सफल शिया महिलाएं 1



सफल महिला श्रंखला के अन्तर्गत हम ईरान की कुछ और सफल महिला से आपको परिचित करवा रहे हैं।

श्रीमती डा. सूसन सफ़ावर्दी

इस्लामी गणतंत्र ईरान के विरुद्व शत्रुओं के इन दुष्प्रचारों के बावजूद कि ईरान की महिलाएं सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक गतिविधियों तथा विज्ञान एवं शोध संबन्धी प्रयासों में सक्रिय नहीं हैं, ईरानी महिलाएं देश के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रहने के साथ ही साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। सफल ईरानी महिलाएं नामक साप्ताहिक कार्यक्रम की २५वीं कड़ी में हम आपको मानवाधिकार के क्षैत्र में सक्रिय कार्यकर्ता "डाक्टर सूसन सफ़ावर्दी" से परिचित कराने जा रहे हैं।

ईरान के भीतर तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सफल एवं सक्रिय ईरानी महिलाओं में से एक, श्रीमती डा. सूसन सफ़ावर्दी हैं। उनका जन्म वर्ष १९६० में राजधानी तेहरान में हुआ था। उन्होंने माध्यमिक शिक्षा तेहरान में पूरी की और ईरान की इस्लामी क्रांति के दौरान पहलवी शासन की तानाशाही के विरुद्व देशवासियों के साथ मिलकर सक्रिय रूप में क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरंभ कर दिया। इस्लामी क्रांति की सफलता के पश्चात उन्होंने बहुत सी उपलब्धियां अर्जित की हैं। डा. सूसन सफ़ावर्दी की उपलब्धियों में से एक, नशे की लत छुड़ाने वाले केन्द्र की स्थापना है। नशे की लत छुड़ाने तथा मादक पदार्थों के प्रयोग की रोकथाम के क्षेत्र में उन्होंने बहुत सफलताएं अर्जित की हैं।

श्रीमती सफ़ावर्दी ने इस्लामी क्रांति की सफलता के कुछ ही समय पश्चात शिक्षा प्राप्ति के उद्देश्य से जर्मनी की यात्रा की। वहां पर उन्होंने राजनीति शास्त्र में एम.ए.किया और स्वदेश वापस आ गईं। राजनीति शास्त्र में भी डाक्ट्रेट करने के लिए उन्होंने फिर विदेश की यात्रा की। वर्तमान समय में वे ईरान की ओपेन यूनिवर्सिटी के एकेडिमिक बोर्ड की सदस्य हैं और इसी यूनिवर्सिटी में राजनीतिशास्त्र तथा जर्मन भाषा पढ़ाती हैं।

ओपेन यूनिवर्सिटी में अपने दायित्वों के निर्वाह के साथ ही डा. सूसन सफ़ावर्दी, ग़ैर सरकारी तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में भी सक्रिय हैं। इस समय वे एक ग़ैर सरकारी संगठन "कानूने मेहरवर्ज़ाने सुल्ह" की महासचिव हैं जिसकी स्थापना उन्होंने वर्ष २००५ में की थी। इस केन्द्र में डा. सफ़ावर्दी ने ईश्वरीय धर्मों को मानने वाली महिलाओं के साथ इन धर्मों की संयुक्त बातों तक पहुंचने और शांति, न्याय तथा आत्मीयता जैसे विषयों के आधार पर समन्वय बनाने के लिए बहुत प्रयास किये हैं। इस संबन्ध में उन्होंने विभिन्न देशों की यात्राएं कीं तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ में शांति, महिला और परिवार जैसे विषयों से संबन्धित बैठकों में भाग लेकर मानवाधिकारों के कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी सुझाव प्रस्तुत किये हैं। इसीलिए सन २००९ में उन्हें इस्लामी गणतंत्र ईरान की हेलाले अहमर, रेड क्रीसेन्ट संस्था की ओर से "शांतिदूत" का पुरस्कार दिया गया। उनकी ग़ैर सरकारी गतिविधियों के संदर्भ में, बम नगर में आने वाले भीषण भूकंप से प्रभावित महिलाओं के लिए "मेरूदण्ड चिकित्सा केन्द्र" की स्थापना की ओर संकेत किया जा सकता है। विगत में वे विश्व अहलुलबैत परिषद की महिला शाखा के कार्यालय की प्रमुख रह चुकी हैं। इस समय डा. सफ़ावर्दी, तेहरान ओपेन विश्वविद्याल में महिला मामलों की केन्द्रीय परिषद की सदस्य हैं। डा. सूसन सफ़ावर्दी ने इस्लाम तथा इस्लामी क्रांति से लोगों को परिचित कराने के उद्देश्य से विश्व के विभिन्न देशों की यात्राएं की हैं जिनमें अमरीका, फ़्रांस, अल्जीरिया, मिस्र, बोस्निया, स्वीज़रलैण्ड, जर्मनी तथा लेबनान आदि सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने बहुत से सेमिनारों और गोष्ठियों में भी भाग लिया।

डा. सफ़ावर्दी ने बहुत सी पुस्तकें लिखी हैं और कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया है। ईरान की इस सफल महिला की बहुत सी रचनाएं राजनीतिशास्त्र, मानवाधिकारों, महिलाओं और बच्चों के बारे में हैं। अलबत्ता उनकी कुछ रचनाएं उन यात्राओं के बारे में हैं जो उन्होंने मानवाधिकारों के संबन्ध में की हैं। इस प्रतिभाशाली ईरानी महिला की प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक का नाम है, "बिस्तो हफ़्त साअत दर फ़ुरूदगाहे जान.एफ़ केनेडी" अर्थात जान एफ केनेडी हवाई अडडे पर २७ घण्टे। उनकी यह रचना ईरानी महिलाओं के ग़ैर सरकारी संगठन की कुछ उन महिला सदस्यों की कहानी है जो वर्ष २००० में संयुक्त राष्ट्रसंघ के आधिकारिक निमंत्रण पर महिलाओं के साथ भेदभाव के विरन्द्र करने वाले आयोग की वार्षिक बैठक में भाग लेने के उद्देश्य से न्यूयार्क जाती हैं। जैसे ही जान एफ़ कैनेडी हवाई अडडे पर पहुंचती हैं, उन्हें अमरीकी गुप्तचर एजेन्टों की एक अप्रत्याशित कार्यवाही का सामना करना पड़ता है जो वास्तव में पढ़ने योग्य है। यह पुस्तक विदेशों में बहुत अधिक लोकप्रिय हुई। जिन लोगों ने यह पुस्तक पढ़ी है उनमें से अधिकांश लोगों के अनुसार, वे लोग पहली बार इस पुस्तक के माध्यम से धार्मिक आस्थाओं तथा इस्लामी गणतंत्र ईरान पर विश्वास रखने वाले एक ईरानी परिवार के जीवन तथा धार्मिक आस्था से अवगत हुए हैं।

डा. सफ़ावर्दी अंग्रेज़ी और जर्मनी भाषाओं में दक्ष हैं और उन्होंने अपनी रचनाओं का इन दो भाषाओं में अनुवाद किया है। जान एफ केनेडी हवाई अडडे पर २७ घण्टे नामक पुस्तक का भी अनुवाद इसकी लेखिका अर्थात डा. सूसन सफ़ावर्दी ने अंग्रेज़ी भाषा में भी किया है।

"रस्ताख़ीज़ी दर तारीकी" नामक पुस्तक, जो दो वाल्यूम में है, जर्मनी में डा. सफ़ावर्दी की उपलब्धियों को दर्शाती है क्योंकि उन्होंने जर्मनी में अपने निवास के दौरान अपने पति तथा उनके मित्रों की सहायता से बहुत से ग़ैर मुस्लिमों को इस्लाम से परिचित करवाया और वे उनके मुसलमान होने का कारण बनीं। रस्ताख़ीज़ी दर तारीकी नामक पुस्तक में इन नए मुसलमानों की यादगारों घटनाओं का उल्लेख किया गया है। "इस्लाम" तथा "कूदक" भी डा. सफ़ावर्दी की वे दो अन्य पुस्तके हैं जिनका अनुवाद जर्मन भाषा में किया गया है।

मानवाधिकारों के संबन्धन में सक्रिय ईरानी महिला डा.सफ़ावर्दी से किये गए साक्षात्कार में जब सफलता में परिवार की भूमिका के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा किसी व्यक्ति की प्रगति एवं सफलता का महत्वपूर्ण कारक परिवार माना जाता है। विशेषकर संकल्प को सुदृढ़ करने या उसे कमज़ोर बनाने में परिवार की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मनुष्य परिवार से ही आत्मविश्वास सीखता है। परिवार ही वह स्थान है जहां पर लोगों की पहचान बनती है और यहां पर माता और पिता की भूमिका निर्धारित एवं निश्चित है। तात्पर्य यह है कि माता-पिता ही बच्चों के सब कुछ होते हैं। बच्चा अपने घर से ही हर प्रकार की अच्छी और बुरी बातें सीखता है। इस दृष्टि से महिला और पुरूष के बीच सहकारिता बहुत महत्वपूर्ण है और हर प्रकार का दिखावा, सहमति और मतभेद आदि जैसी बातें जीवन में एक व्यक्ति की पथभ्रष्टता का कारण बन सकती हैं।

श्रीमती डाक्टर सफ़ावर्दी, महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि प्रथम चरण में महिलाओं के लिए आत्मविश्वास बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसा आत्मविश्वास जो एक मनुष्य की दृष्टि से हो, न कि महिला के विदित आयामों के दृष्टिगत एक महिला की दृष्टि से, क्योंकि जो भी महिला भीतर से ठोस होगी वह इस बात को सही ढंग से समझेगी कि महिला के विदित आयामों का प्रभाव अस्थाई एवं क्षणिक होता है किंतु दीर्गावधि में जो बात मनुष्य के रूप में किसी महिला की प्रगति एवं विकास का कारण बनती है वह आत्मविश्वास, मूल्यों व आस्थाओं के प्रति कटिबद्वता तथा इस संबंध में सतत प्रयास है।

श्रीमती सफ़ावर्दी के तीन बच्चे हैं। यह सक्षम ईरानी महिला अपने पति के सहयोग से परिवार में दायित्वों का निर्वाह तथा समाजिक एवं धार्मिक गतिविधियां करने में सफल रही हैं। जब उनसे पूछा गया कि सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए एक महिला किस प्रकार से माता-पत्नी तथा अपनी सामाजिक भूमिकाओं के मध्य समन्वय स्थापित कर सकती है तो उन्होंने कहा, कि वास्तव में किसी महिला के लिए जो एक आदर्श पत्नी तथा सफल माता की भूमिका निभाना चाहती है, इन भूमिकाओं के बीच समन्वय उत्पन्न करना कोई सरल बात नहीं है। इस कार्य में शत प्रतिशत सफलता जीवनसाथी के सहयोग के बिना बिल्कुल संभव नहीं है। ऐसा हो सकता है कि एक महिला इस मार्ग में आगे बढ़े किंतु अपने जीवनसाथी के सहयोग के बिना उसकी कोई न कोई भूमिका कमज़ोर रह जाएगी। अतः वह महिला जो यह चाहती है कि इन तीनों भूमिकाओं को अच्छी तरह से निभाए उसको चाहिए कि वह तीनों भूमिकाओं में अपनी स्थिति को पहचानते हुए अपने जीवनसाथी के साथ अपने महत्व एवं स्थान को ढूंढे। ऐसा न होने की स्थिति में समस्याएं आएंगी। यह नहीं कहा जा सकता कि यह संभव ही नहीं है किंतु महिला को अपने व्यक्तित्व और महत्व को समझते हुए, जिनका उल्लेख स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी तथा वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई के कथनों में मिलता है, अपने स्थान को पहचानना चाहिए। अलबत्ता इसके लिए बचपन से ही प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। वास्तव में यदि हमारे बच्चे और बच्चियां भविष्य में संयुक्त जीवन के लिए पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों विशेषकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम और हज़रत ज़हरा के आदर्श जीवन के आधार पर संयुक्त जीवन व्यतीत करना चाहते हैं तो उन्हें बचपन से ही इन धार्मिक आदर्शों से अवगत होना चाहिए।

डाक्टर श्रीमती मीनू मोहरज़

डाक्टर श्रीमती मीनू मोहरज़, एक चिकित्सक और ईरान की चिकित्सा विज्ञान अकादमी की सदस्या हैं। उनका जन्म वर्ष १९४५ ईसवी में तेहरान में हुआ था। उन्होंने १९६३ में कालेज की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात उसी वर्ष तेहरान विश्वविद्यालय में चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई आरंभ की। डाक्टर मीनू मोहरज़ ने सामान्य चिकित्सा की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात संक्रामक बीमारियों में विशेषज्ञता की और वर्ष १९७३ में इसी विषय में उन्होंने तेहरान विश्वविद्यालय से डाकट्रेट की डिग्री प्राप्त की। विश्वविद्यालय से शिक्षा समाप्त करने के पश्चात डा. मोहरज़ ने एडस के उपचार के संबन्ध में आस्ट्रेलिया में विभिन्न कोर्स पूरे किये और फिर स्वदेश वापस आ गईं। वर्तमान समय में वे इस्लामी गणतंत्र ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अस्पताल तथा अन्य स्वास्थ्य केन्द्रों में अपनी सेवाएं प्रदान कर रही हैं। वे इस समय तेहरान विश्वविद्याल के एकेडमिक बोर्ड की सदस्य हैं और इस विश्वविद्यालय में संक्रमण विभाग के प्रमुख के रूप में पढ़ा रही हैं।

डाक्टर मोहरेज़ अब तक विभिन्न प्रकार के दायित्वों का निर्वाह कर चुकी हैं। उन्होंने संक्रामक बीमारियों विशेषकर एडस जैसी भयानक बीमारी से संघर्ष के संदर्भ में उल्लेखनीय उपलब्धियां अर्जित की हैं। वर्तमान समय में वे स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी अस्पताल के एडस शोध केन्द्र की प्रमुख हैं। वे ईरान में संक्रामक रोगों में ग्रस्त लोगों का समर्थन करने वाली समिति की सहायक तथा ईरान की चिकित्सा विज्ञान अकादमी की स्थाई सदस्य हैं। यह परिश्रमी ईरानी महिला चिकित्सक तेहरान विश्वविद्याल के एकेडमिक बोर्ड की सदस्य होने के अतिरिक्त संक्रामक रोगों के विशेषज्ञों के संघ की सचिव, संक्रामक रोगों की पत्रिका की संपादक साथ ही ईरान की एडस समिति की सदस्या हैं। वर्ष २००१ से चार वर्षों तक वे विश्व स्वास्थ्य संगठन में एडस के विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत रही हैं।

ईरान की यह सक्षम महिला चिकित्सा समाज को अपनी सेवाएं देने के साथ ही साथ पिछले ३५ वर्षों से अध्ययन और शोध में भी व्यस्त है। श्रमती डाक्टर मोहरज़ के अथक प्रयासों का एक भाग IMOD नामक औषधि का उत्पाद है जो एडस के उपचार में प्रयोग होती है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने विशेषज्ञ डाक्टरों की एक टीम के सहयोग से एडस की रोकथाम तथा उसके उपचार के IMOD नामक दवा बनाने में सफलता प्राप्त की। एडस के संबन्ध में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय कांफ़्रेंसो में वे भाग लेती हैं और इस संदर्भ में उन्होंने अब तक बहुत से उपयोगी एवं उल्लेखनीय उपाय सुझाए हैं। इसके अतिरिक्त डा. मोहरज़ वर्षों से एडस की रोकथाम और उसके उपचार के लिए क्लीनिकल प्रशिक्षण के संबन्ध में अमरीका सहित अन्य कई देशों के शोध केन्द्रों के साथ सहकारिता कर रही हैं। इसी प्रकार उन्होंने मानव सेवा की भावना से लेबनान, इथोपिया, मोरक्को, पाकिस्तान तथा अन्य देशों में जाकर संक्रामक बीमारियों तथा एडस के बारे में प्रभावी प्रयास किये हैं। इसके अतिरिक्त वे ईरान की माल्ट फीवर तथा क्षय रोग समिति की सदस्य भी हैं। स्वास्थ्य और उपचार के क्षेत्र में इस ईरानी महिला की दक्षता एवं प्रभावी सक्रियता के कारण स्वास्थ्य शिक्षाओं के क्षेत्र में वे यूनेस्कों के योजना आयोग परिषद की सदस्य बनीं।

वर्तमान समय में डाक्टर मीनू मोहरज़ उस क्लब की अध्यक्ष हैं जिसका संचालन एडस पीड़ितों द्वारा किया जाता है। इस बारे में वे कहती हैं कि पहले की तरह अब एडस कोई घातक बीमारी नहीं रही है बल्कि उपचार से इसको नियंत्रित किया जा सकता है। इस बीमारी को रोकने में अधिक प्रभावी लोग स्वंय एडस के मरीज़ हैं जो एक दूसरे को परामर्श देकर इस बीमारी की रोकथाम में बहुत प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। जिस क्लब का प्रबंधन मेरे हाथ में है उसमें एडस के लगभग ३७० बीमार हैं जिसमें महिलाएं और पुरूष दोनों ही सम्मिलित हैं और यह बीमारों तथा लोगों को परामर्श देते हैं। हम एडस के बीमारों को सिखाते हैं कि वे किस प्रकार शादी करें और संतान उत्पन्न करें तथा अपने परिवार की सुरक्षा करें।

डाक्टर मीनू मोहरज़ कहती हैं कि मैं इसलिए अपने जीवन से संतुष्ट हूं क्योंकि मेरा जीवन जनता की सेवा में व्यतीत हुआ है। मेरी अभिलाषा है कि मैं संक्रमक रोगों विशेषकर एडस के बारे में अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध करवा सकूं। सौभाग्यवश हमारे देश में रेडियो एवं टेलिविज़न ने इस विषय को बड़े अच्छे ढंग से कवरेज दिया है और हमारे देश ने एडस जैसी बीमारी की रोकथाम हेतु बहुत अच्छे प्रयास किये हैं।

एड्स एक संक्रमक बीमारी है जो एचआईवी वाएरेस से फैलती या स्थानांतरित होती है। एड्स का यह वाएरेस धीरे-धीरे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को इस प्रकार से प्रभावित करता है कि इससे प्रभावित व्यक्ति कुछ ही वर्षों में विभिन्न प्रकार के संक्रमणों और कैंसर का शिकार हो जाता है जिसके परिणाम स्वरूप उसकी मृत्यु हो जाती है। मुझको इस बात की आशा है कि मेरे तथा मेरे सहयोगियों के निरंतर प्रयासों से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकेगा। ईरान में एड्स शोध केन्द्र की प्रमुख डा.मीनू मोहरज़, इस बीमारी से होने वाली क्षति को कम करने का उचित मार्ग इस बारे में लोगों को सूचित करने और उसकी रोकथाम मानती हैं। वे कहती हैं कि वर्तमान समय में ईरान में १९६ ऐसे केन्द्र मौजूद हैं जो एडस के बारे में निःशुल्क परामर्श देते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस भयानक बीमारी को रोकथाम के लिए हमें जानकारी की आवश्यकता है।

जब डाक्टर मीनू मोहरज़ से उनकी सफलता के कारणों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे अपनी सफलता के महत्वपूर्ण भाग को अपने माता-पिता के निस्वार्थ प्रयासों का ऋणी मानती हैं। वे कहती हैं कि पहले चरण में मेरे मुख्य प्रेरक माता-पिता रहे। मुझको याद है कि मेरे पिता सदैव ही मुझको ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रेरित किया करते थे और हमारी प्रगति के बारे में पूछगछ करते रहते थे। वे सदैव कहते थे कि तुम लोग ही मेरी एकमात्र पूंजी हो जो शिक्षा प्राप्ति में व्यस्त हो। मैंने उस समय से यह सीखा कि जीवन में पढूं और पढ़ाऊं। डा. मोहरज़, बच्चों के प्रशिक्षण में परिवार की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण मानती हैं। इस संबन्ध में वे कहती हैं कि बच्चों के प्रशिक्षण, उनकी शिक्षादीक्षा, चिंतन करने, उनको पहचान देने, प्रतिबद्ध बनाने और उनको स्वस्थ बनाने में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

डा. मोहरज़ बीमारों के उपचार के साथ ही साथ अपने परिवार पर भी विशेष ध्यान देती हैं तथा अपनी भूमिका उचित ढंग से निभाती हैं। वे अपनी सफलता के एक भाग में अपने पति और बच्चों को भी भागीदार मानती हैं। उनके पति शल्य चिकित्सक तथा विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर हैं। इसके अतिरिक्त कुछ अस्पतालों के महानिदेशक पद का दायित्व भी उनके कंधों पर है। इन समस्त प्रयासों के बावजूद यह चिकित्सक दंपति एक दूसरे के सहायक और सहयोगी हैं तथा दोनों ही अपनी सफलताओं के लिए स्वंय दूसरे का ऋणी मानते हैं। इस सक्षम ईरानी महिला डाक्टर ने माता की भूमिका भी बड़े अच्छे ढंग से निभाई है। उन्होंने समाज को ऐसी दो संतानें दी हैं जो प्रयत्नशील एवं विशेषज्ञ हैं। डा.मीनू मोहरेज़ के ज्येष्ठ पुत्र ने सनअती शरीफ़ विश्वविद्यालय से एलेक्ट्रानिक क्षेत्र में डाक्ट्रेट की है और वर्तमान समय में वे इसी विषय मे विशेषज्ञता का कोर्स कर रहे हैं। इस सफल ईरानी चिकित्सक परिवार की पुत्री भी पर्यावरण के क्षेत्र में डाक्ट्रेट करने में व्यस्त है।

डा.मोहरज़ का मानना है कि समाज में महिलाओं को स्वयं को कम नहीं समझना चाहिए। इस सबन्ध में वे कहती हैं कि मनुष्य को सक्रिय रहना चाहिए। उसको चाहिए कि आगे बढ़े और अपनी क्षमताओं का दमन न करे। काम में मानदंड पुरूष या महिला होना नहीं है। कार्य एवं सक्रियता के लिए महिलाओं को भी आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। उनको जानना चाहिए कि समय व्यतीत होने के साथ स्वयं को सक्षम बनाने से उनके भीतर आत्मबल में वृद्धि होती है।

अलबत्ता आत्मविश्वास उत्पन्न करने और सक्षम बनाने में परिवार जैसी समाजिक इकाई के ध्यान एवं प्रशिक्षण की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी के साथ इस बारे में संचार माध्यमों एवं शिक्षा विभाग का भी महत्वपूर्ण दायित्व बनता है। मैं इस बात से प्रसन्न हूं कि वर्तमान समय में ईरानी महिलाएं समस्त क्षेत्रों में पूरे आत्मविश्वास के साथ सक्रिय हैं।

डा मोहरज़, व्यायाम और अच्छी तरह से शिक्षा प्राप्त करने जैसे कार्यों को युवाओं विशेषकर महिलाओं के भीतर आत्मविश्वास उत्पन्न करने और उनको सक्षम बनाने के उपायों में बताती हैं। वे कहती हैं कि अपनी शिक्षाकाल के दौरान मैं वालीबाल की टीम की एक सक्रिय सदस्य थी। मेरा मानना है कि स्वस्थ्य रहने के लिए व्यायाम आवश्यक है। परिवारों को यह अवसर अपने बच्चों के लिए उपलब्ध कराना चाहिए। इसके अतिरिक्त श्रीमती मोहरेज़ एक महिला की विभिन्न भूमिकाओं में समन्वय, तेज़ी से काम करना और परिवार के लिए समय और ऊर्जा के प्रयोग को एक महिला की सफलता के कारक मानती हैं।

यह महिला डाक्टर, वर्तमान संसार में परिवारों को होने वाली क्षति का एक कारण, इन्टरनेट तथा चैनेलों से मुक़ाबले के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की कमी को मानती हैं। इस संदर्भ में वे कहती हैं कि तीसरी दुनिया के देशों में चैनेल विशेषकर अश्लील फ़िल्मों का निर्माण परिवारों को ख़राब करने के लिए किया गया है। इस बीच शिक्षा मंत्रालय, संचार माध्यम तथा परिवार जैसी इकाइयों का कर्तव्य युवाओं तथा परिवार के सदस्यों को दक्ष बनाना है ताकि उनको पता चले कि यह फ़िल्में, जीवन की वास्तविकता नहीं हैं और जीवन में आप का लक्ष्य बिना परिश्रम के प्राप्त नही हो सकता। इस आधार पर उचित ढंग से जीवन व्यतीत करने की दक्षता का प्रशिक्षण परिवार-शिक्षा एवं प्रशिक्षण विभाग तथा संस्कृति निर्माण करने वाली अन्य संस्थाओं द्वारा दिया जाना चाहिए।

श्रीमती मरज़िये हदीदची

ईरान की संघर्षकर्ता महिलाओं में से एक मरज़िये हदीदची हैं जो दब्बाग़ के नाम से विख्यात हैं। इस ईरानी संघर्षकर्ता महिला का जन्म १९३९ में ईरान के पश्चिमी नगर हमदान में हुआ था। उनका प्रशिक्षण धार्मिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ ही साथ अपने पिता से पवित्र क़ुरआन और नहजुल बलाग़ा की शिक्षा ग्रहण की। १९५४ में श्रीमती दब्बाग़ का विवाह हुआ। उनके विवाह को उनके जीवन के परिवर्तन का आरंभ समझा जाता है। विवाह के आरम्भिक दिनों में वे अपने पति के साथ तेहरान आ गईं। तेहरान आकर उन्होंने अपनी धार्मिक शिक्षा को आगे बढ़ाया। अध्ययन के दौरान ही उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियां भी आरंभ कर दीं। उन्होंने १३४१ हिजरी शमसी से शाह की तानाशाही सरकार के विरुद्ध पमफ़्लेट बांटने जैसे कार्य से अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां आरंभ कीं और तेहरान के संघर्षकर्ता धर्मगुरू शहीद आयतुल्लाह सईदी के क्रांतिकारी संगठन से जुड़कर उनकी सक्रियता में तेज़ी आ गई।

क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते दब्बाग़ी के नाम से प्रसिद्ध श्रीमती हदीदची को शाह की गुप्तचर सेवा सावाक ने वर्ष १९७३ में गिरफ़्तार कर लिया। कारावास में सावाक ने इस क्रांतिकारी महिला को नान प्रकार से प्रड़ताड़ित किया। उन्होंने अपनी बेटी के साथ कारावास में बहुत यातनाएं सहन कीं और वे बहुत बीमार हो गईं। जब उनके जीवित रहने की कोई आशा नहीं रही तो उन्हें कारावास से स्वंतत्र कर दिया गया। जेल से स्वतंत्र होने के पश्चात अपना संघर्ष जारी रखने के उद्देश्य से श्रीमती दब्बाग़ देश के बारह चली गईं और इस्लामी क्रांति की सफलता तक वे देश के बाहर निर्वासन में रहीं। उन्होंने सीरिया तथा लेबनान के सीमावर्ती क्षेत्रों में बनी सैनिक छावनियों में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया। इस क्रांतिकारी ईरानी महिला ने देश के बाहर हर प्रकार की शाह विरोधी गतिविधों में बढ़चढ कर भाग लिया।

वर्ष १९७८ में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के पैरिस जाने के पश्चात उनके अन्य चाहने वालों की भांति वे भी वहां गईं और उन्होंने इमाम ख़ुमैनी के घर के भीतरी कामों का दायित्व संभाला। पेरिस में इमाम ख़ुमैनी के निवास स्थल में इमाम की सुरक्षा का दायित्व भी उनपर था। इस्लामी क्रांति की सफलता के पश्चात श्रीमती दब्बाग़ी, ईरान वापस आईं और यहां पर उन्होंने विभिन्न प्रकार की ज़िम्मेदारियां संभालीं। इस क्रांतिकारी ईरानी महिला की ज़िम्मेदारियों में हमदान में ईरान की क्रांति के संरक्षक बल सिपाहे पासदारान की कमान और बसीज अर्थात स्वयंसेवी संगठन की महिला शाखा की जि़म्मेदारी का उल्लेख किया जा सकता है। इसी प्रकार श्रीमती दब्बाग़ तीन बार तेहरान और हमादान से सांसद भी रह चुकी हैं। उन्होंने इसी प्रकार तेहरान में "इल्म और सनअत" विश्वविद्यालय तथा शहीद मुत्तहरी उच्च धार्मिक शिक्षा केन्द्र में धर्मशास्त्र के विषयों के अध्धयापन का काम किया। श्रीमती दब्बाग़ की उपलब्धि यह थी कि पूर्व सोवियत संघ के अन्तिम नेता मिखाइल गोरबाचोफ़ के सत्तकाल में १९८९ में इमाम ख़ुमैनी का संदेश ले जाने वाले तीन सदस्सीय प्रतिनिधिमण्डल मंि एक वे भी थीं। इस संदेश में इमाम ख़ुमैनी ने सोवियत संघ के विघटन की भविष्यवाणी की थी और सोवियत संघ के नेताओं को इस्लाम की ओर आने का निमंत्रण दिया था।

वर्तमान समय मे भी वे विभिन्न प्रकार की ज़िम्मेदारियां संभाले हुए हैं और इस समय इस्लामी गणतंत्र ईरान के महिला आयोग के उप प्रमुख हैं।

श्रीमती मरज़िये हदीदची दब्बाग़ इन सब चीज़ों को अपने पति का ऋणी मानती हैं जिन्होंने समाजिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता के साथ कार्य करने के लिए उनके सामने रास्ता खुला छोड़ा। इसीलिए श्रीमती मरज़िये हदीदची को उनके पति के उपनाम से पहचाना जाता है। इस बारे में वे अपनी बात इस प्रकार से आरंभ करती हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) का एक कथन है कि जो भी ईश्वर के दास का धन्यवाद नहीं करता उसने ईश्वर का धन्यवाद नहीं किया। वे आगे कहती हैं कि मेरे पति का सरनेम दब्बाग़ है जबकि मेरा सरनेम हदीदेची। इसका कारण यह है कि मेरे पिता, दादा और पूर्वज लोहार थे। मैंने स्वतंत्रता प्रेम और अपने पति की इच्छा के दृष्टिगत जो स्वयं भी इस विशेषता के स्वामी थे अर्थात मेरी इच्छाओं की ओर बहुत ध्यान दिया करते थे और मुझको विभिन्न प्रकार की कार्यवाहियों के लिए उन्होंने स्वतंत्र रखा। मै यह मानती हूं कि मुझपर उनका बहुत बड़ा एहसान है और यदि इतिहास में कोई नाम बाक़ी रहना है तो वह उनके नाम के साथ हो न कि मेरे नाम के साथ। इसी आधार पर मैं स्वयं को दब्बाग़ के नाम से परिचित करवाया करती थी।

श्रीमती हदीदची का यह मानना है कि एक महिला अपने बच्चों के लिए एक अच्छी माता और पति के लिए एक अच्छी पत्नी सिद्ध हो सकती है और साथ ही वह समाज की सेवा भी कर सकती है। अलबत्ता वे इस बात पर बल देती हैं कि समय और स्थान की परिस्थितियों को भी पहचानना आवश्यक है और अवसर से उचित लाभ उठाया जाए। वे महिलाओं के क्रांतिकारी संघर्ष के बारे मे कहती हैं कि समाज में उपस्थित रहने और जनसेवा के लिए इस्लाम ने महिला और पुरूष दोनों के लिए किसी भी प्रकार की सीमितता निर्धारित नहीं की है और प्रगति के विभिन्न क्षेत्रों में उपस्थिति तथा मानव की परिपूर्णता को महिला के लिए सीमित नहीं किया है। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाओं की भूमिका के लिए जो (ख़ाक़ा) स्पष्ट किया है वह वही चीज़ है जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों की अन्तरदृष्टि से ली गई है।

जब श्रीमती दब्बाग़ से यह पूछा गया कि क्या आपके पति ने आपकों कभी भी समाजिक एवं क्रांतिकारी गतिविधियों से नहीं रोका तो उन्होंने कहा कि नहीं, कभी नहीं। उनका तो यह मानना था कि ईश्वर यह कहता है कि पुरूष महिला के लिए और महिला पुरूष के लिए परिपूर्णता का कारण है अतः तुम जितना भी विकास और प्रगति करोगी निश्चित रूप से मैं भी परिपूर्ण होता जाऊंगा।

श्रीमती दब्बाग़, अपनी राजनैतिक गतिविधियों और स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के साथ अपनी सहकारिता के बारे में कहती हैं कि मुझको शहीद आयतुल्लाह सईदी ने स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से मिलवाया था। मैं वर्ष १३४६ हिजरी शमसी से अर्थात लगभग २९ या ३० साल से गंभीरता के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगी थी। शहीद आयतुल्ला सईदी ने पहले मेरी सहनशीलता, संकल्प और साहस की परीक्षा ली ताकि यह पता चल सके कि कठिनाइयों में मैं कितना प्रतिरोध कर सकती हूं उसके पश्चात उन्होंने मेरे हवाले ऐसे कार्य किये जो संभवतः बहुत से पुरूषों के लिए भी भयभीत करने वाले थे। अब जब मैं सोचती हूं तो ऐसा लगता है कि उस समय मेरे पास बहुत साहस था। किंतु इमाम ख़ुमैनी के प्रति मेरे अथाह लगाव और पहलवी तथा उसके परिवार के बारे में मेरे पूरे अस्तित्व में पाई जाने वाली घृणा के कारण मैंने कभी भी स्वयं को इस बात की अनुमति नहीं दी कि कभी भी मेरे ऊपर भय या डर छा जाए। सूचनाए एकत्रित करने और अत्याचारी शाही सरकार से मुक़ाबले के लिए मैंने इतने भयानक कार्यों में हाथ डाला कि शायद कोई पुरूष भी इसको करने का साहस न कर सके।

ईरान की यह क्रांतिकारी महिला इस बात से कभी भी अप्रसन्न नहीं रही कि वह अपने संघर्षकाल के दौरान परिवार से दूर रही और अन्य महिलाओं की भांति एक साधारण जीवन से वंचित। इसका कारण यह है कि उनका लक्ष्य बहुत उच्च था अर्थात शाह की अत्याचारी सरकार के विरुद्ध संघर्ष मेरे अस्तित्व में था। वे कहती हैं कि निर्वासन के काल में शायद एक या दो बार अपने परिवार को देखने और उससे मिलने के लिए मेरा मन उदास हुआ किंतु मैंने कभी भी खोखलेपल का आभास नहीं किया। मेरे मन में कभी यह विचार नहीं आया कि बहुत सी ऐसी महिलाए हैं जो इस समय एक सामान्य जीवन व्यतीत कर रही हैं और अपने बच्चों के साथ हैं, ऐसा मैंने कभी नहीं सोचा। इसी प्रकार या इसी अनुपात में मेरे पति के मन में भी ऐसी ही भावना पाई जाती थी। १३५२ हिजरी शमसी से जब मुझको गिरफ़तार किया गया और उसके बाद जब मैंने निर्वासन का जीवन बिताया, मेरे बच्चे मां से वंचित रहे किंतु उस आस्था के आधार पर जो उनके मन में थीं इस बात का उनके जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सका।

जब इस संघर्षकर्ता महिला से पूछा गया कि उस प्रतिनिधमण्डल में, जिसे इमाम ने अपने संदेश के साथ गोरबाचेफ़ को भेजा था, आपकी उपस्थिति का कारण क्या था तो उन्होंने कहा, मेरा अपना मानना यह है कि इमाम यह दर्शाना चाहते थे कि चाहे राजनैतिक क्षेत्र हो या समाजिक या सैनिक या फिर अन्तर्राष्ट्रीय इन सबमें महिलाओं की उपस्थिति आवश्यक है किंतु इस बात का संबन्ध इससे है कि हमारी महिलाएं इस स्थिति को किस सीमा तक समझती हैं, अन्यथा मैं वहां पर अपनी उपस्थिति को आवश्यक नहीं समझती। इसका कारण यह है कि आयतुल्लाह जवादी आमोली, इमाम का संदेश पढ़ने के लिए और श्रीमान लारीजानी उसके अंग्रेज़ी अनुवाद के लिए मौजूद थे। किंतु मैं यह समझती हूं कि इमाम ख़ुमैनी का उद्देश्य यह था कि वे व्यवहारिक रूप से देश के अधिकारियों को यह बता दें कि अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में महिलाओं की उपस्थिति आवश्यक है।

इस क्रांतिकारी महिला के जीवन के ६ दशक से अधिक का समय समाप्त हो चुका है किंतु अभी उनके मन में बड़ी-बड़ी अभिलाशाएं मौजूद हैं। वे कहती हैं कि यदि मुझमें क्षमता होती तो मैं यहां पर नहीं ठहरती बल्कि फ़िलिस्तीन के इन्तेफ़ाज़ा में भाग लेती। संभवतः इसके अतिरिक्त उनसे किसी अन्य की आशा भी नहीं रखनी चाहिए।