष 1970 में स्वेदश वापसी पर अनुवाद में दक्षता के दृष्टिगत उन्हें शहीद बहिश्ती विश्वविद्यालय में नौकरी मिली। उसके बाद वे अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हो गयीं। उन्होंने ईरान में अनुवाद को ज्ञान की एक शाखा का स्थान दिलाया और ईरान के विश्वविद्यालयों में अनुवाद की वैज्ञानिक समीक्षा की पहली कांफ़्रेंस आयोजित करायी। उन्होंने अनुवाद की कला में दो भाषाओं अर्थात स्रोत भाषा और जिस भाषा में अनुवाद किया जा रहा है उस भाषा के अर्थ,व्याकरण व संरचना की अनुरूपता व पहचान पर आधारित एक शैली की खोज की। ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पश्चात उसूल व मबानिये तर्जुमे अर्थात अनुवाद के नियम एवं आधार नामक उनकी महत्वपूर्ण रचना को अनुवाद के विषय के छात्रों की पाठ्य पुस्तक के रूप में चुना गया। इस विद्वान ईरानी महिला ने कला की शिक्षा देने के इस्लामी केन्द्र की स्थापना की जिसे आज होज़े हुनरी अर्थात कला केन्द्र के नाम से जाना जाता है।

ईरान की इस महान महिला के धार्मिक व सांस्कृतिक प्रयास देश की सीमा तक सीमित नहीं थे बल्कि पूरे इस्लामी जगत फैले हुए थे। यही कारण था कि वर्ष 2005 में एशिया व अफ़्रीक़ा के लेखकों के संघ ने सुश्री सफ़्फ़ारज़ादे को सबसे प्रतिष्ठित मुसलमान महिला व विश्वस्तरीय बुद्धिजीवी के रूप में चुना। इस संघ ने अपने पत्र में एक स्थान पर लिखा हैः चूंकि डाक्टर ताहेरे सफ़्फ़ारज़ादे ईरान की बड़ी लेखिका, कावित्री महान संघर्षकर्ता व एक महिला विद्वान का उच्च नमूना तथा गौरव करने योग्य मुसलमान इसी लिये इस संघ ने उनके लंबे संघर्ष व ज्ञान के क्षेत्र में व्यापक प्रयासों के दृष्टिगत उन्हें वर्ष की सबसे श्रेष्ठ हस्ती के रूप में चुना है। इससे पूर्व 1988 में बंग्लादेश के ढाका अंतर्राष्ट्रीय उत्सव में सुश्री डाक्टर सफ़्फ़ारज़ादे को एशिया की अनुवाद समिति के पांच संस्थापक सदस्यों में चुना गया था। ढाका उत्सव के प्रमुख ने उनके चयन के बारे में कहा थाः हमारा मानना है कि विश्व के इस भाग में वह एक व्यक्ति जिसने अनुवाद की कला पर ज़ोर दिया एवं उसके सिद्धांत पेश किए वह सुश्री ताहेरे सफ़्फ़ारज़ादे हैं।

सफ़्फ़ारज़ादे की शायरी वास्तव में विचारों पर आधारित है जिसे वे शब्दों के सांचे में पेश करती हैं। उन्होंने क़ुरआन की आयतों, कहानियों व धार्मिक अर्थों का उपयोग कर के अपनी शायरी को विशेष रंग दिया है। उन्होंने सांसारिक व राजनीति मामलों को इस प्रकार अपनी शायरी में पिरोया है कि उसने उनकी रचनाओं को विशिष्टता प्रदान करदी है। उन्होंने ज्ञान, कला, और धर्म से संबंधित अनेक किताबें लिखी हैं। उनकी किताबों में रहगुज़रे महताब, हर्कत व दीरूज़, बैअत बा बीदारी, दीदारे सुब्ह, मर्दाने मुनहनी, हफ़्त सफ़र, अंदीशे दर हिदायते शेर इत्यादि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने अपने बहुत से शेरों का अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद किया है।

अंततः ईरान की पठन -पाठन शोध, और किताबें लिखने में सदैव प्रयासरत रहने वाली यह गौरवान्तित महिला वर्ष 2008 में इस नश्वर संसार से सिधार गयीं।

 

श्रीमती सैयदा ज़हरा हुसैनी

इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद सांस्कृतिक विशेषकर लेखन और नाविल लिखने के क्षेत्रों में महिलाओं ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। इस प्रकार से कि हालिया वर्षों के दौरान महिला लेखकों की बहुत सी पुस्तकों को, पुस्तक मेलों व समारोहों में श्रेष्ठ पुस्तकों का दर्जा मिला। इन्हीं पुस्तकों में "दा" नामक पुस्तक की ओर संकेत किया जा सकता है जो श्रीमती सैयदा ज़हरा हुसैनी की यादों का संकलन है। इस पुस्तक को श्रीमती सैयदा आज़म हुसैनी ने लिखा है। आज के कार्यक्रम में हम ईरान की एक ऐसी ही बलिदानी और त्यागी महिला से आपका परिचय कराने जा रहे हैं कृपया हमारे साथ रहिए।

वर्ष 1963 में जन्मीं श्रीमती सैयदा ज़हरा हुसैनी ईरान के दक्षिण पश्चिमी नगर ख़ुर्रमशहर की रहने वालीं हैं। उनका बचपना ईरान के सुन्दर ख़ुर्रमशहर में गुज़रा। उनके युवाकाल में सद्दाम शासन ने ईरान के विरुद्ध आठ वर्षीय युद्ध थोपा था। वर्ष 1980 में थोपे गये युद्ध के आरंभ होते ही इस सत्तरह वर्षीय लड़की का जीवन बदल गया। वह उन महिलाओं में थीं जो अतिक्रमणकारी सैनिकों के मुक़ाबले में पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान ख़ुर्रमशहर में रहीं ताकि अपने नगर की रक्षा और अपने देशवासियों की सहायता करें। श्रीमती हुसैनी उन महिलाओं में थीं जिन्होंने ख़ुर्रमशहर से महिलाओं के निकलने के आदेश के बावजूद 24 दिनों तक इस नगर में प्रतिरोध किया। श्रीमती हुसैनी ही वह अंतिम महिला थीं जो इस नगर से निकलीं वह भी घायल होने के कारण। ख़र्रमशहर में श्रीमती हुसैनी के पिता और भाई शहीद कर दिए गये। महिलाओं वाली भावनायें और स्नेह रखने के बावजूद यह साहसी महिला अपने शहीद भाई व पिता और इस नगर की बहुत सी शहीद महिलाओं के शवों को अपने हाथों से दफ़्न करने पर विवश हुई। ज़हरा हुसैनी ने अपने बचपन की यादों को "दा" नामक पुस्तक में संजोया है। इस पुस्तक में उन्होंने इसी प्रकार ख़ुर्रमशहर के अतिग्रहण और उसकी स्वतंत्रता के बाद के अपने अनुभवों को बयान किया है। इस पुस्तक में उन्होंने युद्ध के दौरान और उसके समाप्त होने के बाद की अपनी यादें संकलित की हैं। कुर्दी भाषा में दा का अर्थ होता है मां। इस पुस्तक का नाम मां रखने का उद्देश्य यह है कि श्रीमती ज़हरा हुसैनी सद्दाम शासन द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के दौरान ईरानी महिलाओं के प्रतिरोध, प्रयास, दुःख और कष्टों को बयान करना चाहती हैं।

श्रीमती ज़हरा हुसैनी की इस मूल्यवान पुस्तक का वर्ष 2008 में विमोचन हुआ और तीन वर्षों के दौरान पाठकों के अद्वितीय स्वागत के कारण इसका एक सौ चालीस बार प्रकाशन हो चुका है।

इस पुस्तक को अब तक वर्ष 2009 में ईरान की सबसे श्रेष्ठ पुस्तक के पुस्कार सहित कई साहित्य पुरस्कार मिल चुके हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने सांस्कृतिक अधिकारियों, लेखकों, दा पुस्तक की कथा को बयान करने वाली सैयदा ज़हरा हुसैनी और इसी प्रकार इस पुस्तक की लेखिका सैयदा आज़म हुसैनी से भेंट में जिन्होंने बहुत ही दक्षता व निपुणता के साथ इस को तैयार किया, उनकी प्रशंसा की और उनका आभार व्यक्त किया। वरिष्ठ नेता ने इस पुस्तक के महत्त्व को विश्व स्तर पर प्रस्तुत किये जाने योग्य बताया और संसार की पांच जीवित भाषाओं में इसका अनुवाद करने की मांग की। इस परिधि में इस पुस्तक का अब तक अंग्रेज़ी, उर्दू, अरबी और तुर्की इस्तांबोली जैसी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस पुस्तक की कहानी को रेडियो पर ड्रामे का रुप देकर प्रसारित किया जा चुका है और इस पर फ़िल्म बनाने की भी बात चल रही है।

दा नामक पुस्तक की अधिकांश कथा ख़ुर्रमशहर की नागरिक ज़हरा हुसैनी की इस नगर में युद्ध के आरंभिक बीस दिनों की यादों पर आधारित है। ऐसे दिन जब आम नागरिक सैन्य भूमिका अदा करने पर विवश हुए। कल तक अपनी अजीविका कमाने में व्यस्त लोगों ने हथियार उठाया और महिलाएं भी सहायता कर्मियों में शामिल हो गयीं। जब युद्ध आरंभ हुआ, तब ज़हरा हुसैनी 17 वर्ष की थीं और उनमें जोश व उत्साह भरा हुआ था। दा नामक पुस्तक में वर्णित समस्त घटनाएं इस 17 वर्षीय लड़की की ज़बान से बयान हुई है।

श्रीमती ज़हरा हुसैनी से हुए साक्षात्कार में इतने अंतराल के बाद अर्थात युद्ध के लगभग बीस वर्ष बाद इस पुस्तक के प्रकाशन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस का कारण यह है कि मैं साक्षात्कार के लिए तैयार न थी, मैं अपनी कटु यादों को दोहराना नहीं चाहती थी। मैं सोचती थी कि इसकी क्या आवश्यकता है कि मैं इन घटनाओं को लोगों से बयान करूं। मैं सोचती थी कि दिखावा होगा। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे कार्य का ईश्वरीय परितोषिक बर्बाद हो जाए। यहां तक कि ईरान के प्रसिद्ध कलाकार और लेखक स्वर्गीय सैयद मुस्तफ़ा आवीनी ने कई बार मुझसे कहा कि अपनी यादों को संकलित करो और प्रकाशित करो किन्तु मैं हर बार इस कार्य से बचती रही।

उनका मानना है कि सद्दाम द्वारा थोपे गये युद्ध में बहुत से ईरानी परिवारों ने हानि उठाई और अपने देश की मुक्ति के लिए कष्ट उठाया। वह कहती हैं कि मैंने कुछ समय बाद साक्षात्कार देने का निर्णय किया और अपनी यादों को संकलित करना आरंभ किया। मैंने इस बात का आभास किया कि हमारे आज के बच्चों का यह अधिकार है कि वह इस पुस्तक को पढ़ें और फ़ैसला करें।

श्रीमती हुसैनी अपनी आकर्षक व बहुत अधिक पढ़ी जाने वाली यादों को संकलित करने का उद्देश्य बयान करते हुए इस बिन्दु पर बल देती हैं कि ईरान अनचाहे युद्ध की बलि चढ़ा और उसे युद्ध की इच्छा नहीं थी। इसके बावजूद इस देश के जियालों ने अपने ख़ून की अत्तिम बूंद तक देश की रक्षा की।

पवित्र प्रतिरक्षा के दौरान ईरानी महिलाओं की भूमिका के बारे में श्रीमती हुसैनी कहती हैं कि यह महिलाएं ही थीं जिन्होंने अपने पिता,भाई और अपनी संतानों को मोर्चे पर उपस्थित होने का मनोबल प्रदान किया। जब इराक़ ने आक्रमण किया, तो सेना को संभलने में समय लग गया उस समय ख़ुर्रमशहर की यही महिलाएं और पुरुष थे जो शत्रुओं के सामने डट गये। सहायता कार्य और मोर्चे के पीछे के कार्य करने के अतिरिक्त कुछ महिलाओं ने शस्त्र उठाकर अपने देश की रक्षा की।

ईरान की इस साहसी महिला के मन में ख़ुर्रमशहर के युद्ध की कटु यादें अभी बाक़ी हैं और इस नगर के नागरिकों का वह याद करती रहती हैं। वह कहती हैं कि मेरा दिल ख़ुर्रमशहर और उसके निवासियों की यादों में सदैव परेशान रहता है और मैं सदैव उनको याद करती रहती हूं। युद्ध से पहले ख़ुर्रमशहर बहुत हराभरा और आबाद था किन्तु युद्ध के दौरान शत्रुओं ने हर जगह को बर्बाद कर दिया और बारूदी सुरंगे बिछा दीं। इन बारूदी सुरंगों को निकालने में बहुत समय लग गया किन्तु अब भी शलमचे और सीमा पर बारूदी सुरंगें मौजूद हैं। रासायनिक बमों की बमबारी में हरे भरे खेत और खजूर के बाग़ बर्बाद हो गये। बहुत से घर हैंडग्रेनेड और मार्टर गोलों के कारण खंडहर में परिवर्तित हो गये। यह वह अत्याचार थे जो सद्दाम ने अपनी समर्थक सरकारों के साथ मिलकर ईरान की जनता और ख़ुर्रमशहर पर किये। श्रीमती हुसैनी तीन पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं। उन्होंने अपने प्रयासों के एक भाग को अपनी संतान के प्रशिक्षण से विशेष किया है और इस प्रकार उन्होंने समाज को स्वस्थ और सक्रिय संतानें दी हैं। श्रीमती हुसैनी थोपे गये युद्ध के दौरान घायल हो गयी थी और अब भी उसका कष्ट सहन कर रही हैं।

दा नामक पुस्तक और ईरानी महिलाओं के प्रयास, बलिदान और त्याग ईरान की सीमाओं से निकलकर दूसरे क्षेत्रों में भी फैल गये, इस प्रकार से कि बहुत से टीकाकारों ने इस पुस्तक के महत्त्व को स्वीकार कर लिया है। अमरीका के विख्यात अनुवादक और लेखक पॉल स्प्रेक्मैन ने इस पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया है। वह इस पुस्तक के महत्त्व के बारे में कहते हैं कि दा नामक पुस्तक का अनुवाद, विश्ववासियों को ईरानी महिलाओं का सही व पारदर्शी चित्र प्रस्तुत कर सकता है। क्योंकि अमरीकी सोचते हैं कि चूंकि ईरानी महिलाएं हेजाब में होती हैं तो वह गतिविधियां और कार्य नहीं कर सकतीं। यह ऐसी स्थिति में है कि मैंने अपनी ईरान की यात्राओं के दौरान समाज में महिलाओं की व्यापक गतिविधियां देखीं और मेरा यहां तक मानना है कि ईरानी महिलाएं, पुरुषों से भी शक्तिशाली हैं। मेरा मानना है कि इस पुस्तक का अनुवाद, ईरानी महिलाओं के संबंध में समस्त दृष्टिकोणों को परिवर्तित कर देगा। वह कहते हैं कि जिस प्रकार से इस पुस्तक ने मुझे आकर्षित किया उसी प्रकार इंगलिश पाठकों के लिए भी रोचक होगा कि आठ वर्षीय युद्ध के दौरान किसी प्रकार एक महिला साहस के साथ पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर बहुत से क्षेत्रों में उपस्थित हुई और बहुत ही महान कार्य अंजाम दिए। इसीलिए इस पुस्तक का अनुवाद करके अन्य विश्ववासियों के समक्ष यह चित्र रखना चाहता हूं।

 

खेल व पर्वतारोहण में दक्ष ईरानी महिलाएं

इस्लामी गणतंत्र ईरान उन देशों में है जिसने तीन दशकों से अधिक समय से महिलाओं के स्वास्थय के संबंध में गंभीरता दिखाई है। ईरान में महिलाओं के स्वास्थय रक्षा के लिए दो प्रभावी क़दम उठाए गए। वे दो क़दम महिलाओं द्वारा चिकित्सा सेवाओं व खेल सुविधाओं से अधिक से अधिक लाभ उठाया जाना है। आज की चर्चा में खेल के स्थान पर ईरानी महिला खिलाड़ियों की प्रगति पर चर्चा की जा रही है।

ईरान की महिला खिलाड़ी खेल प्रतियोगिताओं में भी बहुत सक्रिय हैं। इस समय ईरान की महिला खिलाड़ी हेजाब के साथ खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेती हैं और वे पुरस्कार व पदक जीतने में भी सफल होती हैं। वर्ष 2010 में चीन के ग्वांग्जू में आयोजित एशियन गेम्ज़ में ईरान की महिला खिलाड़ी ख़दीजा आज़ादपूर ने वोशो में पहला स्वर्ण पदक जीता था। ख़दीजा आज़ादपूर साठ किलो भार वर्ग में अपनी प्रतिद्वंद्वी पर विजय प्राप्त करते हुए इन खेलों में ईरानी कारवां के लिए चौथा व एशियाई खेलों के इतिहास में पहली ईरानी महिला खिलाड़ी के रूप में स्वर्ण पदक जीता था। वह कहती हैः यह पदक मेरी नौ महीने के दिन रात परीश्रम का परिणाम है। मेरी अभिलाषा थी कि वोशो में पहली स्वर्ण पदक विजेता बनूं अब बहुत अच्छा आभास कर रही हूं। यह मेरे जीवन की सबसे अच्छी याद है। मैंने कठिन परीश्रम किया था और मेरा पूरा प्रयत्न इस बात के लिए था कि ईरान ख़ाली हाथ न पहुंचूं। मेरी दृष्टि में एक ईरानी महिला के रूप में स्वर्ण पदक व एशियाई खेलों में पहली ईरानी महिला के रूप में स्वर्ण पदक प्राप्त साधारण बात नहीं है इसलिए मैं बहुत प्रसन्न हूं। सुश्री आज़ादपूर कहती हैः सब देशों के लिए बात अद्भुत थी कि हेजाब में एक महिला, रुकावटों के बावजूद भारत, चीन, ताइवान, वियतनाम, फ़िलिपीन, और दक्षिण कोरिया जैसे दावेदार देशों को पीछे कर रही है।

ईरान की यह महिला वोशो खिलाड़ी अपनी सफलता का श्रेण अपने परिवार को देते हुए कहती हैः मैंने यह सफलताएं अपने परिवार व प्रशिक्षकों के समर्थन से प्राप्त की है और इस मार्ग को तय करने में उनकी सहायता पर आभार व्यक्त करती हूं।

कराटे में भी ईरानी महिला खिलाड़ियों की उल्लेखनीय भागीदारी है। सुश्री हेलेन सिपाही उन सफल महिलाओं में हैं जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में ईरान की महिला कराटे टीम में शामिल हैं। हेलेन सिपाही वर्ष 1993 से अब तक ईरान में होने वाली प्रतियोगिताओं में 15 स्वर्ण, पांच रजत और चार कांस्य पदक जीत चुकी हैं। इसके अतिरिक्त वर्ष 2004 में उन्होंने एशियाई प्रतियोगिता में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। सुश्री हेलेन सिपाही ने वर्ष 2007 में भी एशिया, ओशियानिया, व हांग कांग प्रतियोगिताओं में भी कराटे में प्रथम स्थान प्राप्त किया था जबकि मोरक्को में अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में वे तीसरे स्थान पर रही थीं।

सुश्री हेलेन सिपाही ने वर्ष 2008 में दक्षिण कोरिया में कराटे व कूमीटे (Kumite) प्रतियोगिता में दो बार प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इस परिश्रमी ईरानी महिला को जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इस्लामी आवरण के साथ भाग लेती हैं, जापान में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में रेफ़री की ओर से इस्लामी आवरण के कारण विरोध का सामना करना पड़ा किन्तु इससे उनके अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के संकल्प पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा और वह अभी भी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए तय्यार हैं। ईरान की इस महिला खिलाड़ी ने खेल के वैज्ञानिक आयाम के संबंध में अध्ययन व शोध कार्य किए हैं। इस समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके चौदह लेख स्वीकृत हो चुके हैं।

ईरान की एक अन्य सफल महिला खिलाड़ी हैं लाले किशावर्ज़। वह विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट फ़तह करने वाली पहली मुसलमान महिला हैं। एवरेस्ट पर चढ़ने वाली 102 महिलाओं में वह पहली व सबसे युवा मुसलमान महिला हैं जिसने एवरेस्ट फ़तह कह है।

आपको यह जान कर शायद आश्चर्य हो कि डाक्टर लाले किशावर्ज दांत की डाक्टर भी हैं। 26 वर्षीय लाले किशावर्ज़ का संबंध ईरान के दक्षिणपूर्वी प्रांत सीस्तान व बलोचिस्तान के ज़ाहेदान नगर से हैं। उन्होंने 30 मई 2005 को 8848 मीटर ऊंची एवरेस्ट को फ़तह किया था। प्रकृति से अथाह प्रेम के कारण उन्हें चौदह वर्ष की आयु में पर्वतारोहण में रूचि पैदा हो गयी थी और पिछले नौ वर्षों से वे इस क्षेत्र में गंभीरता से सक्रिय हैं। सुश्री लाले किशावर्ज़ ने बड़े प्रयासों के बाद पर्वतारोहण के तीसरे दर्जे और फिर उसके बाद पर्वतारोहण व स्कीईंग के तीसरे दर्जे के प्रशिक्षक की डिग्री प्राप्त की। सुश्री लाले किशावर्ज़ ने इसी प्रकार हिमालय पर्वत श्रंख्ला की ऊंची चोटी को वर्ष 2003 में फ़तह किया था और पर्वतारोहण प्रतियोगिता में देश में पहला स्थान प्राप्त किया था।

सुश्री लाले किशावर्ज़ एवरेस्ट पर चढ़ने के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहती हैः वह बहुत बड़ी है और एक पर्वतारोही के रूप में भी उस पर चढ़ना कोई आसान बात नहीं है। मैंने अपनी वसीयत लिखी थी और तीन महीनों तक बर्फ़ व बर्फ़ की सरकती हुई चट्टानों के बीच जीवन बिताया। सुश्री लाले किशावर्ज़ अब तक ईरान की छह चोटियों को फ़तह कर चुकी हैं। ईरान के 180 अच्छे पर्वतारोहियों से पहले सात पर्वतारोहियों का चयन हुआ और फिर उनमें से सात पांच पर्वतारोहियों को एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए चुना गया और अंत केवल दो लोग ही एवरेस्ट फ़त्ह कर सके जिनमें प्रथम स्थान पर लाले किशावर्ज़ थीं।

जब डाक्टर लाले किशावर्ज़ से एवरेस्ट पर चढ़ने के उनके कार्यक्रम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहाः इस सफलता तक पहुंचने के लिए मैंने निरंतर नौ वर्षों तक अथक प्रयास किया दूसरे शब्दों में ठीक उस समय से जब मैंने पर्वतारोहण आरंभ किया था। मैंने पहाड़ पर क़दम भी एवरेस्ट फ़तह करने की मंशा से रखा था।

वह धरती की छत कहे जाने वाली चोटी को एक मुसलमान महिला के रूप में फ़तह करने के अपने अनुभव को इन शब्दों में व्यक्त करती हैः एवरेस्ट पर चढ़ना मेरे जीवन के सबसे मीठे व सुंदर क्षणों में से एक है। वास्तव में मेरे सभी सपनों के व्यवहारिक होने जैसा था। और एक मुसलमान महिला के रूप में मैने यह सफलता प्राप्त की है इसलिए यह मेरे जीवन की महाउलब्धियों मे से एक है।

ईरान की महिला खिलाड़ियों को विश्व स्तर पर दूसरी महिला खिलाड़ियों से जो बात भिन्न करती है वह ईरानी खिलाड़ियों का इस्लामी आवरण पर प्रतिबद्ध रहना है। खेल के मैदानों में इस्लामी आवरण पर ईरानी महिला खिलाड़ियों का पाबंद रहने की विश्व के न्याय व स्वतंत्रता प्रेमियों ने बड़ी सराहना की है। यद्यपि इस्लामी आवरण के साथ मुसलमान महिला खिलाड़ियों को किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती किन्तु कुछ अंतर्राष्ट्रीय खेल संघ व पश्चिमी सरकारें इस संबंध में सदैव रुकावटें खड़ी करती रहती हैं। इस प्रकार के भेदभावपूर्ण क़दमों में से एक उस समय देखने में आया जब फ़ीफ़ा ने जार्डन के साथ ईरान की महिला फ़ुटबाल टीम के खेल को इस लिए रद्द कर दिया क्योंकि ईरानी खिलाड़ी इस्लामी आवरण में थीं और इस प्रकार फ़ीफ़ा ने ईरान की महिला टीम की खिलाड़ियों को प्रतियोगिता में भाग लेने से रोक दिया। इसका परिणाम यह निकला कि ईरान की महिला फ़ुटबाल टीम अब लंदन ओलंपिक में भाग नहीं ले सकेगी। इसके बावजूद ईरान की महिला खिलाड़ी इस्लामी मूल्यों विशेष रूप से प्रतियोगिताओं में इस्लामी आवरण पर बल देती हैं क्योंकि उनके लिए ईश्वर की प्रसन्नता अधिक महत्व रखती है।

 

मिसाइल की इंजीनियर शफ़ीक़ा बाक़रीन

ज्ञान विज्ञान के विभिन्न विभागों में सफल महिलाओं में एक ईरान की प्रसिद्ध इंजीनियर, श्रीमती शफ़ीक़ा बाक़रीन हैं। वे वर्ष १९६० में तेहरान में जन्मी और इल्म व सनअत विश्वविद्यालय से उन्होंने मेकानिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने आगे की शिक्षा आज़ाद इस्लामी विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वे मशीनों की डिज़ाइनिंग और उत्पादन की विशेषज्ञ हैं और इसके कारण उन्होंने कई अविष्कार किये और नयी नयी मशीनें बनायीं। श्रीमती बाक़रीन अत्याधिक परिश्रमी और योग्य महिला हैं जिसके कारण वे अपने देश के लिए विभिन्न अविष्कारों को पंजीकृत और उन्हें व्यवहारिक बनाने में सफल हुईं। श्रीमती बाक़ेरीन रेबात नामक दूर तक मारक क्षमता रखने वाली मिसाइल की इंजीनियर हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कार के क्लच व गेयर तथा ब्रेक के पैडल को, विकलांगों के लिए इस प्रकार से बनाने में सफलता प्राप्त की है कि जिससे पैरों की आवश्यकता नहीं रहती। यह सक्रिय ईरानी महिला शफ़क़ प्रशिक्षण विमान के माडल उत्पादन की परियोजना की प्रमुख और उडडयन विश्वविद्यालय की वर्तमान और अतीत की सभी परियोजनाओं की प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्ति श्रीमती बाक़ेरीन के बहुत से वैज्ञानिक कारनामें हैं। उन्होंने सैनिक, उद्योगिक व अंतरिक्ष संबंधी विभिन्न परियोजनाओं के संदर्भ में लगभग चालीस कार्यक्रमों को पहली बार ईरान में पंजीकृत कराने में सफलता प्राप्त की है। उत्पादन इकाई की डिज़ाइनिंग व निर्माण, इलेक्ट्रोप्लांटिंग या मुल्लमा के कारख़ानों की डिज़ाइनिंग, लकड़ी के सामान बनाने वाले कारख़ानों की डिंज़ानिंग व निमार्ण, लगभग दो हज़ार से अधिक वस्तुओं की डिज़ाइनिंग व निर्माण, दो प्रकार की विशेष गेयर व्हील की डिज़ाइनिंग और निर्माण, विमान के पंखों को विमान से जोड़ने के उपकरणों की डिज़ाइनिंग व निर्माण तथा शफ़क़ नामक विमान के जैक की डिज़ाइनिंग इस वैज्ञानिक ईरानी महिला के कुछ कारनामें हैं। श्रीमती बाक़ेरीन इसी प्रकार शहाब एक मिसाइल की इंजीनियरों में शामिल हैं तथा कई अविष्कार उन्होंने महिला वैज्ञानिक के रूप में अपने नाम से पंजीकृत कराये हैं।

श्रीमती बाक़ेरीन अंतरिक्ष विज्ञान में विशेषज्ञ होने के साथ ही साथ सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में भी अत्यधिक ज्ञान रखती हैं। उन्होंने विभिन्न इंजीनियरिंग, सामाजिक व सांस्कृतिक क्षेत्रों में तीस से अधिक किताबें और आलेख लखे हैं। ढांचा बनाने के सिद्धान्त, डाक्यूमेन्ट्री और तकनीक में, उपस्थिति पंजीकृत करने की व्यवस्था, तथा प्रशासन के सिद्धान्त जैसी उनकी कुछ रचनाओं की ओर संकेत किया जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सेवाओं के लिए उन्हें बाइस से अधिक मेडल, प्रशंसा पत्र तथा उपाधियां मिल चुकी हैं। इसी संदर्भ में वर्ष १९९० में उन्हें अमीर कबीर फेस्टिवल में प्रशंसा पत्र मिला जबकि उससे तीन वर्ष पूर्व भी ख़ारिज़्मी व शहीद रजाई विज्ञान मेले में उन्हें इसी प्रकार से प्रशंसा पत्र मिल चुके थे। इस ईरानी वैज्ञानिक महिला को इसी प्रकार वर्ष २००१ में देश की आदर्श शोधकर्ता की उपाधि भी दी गयी थी।

शफ़क या पांचवी पीढ़ी के युद्धक विमान की परियोजना, श्रीमती बाक़ेरीन और उनके सहयोगी इंजीनियरों की महत्वपूर्ण पहल रही है। इस युद्धक विमान को, प्रशिक्षण, टू सीटर तथा एक पायलट के साथ युद्धक विमान के तीन माडलों में तैयार किया गया है। शफ़क़ युद्धक विमान, का पता राडार द्वारा नहीं लगाया जा सकता है इसके लिए वह स्टील्थ व्यवस्था से लैस है जिस पर पहले केवल अमरीका का एकाधिकार था। शफ़क़ युद्धक विमान जिसकी प्रथम डिज़ाइनिंग श्रीमती शफ़ीक़ा बाक़ेरीन ने की है, इस समय उत्पादन के चरण में है।

इस महान ईरानी महिला वैज्ञानिक से वार्ता में हमने उनकी सफलताओं के कारणों के बारे में पूछा तो उन्होंने अपनी सफलताओं का एक महत्पूर्ण कारण, अपनी योग्यताओं व ज्ञान पर ठोस विश्वास को बताया। उन्होंने कहा कि आरंभ में हमारे पास कच्चा माल और निर्माण के लिए आवश्यक उपकरण पर्याप्त मात्रा में नहीं थे। मैंने अपने सहयोगियों के साथ, अपने अनथक प्रयास से साधारण व अपर्याप्त वस्तुओं से देश के लिए श्रेष्ठ व उच्च श्रेणी के उपकरण बनाने में सफलता प्राप्त की। एक प्रदर्शनी के दौरान, वैज्ञानिकों के अविष्कारों और इसी प्रकार मेरे अविष्कारों को दिखाया जा रहा था उसी दौरान एक विकलांग किशोर व्हीलचेयर पर बैठ कर मेरे पास आया और मेरी सेवाओं की सराहना की जिससे मेरे भीतर काम व प्रयास की अत्यधिक ऊर्जा पैदा हो गयी। ईश्वर की कृपा व सहायता भी मेरी सफलताओं में अत्याधिक प्रभावी रही है। ईश्वर मेरे ह्रदय में बसता है और मैंने उस मार्ग का चयन किया है जिसे वह चाहता है।

ईरान की यह वैज्ञानिक महिला, अपने देश की आदर्श महिलाओं की प्रगति में घराने की भूमिका को अत्याधिक महत्वपूर्ण मानती हैं। उनका कहना है कि प्रगति की मुख्य भूमिका घराने में तैयार होती है। मेरे घर में भी मेरा पालन पोषण कुछ इस प्रकार से हुआ है कि मैं अपनी भूमिका को सही रूप से पहचानने और उसे भली भांति निभाने में सफल हुई। मेरे व्यवहार तीन क्षेत्रों में विभाजित हैं। घर के अंदर और माता पिता के साथ मेरा व्यवहार, एक पत्नी की भूमिका और घर से बाहर एक निदेशक व वैज्ञानिक के रूप में मेरा व्यवहार।

श्रीमती बाक़ेरीन की दृष्टि में हर मामले में मुख्य भूमिका निभाती हैं। वे कहती हैं कि आबाद व बर्बाद करने की शक्ति महिलाओं के पास होती है। हर परिस्थिति में चाहे वह युद्ध की हो या संधि की, मुख्य भूमिका महिलाओं की होती है। हमारे देश में भी ईरान पर सद्दाम द्वारा थोपे गये युद्ध के दौरान और योद्धाओं के समर्थन की मुख्य भूमिका महिलाओं की थी। कुछ महिलाएं, नर्स के रूप में घायलों और रोगियों की देखभाल करती थीं तो कुछ खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था करती थीं और कुछ अन्य महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में शिक्षा प्राप्त करके तथा अध्ययन व शोध द्वारा अविष्कारों के माध्यम से देश व समाज के विकास में योगदान करती थीं।

श्रीमती बाक़ेरीन उन महिलाओं में से थीं जिन्होंने थोपे गये आठ वर्षीय युद्ध के दौरान सद्दाम की ओर की की गयी रसायिनक बमबारी का सामना किया और आज भी उसके प्रभाव के कारण विभिन्न प्रकार को रोगों में ग्रस्त हैं किंतु इसके बावजूद वे ठोस इरादे के साथ विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं और इसी लिए वे चालीस से अधिक अविष्कारों को पंजीकृत कराने में सफल हुई हैं।

श्रीमती शफ़क़ा बाक़ेरीन का यह विश्वास है कि एक विशेषज्ञ महिला को समाज में प्रगति व विकास के लिए सब से पहले अपनी सच्चाई और योग्यताओं में विश्वास रखना चाहिए। उनका मानना है कि यदि किसी को अपने काम में आस्था न हो तो वह सफल नहीं हो सकता। हमारी महिलाएं, धार्मिक मान्यताओं व सिद्धान्तों में विश्वास के कारण विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में सफल हुई हैं। उनका विचार है कि ईरानी महिलाओं की सफलता का एक कारण, हिजाब और इस्लामी आवरण में विश्वास है। वे कहती हैं कि हमारी महिलाएं वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दृष्टि से जितने उच्च स्तर पर होंगी, स्वंय को दिखाने की भावना उनमें उतनी ही कम होगी जैसा कि हम देखते हैं कि बुद्धिजीवी व वैज्ञानिक महिलाएं कभी दूसरों को आकर्षित करने का प्रयास नहीं करतीं क्योंकि उसकी पूंजी उसका ज्ञान होता है। यदि कोई महिला, स्वंय को सजा संवार कर पुरुषों को दिखाना चाहती है तो उसका कारण यह अभाव है जो उसे अपने भीतर महसूस होता है। यदि महिला के पास ज्ञान हो तो उसे अपनी सुन्दरता परोसने की कोई आवश्यकता नहीं होती। जो महिला ज्ञान अर्जित नहीं कर सकती वह रात दिन महत्वहीन वस्तुओं और विषयों के बारे में सोचती रहती है।

श्रीमती बाक़ेरीन महिलाओं की शक्ति को एक साथ कई काम में जानती हैं वे कहती हैं कि महिलाएं एक साथ कई काम कर सकती हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि महिलाओं का मस्तिष्क सदैव घर के भीतर और बाहर के कामों के बारे में कार्यक्रम बनाने में व्यस्त रहता है। यह भी सिद्ध हो चुका है कि जीवन के विभिन्न मामलों में महिलाओं की योजनाएं, पुरुषों से बेहतर होती हैं। श्रीमती बाक़ेरीन का मानना है कि महिलाओं को अपनी सफलताओं के लिए, अपनी आकांक्षाओं, प्रतिष्ठा, और विचारों की रक्षा करनी चाहिए और अपनी योग्यताओं के सहारे बड़े बड़े काम करने चाहिए।