सृष्टि ईश्वर और धर्म ५१ पाप या ग़लती का अज्ञानता व सूझबूझ से गहरा संबंध



ईश्वरीय दूतों का इस लिए पापों से दूर रहना आवश्यक है क्योंकि यदि वे लोगों को पापों से दूर रहने की सिफारिश करेगें किंतु स्वंय पाप करेंगे तो उनकी बातों का प्रभाव नहीं रहेगा जिससे उनके आगमन का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

ईश्वरीय दूत समस्त मानव जाति के लिए मार्गदर्शक होते है इस लिए मानव जाति की महानता की अंतिम श्रेणी पर उनका होना आवश्यक है क्योंकि यदि एसा न हुआ तो और वे अपने से उच्च श्रेणी वालों का मार्गदर्शन नहीं कर सकते क्योंकि उन लोगो पर उनकी बातों का प्रभाव नहीं होगा। और अब आज की चर्चा

अब तक हमने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि क्यों ईश्वरीय दूतों का पापों ओर ग़लतियों से पवित्र रहना आवश्यक है किंतु आज की चर्चा में हम आप को यह बताने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार ईश्वरीय दूत पापों से पवित्र रहते थे?

जैसाकि हम आपको बता चुके हैं ईश्वरीय संदेश की प्राप्ति के लिए कुछ विशेष प्रकार की योग्यताओं और क्षमताओं का होना आवश्यक है जो व्यवहारिक रूप से हर मनुष्य में नहीं हो सकतीं और यही कारण है कि ईश्वरीय संदेश पहुंचाने की ज़िम्मेदारी कुछ विशेष लोगों पर डाली गयी जिन्हें हम ईश्वरीय दूत कहते हैं। यह विशेष लोग, ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने के लिए चुने ही इस लिए जाते हैं क्योंकि उनमें विशेष प्रकार की क्षमताएं और योग्यताएं होती हैं जो उन्हें साधारण मनुष्य से उच्च बना देती हैं किंतु इन क्षमताओं और विशेषताओं के परिणाम में उनमें जो परिवर्तन होता है वह केवल यही नहीं होता कि वे ईश्वरीय संदेश की प्राप्ति के पात्र बन जाते हैं बल्कि यह परिवर्तन बहु आयामी होता है और ईश्वरीय दूतों की आत्मा व मन को विशेष रूप दे देता है जिसके कारण वे ज्ञान व जानकारी व सूझबूझ के उच्चतम श्रेणी पर पहुंच जाते हैं क्योंकि ईश्वरीय संदेश की प्राप्ति की एक शर्त ज्ञान व जानकारी का पूर्ण होना है किंतु यह भी स्पष्ट है कि जिसका ज्ञान व पहचान व जानकारी पूर्ण होगी व न गलती करेगा न पाप ।

वास्तव में पाप या अपराध या गलती का अज्ञानता व सूझबूझ से गहरा संबंध है। उदाहरण स्वरूप एक अपनी आर्थिक समस्याओं के निवारण के लिए परिश्रम करने के स्थान पर चोरी की योजना बनाता है। अपने हिसाब से उसकी योजना पूरी होती है और वह हर पहलु पर ध्यान देते हुए कार्यवाही करता है और अपनी पहचान छुपाने की भी व्यवस्था करता है किंतु फिर भी वह पकड़ा जाता है क्योंकि उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि उदाहरण स्वरूप उस घर की निगरानी की जा रही है और उदाहरण स्वरूप सामने वाले घर में कई सुरक्षा कर्मी रात दिन उस घर पर नज़र रखे हैं जिसमें वह चोरी करना चाहता है। यदि उसे इस बात का ज्ञान होता तो वह कदापि उस घर में चोरी न करता।

इसके अतिरिक्त यदि उसमें सूझबूझ होती और बुद्धि पूरी होती तो वह चोरी के परिणामों पर ध्यान देता और दूरदर्शिता से सोचते हुए यह काम न करता। इसी लिए जिन लोगों को अपराध की बुराईयों और परिणामों का भलीभांति ज्ञान होता है वे कभी भी अपराध नहीं करते किंतु जिन लोगों का ज्ञान कम होता है और मूर्खों की भांति अपनी बनायी योजना से आश्वस्त होकर सोचते हैं कि वे पकड़े नहीं जाएगें वही अपराध करते हैं और पकड़े जाते हैं।

इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि अपराध की बुराई और परिणाम का यदि किसी को सही रूप से पूरी तरह से ज्ञान हो तो वह अपराध नहीं कर सकता। बिल्कुल यही दशा ईश्वरीय दूतों की होती है। चूंकि ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने की योग्यता के कारण उनका ज्ञान पूर्ण और वे विलक्षण बुद्धि के स्वामी तथा दूरदर्शिता व सूझबूझ की चरम सीमा पर होते हैं इस लिए वे पाप जो वास्तव में धार्मिक अपराध है नहीं करते क्योंकि उन्हें पाप की बुराई और उसके परिणाम का पूर्ण रूप से ज्ञान होता है। यह यह ज्ञान वास्तव में उनकी उन्हीं विशेष क्षमताओं व योग्यताओं के कारण होता है जिसके आधार पर उन्हें ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने का पात्र समझा जाता है।

इस प्रकार से हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूत ज्ञान की उस सीमा पर होते हैं जहां उनकी सूझबूझ और वास्तविकता का ज्ञान उन्हें पाप नहीं करने देता और उनकी दूरदर्शिता व सम्पूर्ण बुद्धि इस बात का कारण बनती है कि वे हर प्रकार की ग़लती से भी सुरक्षित रहते हैं क्योंकि गलती भी अज्ञानता का परिणाम है। उदाहरण स्वरूप कोई व्यक्ति वर्षों तक अपने घर में रहने और प्रतिदिन आने जाने के बाद अपने उस घर के मार्ग के बारे में कभी गलती नहीं कर सकता क्योंकि अपने घर के मार्ग के बारे में उसका ज्ञान सम्पूर्ण होता है। उसका ज्ञान अपने घर के बारे में सम्पूर्ण होता है इस लिए वह अपने घर के मार्ग में गलती नहीं करता किंतु ईश्वरीय दूतों का ज्ञान हर मामले में सम्पूर्ण होता है इस लिए वे किसी भी मामले में गलती नहीं करते।

पैग़म्बरों अर्थात ईश्वरीय दूतों के पापों से पवित्र होने की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम अपनी बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए पाप व पुण्य व भलाई व बुराई जैसे कामों की इरादे से लेकर काम करने की पूरी प्रक्रिया पर एक दृष्टि डालते हैं ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ईश्वरीय दूत स्वेच्छा से पापों से दूर रहते हैं और जो शक्ति उन्हें पापों से दूर रखती है वह उनकी अपनी होती है और इससे शक्ति के प्रभावशाली होने के कारण, मनुष्य को प्राप्त चयन अधिकार समाप्त नहीं होता।

वास्तव में हर काम चाहे वह सही हो या गलत इरादे और इच्छा से आरंभ होता है और काम करने पर जाकर समाप्त होता है किंतु इस पूरी प्रक्रिया में कई चरण आते हैं जो वास्तव में प्रत्येक मनुष्य की मानसिक दशाओं के अनुसार कम या अधिक होते हैं।

उदारहण स्वरूप जब एक मनुष्य कोई काम करने का इरादा करता है तो उसकी अच्छाइयों और बुराईयों और परिणाम के बारे में सोचता है यदि उसका ज्ञान कम किंतु दूरदर्शिता अधिक होती है तो वह उस बारे में जानकारी रखने वालों से भी पूछताछ करता है अन्य लोगों से सलाह मशविरा करता है फिर अपने हिसाब से उचित समय की प्रतीक्षा करता है और समय आने पर वह काम कर लेता है किंतु यदि उसमें आत्मविश्वास की कमी होगी तो यह प्रक्रिया उसमें लिए लंबी होगी और वह बार बार अपने फैसले बदलेगा किंतु यदि उसमें आत्मविश्वास होगा तो वह प्रक्रिया अपेक्षाकृत छोटी होगी और इसी प्रकार यदि किसी के पास उस काम के बारे में पर्याप्त जानकारी होगी तो उसके लिए वह काम करने की प्रक्रिया और अधिक छोटी होगी और उसके लिए ढेर सारे इरादों और मनोकामनाओं में से संभव व सरलता से पूरी की जाने वाली कामना तक पहुंचा सरल होगा।

इस प्रकार से यह स्पष्ट होता है कि ज्ञान व जानकारी, जहां गलतियों से बचाव को सुनिश्चित करती है वहीं सही मार्ग के चयन की संभावना को अधिक करती है। इस लिए जानकारी व अनुभव जितना अधिक होगा गलतियों से दूरी उतनी ही निश्चित होगी तो यदि हम किसी एसे व्यक्ति की कल्पना करें जिसकी जानकारी व अनुभव पूर्ण हो और उसमें किसी प्रकार की कोई कमी न हो फिर उससे गलती की संभावना नहीं होती किंतु उसमें संभावना न होने का अर्थ यह नहीं है कि वह गलतियों से दूर रहने पर विवश होता है और उसमें चयन शक्ति का विशेष अधिकार ही नहीं होता।

यह ठीक उसी प्रकार है जैसे यदि कोई बुद्धि रखने वाला व्यक्ति किसी शर्बत में विष गिरते अपनी आंखों से देख ले तो वह कदापि उस शर्बत को नहीं पीएगा। अर्थात हम यह कह सकते हैं कि बुद्धि रखने वाला मनुष्य उस शर्बत को पी नहीं सकता किंतु पी नहीं सकता कहने का अर्थ यह नहीं है कि उसमें वह शर्बत पीने की क्षमता ही नहीं है और वह शर्बत न पीने पर विवश है और शर्बत पीने या न पीने के मध्य निर्णय का अधिकार ही उसके पास नहीं है।

यह अधिकार उसके पास है किंतु बुद्धि व विष के होने का ज्ञान उन्हें शर्बत पीने से रोक देता है ।

यही स्थिति ईश्वरीय दूतों की भी होती है एक मनुष्य होने के नाते और ईश्वर द्वारा मनुष्यों को प्रदान की गयी चयन शक्ति व अधिकार के दृष्टिगत यदि वे चाहें तो पाप कर सकते हैं किंतु उन्हें जो वास्तविकताओं का पूर्ण ज्ञान होता है और पापों की बुराइयों से चूंकि वे अवगत होते हैं इस लिए पूर्ण ज्ञान उनके भीतर पाप की इच्छा को जन्म ही नहीं लेने देता किंतु इसका अर्थ यह नहीं होता कि वे पाप करने में अक्षम और मनुष्य को प्रदान किये गये चयन अधिकार से वंचित होते हैं। वास्तव में पापों की बुराई ईश्वरीय दूतों के लिए उसी प्रकार स्पष्ट होती जैसा बुद्धि रखने वाले के लिए विष की बुराईयों और जिस प्रकार बुद्धि रखने वाला व्यक्ति शर्बत में अपनी आखों से विष गिरते देखने के बाद अपनी इच्छा से उसे नहीं पीता उसी प्रकार ईश्वरीय दूत भी पापों से अपनी इच्छा से दूर रहते हैं और इस उनकी इस इच्छा का कारण उनका ज्ञान होता है।

हमारी आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार थेः

ईश्वरीय दूत इस लिए ईश्वरीय संदेश प्राप्त करने का प्राप्त बनते हैं क्योंकि उनमें कुछ एसी विशेषताएं व क्षमताएं होती हैं जो हर मनुष्य में नहीं हो सकती और यही विशेषताएं व क्षमताएं उन्हें पापों से भी रोकती हैं।

सृष्टि ईश्वर और धर्म ५२: ईश्वरीय दूतों का पापों से दूर रहना

nईश्वरीय दूत ईश्वरीय संदेश प्राप्त करते हैं क्योंकि उनमें कुछ एसी विशेषताएं व क्षमताएं होती हैं जो हर मनुष्य में नहीं हो सकती और यही विशेषताएं व क्षमताएं उन्हें पापों से भी रोकती हैं।

ग़लती, अपराध व पाप, वास्तव में ज्ञान व जानकारी में कमी के कारण होता है और यदि अपराधी को अपने अपराध की बुराई, परिणाम और प्रभाव का पूर्ण रूप से ज्ञान हो जाए तो वह अपराध नहीं करता।

पिछली कुछ कड़ियों में यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ईश्वरीय दूत पापों से क्यों दूर रहते है इसके साथ यह भी बताया कि उनका पापों से दूर रहना क्यों आवश्यक है किन्तु ईश्वरीय दूतों के पापों से दूर रहने की बात पर कई शंकाएं की जाती हैं जिनमें से कुछ शंकाओं और उनके निवारण का हम वर्णन कर रहे हैं।

कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि ईश्वर ने अपने दूतों को पापों से दूर रखा है और उनकी यह पवित्रता उनके कर्तव्यों के सही रूप से निर्वाह के लिए आवश्यक भी है तो इस स्थिति में अधिकार व चयन व अपनी इच्छा की विशेषता उन में बाकी नहीं रहेगी तो इस दशा में उनके अच्छे कामों ईश्वर उन्हें फल भी नहीं दे सकता क्योंकि यदि उन्होंने अच्छा काम किया है तो इस लिए किया है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें पापों से दूर रखा और ईश्वर जिसे भी इस प्रकार से पापों से दूर रखेगा वह अच्छा काम ही करेगा।

इस शंका का निवारण किसी सीमा तक पिछली कड़ी में हो चुका है जिसका सार यह है कि पवित्र होने का अर्थ विवश होना नहीं है और पापों से दूरी वास्तव में उनकी स्वेच्छा से होती है इस अंतर के साथ कि उन पर ईश्वर की विशेष कृपा होती है किंतु पवित्र लोगों और ईश्वरीय दूतों पर ईश्वर की विशेष कृपा, विशिष्ट लोगों को प्राप्त सुविधाओं की भांति होती है। अतिरिक्त सुविधा, अतिरिक्त दायित्व और अतिरिक्त संवेदनशीलता का कारण होती है।

हम अपनी इस बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करते हैं। एक कंपनी में बहुत से कर्मचारी विभिन्न प्रकार के काम करते हैं और सब का उद्देश्य कंपनी को लाभ पहुंचाना होता है और सब एक निर्धारित समय पर कंपनी में आते और निर्धारित समय पर जाते हैं किंतु यदि हम वेतन और सुविधाओं पर नज़र डालें तो बहुत अधिक अंतर नज़र आता है। उदाहरण स्वरूप गेट पर बैठे हुए दरबान और कपंनी के एक निदेशक को प्राप्त सुविधाओं और वेतन में बहुत अंतर होता है। दरबान कंपनी की रखवाली करता है और निदेशक व्यापारिक मामलों की देखभाल करता है। किंतु क्या दरबान यह कह सकता है कि यदि मुझे भी निदेशक को प्राप्त होने वाला वेतन और सुविधाएं मिल जाएं तो मैं भी व्यापारिक मामले देख सकता हूं कदापि नहीं क्योंकि उसे ज्ञात है कि निदेशक कंपनी के महत्वपूर्ण और व्यापारिक मामले देखता है इस लिए उसे वेतन और सुविधाएं मिली हैं न यह कि चूंकि उसे सुविधा और भारी वेतन मिलता है इस लिए वह व्यापारिक मामले देखने की दक्षता प्राप्त कर लेता है। स्पष्ट है कि उस उसकी दक्षता व शिक्षा व विशेषताओं के कारण निदेशक बनाया गया और व्यापारिक मामलों को देखने का काम सौंपा गया जिसके बाद उसे भारी वेतन और सुविधाएं दी गयीं। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि ग़लती होने पर जैसा दंड निदेशक को मिलेगा वैसा दरबान को नहीं मिलेगा।

ठीक यही स्थित ईश्वरीय दूतों की होती है। उनमें विशेष प्रकार की दक्षता व विशेषताएं होती हैं जिसके कारण उन्हें ईश्वरीय दूत बनाया जाता है और चूंकि इतना महत्वपूर्ण काम उन्हें सौंपा जाता है इस लिए उन पर ईश्वर की विशेष कृपा भी होती है जो उसकी पापों से दूर रहने में सहायता करती है। किंतु इस के साथ यह भी स्पष्ट है कि उनके अच्छे कर्म का जिस प्रकार से प्रतिफल अधिक होता है उसी प्रकार उनकी गलतियों का दंड भी साधारण लोगों से अधिक कड़ा होता है जिस से संतुलन स्थापित हो जाता है। यह अलग बात है कि हम यह सिद्ध कर चुके हैं कि विभिन्न कारणों से यह निश्चित है कि ईश्वरीय दूत और ईश्वर के विशेष दास गलती और पाप नहीं करते किंतु बौद्धिक रूप से यह संभव है।

ईश्वरीय दूत और उसके विशेष दासों की पापों से पवित्रता की बात पर यह भी कुछ लोग कहते हैं कि पैग़म्बरों और इमामों तथा ईश्ववरीय दूतों की प्रार्थनाओं का इतिहास में उल्लेख है और उन्होंने अपनी इन प्रार्थनाओं में स्वंय ही ईश्वर से अपनी पापों को क्षमा कर देने की गुहार की है तो फिर जब वे स्वयं ही अपने पापों को स्वीकार कर रहे हैं तो हम कैसे यह कह सकते हैं कि वे पापों से पवित्र होते हैं।

इस शंका का उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता है कि ईश्वरीय दूत थोड़े बहुत अंतर के साथ आध्यात्म की परिपूर्णता व चरम सीमा पर होते थे और अपने पद की संवेदनशीलता और आध्यात्मिक स्थान के कारण स्वंय को ईश्वर के अधिक निकट समझते थे इस लिए वे आम लोगों के लिए अत्याधिक साधारण ग़लती और धार्मिक दृष्टि से पाप के दायरे में न आने वाले कामों को भी पाप समझते थे इस लिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते थे तो ईश्वर से उसके लिए क्षमा मांगते थे।

हम एक उदाहरण से अपनी बात अधिक स्पष्ट करना चाहेंगे आप। किसी देश के अत्यन्त सम्मानीय बुद्धिजीवी या उदाहरण स्वरूप प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की कल्पना करें जो एक सड़क पर ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाता हुआ अपने मित्रों के साथ चल रहा हो कभी कभी मज़ाक में दो चार धौल भी अपने मित्र को लगा देता हो। आप की दृष्टि में यह काम क्या है?

निश्चित रूप से आप कहेंगे कि उसे एसा नहीं करना चाहिए अब बाद में वह बुद्धिजीवी या प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति टीवी पर आकर लोगों से क्षमा मांगे और यह कहे कि मुझ से गलती हो गयी आशा है कि जनता मुझे माफ करेगी तो क्या पुलिस उसके इस स्वीकारोक्ति कारण गिरफतार कर सकती है और यह कह सकती है कि उसने स्वंय अपनी गलती मानी है? या यह कि उसने अपने पद की मर्यादा नहीं रखी जबकि उसने शपथ ग्रहण की थी? कदापि नहीं । क्योंकि उसने जो काम किया है वह ग़लती है किंतु एसी गलती नहीं है जो गैर क़ानूनी काम हो या उसने जो शपथ ग्रहण की थी उसके विपरीत हो बल्कि उसका काम, स्वंय उसकी विशेषताओं के कारण, गलत था किंतु गलत होने के बावजूद न तो अपराध के दायरे में आता है और न ही पद की मर्यादा तोड़ना है।

ठीक यही दशा ईश्वरीय दूतों की है बहुत से ऐसे काम हैं जो उन की अपनी विशेषताओं व स्थान के कारण स्वंय उनकी दृष्टि में उचित नहीं होते और वे उस काम को अपने लिए गलत समझते हैं इस लिए यदि इस प्रकार का कोई काम कर लेते हैं तो उसके लिए भी ईश्वर से क्षमा मांगते हैं किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने जो अपनी गलती या पाप के लिए ईश्वर से क्षमा मांगी है वह गलती और पाप वास्तव में धार्मिक रूप से भी पाप था क्योंकि हर पाप ग़लती है किंतु हर ग़लती पाप नहीं जैसे हर साधारण व्यक्ति के लिए हर अपराध गलती है किंतु हर गलती अपराध नहीं।

इसके अतिरिक्त यह भी कहा जा सकता है कि ईश्वरीय दूतों का कर्तव्य मनुष्य का मार्गदर्शन था और मानव जाति का मार्गदर्शन करने की ज़िम्मेदारी, मानव जीवन के सभी आयामों के लिए एक सर्वव्यापी कर्तव्य था। यही कारण है कि ईश्वरीय दूतों ने हर दृष्टि से मानव जाति का मार्गदर्शन किया तो फिर यह कैसे हो सकता था कि प्रार्थना जैसे विषय में जिसपर ईश्वर ने भी अत्याधिक बल दिया है वह मनुष्य का मार्गदर्शन न करते। इसी लिए उन्होंने साधारण मनुष्य द्वारा की जाने वाली प्रार्थना के व्यवहारिक नमूना पेश करने के लिए भी इस प्रकार की प्रार्थनाएं करके मनुष्य को व्यवहारिक रूप से यह सिखाना चाहा है कि ईश्वर से अपने पापों को क्षमा करने की प्रार्थना किस प्रकार की जाए।

आज की कड़ी के मुख्य बिन्दु

ईश्वरीय दूत ईश्वर की विशेष कृपा के कारण पापों से अपनी स्वेच्छा से दूर रहते हैं और ईश्वर की विशेष कृपा के कारण उन पर विशेष प्रकार की ज़िम्मेदारियां भी होती हैं

ईश्वरीय दूतों द्वारा अपनी प्रार्थनाओं में ईश्वर से पापों को क्षमा करने की बात का यह अर्थ नहीं होता कि उन्होंने स्वंय पाप करनी बात स्वीकार की है बल्कि उनके निकट पाप की परिभाषा साधारण मनुष्य की तुलना में अधिक विस्तृत होती है।

ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य के मार्गदर्शन और उसके सामने व्यवहारिक उदाहरण पेश करने के लिए भी साधारण मनुष्य की भांति प्रार्थनाएं की हैं। (जारी है)

गलती, अपराध व पाप , वास्तव में ज्ञान व जानकारी में कमी के कारण होता है और यदि अपराधी को अपने अपराध की बुराई , परिणाम और प्रभाव का पूर्ण रूप से ज्ञान हो जाए तो वह अपराध नहीं करता और चूंकि पैग़म्बरों और ईश्वरीय दूतों का ज्ञान हर वस्तु के बारे में पूर्ण होता है इस लिए उन्हें पापों की बुराइयों और परिणाम और प्रभाव का पूर्ण ज्ञान होता है जिसके कारण वह स्वेच्छा से उस बुराई से दूर रहते हैं।

सृष्टि ईश्वर और धर्म ५३: सच्चे ईश्वरीय दूतों की सत्यता और झूठे दावे करने वालों के झूठ को सिद्ध करना

इस कड़ी में इस बात का उल्लेख है कि सच्चे ईश्वरीय दूतों की सत्यता और झूठे दावे करने वालों के झूठ को किस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है? क्योंकि इतिहास में ऐसे बहुत से लोगों का वर्णन है जिन्होंने यह दावा किया है कि वे ईश्वरीय दूत हैं इस प्रकार के दावों के दृष्टिगत यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन प्रमाणों और साधनों पर चर्चा करें जिनके द्वारा किसी के ईश्वरीय दूत होने के दावे की सच्चाई को परखा जा सकता है। क्योंकि हर दावे के लिए प्रमाण की आवश्यकता होती है और यह एक बौद्धिक विषय है इस लिए यह नहीं सोचा जा सकता कि ईश्वर ने अपने दूतों को बिना प्रमाण के ही धरती पर भेज दिया।

ईश्वरीय दूत होने का दावा यदि कोई ऐसा व्यक्ति करे जो पाप करता हो तो उसका झूठ स्पष्ट होता है क्योंकि हम यह सिद्ध कर चुके हैं ईश्वरीय दूत पाप नहीं करता। इसी प्रकार यदि किसी ईश्वरीय दूत ने अपने बाद के ईश्वरीय दूत का परिचय करा दिया हो तो उसे ईश्वरीय दूत मानने में कोई बाधा नहीं होती किंतु समस्या उस समय होती है जब लोगों के पास ईश्वरीय दूत को पहचानने के लिए कोई विश्वस्त जानकारी न हो और पहले वाले ईश्वरीय दूत ने भी अपने बाद के ईश्वरीय दूत को परिचित न कराया हो। ऐसी स्थिति में ईश्वरीय दूत को पहचानना कठिन होता है क्योंकि इस स्थिति में पापों से दूर रहने वाली विशेषता भी प्रभावी नहीं होती क्योंकि पापों से दूर बहुत से लोग होते हैं किंतु पापों से दूर इन लोगों में कौन सचमुच पापों से दूर है और सही अर्थों में पापों से दूर इन लोगों में कौन ईश्वरीय दूत है इसका ज्ञान साधारण मनुष्य के लिए संभव नहीं है।

इस स्थिति में ईश्वरीय दूत को पहचानने के लिए किसी अन्य साधन की भी आवश्यकता होती है और यही कारण है कि ईश्वर ने अपने असीम ज्ञान द्वारा इस स्थिति के लिए भी मनुष्य को ईश्वरीय दूतों का पहचानने का साधन दिया है और वह साधन है चमत्कार जिसे अरबी भाषा में मोजिज़ा कहा जाता है।

इस प्रकार से यह सिद्ध होता है कि सच्चे ईश्वरीय दूतों को पहचानने के मुख्य रूप से तीन मार्ग हैं। पहला मार्ग तो यह है कि कोई अपनी जानकारी और ज्ञान व पहचान के आधार पर किसी के ईश्वरीय दूत होने का विश्वास कर ले किंतु इसमें समस्या यह है कि इसके लिए आवश्यक है कि वह ईश्वरीय दूत आरंभ से लेकर अंत तक उसके सामने रहा हो अर्थात उसी समाज में जीवन व्यतीत करता हो और उसके सभी कर्मों का लोगों को ज्ञान हो और लोग उसकी भलाईयों, सत्यवाद और उच्च चारित्रिक विशेषताओं से भली भांति अवगत हों किंतु इसके बावजूद यदि किसी को युवास्था में ही ईश्वरीय दूत का पद मिल जाए तो उसकी पूरी आयु के बारे में कौन विश्वास कर सकता है कि वह अपने जीवन के बचे हुए वर्षों में कोई बुराई नहीं करेगा ? इस लिए पैग़म्बर और ईश्वरीय दूत को पहचानने का यह साधन अत्यन्त कमज़ोर और अधिकांश अवसरों पर उपयोगिताहीन होता है।

ईश्वरीय दूतों को पहचानने का एक अन्य मार्ग यह है कि पहले वाले ईश्वरीय दूत ने आगामी ईश्वरीय दूत का परिचय करा दिया हो और स्पष्ट रूप से बता दिया हो उसके बाद अमुक व्यक्ति ईश्वरीय दूत है किंतु इस मार्ग की यह समस्या है कि इसके लिए यह आवश्यक है कि लोग पहले वाले दूत से परिचित हों अर्थात यह मार्ग उसी समाज के लिए उपयोगी हो सकता है जिसमें पहले भी ईश्वरीय दूत रहा हो किंतु यदि किसी समाज में पहली बार कोई ईश्वरीय दूत बनाया जाए तो उसकी सत्यता सिद्ध करने के लिए यह मार्ग उपयोगी नहीं होगा।

तीसरा और सब से अधिक व्यापक व उपयोगी मार्ग चमत्कार का मार्ग है जिसके द्वारा किसी भी समाज में ईश्वरीय दूत अपनी सत्यता सिद्ध कर सकता है। किंतु वह चमत्कार जिससे किसी के ईश्वरीय दूत होने को सिद्ध किया जा सके कैसा हो?

चमत्कार या मोजिज़ा उस काम को कहते हैं जो ईश्वर के आदेश से उसके दूतों की सत्यता को असाधारण रूप से सिद्ध करता हो। यदि ध्यान दिया जाए तो इस परिभाषा के तीन भाग हैं। पहले भाग में यह कहा गया है कि कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो सामान्य व प्रचलित कारकों का परिणाम नहीं होती बल्कि उन घटनाओं के कारक मनुष्य के लिए अज्ञात होते हैं।

इस परिभाषा के दूसरे भाग के अनुसार इस प्रकार के असाधारण कार्य ईश्वर के इरादे और उसकी विशेष अनुमति के बाद ईश्वरीय दूतों द्वारा किये जाते हैं विशेष अनुमति इस लिए क्योंकि ईश्वर ने जो व्यवस्था इस सृष्टि के लिए बनायी है उसमें परिवर्तन ईश्वर के विशेष आदेश व अनुमति से हीं संभव है। उदारहण स्वरूप कारक व परिणाम के नियम के अनुसार यदि जलती हुई आग में उदाहरण स्वरूप पत्ता डाला जाएगा और पत्ते के जलने के लिए आवश्यक सारी परिस्थितियां भी होंगी तो पत्ता अवश्य जलेगा किंतु यदि सारी परिस्थितियों और शर्तों के पूरा होने के बावजूद वह पत्ता न जले अर्थात पत्ता न जलने का कोई भौतिक कारण न हो तो फिर इसे असाधारण काम कहा जाएगा किंतु इसके बावजूद चमत्कार की परिभाषा का तीसरा भाग, उसे चमत्कार कहे जाने के लिए आवश्यक है अर्थात इस प्रकार के असाधारण काम यदि ईश्वरीय दूत के कथन को सही सिद्ध करने की क्षमता रखते होंगे तभी उन्हें मोजिज़ा या चमत्कार का नाम दिया जा सकता है अन्यथा वह साधारण चमत्कार होगा वह चमत्कार नहीं होगा जिस पर हम यहां चर्चा कर रहे हैं।

वह चमत्कार जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं स्पष्ट है कि साधारण चमत्कार के भिन्न होता है और उसकी अपनी विशेष शर्ते होती हैं जिन के बाद ही उसे ईश्वरीय चमत्कार कहा जा सकता है। इस विषय पर हमारी चर्चा जारी रहेगी जिसके दौरान हम ईश्वरीय चमत्कार के विभिन्न आयामों पर व्यापक चर्चा करेगें किंतु फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः

1. यदि ईश्वरीय दूत होने का दावा करने वाला पाप करता हो तो उसके झूठ का पता लगाना अत्यधिक सरल होता है किंतु यदि वह पाप न करता हो तो फिर उसकी सत्यता का पता लगाना कठिन होगा।

2. ईश्वरीय दूतों की सत्यता का पता लगाने का सब से व्यापक और उपयोगी मार्ग वह चमत्कार होता है जो ईश्वर उन्हें अपना दावा सिद्ध करने के लिए प्रदान करता है किंतु इस चमत्कार की भी अपनी शर्तें होती हैं और इसी लिए हर असाधारण कार्य को वह चमत्कार नहीं समझा जा सकता जिससे किसी का ईश्वरीय दूत होना सिद्ध होता हो। (जारी है)

सृष्टि ईश्वर और धर्म ५४

पाठको! पिछले कार्यक्रम में हमने चर्चा की थी कि यदि ईश्वरीय दूत होने का दावा करने वाला पाप करता हो तो उसके झूठ का पता लगाना अत्याधिक सरल होता है किंतु यदि वह पाप न करता हो तो फिर उसकी सत्यता का पता लगाना कठिन होगा।   ईश्वरीय दूतों की सत्यता का पता लगाने का सबसे व्यापक और उपयोगी मार्ग वह चमत्कार होता है जो ईश्वर उन्हें अपना दावा सिद्ध करने के लिए प्रदान करता है किंतु इस चमत्कार की भी अपनी शर्तें होती हैं और इसी लिए हर असाधारण कार्य को वह चमत्कार नहीं समझा जा सकता जिससे किसी का ईश्वरीय दूत होना सिद्ध होता हो।   पिछली चर्चा में हमने मोजिज़े या चमत्कार की परिभाषा का वर्णन किया था किंतु प्रश्न यह है कि क्या हर असाधारण कार्य मोजिज़ा कहा जा सकता है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हमें असाधारण कार्य पर चर्चा करनी होगी।

इस संसार में घटने वाली घटनाएं मूल रूप से उन कारकों का परिणाम होती हैं जो प्राकृतिक रूप से निर्धारित होते हैं और उन्हें प्रयोगों द्वारा समझा जा सकता है उदाहरण स्वरूप रसायन व भौतिक शास्त्र द्वारा प्रयोगों से बहुत से प्रक्रियाओं को पूर्ण रूप से समझा जा सकता है किंतु कुछ एसे काम भी होते हैं जिनके कारणों को भौतिक व रसायनिक प्रयोगों से समझना संभव नहीं होता। इस प्रकार के कामों और प्रक्रियाओं को असाधारण कार्य कहा जाता है।

वास्तव में असाधारण कार्यों को एक दृष्टि से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है एक वह साधारण कार्य जो सामान्य और साधारण कारकों के अंतर्गत नहीं होते किंतु एक सीमा तक उसके कारकों पर मनुष्य का नियंत्रण होता है। अर्थात विदित रूप से कुछ एसे काम होते हैं जिन्हें करना हर एक मनुष्य के लिए संभव नहीं होता किंतु जो भी उसकी शर्तों को पूरा करते हुए उसके लिए आवश्यक अभ्यास करे तो उसमें असाधारण काम करने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के असाधारण कार्य योगियों और जादूगरों द्वारा दिखाई देते हैं। निश्चित रूप से एक योगी और जादूगर जो तमाशा दिखाता है वह देखने में असाधारण नज़र आता है और हर एक के लिए वैसे काम करना संभव नहीं होता किंतु इसके बावजूद हम उसे वैसा चमत्कार नहीं कह सकते जिससे किसी का ईश्वरीय दूत होना सिद्ध होता हो क्योंकि वह काम असाधारण होते हैं किंतु मनुष्य के लिए उसकी क्षमता प्राप्त करना संभव होता है।

असाधारण कार्यों का दूसरा प्रकार वह असाधारण काम हैं जो ईश्वर की विशेष अनुमति पर निर्भर होते हैं। इस प्रकार के असाधारण कार्य की विशेषता यह होती है कि उसे केवल वही लोग कर सकते हैं जिनका ईश्वर से विशेष संपर्क हो और इस प्रकार के असाधारण कार्य की क्षमता, अभ्यास या तपस्या से प्राप्त नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए ईश्वर की विशेष दृष्टि आवश्यक है।

इस प्रकार के असाधारण कार्य की जिसके लिए ईश्वर की विशेष कृपा और उससे विशेष संबंध आवश्यक होता है मूल रूप से दो विशेषताएं होती हैं, पहली विशेषता यह होती है कि इस प्रकार के असाधारण कार्य सीखे या सिखाए नहीं जा सकते और उसपर किसी अधिक शक्तिशाली शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ता। अर्थात पहले प्रकार के असाधारण कार्य जिसकी क्षमता प्राप्त की जा सकती है।

अधिक क्षमता रखने वाले मनुष्य के असाधारण कार्य से प्रभावित हो जाते हैं। उदाहरणस्वरूप यदि कोई जादूगर कोई असाधारण कार्य करता है तो संभव है कि उससे बड़ा जादूगर उसके काम को प्रभावित करदे किंतु दूसरे प्रकार का असाधारण कार्य जो ईश्वर की अनुमति से होता है उस पर किसी भी अन्य शक्ति का प्रभाव नहीं पड़ सकता।

ईश्वर की विशेष अनुमति से होने वाले कार्य पापी व्यक्ति नहीं कर सकता किंतु यह भी आवश्यक नहीं है कि ईश्वर की विशेष अनुमति से किये जाने वाले कार्य केवल ईश्वरीय दूत ही करें बल्कि यह भी संभव है कि ईश्वर से निकट और पापों से दूर रहने वाला कोई एसा व्यक्ति भी इस प्रकार के काम करे जो ईश्वरीय दूत के पद पर न हो तो इस दशा में उसका काम यद्यपि असाधारण होगा और ईश्वर की विशेष अनुमति से होगा और उसकी क्षमता प्राप्त करना हरेक के लिए संभव नहीं होगा और उस पर कोई अन्य शक्ति अपना प्रभाव नहीं डाल पाएगी किंतु इन सब के बावजूद उसके काम को विशेष अर्थों में मोजिज़ा या चमत्कार का नाम नहीं दिया जा सकता। बल्कि इस प्रकार के काम भी साधारण चमत्कार और करामत की सूचि में आते हैं।

यह ठीक इसी प्रकार है जैसे ईश्वर की ओर से प्राप्त होने वाली हर विद्या व शिक्षा को ईश्वरीय संदेश नहीं कहा जा सकता। क्योंकि संभव है बहुत से पवित्र और ईश्वर से निकट लोग, ईश्वरीय माध्यमों से संदेश प्राप्त करें किंतु हमने जिस ईश्वरीय संदेश की बात की है वह केवल वही संदेश हो सकता है जो ईश्वरीय दूतों को प्राप्त होता है।

इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि वह असाधारण कार्य जो ईश्वर की विशेष अनुमति से हो और जिसने करने वाला ईश्वरीय दूत हो उसे ही ईश्वरीय दूतों की पैग़म्बरी को प्रमाणित करने वाला चमत्कार माना जा सकता है।

इसी प्रकार हमारी अब तक की चर्चा से यह भी स्पष्ट हो गया कि हम किस प्रकार ईश्वरीय असाधारण कार्य और मानवीय असाधारण कार्यों के अंतर को चहचानें। स्पष्ट है कि यदि कोई पापी व बुराई करने वाला व्यक्ति कोई असाधारण कार्य करता है तो हमें यह जान लेना चाहिए कि उसका यह विशेष ईश्वरीय अनुमति से नहीं है क्योंकि ईश्वर बुराई करने वाले को इस प्रकार की क्षमता कदापि प्रदान नहीं कर सकता अब यदि कोई असाधारण कार्य करता है और इसके साथ ही शैतान का अनुयायी भी हो और बुरे काम भी करता हो तो इसका अर्थ यह होगा कि उसका ईश्वर से नहीं शैतान से संबंध है इस लिए यदि वह ईश्वरीय दूत होने या भगवान होने का दावा करे जैसा कि पहले कई लोग कर चुके हैं और आज भी बहुत से लोग इस प्रकार का दावा करते हैं , तो उसका यह दावा झूठा होगा और एक धार्मिक व्यक्ति को उसके आदेशों का पालन करने पर स्वयं को बाध्य नहीं समझना चाहिए।

यहां पर यह भी स्पष्ट करते चलें कि ईश्वरीय अनुमति से होने वाले असाधारण कार्य वास्तव में ईश्वर के कामों में गिने जाते हैं यह अलग बात है कि चूंकि ईश्वरीय दूत इस प्रकार के कामों के लिए साधन होते हैं इस लिए इन कामों को उनके काम भी कहा जाता है जैसे हम कहते हैं कि ईश्वरीय दूत हज़रत ईसा मसीह मृत व्यक्ति को जीवित कर देते थे किंतु वास्तव में यह काम ईश्वर का होता था और वे केवल साधन थे।

ईश्वरीय दूतों की सत्यता प्रमाणित करने वाले असाधारण कार्य की एक अन्य विशेषता यह होती है कि इस प्रकार के असाधारण कार्य का उद्देश्य ईश्वरीय दूतों की सत्यता को प्रमाणित करना होता है इस आधार पर यदि कोई ईश्वरीय दूत कोई एसा असाधारण काम करे जिस का उद्देश्य उसकी पैगम्बरी को सही सिद्ध करना न हो तो उसका यह काम असाधारण कार्य होने और ईश्वर की अनुमति के बाद किये जाने के बावजूद मोजिज़ा नहीं कहा जाएगा।

चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं

संसार की सभी घटनाएं कुछ कारकों के अंतर्गत होती हैं किंतु हर कारक का पता प्रयोगशालाओं में नहीं लगाया जा सकता बल्कि कुछ काम एसे होते हैं जिनके कारकों का पता लगाना असंभव लगता है इस प्रकार के कार्य को असाधारण कार्य कहते हैं।

असाधारण कार्य यदि एसा हो जिसकी क्षमता प्राप्त की जा सके जैसे जादू टोना तो वह असाधारण होने के बावजूद मोजिज़ा या ईश्वरीय दूतों की सत्यता प्रमाणित करने वाला चमत्कार नहीं होगा।

ईश्वरीय दूतों की सत्यता प्रमाणित करने वाला असाधारण कार्य वह होता है जो ईश्वर की विशेष अनुमति से हो और जिसे सीखा या सिखाया न जा सके तथा जिस पर कोई अन्य शक्ति अपना प्रभाव न डाल सके। (जारी है)