सृष्टि ईश्वर और धर्म ३६ न्याय और उसका अर्थ



न्याय को अरबी भाषा में अद्ल कहा जाता है उस का अर्थ होता है समान बनाना और आम- बोलचाल में इस का अर्थ होता है दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना और इसके विपरीत अत्याचार होता है। इस प्रकार न्याय की परिभाषा यह हैः हर वस्तु या व्यक्ति को उसका अधिकार देना किंतु इस परिभाषा को सही रूप से समझने के लिए सबसे पहले किसी ऐसे प्राणी की कल्पना करनी होगी जिसके कुछ अधिकार हों ताकि उसके अधिकारों की रक्षा को न्याय और उसके अधिकारों के हनन को अन्याय व अत्याचार कहा जाए किंतु यह तो प्राणियों की बात है किंतु कभी- कभी न्याय के अर्थ को अधिक विस्तृत कर दिया जाता है इस प्रकार से न्याय का व्यापक अर्थ इस प्रकार होगाः प्रत्येक वस्तु को उसके सही स्थान पर रखना।

इस परिभाषा के अनुसार न्याय बुद्धिमत्ता व दूरदर्शिता के समान होगा किंतु इसके साथ यह भी प्रश्न है कि हर अधिकारी का अधिकार और हर वस्तु का स्थान किस प्रकार से स्पष्ट होगा तो यह एक विस्तृत चर्चा है जिसका यहां स्थान नहीं, यहां पर हम इस चर्चा का संक्षेप में वर्णन करते हैं। आपको याद होगा कि पिछली चर्चा में हमारी बहस यह थी कि अच्छा काम स्वंय अच्छा होता है या इसलिए अच्छा होता है कि महान ईश्वर ने उसका आदेश दिया है और बुरा काम क्या स्वयं बुरा होता है या इसलिए बुरा होता कि ईश्वर ने उससे दूर रहने को कहा है आज यहां पर हम ईश्वर के न्याय के संबंध में अपनी चर्चा में इसी विषय को आगे बढ़ा रहे हैं। इस पूरी चर्चा में जिस विषय की ओर ध्यान देना आवश्यक है वह यह है कि हर बुद्धिमान व्यक्ति यह समझता है कि यदि कोई अकारण किसी अनाथ के हाथ से उदाहरण स्वरूप रोटी छीन ले या किसी निर्दोश व्यक्ति की हत्या कर दे तो उसने अत्याचार किया है और बुरा काम किया है और उसकी यह समझ और यह निष्कर्ष ईश्वर के आदेश पर निर्भर नहीं होता। अर्थात बुद्धि रखने वाला व्यक्ति इस काम को बुरा इसलिए नहीं समझता कि ईश्वर ने इस काम को बुरा कहा है क्योंकि हम देखते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व का इन्कार करने वाले और धर्म व परलोक पर विश्वास न करने वाले भी इन कामों को बुरा समझते हैं। तो यदि हम यह मान लें कि बुरे काम की बुराई और अच्छे काम की अच्छाई ईश्वर के आदेश पर निर्भर होती है तो जो लोग धर्म और ईश्वर में विश्वास ही नहीं रखते फिर भी अत्याचार को बुरा और न्याय को अच्छा समझते हैं उनके बारे में क्या कहेंगे?

इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि बुरा काम केवल इसीलिए बुरा

नहीं होता कि ईश्वर ने उसे बुरा कहा है बल्कि कुछ मनुष्य की बुद्धि में भी यह शक्ति होती है कि वह भलाई व बुराई को बिना ईश्वर व धर्म के आदेश को जाने, समझे और उससे दूर रहे या उसके निकट जाए। अलबत्ता यह एक अलग चर्चा है कि वह कौन सी शक्ति है और किस प्रकार की योग्यता है जिसके बल पर मनुष्य भलाई को भला और बुराई को बुरा समझने में सक्षम होता है।

ईश्वर के न्याय के बारे में चर्चा के लिए बस इतना जान लेना पर्याप्त है कि हर वस्तु में स्वंय ही भलाई या बुराई का पहलु होता है और ईश्वर बुराई से बचने और भलाई करने का आदेश देता है। अब तक की चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि न्याय के लिए दो अर्थ दृष्टिगत रखे जा सकते हैं एक दूसरों के अधिकारों का सम्मान और दूसरे सूझबूझ के साथ कोई काम करना जिसमें दूसरों के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि न्याय का अर्थ समानता व बराबरी कदापि नहीं है बल्कि न्याय हर एक को उसका स्थान व अधिकार देना है। उदाहरण स्वरूप शिक्षक यदि अपने सारे छात्रों को चाहे वह पढ़ने वाले हों या पढ़ाई से मन चुराने वाले हों, चाहे परिश्रमी हों या आलसी हों समान रूप से प्रोत्साहित अथवा दंडित करे तो हमने न्याय के जो अर्थ बताए हैं उसके अनुसार वह शिक्षक न्यायी नहीं होगा। या उदाहरण स्वरूप यदि किसी संपत्ति के बारे में दो पक्षों में विवाद हो जाए और न्यायधीश दोनों पक्षों को समान रूप से वह संपत्ति बांट दे तो यह न्याय नहीं होगा ।

शिक्षक का न्याय यह है कि वह प्रत्येक छात्र को उसकी योग्यता और परिश्रम के अनुरूप दंड या प्रोत्साहन दे। न्यायधीश का न्याय यह है कि वह संपत्ति उसे दे जिसकी वास्तव में वह हो। इस प्रकार से यह स्पष्ट हो गया कि समानता हर स्थान पर न्याय नहीं हो सकती बल्कि कहीं -कहीं अत्याचार व अन्याय हो जाती है। इसी प्रकार से ईश्वर के न्यायी होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह अपनी सभी रचनाओं को समान रूप से बनाए या उन्हें समान रूप से सुविधांए दे। उदाहरण स्वरूप मनुष्य को पंख व सींग आदि भी दे और पशुओं को बुद्धि व कथन की शक्ति प्रदान करे।

ईश्वर के न्याय व तत्वदर्शिता का अर्थ यह है कि वह संसार को ऐसा बनाए जिससे उसमें रहने वालों को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सके और संसार की विभिन्न वस्तुएं और प्राणी इस प्रकार से बनाए गये हों कि एक दूसरे के अंश व एक दूसरे की आवश्यकताओं के पूरक के रूप में अपने अंतिम लक्ष्य के अनुरूप भी हों। इसी प्रकार ईश्वर के न्याय व तत्वज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि हर मनुष्य को समान बनाए बल्कि न्याय यह है कि हर मनुष्य को उसकी योग्यता और क्षमता के अनुरूप कर्तव्य दिया जाए और फिर उस कर्तव्य के पालन में उसकी स्वेच्छिक गतिविधियों और कामों को दृष्टि में रखते हुए उसे दंड या प्रतिफल दिया जाए। तो यदि हम यह देखते हैं कि मनुष्य असमान दशा में है तो इसका अर्थात यह नहीं है कि ईश्वर ने मनुष्य के साथ न्याय नहीं किया बल्कि यदि सारे मनुष्य समान दशा में होते तो यह अन्याय होता क्योंकि हम ने बताया कि न्याय का अर्थ हर अधिकारी को उसका अधिकार देना और हर वस्तु को उसके स्थान पर रखना है।

यह कोई बहुत गूढ़ विषय नहीं है। हम अपने जीवन में हर क़दम पर इस अर्थ को साक्षात देखते हैं। किसी भी कंपनी या संस्था में सभी कर्मचारियों को समान अधिकार और समान सुविधाएं प्राप्त नहीं होती। बल्कि हर एक को उसकी शिक्षा, अनुभव, रिकार्ड, काम और पद के अनुसार वेतन और सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इस प्रकार के स्थानों पर यदि समान अधिकार व सुविधाएं प्रदान की जाए तो यह न्याय नहीं बल्कि अन्याय होगा। हमारी अगली चर्चा महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के न्याय के प्रमाणों के बारे में होगी।

सृष्टि ईश्वर और धर्म ३७- महान ईश्वर और तत्वज्ञान

जैसा कि हमने अपनी पिछली चर्चाओं में कहा कि एक व्याख्या के अनुसार ईश्वरीय न्याय ईश्वरीय तत्वदर्शिता का एक भाग है और दूसरी व्याख्या के अनुसार न्याय ही तत्वदर्शिता है।

ईश्वर की तत्वदर्शिता या तत्वज्ञान का अर्थ है कि ईश्वर हर काम वैसा ही करता है जैसाकि उसे होना चाहिए अर्थात उसका हर काम लक्ष्यपूर्ण व उद्देश्यपूर्ण होता है भले ही विदित रूप से हमारी बुद्धि उसे समझ न सके। अब यदि न्याय का अर्थ ईश्वर के तत्वज्ञान को ही समझा जाए तो फिर ईश्वर के न्याय को प्रमाणित करने का वही मार्ग होगा जो उसके तत्वज्ञान को प्रमाणित करने के लिए है।

इस कार्यक्रम की आरंभिक चर्चाओं में हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि ईश्वर का हर काम सूझबूझ और दूरदर्शिता के साथ होता है किंतु यहां पर यदि हम न्याय का अर्थ तत्वज्ञान व तत्वदर्शिता कहते हैं तो इस संदर्भ में ईश्वर के तत्वज्ञान पर हम अधिक विस्तार से चर्चा करेंगे।

यह तो हम जान चुके हैं कि ईश्वर के पास परम शक्ति और अधिकार है और जो काम भी वह चाहे कर सकता है और जो काम न चाहे उस उस काम को करने पर कोई विवश नहीं कर सकता, न उसे कोई प्रभावित कर सकता है और न ही किसी भी साधन द्वारा उस पर दबाव डाल सकता है। इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि ईश्वर जो चाहे कर सकता है और हर काम करने पर वह पूर्ण सक्षम है किंतु इस विश्वास का यह अर्थ नहीं है कि वह हर वह काम करता भी है जिसकी उसमें क्षमता है बल्कि वह केवल वही काम करता है जिसे वह करना चाहता है।

पिछली चर्चाओं में हम यह भी जान चुके हैं कि ईश्वर का इरादा अर्थपूर्ण व लक्ष्यपूर्ण होता है और उसका कोई भी काम उद्देश्य रहित नहीं होता। ईश्वर वही काम करता है जो उसके तत्वज्ञान व तत्व दर्शिता व गुणों के अनुकूल होता है और यदि उसके विशेष गुण किसी काम को अनावश्यक बनाते हों तो वह किसी भी दशा में वह काम नहीं करता और चूंकि ईश्वर सम्मपूर्ण परिपूर्णता है इसलिए उसका इरादा भी सदैव ही उसकी रचनाओं के हित में होता है और यदि किसी वस्तु अथवा प्राणी के अस्तित्व के लिए किसी दुष्टता व अभाव का अस्तित्व आवश्यक होगा तो वह बुराई और दुष्टता, ईश्वर के इरादे का मूल लक्ष्य नहीं बल्कि हित पहुंचाने की प्रक्रिया के अंश के रूप में होगा। अर्थात ईश्वर की इच्छा व इरादा कभी किसी दुष्टता व बुराई से संबंधित नहीं हो सकता है यदि कभी कोई दुष्टता या बुराई उसने पैदा की है तो किसी भलाई को पूरा करने के लिए ऐसा किया है तो इस दशा में वह दुष्टता वास्तव में हित पहुंचाने की प्रक्रिया का भाग और भलाई होगी। क्योंकि लक्ष्य व उद्देश्य, साधनों की परिभाषा व महत्व को बदल देते हैं। उदाहरण स्वरूप किसी मनुष्य का सीना चीर कर उसका ह्दय बाहर निकालना बहुत बड़ी बुराई और एक जघन्य अपराध है और विश्व के सभी क़ानूनों में इसे एक बड़ा अपराध माना जाता है किंतु जब यही काम एक डाक्टर आपरेशन थियटर में मनुष्य को हृदय रोग से छुटकारा दिलाने के लिए करता है तो न केवल यह कि यह काम अपराध नहीं होता बल्कि मानवसमाज की बड़ी सेवा भी समझा जाता है। ऐसा क्यों है? ऐसा इस लिए है क्योंकि सीना चीरना और हदय निकालना भले एक बुरा काम हो किंतु जब डाक्टर द्वारा यह काम होता है तो यह बुराई नहीं रोगी को रोग से मुक्त करने की भलाई का एक भाग और एक चरण होता है।

ईश्वर का इरादा भी यही है अर्थात ईश्वर किसी का बुरा नहीं चाहता और न ही किसी के साथ बुरा करता है और यदि किसी के साथ बुरा होता है तो या तो वह उसके अपने कर्मों का फल होगा या फिर उसके हित में की जाने वाली किसी भलाई की प्रक्रिया का भाग होगा।

इस प्रकार से यदि संसार को देखा जाए तो ईश्वर के गुण ऐसे हैं जिनके दृष्टिगत यह आवश्यक था कि संसार को ऐसा बनाया जाए कि सामूहिक रूप से उसकी व्यवस्था व रचना से सब को अधिक से अधिक लाभ पहुंचे यद्यपि आंशिक रूप से कुछ रचनाओं को विदित रूप से हानि भी पहुंचती दिखायी दे।

सृष्टि ईश्वर और धर्म 38- ईश्वर अपनी हर रचना से प्रेम करता है

ईश्वर न्यायी है यह लगभग सभी लोग मानते हैं किंतु बहुत लोग इस पर यह आपत्ति करते हैं कि ईश्वर की विभिन्न रचनाओं और स्वंय मनुष्य में पाई जाने वाली विविधता और विभिन्नता किस प्रकार से ईश्वर के न्याय के अनुरूप हो सकती है और न्यायी व तत्वदर्शी ईश्वर ने क्यों अपनी समस्त रचनाओं को समान नहीं बनाया?

इस शंका व आपत्ति का उत्तर यह है कि रचना को अत्यधिक लाभ पहुंचाने के लिए विभिन्न प्राणियों, वस्तुओं और लोगों में भिन्नता आवश्यक है। क्योंकि एक बड़ी व्यवस्था के छोटे भाग उसी समय मिल कर उस पूरी व्यवस्था को लाभ पहुंचा सकते हैं जब उनमें ऐसी भिन्नता हो जो मिल कर उस पूरी व्यवस्था के लिए लाभदायक हो।

यदि हम थोड़ा सा विचार करें तो इस आपत्ति का खोखलापन स्पष्ट हो जाएगा। उदारहण स्वरूप यदि हम यह मान लें कि ईश्वर को अपने न्याय के अनुसार सारी सृष्टि को समान बनाना चाहिए था अर्थात उदाहरण स्वरूप यदि सारे मनुष्य, पुरुष या महिला होते तो वंश आगे न बढ़ता और मनुष्य का अस्तित्व ही मिट जाता। महिला और पुरुष के मध्य जो भिन्नता है वह मानव पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए ईश्वर की तत्वदर्शिता का प्रमाण है अन्याय कदापि नहीं है। या यदि ईश्वर इस धरती पर केवल उदाहरण स्वरूप मनुष्य की ही रचना करता तो उसका आहार कहां से आता या यदि सृष्टि की समस्त वस्तुएं समान रंग- रूप की होतीं तो इतनी अधिक सुन्दरता कहां से आती। इस प्रकार से हम यह देखते हैं कि रचनाओं में भिन्नता इस सृष्टि के सामूहिक हितों की रक्षा करती है और यह आवश्यक है।

बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हम एक छोटे से समाज की कल्पना करते हैं। इस समाज में कुछ लोग व्यापार करते हैं, कुछ लोग उदाहरण स्वरूप कपड़ा बुनते हैं कुछ लोग जूते- चप्पल या मानव जीवन के लिए दूसरी आवश्यक वस्तुएं बनाते हैं कुछ लोग खेती करके अनाज पैदा करते हैं कुछ लोग उस अनाज को विभिन्न प्रकार की खाने- पीने की वस्तुओं में बदल देते हैं । यह सारी वस्तुएं किसी भी समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं और समाज के विभिन्न सदस्यों के कामों में भिन्नता अन्याय नहीं बल्कि आवश्यकता है। क्योंकि यदि सारे लोग उदारहण स्वरूप अनाज ही उगाने लगें तो फिर बाक़ी काम कौन करेगा। इसी उदाहरण को आप बड़ा करके पूरी सृष्टि को देखें। इस सृष्टि और मानव जीवन की रक्षा के लिए भिन्नता व विविधता एक आवश्यकता है और इसी लिए तत्व दर्शी ईश्वर ने विविधता के साथ अपनी रचनाओं को अस्तित्व दिया है और यदि इस सृष्टि में मौजूद किसी रचना को तुच्छ और किसी को महत्वपूर्ण समझा जाता है तो इसका कारण स्वंय मनुष्य के अपने विचार और समाज की परिस्थितियां होती हैं और उसका उनकी रचना करने वाले अर्थात ईश्वर से कोई संबंध नहीं है।

इसीलिए हम देखते हैं कि विभिन्न समाजों में वस्तुओं और लोगों को तुच्छ समझने का मापदंड अलग- अलग होता है। कोई वस्तु किसी समाज में उसकी विशेष संस्कृति के अनुसार मूल्यवान और कोई अन्य वस्तु मूल्यहीन समझी जाती है। उदाहरण स्वरूप कुछ सौ वर्ष पूर्व तक अफ़्रीका के घने जंगलों में रहने वाले आदिवासी, पश्चिम से सोने की खोज में जाने वालों से लोहे के बदले सोना देते थे। शिकार आदि में प्रयोग के कारण उन आदिवासियों के लिए लोहा सोने से अधिक मूल्यवान था जब कि सभ्य विश्व वासियों के लिए सोना लोहे से कोई गुना अधिक मूल्यवान था। इस प्रकार से हम देते हैं कि चीज़ों का महत्व समाज, संस्कृति और परिस्थितियों और तथा लोगों की विचारधारा से होता है और वास्तव में सोना और लोहा, दोनों ही धातु हैं और इनके मध्य विविधता और उनकी महत्ता का उनके बनाने वाले अर्थात ईश्वर से संबंध नहीं है बल्कि विशेष परिस्थितियों से है।

ईश्वर ने अपनी रचनाओं को विभिन्न रूप दिया है किंतु उसने किसी को किसी से तुच्छ नहीं बनाया है उसकी दृष्टि में विविधता विदित रूप में है और यह विविधता किसी भी प्रकार किसी की महानता या तुच्छता की प्रतीक नहीं है। उसकी दृष्टि में उसकी सभी रचनाएं प्रिय हैं और वह अपनी हर रचना से प्रेम करता है।

सृष्टि ईश्वर और धर्म ३९-मृत्यु और न्याय

ईश्वर के न्याय और उसकी सूझबूझ व उसके तत्वज्ञान पर आपत्ति करने वाले कुछ लोगों का यह कहना है कि यदि ईश्वर के तत्वज्ञान व सूझबूझ के अनुसार इस धरती पर मनुष्य का जीवन ईश्वर का उद्देश्य है तो फिर वह मनुष्य को मृत्यु क्यों देता है? अर्थात कुछ लोगों का कहना है कि यदि ईश्वरीय न्याय व तत्वज्ञान इस बात को आवश्यक बनाता था कि इस धरती पर मनुष्य जीवित रहे और इसी के अंतर्गत ईश्वर ने लोगों को जीवन दिया तो फिर यह कैसा न्याय है कि वह स्वंय ही उन्हें मृत्यु भी देता है। यदि ईश्वर का न्याय जीवन देना था तो फिर मृत्यु की रचना की नहीं करना चाहिए था। इस शंका का उत्तर कई प्रकार से दिया जा सकता है। सब से पहली बात तो यह कि यह किसने कहा है कि ईश्वर का उद्देश्य और न्याय की आवश्यकता धरती पर मनुष्य का जीवन है। यदि ऐसा कोई सोचता है तो यह सही नहीं है। अलबत्ता धरती पर मनुष्य का जीवन ईश्वरीय इच्छा व उद्देश्य का एक भाग और एक चरण है। और जीवन मृत्यु, बाक़ी रहना और ख़त्म हो जाना यह सब कुछ इस सृष्टि के नियमों और कारक तथा उसके प्रभाव के मूल सिद्धान्त के अंतर्गत इसी व्यवस्था का भाग और इसके विभिन्न चरण हैं और ईश्वर का उद्देश्य धरती पर मानव जीवन है तो इस उद्देश्य में मानव जीवन के समस्त चरण आंरभ से अंत तक अर्थात जन्म व मृत्यु दोनों ही शामिल हैं। इसके साथ ही यह बात भी है कि यदि जीवित प्राणी मरते नहीं तो उसके बाद आने वाले बहुत से प्राणियों का जन्म ही न होता और इसी प्रकार उदाहरण स्वरूप कल्पना करें कि यदि सारे मनुष्य जीवित ही रहते और कोई मरता न तो बड़ी जल्दी यह धरती मनुष्य के लिए छोटी पड़ जाती और मानव जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो जाता और लोग भूख व समस्याओं से परेशान होकर मृत्यु की कामना करते। इस प्रकार हम देखते हैं कि सृष्टि का यह आयाम अर्थात मृत्यु भी इस पूरी ईश्वरीय रचना की व्यवस्था के लिए अत्यन्त आवश्यक है।

इसी प्रकार यह बात भी स्पष्ट है कि मनुष्य की रचना का मूल लक्ष्य धरती पर उसका जीवन नहीं है बल्कि अनन्त सफलता व कल्याण या मोक्ष तक पहुंचना है और यह तो स्पष्ट है कि मनुष्य जब तक मृत्यु द्वारा इस संसार से नहीं जाएगा उसका कल्याण तथा उसकी सफलता संभव नहीं है। क्योंकि ईश्वर ने अपने दूतों को भेजकर कर यह स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य के लिए यह धरती और यह जीवन अस्थाई है और उसका मुख्य जीवन परलोक में होगा। इस लिए मृत्यु वास्तव में अंत नहीं है बल्कि स्थानान्तरण का एक साधन है।

अर्थात लोक व परलोक के मध्य मृत्यु नाम की एक अंधकारमय सुरंग है जिसे पार करके ही लोकवासी परलोक तक जा और अपने कर्मों का फल प्राप्त कर सकते हैं। इस लिए मृत्यु किसी भी रूप में ईश्वरीय उद्देश्य से विरोधाभास नहीं रखती बल्कि इस सृष्टि के रचयिता और महान तत्वज्ञानी ईश्वर की व्यवस्था का भाग और एक आवश्यक चरण है। इस प्रकार से मृत्यु को ईश्वर का अन्याय किसी भी प्रकार से नहीं कहा जा सकता।

वास्तव में जो लोग यह शंका करते हैं उनके मन में मृत्यु के वास्तविक अर्थ नहीं होते। चूंकि यदि ध्यान दिया जाए तो मृत्यु एक ऐसी चीज़ है जिसके अधिकांश आयाम मनुष्य के लिए अज्ञात हैं बल्कि मृत्यु की वास्तविकता संभवतः किसी पर स्पष्ट नहीं है मृत्यु के नाम पर हम जो कुछ देखते और अनुभव करते हैं वह वास्तव में मृत्यु का प्रभाव होता है। अर्थात जब किसी मनुष्य की हृदय गति का रुक जाना, सांस बंद हो जाना, शरीर ठडां पड़ जाना तथा इस प्रकार की अन्य दशाएं वास्तव में इस बात का चिन्ह व लक्ष्य हैं कि शरीर मृत हो गया है, मृत्यु की वास्तविकता या अर्थ नहीं और यह दशा जीवन व प्राण की दशा की ही भांति है अर्थात सांस लेना, दिल का धड़कना, चलना- फिरना आदि शरीर के जीवित होने के लक्षण हैं, प्राण की वास्तविकता नहीं किंतु चूंकि इसके परिणाम में कोई कुछ खोता नहीं इस लिए लोग प्राण की दशा से प्रसन्न होते हैं और चूंकि मृत्यु की दशा में लोग कुछ खो देते हैं इस लिए अधिकांश लोग उससे डरते हैं किंतु यह इस डर व भय को प्रमाण बना कर यह नहीं कहा जा सकता कि मृत्यु भयानक वस्तु है और ईश्वर ने मनुष्य को मृत्यु देकर उस पर अन्याय किया है। क्योंकि वास्तव में मृत्यु, मानवजीवन की एक दशा है।

सृष्टि, ईश्वर और धर्म ४०- ईश्वर का न्याय और प्राकृतिक आपदायें

कुछ लोगों का यह कहना है कि मानव जीवन में इतने दुखों के बावजूद और बाढ़, भूकंप तथा युद्ध जैसी प्राकृतिक व मानवीय समस्याओं के होते हुए किस प्रकार संभव है कि कोई ईश्वर को पूर्ण रूप से न्यायी माने? अर्थात शंका करने वालों का यह कहना है कि जब बाढ़ आती है तो हज़ारों लोग मारे जाते और विस्थापित होते हैं या जब युद्ध होता है तो भी बहुत से ऐसे लोग मारे जाते हैं जिनका युद्ध से कोई लेना- देना नहीं है तो यदि ईश्वर न्यायी है तो फिर बाढ़ या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं क्यों? यदि वह न्यायी है तो फिर युद्धों में निर्दोषों की हत्या को क्यों नहीं रोकता?

इस शंका का कई आयामों से निवारण किया जा सकता है। सबसे पहली बात तो यह है कि प्राकृतिक आपदाएं भौतिक कारणों से होती हैं। विज्ञान में प्रगति के बाद अब यह सिद्ध हो चुका है कि प्राकृतिक आपदाएं जैसाकि प्राचीन काल में लोग समझते थे, ईश्वर के प्रकोप के कारण नहीं होती थी बल्कि इस प्रकार की आपदाओं में भौतिक कारकों की भूमिका अधिक होती है और चूंकि इस प्रकार की आपदाएं भौतिक कारकों से होती हैं इसलिए अब यह देखना होगा कि भौतिक कारण क्या हैं, यदि कारक प्राकृतिक हो तो यह भी निश्चित है कि उसमें लाभ का पहलु अधिक होगा। अर्थात यदि कोई आपदा आती है तो भले ही विदित रूप से उससे कई हज़ार लोगों के प्राण चले जाते हों किंतु यदि उसके कारकों पर ध्यान दिया जाए तो या तो उसमें कोई हित नज़र आएगा या फिर लाखों लोगों की जीवन रक्षा का विषय निहित होगा। अर्थात प्राकृतिक आपदाएं यदि कभी- कभी कुछ हज़ार लोगों की बलि लेकर, कुछ लाख लोगों की जीवन रक्षा का कारण बनती हैं तो इस प्रकार उसमें निहित हित उसकी हानि से अधिक होते हैं और जिस प्रक्रिया के हित उसकी हानियों से अधिक हों वह प्रक्रिया अन्याय पूर्ण नहीं हो सकती। इसी प्रकार वह समस्याएं जिनका कारक स्वंय मनुष्य होता है यदि उन्हें ईश्वर नहीं रोकता तो भी यह अन्याय नहीं होगा। उदारहण स्वरूप युद्ध होता है उसमें हज़ारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं और यदि ईश्वर इसे रोकेगा तो मनुष्य को प्राप्त अधिकार का हनन होगा जो मनुष्य पर सब से बड़ा अत्याचार होगा। हम चर्चा कर चुके हैं कि मनुष्य काम करने में स्वतंत्र होता है वह चाहे तो अच्छा काम करे और चाहे तो बुरा काम करे और यह अधिकार एवं स्वाधीनता व स्वतंत्रता ईश्वर ने भी उसे प्रदान की है अब यदि ईश्वर स्वंय ही उसमें बाधा डालेगा तो वास्तव में यह अन्याय होगा। यदि कोई अत्याचारी, कुछ निर्दोषों की हत्या करना चाहता हो और ईश्वर अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उसे ऐसा न करने दे तो फिर उस अत्याचारी को एक मनुष्य होने के नाते, जो स्वाधीनता व स्वतंत्रता उसे प्राप्त है जो भले या बुरे मार्ग के चयन का उसे अधिकार मिला है वह अर्थहीन हो जाएगा और जब अधिकार अर्थहीन होगा तो फिर दंड या इनाम भी अर्थहीन हो जाएगा।

ईश्वर ने निर्दोषों की हत्या रोकने के लिए, हत्या को महापाप और हत्यारों को सदैव के लिए नरक में डाले रहने का वचन दिया है। इसके साथ ही उसके समस्त दूतों ने हत्या तथा इस प्रकार के अन्य अपराधों और अन्य लोगों के अधिकारों के हनन से लोगों को रोकने का प्रयास किया है और इन सब बुराईयों से दूर रहने वालों के लिए स्वर्ग का वचन दिया है। अब यदि कोई मनुष्य ईश्वर के इस प्रकार के समस्त आदेशों की अनदेखी करे और अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए दूसरों पर अत्याचार करे तो यह अत्याचार स्वंय उसका पाप होगा और इसे केवल इसलिए कि ईश्वर ने अत्याचारी को अत्याचार से रोका नहीं, ईश्वर का अन्याय नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यदि ईश्वर बुरे लोगों को बुराई करने से रोकने लगेगा तो सब से पहले तो यह उस अधिकार का हनन होगा जो ईश्नर ने उसे दिया है और उसके बाद यह बात भी है कि इस प्रकार से विश्व में कोई बुरा काम कर ही नहीं पाएगा तो फिर सारे लोग अच्छे ही होगें और परीक्षा का विषय ही समाप्त हो जाएगा। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार परीक्षा कक्ष में बैठा एक छात्र यदि नक़ल कर रहा हो तो उसे नक़ल से न रोकना अन्याय नहीं है, नक़ल के बावजूद उसे नकल न करने वाले छात्र के इतना नंबर देना अन्याय है। इसी प्रकार आप चाहें जिस प्रतियोगिता या परीक्षा की कल्पना कर लें। किसी भी प्रतियोगिता या परीक्षा के दौरान गलती पर रोका- टोका नहीं जाता। परीक्षा के बाद ही संबंधित लोग हस्तक्षेप करते हैं। बाढ़ या युद्ध जैसी प्राकृतिक व समाजिक समस्यांए भौतिक कारकों के अंतर्गत होती हैं और प्राकृतिक आपदाओं के हित अधिक और लाभ कम होते हैं इस लिए उसे ईश्वर नहीं रोकता और समाजिक समस्याओं मनुष्य को प्रदान की गयी स्वतंत्रता का परिणाम होती हैं और यदि अपराधी को अपराध करने से रोका जाएगा तो उसे जो स्वतंत्रता प्रदान की गयी है वह उससे छिन जाएगी।

यदि ईश्वर किसी को बुराई से नहीं रोकता तो यह अन्याय कदापि नहीं है क्योंकि स्वंय उसी ने मनुष्य को स्वतंत्रता प्रदान की है अलबत्ता ईश्वर ने लोगों को बुराइयों से रोकने के लिए दूसरी बहुत सी व्यवस्थाएं की हैं जिनमें सब से मुख्य व्यवस्था यह है कि ईश्वर ने विभिन्न कालों में अपने दूत भेजे जो लोगों को बुराइयों से रोकते और अच्छाओं का निमंत्रण देते थे अब इसके बाद भी यदि कोई अपराध करता है और उसके अपराध के परिणाम स्वरूप कुछ लोगों के साथ अन्याय होता है तो इसकी ज़िम्मेदारी मनुष्य पर है ईश्वर पर नहीं। श्रोताओं ईश्वरीय न्याय पर हमारी चर्चा यहीं पर समाप्त होती है तथा इसके साथ ही ईश्वर और उसके गुणों से सबंधित हमारी चर्चा भी समाप्त होती है अगली कड़ी में हम ईश्वरीय दूतों के बारे में चर्चा आरंभ करेंगें।