ग़दीर और वहदते इस्लामी



असरे हाज़िर में बाज़ लोग ग़दीर और हज़रते अली अलैहिस्सलाम की इमामत की गुफ़्तुगू (चूँकि इसको बहुत ज़माना गुज़र चुका है) को बेफ़ायदा बल्कि नुक़सानदेह समझते हैं, क्योकि यह एक तारीखी वाक़ेया है जिसको सदियाँ गुज़र चुकी हैं। यह गुफ़्तुगू करना कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्ललाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) का जानशीन कौन था और है? हज़रत अली इब्ले अबी तालिब या अबू बक्र? आज इसका कोई फ़ायदा नही है बल्कि बाज़ अवक़ात इस सिलसिले में गुफ़तुगू के नताइज में फ़ितना ब फ़साद बरपा होता है, उसके अलावा कोई फ़ायदा नही है। दूसरे अल्फ़ाज़ में यूँ कहा जाये:  इस ज़माने में इस्लामी फ़िरक़ों के दरमियान वहदत की वाज़ेह ज़रूरत है तो फिर इस तरह की इख़्तेलाफ़ी गुफ़्तुगू क्यों की जाती है?.....

हम ख़ुदा वन्दे आलम के लुत्फ़ व करम से असरे हाज़िर में "इमामत" के आसार व फ़वायद के लिये चंद चीज़ों को बयान करते हैं:

1.     वहदत की ह़कीक़त

चूँकि ऐतेराज़ करने वाले लफ़्ज़े वहदत पर बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं लिहाज़ा पहले इस लफ़्ज़ की हक़ीक़त को वाज़ेह करना ज़रूरी है।

आम तौर पर दो इस्तेलाहें हमारे यहाँ पाई जाती हैं जिन पर ग़ौर व फ़िक्र करना ज़रूरी है और उनमें एक दूसरे पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, उनमें से एक वहदत और उम्मते इस्लामिया के इत्तेहाद को महफ़ूज़ रखना है और दूसरी चीज़ अस्ले इस्लाम की हिफ़ाज़त है।

इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि दीने हनीफ़ (हक़ीक़ी दीन) को हिफ़्ज़ और उसको फैलाने की कोशिश करे, लिहाज़ा यह सभी की अहम ज़िम्मेदारी है।

इसी तरह चूँकि मुसलमानों के बहुत से मुशतरक दुश्मन हैं जो चाहते हैं इस्लाम और मुसलमानों को नीस्त व नाबूद कर दें लिहाज़ा हमें चाहिये कि सब मुत्तहिद होकर इस्लाम के अरकान और मुसलमानों की हिफ़ाज़त की कोशिश करें, लेकिन इसके यह मायना नही है कि दूसरी ज़िम्मेदारियों को पशे पुश्त डाल दें और इस्लाम के मुसल्लम हक़ायक़ को बयान न किया जाये। लिहाज़ा वहदत और इत्तेहाद के मसले को असली हदफ़ क़रार नही देना चाहिये और शरीयत के हक़ायक़ को इत्तेहाद पर क़ुर्बान नही करना चाहिये, बल्कि उसके बर ख़िलाफ़ अगर इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान ताकीद की है तो इसकी वजह भी दीने इस्लाम की हिफ़ाज़त बयान की है, अब यह कैसे मुम्किन है कि किसी की नज़र में बहदत का मसअला इतना अहम दिखाई दे कि बाज़ दीनी मुसल्लमात और मज़हब के अरकान को तर्क कर दे या बेजा और फुज़ूल की ताविलात की जाये।

इस ह़कीक़त पर पैग़म्बरे इस्लाम (स) की सीरत और तारीख़ बेहतरीन गवाह है, आँ हज़रत (स) अगरचे यह जानते थे कि बनी उमय्या हज़रत अली (अ) और बनी हाशिम के मुख़ालिफ़ हैं और बहुत से लोग हज़रत अली (अ) की विलायत और हुक्मरानी को क़बूल नही करेगें और आपकी इमामत के कभी भी कबूल नही करेगें, लेकिन इस वजह से आँ हज़रत (स) ने हक़ व हक़ीक़त को बयान करने से गुरेज़ नही किया। ऐसा नही है कि हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को बयान किया हो, बल्कि अपनी बेसत के 23 साल में जैसे भी मुमकिन हुआ हज़रत अली (अ) की विलायत व इमामत को असहाब के सामने बयान किया जबकि आँ हज़रत (स) इस बात पर यक़ीन रखते थे कि यह लोग मेरी वफ़ात के बाद इस मसअले पर इख़्तिलाफ़ करेगें, बल्कि यह इख़्तिलाफ़ हज़रत इमामे ज़माना (अ) के ज़हूर तक बाक़ी और जारी रहेगा। आँ हज़रत (स) ने इन तमाम चीज़ों के बावजूद भी हक़ को बयान किया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) हालाकि जानते थे कि हज़रत अली (अ) के इमामत को मसअले पर क़यामत तक इख़्तिलाफ़ रहेगा फिर भी आँ हज़रत (स) ने इस तरह हज़रत अली (अ) की इमामत की ताकीद फरमाई यहाँ तक कि रोज़े ग़दीर शक व शुब्हे को दूर करने के लिये हज़रत अली (अ) के हाथों को उठा कर उनको अपना जानशीन मुक़र्रर किया और आपकी विलायत पर ताकीद फरमायी।

क़ारेईने केराम, यहाँ तक की बातों से यह बात बिल्कुल वाज़ेह हो जाती है कि हक़ व हक़ीक़त को बयान करना अस्ल है और कभी भी इसको नज़र अंदाज़ नही करना चाहिये। यहाँ तक कि अगर हमें मालूम हो कि इसको बयान करने की वजह से मुसलमानों की सफ़ों में इख्तिलाफ़ हो जायेगा और मुसलमानों के दरमियान दो गिरोह हो जायेगें, लेकिन इसके यह मायने नही हैं कि मुसलमान एक दूसरे के दुश्मन हो जायें और एक दूसरे को नीस्त व नाबूद करने की फ़िक्र में लग जायें, बल्कि अपना मुद्दआ बयान करने के साथ साथ एक दूसरे की बातों को भी बर्दाश्त करने का भी हौसला रखें और बेहतरीन गुफ़तार की पैरवी करने की दावत दें, लेकिन इस हाल में मुश्तरक दुश्मन से ग़ाफ़िल न हों।

हज़रत इमाम हुसैन (अ) का क़याम हमारे मुद्दआ पर बेहतरीन गवाह है, क्योकि इमाम हुसैन (अ) हाला कि जानते थे कि मेरे क़याम से मुसलमानों के दो गिरोह में इख्तिलाफ़ होगा। लेकिन इस सूरत में भी मुसलमानों के इत्तेहाद की वजह से अम्र बिल मारूफ़ व नहयी अनिल मुन्कर जैसे अहम उसूल से ग़ाफ़िल नही हुए।

हज़रत अली (अ) की सीरत भी इसी मतलब की तरफ़ इशारा करती है, क्यो कि बाज़ लोगों के नज़रिये के मुताबिक़ हज़रत अली (अ) तलहा व ज़ुबैर और मुआविया को बेजा ओहदा देकर जंगे जमल व जंगे सिफ़्फ़ीन को रोक सकते थे और इस काम के ज़रिये मुसलमानों के दरमीयान होने वाले इख्तिलाफ़ की रोक थाम कर सकते थे। जिसके नतीजे में हज़ारों लोगों की जान बच जाती। लेकिन हज़रत अली (अ) ने उसूले इस्लाम, हक़ व हक़ीक़त से और शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये उन हक़ायक़ से चश्म पोशी नही की।

लिहाज़ा वहदत की हक़ीक़त (या दूसरे लफ़्ज़ों में इत्तेहाद) के मायना यह हैं कि अपने मुसल्लम अक़ायद को महफ़ूज़ रखते हुए मुश्तरक दुश्मन के मुक़ाबले में हम आवाज़ रहें और दुश्मन से ग़फ़लत न बरतें। इसके यह मायना नही है कि ख़ालिस इल्मी गुफ़्तुगू और ताअस्सुब से ख़ाली बहस से भी परहेज़ करें, क्यो कि यह तमाम चीज़ें दर हक़ीक़त शरीयते इस्लामिया की हिफ़ाज़त के लिये हैं।

इसी वजह से जब जंगे सिफ़्फीन में हज़रत अली (अ) से नमाज़ के वक्त के बारे में सवाल किया गया और उस सवाल के बाद कि इस जंग के मौक़े पर क्या यह नमाज़ को वक्त है? तो इमाम अली (अ) ने फ़रमाया: क्या हम नमाज़ के अलावा किसी दूसरी चीज़ के लिये जंग कर रहे हैंलिहाज़ा कभी भी हदफ़ को वसीले और ज़रिये पर क़ुर्बान न किया जाये।

शेख मुहम्मद आशूर, अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सिक्रेटॅरी और अंदीश ए तक़रीबे मज़ाहिब कमेटी के सद्र एक बेहतरीन और मंतीक़ी गुफ़्तुगू में कहते हैं:  इस्लामी मज़ाहिब के दरमीयान गुफ़्तुगू के नज़िरये का मक़सद यह नही है कि तमाम मज़हबों को एक कर दिया या किसी एक फ़िरकें से दूसरे फ़िरक़े की तरफ़ रग़बत दिलाई जाये, अगर यह मायना किये जायें तो फिर क़ुरबत का नज़रिया बेफ़ायदा हो जायेगा। क़ुरबत का नजरिया इल्मी गुफ़्तुगू की बुनियाद पर होना चाहिये ताकि इस इल्मी असलहे के ज़रिये ख़ुराफ़ात से जंग की जा सके और हर मज़हब व फ़िरक़े के उलामा और दानिशवर अपनी इल्मी गुफ़्तुगू में अपने इल्म को दूसरों के सामने पेश करें। ताकि इंसान चैन व सुकून के माहौल में हक़ीक़त से आगाह हो जाये और आसानी से किसी नतीजे पर पहुच जाये। (बाज़ ख़्वानी अंदेश ए तक़रीब, इसकंदरी पेज 32)

हर मज़हब के मानने वालों की मुश्तरक चीज़ों पर निगाह के ज़रिये आलमी मुआशरे में ज़िन्दगी करने वाले फ़िरक़ों के दरमियान तआवुन और हम दर्दी पैदा हो जायेगी और इख्तिलाफ़ी चीज़ों पर एक इल्मी व तहक़ीक़ाती नज़र से हक़ व हक़ीकत तक पहुचने के लिये गुफ़्तगू व तहक़ीक़ को रास्ता हमवार हो जायेगा। चुनाँचे अहले बैत (अ) की विलायत से तमस्सुक के शेआर के साथ साथ शहादतैन के के इक़रार के फ़वायद और फ़िकही लवाज़िमात के नफ़ी नही की जा सकती, जिस तरह वहदते इस्लामी के उनवान के तहत या ताअस्सुब के ख़ातमे के नारे के ज़रिये ईमानी उसूल और उसके फ़वायद और बरकतों से चश्म पोशी नही की जा सकती।

ताअस्सुब की नफ़ी के मायना हक़ायक़ से पीछे हट जाना नही है, बल्कि इल्मी और तहक़ीक़ाती उसूल पर ऐतेक़ादी बुनियाद को क़ायम करना है(चाहे तहक़ीक़ के सिलसिले में हो या गुफ़्तुगू और बहस से मुताल्लिक़ हो) जिसके नतीज में फ़िक्री निज़ाम और मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों के दरमियान एक दुसरे से ताअल्लुक़ात, उलफ़त और हुस्ने ख़ुल्क की बुनियाद क़ायम हों।

2.     हक़ीकी इमाम पर ही वहदत मुमकिन है

इस्लाम ने मुसलमानों के दरमियान बहदत व इत्तेहाद पर ज़ोर दिया है जैसा कि क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

1.               आयत (सूरह आले इमरान आयत 103)  तर्जुमा (और अल्लाह की नेमत को याद करो कि तुम आपस में दुश्मन थे और उसने तुम्हारे दिलों में उलफ़त पैदा कर दी तो तुम उसकी नेमत से भाई भाई बन गये।)

2.   आयत (सूरह आले इमरान 105) तर्जुमा (और ख़बर दार उन लोगों की तरह  न हो जाओ जिन्होने तफ़रक़ा पैदा किया और वाज़ेह निशानियों के आ जाने के बाद भी इख्तिलाफ़ किया कि उनके लिये अज़ाबे अज़ीम है।

3.   आयत (सूरह हुजरात आयत 10) तर्जुमा (बेशक मोमिनीन आपस में भाई भाई हैं।)

4.  आयत (सूरह अनआम आयत 159) तर्जुमा (जिन लोगों मे अपने दीन में तफ़रक़ा पैदा किया और टुकड़े टुकड़े हो गये उनसे आप को कोई ताअल्लुक नही है।)

5.  आयत (सूरह आले इमरान आयत 103 ) तर्जुमा (और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो।)

6. आयत (सूरह अनफ़ाल आयत 99)

तर्जुमा (और आपस में इख्तिलाफ़ न करो कि कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा बिगड़ जायेगी।)

7. आयत (सूरह अँबिया आयत 92) तर्जुमा (बेशक यह तुम्हारा दीन एक ही दीन इस्लाम है और मैं तुम सब का परवर दिगार हूँ लिहाज़ा मेरी इबादत करो।)

इस्लामी वहदत और इत्तेहाद के मसअले पर इतनी ताकीद के बावजूद इस नुक्ते से ग़ाफ़िल नही होना चाहिये कि वहदत के लिये एक महवर होना चाहिये या दूसरे अलफ़ाज़ में वहदत और इत्तेहाद तक पहुचने के लिये एक रास्ता होना ज़रूरी है लिहाज़ा वहदत पर ज़ोर देना उसके लिये कोई महवर और रास्ता मुअय्यन किये बग़ैर बेहूदा और बेफ़ायदा है।

कभी भी क़ुरआने सामित तने तन्हा वहदत के लिये महवर नही हो सकता। क्योकि हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) के फ़रमान के मुताबिक़ क़ुरआन में बहुत सी वुजूह मौजूद हैं जिन में हर एक वुजूह को एक लफ़्ज़ पर हम्ल किया जा सकता है, इस वजह से हम देखते हैं कि क़ुरआने करीम आसमानी किताबों को इमाम से ताबीर करता है जैसा कि इरशाद होता है:

आयत (सूरह हूद आयत 17) तर्जुमा (और उसके पहले मूसा की किताब गवाही दे रही है जो क़ौम के लिये पेशवा और इमाम और रहमत थी।)

इसी तरह ख़ुदा वन्दे आलम सुहुफ़े इब्राहीम व मूसा का ज़िक्र करता है, चुनाँचे इरशाद होता है:

आयत (सूरह आला आयत 19) तर्जुमा (इब्राहीम के सहीफ़ों में भी और मूसा के सहीफ़ो में भी।)

लेकिन सिर्फ़ इसी चीज़ पर इक्तिफ़ा नही की बल्कि जनाबे इब्राहीम (अ) का इमामे नातिक़ के उनवान से तआरुफ़ कराया है और इरशाद फ़रमाता है:

आयत (सूरह बक़रा आयत 124) तर्जुमा (और उस वक्त को याद करो जब ख़ुदा ने चंद कलिमात के ज़रिये  इब्राहीम का इम्तेहान लिया और उन्होने पूरा कर दिया और उसने कहा कि हम तुम को लोगों का इमाम और क़ायद बना रहे हैं, उन्होने अर्ज़ की कि मेरी ज़ुर्रियत? इरशाद हुआ यह ओहद ए इमामत ज़ालिमीन तक नही जायेगा।)

कारेईने केराम, यहा तक कि गुफ़तुगू से यह बात वाजे़ह हो जाती है कि इमामे सामित जो आसमानी किताबें हैं काफ़ी नही हैं बल्कि उसके साथ साथ इमामे नातिक़ की भी ज़रूरत है जो इख्तिलाफ़ की सूरत में हक़ व हक़ीक़त को बयान करे या दूसरे अलफ़ाज़ में यूँ कहा जाये कि हक़ और इस्लामा वहदत का महवर क़रार पाये।

आयते शरीफ़ा ऐतेसाम () से भी यह नुक्ता बिल्कुल रौशन है, क्यो कि आयत मुसलमानों को हुक्म देती है कि ख़ुदा वंदे आलम की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो, यानी जो चीज़ तुम को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा दे वह हक़ीक़ी इमाम और इमामे मासूम के अलावा कोई नही है, इस्लामी वहदत के सिलसिले में अहम क़ायदा यह है कि इस इत्तेहाद व वहदत का नतीजा वह हक़ीक़त है जो माहेरीन की दक़ीक़ बहस व तहक़ीक़ के बाद कश्फ़ व रौशन हो।

आयत सूरह आले इमरान आयत 103 तर्जुमा (और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहो और आपस में तफ़रक़ा पैदा न करो।)

वहदत का नतीजा हक़ायक़ से दस्त बरदार होना नही है बल्कि हक़ीक़त की राह में वहदत होना चाहिये, आयते ऐतेसाम, इस्लामा उम्मत में वहदत व इत्तेहाद का मेयार मुअय्यन करते हुए इस अहम राज़ से पर्दा उठा देती है कि उम्मत उस वक्त तक मुत्तहिद नही हो सकती जब तक ..... (अल्लाह की रस्सी) से तमस्सुक न कर लिया जाये और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक उम्मत को तफ़रक़े, फ़ितना व फ़साद और बदबख़्ती की तारीक वादी से निजात देता है।

क़ाबिले तवज्जो नुक्ता यह है कि वहदत के महवर को हब्ल (रस्सी) से ताबीर किया गया है। जिससे रौशन हो जाता है कि रस्सी के दो सिरे होते हैं जिसके एक तरफ़ उम्मत और दूसरी तरफ़ ख़ुदा वंदे आलम है जो ज़मीन व आसमान और इंसान व ग़ैब के दरमियान वास्ता है लिहाज़ा इस इत्तेहाद के वहदत व क़ुत्ब का दायरा आलमे ग़ैब और मलाकूते आला से मुत्तसिल हो ताकि आलमे शुहूद व आलमें ग़ैब से राब्ता बर क़रार कर सके। यहा से यह नतीजा वाज़ेह हो जाता है कि वहदत व इत्तेहाद की कश्ती, हक़ व हक़ीक़त के साहिल पर चले न कि हवा व हवस के साहिल पर, हमारी नज़र में हक़ व हक़ीक़त पर इत्तेहाद होना चाहिये न कि हवा व हवस पर इत्तेफ़ाक़।

इस बेना पर हक़ीक़त उस वाक़ेईयत को कहते हैं जिसका उम्मत के किसी इत्तेफ़ाक़ या इख्तिलाफ़ से ताअल्लुक़ न हो। यह तो उम्मत की ज़िम्मेदारी है कि वह हक़ीक़त को तलाश करे और सभी उसकी पैरवी करें। यानी इस हक़ीक़त को हासिल कर के उस पर मुत्तहिद हो जायें। लिहाज़ा हक़ीक़त उम्म्त के किसी इत्तेफ़ाक का नतीजा नही है कि अगर किसी चीज़ पर मुत्तहिद हो जाये तो वही हक़ हो जाये और अगर किसी चीज़ से मुह मोड़ ले तो वह बातिल बन जाये। जिस तरह से सैयदुश शुहादा हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने बड़ी शुजाअत के साथ इत्तेहाद को दरहम बरहम कर दिया और यज़ीद के ख़िलाफ़ क़याम किया और फ़रमाया:

हदीस (बिहारुल अनवार जिल्द 44 पेज 329)

मैं अपने जद की उम्मत की इस्लाह के लिये निकल रहा हूँ, मैं अम्र बिल मारूफ़ और नहयी अनिल मुन्कर करना चाहता हूँ।

अगर उम्मत का इत्तेफ़ाक़ ही हक़ व हक़ीक़त का मेयार हो तो फिर इस्लाह की कोई ज़रूरत नही थी। इस्लाह व अम्र बिल मारुफ़ व नहयी अनिल मुन्कर इस बात पर मज़बूत दलील है कि हक़ व हक़ीक़त लोगों के जमा होने से हासिल नही होती बल्कि ख़ुदो लोगों को हक़ व हक़ीक़त के सामने सरे तसलीम को खम करना चाहिये और ख़ुद को उससे मुताबिक़त देना चाहिये, आयते शरीफ़ा ऐतेसाम के ज़ैल में बयान होने वाली रिवायात के मुतालये से भी यह नतीजा हासिल होता है कि अल्लाह की रस्सी वही आईम्मा अलैहिमुस्सलाम है जो इंसान को यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम तक पहुचा देते हैं।

इब्ने हजर हैसमी (आयते ऐतेसाम) को उन आयात की रदीफ़ में शुमार करते हैं जो अहले बैत (अ) की शान में नाज़िल हुई हैं। () इसी तरह हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम की तफ़सीर क़रार दी जा सकती है। क्योकि इस हदीस में पैग़म्बरे अकरम (स) ने मोमिनीन को हुक्म दिया है कि इन दो ग़रान क़्रद्र गौहरों से तमस्सुक करो जो क़ुरआन व इतरत हैं ताकि हक़ व हक़ीक़त तक पहुच जाओ और कभी गुमराह न हो। (सवायक़े मोहरिक़ा पेज 90)

अबू जाफ़र तबरी आयते ऐतेसाम की तफ़सीर में कहते हैं कि ऐतेसाम का मतलब तमस्सुक करना है, क्योकि रस्सी के ज़रिये इंसान अपने मक़सद तक पहुच सकता है। () इसके अलावा हदीसे सक़लैन की बाज़ तहरीरों में लफ़्ज़ें ऐतेसाम इस्तेमाल हुआ है, नमूने के तौर पर इब्ने अबी शैबा हदीसे सक़लैन को इस तरह नक़्ल करते हैं कि पैग़म्बर अकरम (स) ने फ़रमाया:  जामे उल बयान जिल्द 4 पेज 21

हदीस (अल मुसन्नफ़ इब्ने अबी शैबा)

इसी वजह से मुफ़स्सेरीन और मुहद्देसीन ने हदीसे सक़लैन को आयते ऐतेसाम के ज़ैल में ज़िक्र किया है।

हाकिम हसक़ानी अपनी सनद के साथ रसूले अकरम (स) से नक़्ल करते हैं:

हदीस (शवाहिदुत तंज़ील जिल्द 1 पेज 168)

जो शख़्स चाहे इस निजात की कश्ती पर सवार हो और मज़बूत रस्सी से मुतमस्सिक हो और अल्लाह की रस्सी से तमस्सुक करे तो उसे चाहिये कि हज़रत अली (अ) की विलायत को क़बूल करे और उनके हिदायत करने बेटों की इक्तेदा करे।

नतीज़ा यह हुआ कि आयते शरीफ़ा और उसकी तफ़सीर में बयान होनी वाली रिवायात से यह मालूम होता है कि अहले बैत (अ) उम्मते इस्लामिया की वहदत व इत्तेहाद का मरकज़ हैं और उन हज़रात की इमामत व विलायत की बहस दर हक़ीक़त उस वहदत के महवर की गुफ़्तुगू है जिस पर क़ुरआने करीम और रिवायात ने ज़ोर दिया है जैसा कि दूसरी रिवायात भी इस हक़ीक़त पर ताकीद करती हैं।

हाकिम नैशा पुरी अपनी सनद के साथ इब्ने अब्बास से नक़्ल करते हैं कि रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया:

सितारे अहले ज़मीन को ग़र्क़ होने से बचाते हैं और मेरे अहले बैत मेरी उम्मत को इख्तिलाफ़ का शिकार होने से बचाते हैं, पस अगर अरब का कोई क़बीला उनकी मुख़ालिफ़त करता है तो ख़ुद उनके दरमियान इख्तिलाफ़ हो जायेगा और उसका शुमार शैतानी गिरोह में होगा।

नीज़ मौसूफ़ अपनी सनद के ज़रिये जनाबे अबू ज़र से नक़्ल करते हैं कि जनाबे अबू ज़र ख़ानए काबा के पास खड़े हुए और अपने हाथों से ख़ानए काबा के दर को पकड़ कर लोगों को ख़िताब करते हुए फ़रमाया:

ऐ लोगो, जो मुझ को जानता है वह जानता है और जो नही जानता है वह पहचान ले मैं अबू ज़र हूँ, मैंने रसूले अकरम (स) को यह कहते सुना है:

हदीस (मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 151)

लोगों, आगाह हो जाओ कि तुम में मेरे अहले बैत की मिसाल नूह की कश्ती जैसी है जो उसमें सवार हो गया वह निजात पा गया और जिसने उससे रूगरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

और फिर मौसूफ़ उन दोनो हदीसों को सहीय शुमार करते हैं।

2.              इल्मी गुफ़्तुगू, इत्तेहाद का रास्ता हमवार करती है

इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत व रहबरी को मसअला है चुनाँचे शहरिस्तानी कहते हैं: इस्लामी उम्मत के दरमियान सबसे बड़ा इख्तिलाफ़ इमामत का मसअला है, क्योकि इस्लाम के किसी भी मसअले में इमामत के मसले की तरह तलवार नही उठाई गयी है। ()

लिहाज़ा हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि मुसलमानों के इत्तेहाद के लिये कोशिश करे, लेकिन इसके मायना यह नही हैं कि ख़ालिस इल्मी और बिला ताअस्सुब गुफ़्तुगू भी न की जाये , क्यो कि इस तरह की बहस व गुफ़्तुगू मुसलमानो के इत्तेहाद पर असर अंदाज़ होती है, जब मुसलमानो का कोई एक फिरक़ा दूसरे फ़िरक़े के हक़ीक़ी अक़ायद को समझ जाता है और यह समझ लेता है कि इस फ़िरक़े के अक़ायद क़ुरआन व सुन्नत और अक़्ल से मुस्तनद है तो फिर एक दुसरे में बुग़्ज़ व हसद कम हो जाता है, कीना व दुश्मनी का एक अज़ीम हिस्सा इस वजह से होता है कि मुसलमान एक दुसरे के अक़ायद से बेख़बर हैं या उनको बिला दलील मानते हैं, अगर शियों की तरफ़ बदा के अक़ीदों की वजह से कुफ़्र की निसबत दी जाती है और तक़ैय्ये को निफ़ाक़ क़रार दिया जाता है तो इसकी वजह यह है कि दूसरे इस अक़ीदे और अमल से बाखबर नही हैं, जिस में कुछ तो हमारी भी कमी होती है कि हमने अपने अक़ायद को सही तौर पर पेश नही किया है, इमामत का मसअला भी इस मौज़ू से अलग नही है कि अगर अगर अहले सुन्नत इमामत के मसअले में शिया असना अशरी ऐतेक़ाद और उसके शरायत को ग़ुलू कहते हैं तो इसकी वजह भी यह है कि हमने इल्मी और सही तौर से इमामत के मसअले को नहै पहचनवाया और जब हमने अच्छा किरदार अदा किया तो हमें कामयाबी भी मिली और मुसलमानों के दरमियान इत्तेहाद बरक़रार भी रहा। चुनाँचे इसके चंद नमूने यहाँ बयान किये जाते हैं। (अलमेलल वन नेहल जिल्द 1 पेज 24)

(अ)          हक़ की तरफ़ रग़बत

1.      शेख महमूद शलतूत, अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के साबिक़ सद्र, शिया फ़िक्ह और अहले बैत (अ) की मरजईयत के बारे में काफ़ी तहक़ीक़ और मुतालआ के बाद फ़िक्ह जाफ़री को मोतबर मान लेते हैं और फिक़्ह जाफ़री पर अमल करने का फ़तवा दे देते हैं, चुनाँचे मौसूफ़ फ़रमाते हैं: मज़हबे जाफ़री जो शिया असरी अशरी के नाम से मशहूर है। उस पर अमल करना अहले बैत के दूसरे मज़ाहिब की तरह शरई तौर पर जायज़ है, लिहाज़ा मुसलमानों के लिये मुनासिब है कि इस मज़हब को पहचानें और बाज़ फ़िरकों के बेज़ा ताअस्सुब से निजात हासिल करें। ()

इस्लामुना, राफिई पेज 59, मजल्लए रिसालतुल इस्लाम तारीख़ 13 रबीउल अव्वल 1378 हिजरी क़ाहिरा।

2.      शेख़ अज़हर डाक्टर मुहम्मद फ़ख्खा़म भी शेख़ शलतूत के फ़तवे पर तक़रीज़ लिखते हुए उनके नज़रिये की ताईद करते हैं, चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं: मैं शेख महमूद शलतूत और उनके अख़लाक़, वसीअ ईल्म, अरबी ज़बान, तफ़सीर क़ुरआन और फ़िक़्ह व उसूल में महारत पर रश्क करता हूँ, मौसूफ़ ने शिया इमामिया की पैरवी करने का फ़तवा दिया है, मुझे ज़रा भी इस बात में शक नही है कि उनके फ़तवे की बुनियाद मज़बूत है और मेरी अक़ीदा भी यही है। ()

फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 64

इसी तरह मौसूफ़ कहते हैं: ख़ुदा वंदे आलम रहमत नाज़िल करे शेख शलतूत पर कि उन्होने इस हक़ीकत पर तवज्जो की और दिलेरी के साथ साफ़ साफ़ फ़तवा दिया और अपने जावेदाना बना लिया, उन्होने शिया इमामिया मज़हब की पैरवी करने का फ़तवा दिया, क्योकि यह मज़हब फ़िक्ही और इस्लामी मज़हब है क़ुरआन व सुन्नत और मज़बूत दलाइल पर कायम है। ()

3.      शेख मुहम्मद ग़ज़ाली कहते हैं: मैं इस बात का अक़ीदा रखता हूँ कि उस्तादे कबीर शेख महमूद शलतूत ने मुसलमानों को क़रीब करने के सिलसिले में एक बहुत तूलानी रास्ता तय किया है... उनका अमल दर हक़ीक़त उन ख़्यालात की तकज़ीब है जो बाज़ मग़रिबी मुवर्रेख़ीन अपने ज़हनों में समाये हुए हैं, चुनाँचे वह इस ख़्याल में थे कि मुसलमानों के दरमियान जो बुग़्ज़ व कीना और दुश्मनी पाई जाती है उसके पेशे नज़र उनको वहदत तक पहुचने और एक परचम के नीचे जमा होने पहले और मुतफ़र्रिक़ और एक दूसरे से जुदा करके नीस्त व नाबूद कर दिया जाये लेकिन मेरी नज़र में यह फ़तवा पहला क़दम और इब्तेदाए राह है। ()

() देफ़ा अनिल अक़ीदा वश शरीया पेज 257

4.      अब्दुल रहमान नज्जार क़ाहिरा मसाजिद कमेटी के सद्र कहते हैं: ''हम भी शेख शलतूत के फ़तवे का ऐहतेराम करते हुए उसी के मुताबिक़ फ़तवे देते हैं और लोगों को सिर्फ़ मज़हब में मुन्हसिर होने से डराते हैं, शेख शलतूत मुजतहिद और इमाम हैं, उनकी राय ऐने हक़ है फिर हम क्यो अपनी नज़र और फ़तवों में किसी खास मज़हब पर इक्तिफ़ा करें, हालाँकि वह सब मुजतहिद थे?''।() फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया पेज 66

5.      उस्ताद अहमद बुक, जो शेख शलतूत और अबू ज़हरा के उस्ताद थे, कहते हैं: "शिया इसना अशरी सबके सब मुसलमान हैं और ख़ुदा, रसूल, क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम(स) पर नाज़िल होने वाली तमाम चीज़ों पर ईमान रखते हैं, उनके यहाँ क़दीम और असरे हाज़िर में जय्यिद फ़ुक़हा और इल्म व फ़न में माहिर उलामा पाये गये हैं, उन लोगों के अफ़कार अमीक़ और इल्म वसीअ होता था, उनके तालिफ़ात लाखों की तादाद में मौजूद हैं और बहुत ज़्यादा किताबें मेरे इल्म में हैं।"() तारिख़ित तशरीई इस्लामी।

6.      शेख मुहम्मद अबू ज़हरा भी लिखते हैं: इस बात में कोई शक नही है कि शिया एक इस्लामी फ़िरक़ा है.... अपने अक़वाल में क़ुरआने मजीद और पैग़म्बरे इस्लाम (स) से मंसूब अहादीस से तमस्सुक करते हैं, वह अपने सुन्नी पड़ोसियों से दोस्ती रखते हैं और एक दूसरे से नफ़रत नही करते। () तारिखुल मज़ाहिबिल इस्लामिया पेज 39

7.      उस्ताद महमूद सरतावी (मिसरी मुफ़्ती) कहते हैं: ''मैं वही बात कहता हूँ जो हमारे सलफ़े सालेह कहते रहे हैं, मैं कहता हूँ कि शिया इसना अशरी हमारे दीनी भाई हैं और हम पर हक़े बरादरी रखते हैंऔर हम भी उन पर हक़े बरादरी रखते हैं।'' () मजल्ल ए रिसाल ए सक़लैन नंबर 2 साले अव्वल 1413 हिजरी पेज 252

8.      नीज़ उस्ताद अब्दुल फ़त्ताह अब्दिल मक़सूद कहते हैं: ''मेरे अक़ीदे के मुताबिक़ तंहा मज़हब जो इस्लाम का रौशन आईना है जो शख्स इस्लाम को देखना चाहता है वह शिया अक़ायद व आमाल को देखे, इस बात पर तारीख गवाह है कि शियों ने इस्लामी अक़ायद के दिफ़ा में बहुत ज़्यादा ख़िदमात अंजाम दी हैं।''() फ़ी सबीलिल वहदतिल इस्लामिया।

9.      डाक्टर हामिद हनफ़ी दाऊद, क़ाहिरा दानिशकदे में अदबियात अरब के उस्ताद कहते हैं :''हम क़ारेईन केराम के लिये यह बात वाज़ेह कर देना चाहते हैं कि अगरचे सुफ़यानी मुन्हरेफ़ीन ने गुमान किया है कि शिईयत एक जाली और नक़ली मज़हब है या ख़ुराफ़ात व इसराईलियात से भरा हुआ है या अब्दुल्लाह इब्ने सबा तारीख़ की दूसरी ख़्याली शख्सियतों से मंसूब है लेकिन ऐसा नही है बल्कि शिईयत आज की नई इल्मी रविश में इस चीज़ के बरअक्स है जो उन्होने गुमान किया है, शिया सबसे पहला वह मज़हब है जिसने मन्क़ूल व माक़ूल पर खास तवज्जो की है और इस्लामी मज़ाहिब के दरमियान उस राह का इंतेखाब किया है कि जिसका उफ़ुक़ वसीअ है और अगर मंक़ूल व माक़ूल में शियों का इम्तियाज़ न होता तो फिर इज्तेहाद में दोबारा रूह नही फूँकी जा सकती थी और मौक़ा व महल से अपने को मुताबिक़ नही किया जा सकता था और वह भी इस तरह से कि इस्लामा शरीयत की भी कोई मुख़ालिफ़त न हो।''() नज़रात फ़िल कुतुबिल ख़ालिदा पेज 32

इसी तरह मौसूफ़ ने किताब अब्दुल्लाह बिन सबा पर तक़कीज़ लिखते हुए कहा: ''इस्लामा तारीख को 13 सदिया गुज़रने वाली हैं और हमेशा शियों के खिलाफ़ फ़तवे सादिर होते हुए देखा गया है, ऐसे फ़तवे जिस में हवाए नफ़्स का शायबा पाया जाता था और यह बुरा तरीक़ा इस्लामी फ़िरकों के दरमियान इख़्तिलाफ़ और तफरक़े का बाइस बना, इस तरह इस फ़िरक़े बुज़ुर्ग उलामा की तालिमात से दीगर उलामा ए इस्लाम महरूम हो गये, जिस तरह उनके नज़रियाती नमूनों और उनके और उनके मिज़ाज़ के फवायद से महरूम रह गये, दर हक़ीक़त इस तरह से इल्म व दानिश का बहुत बड़ा नुक़सान हुआ है और सबसे ज़्यादा नुक़सान शियों की तरफ़ ख़ुराफ़ात की निस्बत देने से हुआ है जबकि वह ख़ुराफ़ात शियों के यहाँ नही पाये जाते और शिया हज़रात उनसे बरी हैं और यही आप हज़रात के लिये काफ़ी है कि इमाम जाफर सादिक (अ) (मुतवल्लिद 148 हिजरी) शिया फ़िक्ह के परचमदार और सुन्नियों के दो इमामों के उस्ताद हैं, अबू हनीफ़ा नोमान बिन साबित (मुतवल्लिद 150 हिजरी) और अबू अब्दिल्लाह मालिक बिन अनस (मुतवल्लिद 179 हिजरी) इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के शागिर्द हैं, इसी वजह से अबू हनीफ़ा यह कहते हुए नज़र आते हैं: ''लौलस सनतान ल हलकन नोमान'' अगर वह दो साल न होते तो नोमान (अबू हनीफ़ा) हलाक हो जाते, उन दो सालों से मुराद वह दो साल हैं जिन में इमाम सादिक़ (अ) के वसीअ इल्म से फ़ैज़ हासिल किया है, इसी तरह अनस बिन मालिक कहते हैं: मैने किसी इमाम सादिक़ (अ) से ज़्यादा फ़क़ीह नही देखा। () अब्दुल्लाह बिन सबा जिल्द 1 पेज 13

10.  डाक्टर अब्दुल्लाह कयाली हलब की मशहूर व मारूफ़ शख्सियात अल्लामा अमीनी अलैहिर्रहमह को एक ख़त में तहरीर करते हैं: ''आलमे इस्लाम इस तरह की तहक़ीक़ात का हमेशा मोहताज रहा है, क्योकि रसूले आज़म (स) की वफ़ात के बाद मुसलमानों के के दरमियान इख्तिलाफ़ हो गया जिसके नतीजे में बनी हाशिम अपने हक़ से महरूम कर दिये गये? नीज़ इस बात की ज़रूरत है कि मुसलमानों को पस्ती और तनज़्ज़ुली में ले जाने वाले असबाब और वुजूहात की गुफ़्तुगू की जाये, आज मुसलमानों का यह क्या हाल है? क्या यह मुम्कन है कि मुसलमानों के हाथ से खोये हुए इल्म व दानिश को अस्ल तारीख़ की तरफ़ रुजू करते हुए दोबारा हासिल किया जा सकता है।'' () अल ग़दीर जिल्द 4 पेज 4 से 5

11.  उस्ताद अबुल वफ़ा ग़नीमी तफ़ताज़ानी (अल अज़हर कालेज में इस्लामी फ़लसफ़े के मुद्दर्रिस) कहते है: ''दुनिया में मग़रिब व मशरि़क़ के क़दीमी और असरे हाज़िर में बहस करने वाले शियों के खिलाफ़ बहुत सी गलत बातों के मुरतकिब हुए हैं जो किसी भी मन्क़ूला दलील के मुताबिक़ नही है, अवामुन नास ने भी उन ग़लत बातों को एक हाथ से दूसरे हाथ तक पहुचाया बग़ैर इसके उनके सही या गलत होने के बारे में किसी मोतबर आलिम से सवाल करें और हमेशा शियों पर तोहमतों की बौछार की, शियों की निस्बत ना इंसाफ़ी रवा रखने वाले असबाब व ऐलल में शियों के मनाबे व माखज़ से ला इल्मी है और उन पर लगाई जाने वाली तोहमतों पर सिर्फ़ शिया दुश्मन मोवल्लिफ़ीन की किताबों को देखा है।'' () मा रिजालिल फ़िक्र फ़िल क़ाहिरा पेज 40

ब. हक़ का इक़रार

खालिस इल्मी और ताअस्सुब व जंग व जिदाल से खाली गुफ़्तुगू और इसी तरह की किताबों की तालीफ़ ने न सिर्फ़ यह कि अहले सुन्नत के बुज़ुर्ग उलामा को इस बात की तरफ़ राग़िब किया और उन्होने इस बात का ऐतेराफ़ किया कि मज़हबे जाफ़री की पैरवी करना जायज़ है और शिया असना अशरी को इस उनवान से क़बूल करना कि इस मज़हब के उसूल व फ़ुरूअ क़ुरआन, हदीस और अक़्ल से मुसतनद हैं, बल्कि इस बात का भी बाइस बना कि अहले सुन्नत के बहुत से जय्यिद उलामा ने अपने मज़हब को छोड़ दिया और शिया मज़हब को इंतेखाब कर लिया और उन्होने इस बात का इक़रार किया कि हक़ एक ही है और वह शिया और मज़हबे अहले बैत (अ) के अलावा नही है। कारेईन केराम, हम यहाँ पर उन्ही चंद हज़रात को आप के सामने पेश कर रहे हैं:

1.     अल्लामा शेख मुहम्मद मरई, अमीन अनताकी

मौसूफ़ अनताकिया के इलाक़े में उनसू नामी बस्ती 1314 हिजरी में पैदा हुए, वह शाफ़ेई फ़िरक़े से ताअल्लुक़ रखते थे, वह अपने भाई अहमद के साथ दीनी उलूम हासिल करने के लिये मिस्र रवाना हुए और उन्होने कुछ मुकद्दमात हासिल करने के बाद अल अज़हर के जय्यिद उलामा जैसे शेख मुसतफ़ा मराग़ी, महमूद अबूता महनी, शेख रहीम वग़ैरह के इल्म से फ़ैज़याब होते हुए खुद भी इल्म के बुलन्द दर्जे पर फ़ायज़ हो गये लेकिन जब वह दोनो अपने वतन तो लौटने लगे तो अल अज़हर के बुज़ुर्गों ने उनको मिस्र में बाक़ी रहने की दावत दी और उनको अल अज़हर में मुदर्रिस का ओहदा देने के लिये कहा ताकि वह मुख्तलिफ़ शागिर्दों को अपने इल्म से सैराब करें लेकिन उन दोनो भाईयों ने इस बात को कबूल नही किया और अपने शहर लौट आये और वापस लौटने के कुछ मुद्दत बाद मुख्तलिफ़ किताबों के मुतालआ से शिईयत की हक़्क़ानियत से आगाह हुए और दोनो भाईयों ने मज़हबे तशय्यों को इख़्तियार कर लिया।

शेख मुहम्मद अपनी किताब ले माज़ा इख़्तरतो मज़हब अहले बैत (अ) में तहरीर करते हैं: ''यक़ीनी तौर पर ख़ुदा वंदे आलम ने मेरी हिदायत फ़रमाई और मेरे लिये मज़हबे हक़ से तमस्सुक मुक़द्दर फ़रमाया, यानी मज़हबे अहले बैत (अ) फ़रज़ंदे रसूल (स) हज़रते इमाम जाफ़रे सादिक़ का मज़हब........... ''

मौसूफ़ मज़हबे अहले बैत (अ) तक पहुचाने वाले असबाब व ऐलल के बारे में तहरीर करते हैं:

1.      मैने इस बात का मुशाहिदा किया कि शिया मज़हब पर अमल करना मुजज़ी (काफ़ी) है और मुकल्लफ़ यक़ीनी तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी से बरी हो जाता है, अहले सुन्नत के बहुत से गुज़श्ता और और असरे हाज़िर के उलामा ने इस मज़हब को की सैहत का फ़तवा दिया है।

2.      मुसतहकम दलायल, यक़ीनी बुरहान और रोज़े रौशन की तरह वाज़ेह हुज्जतों के ज़रिये मज़हबे अहले बैत (अ) की हक़्क़ानियत मुझ पर साबित हो गई और यह मेरे लिये साबित हो गया कि वह मज़हब वही है जिसको शियों ने अहले बैत (अ) से हासिल किया है और अहले बैत (अ) ने रसूले अकरम (स) से और आँ हज़रत (स) ने जिबरईल (अ) और जिबरईल (अ) ने ख़ुदा वंदे आलम से हासिल किया है।

3.      उन हज़रात के घर में वहयी नाज़िल हुई और अहले ख़ाना घर की बातों को दुसरों से बेहतर जानते हैं, लिहाज़ा एक अक़्लमंद आदमी के लिये ज़रूरी है कि अहले बैत (अ) के ज़रिये जो दलायल उन तक पहुचे हैं उनको तर्क न करें और ग़ैरों के नज़रियात के पीछे न जायें।

4.      क़ुरआने करीम में मुतअद्दिद आयात नाज़िल हुई हैं जो उन हज़रात की विलायत और दीनी मरजईयत की तरफ़ दावत देती हैं।

5.      पैग़म्बरे अकरम (स) से बहुत सी रिवायात नक़्ल हुई हैं जो हमें मज़हबे अहले बैत (अ) की तरफ़ दावत देती हैं, जिनमें से बहुत सी रिवायात को हम ने अपनी किताब अशशिया व हुजोजुहुम फ़ित तशय्यो में बयान की हैं। () ले माज़ा इख़्तरतो मज़हब अहले बैत (अ) पेज 16 से 17

2.     अल्लामा शेख अहमद अमीन अनताकी

मौसूफ़ शेख मुहम्मद अमीन के भाई हैं जो सैयद शरफ़ुद दीन आमुली की किताब अल मुराजेआत को पढ़ने और उसमे ग़ौर व फ़िक्र करने के बाद अपने मज़हब को छोड़ कर मज़हबे शिया को इंतेखाब करते हैं, वह भी अपनी किताब फ़ी तरीक़ी इलात तशय्यो में बयान करते हैं कि मेरे शिया होने की वजह पैग़म्बरे अकरम (स) की वह हदीस है जिस पर तमाम इस्लामा मज़ाहिब ने इत्तेफ़ाक़ किया है और वह हदीस यह है कि पैग़म्बर इस्लाम (स) ने फ़रमाया:

ऐ लोगो आगाह हो जाओ कि तुम में मेरे अहले बैत की मिसाल नूह की कश्ती जैसी है जो उसमें सवार हो गया निजात पा गया और जिसने उससे रू गरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

मैंने देखा कि अगर मैं ने अहले बैत (अ) की पैरवी की और अपने दीनी अहकाम उन हज़रात से हासिल किये तो मैं निजात याफ़्ता हूँ और अगर मैंने उनको तर्क कर दिया और अपने दीन के अहकाम को उनके अलावा दूसरों से हासिल किया तो मैं गुमराह हूँ।

नीज़ मौसूफ़ फरमाते हैं: मज़हबे जाफ़री से तमस्सुक करके मेरा जमीर और दिल मुतमईन हो गया है, यह मज़हब दर हक़ीक़त आले बैते नबूव्वत (अ) का मज़हब है कि रोज़े क़यामत तक उन पर ख़ुदा का दुरूद व सलाम हो, मैं अपने अक़ीद के मुताबिक़ अहले बैत (अ) की विलायत को क़बूल करके निजात पा गया हूँ, क्योकि उनकी विलायत को क़बूल किये बग़ैर निजात पाना मुम्किन नही है।

3.     डाक्टर मुहम्मद तीजानी समावी

मौसूफ़ टुयुनुस में पैदा हुए, बचपन की ज़िन्दगी गुज़ारने के बाद अरबी मुमालिक के सफ़र किये ताकि मुख्तलिफ़ इल्मी शख्सीयतों से फ़ैज़याब हो, मिस्र में अल अज़हर युनिवर्सिटी के उलामा और दानिशवरों ने उन से दरख़्वास्त की कि वह वहीं रह जायें और अल अज़हर के तलबा को अपने इल्म से फ़ैज़याब करें, लेकिन मौसूफ़ ने कबूल नही किया और इराक़ के सफ़र में मुख़्तलिफ़ शिया उलामा से बहस व गुफ़्तुगू करने के बाद शिया मज़हब इंतेखाब कर लिया और इस वक़्त दुनिया में तशय्यो की तबलीग़ करने वालों में शुमार होते हैं, मौसूफ़ ने मज़हबे अहले बैत (अ) के दिफा़अ में बहुत सी किताबें भी लिखी हैं।

मौसूफ़ सुम्मा ऐहतदयतो के एक हिस्से में फ़रमाते हैं: ''शिया साबित क़दम रहे, सब्र किया, उन्होने हक़ से तमस्सुक किया है... मैं हर आलिम से दरख़्वास्त करता हूँ कि शिया उलामा की सोहबत में बैठें और उनसे बहस व गुफ़्तुगू करें, मैं यक़ीन से यह बात कहता हूँ कि उनकी सोहबत के नतीजे में मज़हबे अहले बैत (अ) को अपनाये बग़ैर उनकी सोहबत को तर्क नही कर सकता... जी हाँ, मैने अपने गुज़िशता मज़हब के बदले इस मज़हब को इंतेख़ाब कर लिया है, ख़ुदा का शुक्र है कि उसमे मुझे इस मज़हब की हिदायत फ़रमाई, वाके़यन अगर उसकी हिदायत और तवज्जो न होती तो मुझे इस मज़हब की हिदायत न होती।''

इसका तर्जुमा फिर मैं हिदायत पा गया के नाम से छप चुका है और मुख़्तलिफ़ ऐडीशन ख़त्म हो चुके हैं, वाकेयन हक़ व हक़ीक़त को तलाश करने के लिये यह किताब बेहतरीन तोहफ़ा है। (मुतर्जिम)

तमाम हम्द व सना उस ख़ुदा के लिये है जिसने मुझे फ़िरक ए नाजिया यानी निजात पाने वाले फिरक़े की रहनुमाई फरमाई, जिस फ़िरके की तरफ़ मुद्दतों ज़हमतें करने के बाद मुझे रहनुमाई मिली, मुझे इस बात में ज़रा भी शक नही है कि जो शख्स हज़रत अली (अ) और अहले बैत (अ) की विलायत को करे तो उसने मज़बूत रस्सी को पकड़ लिया है जो कभी टूटने वाली नही है, इस सिलसिले में पैग़म्बरे अकरम (स) की ऐसी बहुत सी अहादीस नक़्ल हुई हैं जिन पर मुसलमानों का इजमाअ है और अकेले अक़्ल भी तालिबे हक़ के लिये बेहतरीन रहनुमा है... जी हाँ, ख़ुदा का शुक्र है कि मैंने बेहतरीन रास्ता पा लिया है और ऐतेक़ाद में हज़रत अमीरूल मोमिनीन व सैयदिल वसीयीन इमाम अली बिन अबी तालिब (अ) और रसूले अकरम (स) की इक्तिदा की है और मैं जवानाने जन्नत के सरदार और इस उम्मत के दो गुलदस्ते हज़रत इमाम हसन मुज्तबा और इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम, नीज़ पार ए तन मुसतफ़ा, ख़ुलास ए नबूव्वत और मअदने रिसालत सैयदतुन निसाइल आलमीन हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्ला अलैहा कि जिन के ग़ज़ब से ख़ुदा ग़ज़बनाक होता है, उन पर अक़ीदा रखता हूँ।

मैंने इमामे मालिक की जगह तमाम आईम्मा के उस्ताद हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) और हज़रत इमाम हुसैन (अ) की नस्ल से आईम्मा ए मासूमीन का इंतेखाब किया है।

मौसूफ़ हदीसे बाबे मदीनतुल इल्म को नक़्ल करने बाद कहते हैं: ''हम अपने दीन व दुनिया में हज़रत अली (अ) की तक़लीद क्यों न करें? अगर हम यह अक़ीदा रखते हैं कि अली (अ) पैग़म्बर (स) के इल्म का दरवाज़ा हैं तो फिर क्यो बाबे इल्में पैग़म्बर को छोड़ दिया गया है और अबू हनीफ़ा, इमाम मालिक, अहमद बिन हम्बल और इब्ने तैमिया की तक़लीद करने लगे, यह लोग इल्म व अमल और फ़ज़्ल व शरफ़ में हज़रत अली (अ0 के दर्जे तक नही पहुच सकते।''

उसके बाद मौसूफ़ अहले सुन्नत को ख़िताब करते हुए कहते हैं: ''ऐ मेरे दोस्तो और क़बीले वालो, मैं तुम को हक़ के बारे में बहस व गुफ़तुगू करने और ताअस्सुब व हट धर्मी को छोड़ने की दावत देता हूँ, हम बनी उमय्या और बनी अब्बास और सियाह तारीख़ की क़ुरबानी बन गये हैं, हम फ़िक्री जुमूद पर क़ुर्बान हो चुके हैं जिसको हमारे बुज़ुर्गों ने हमारे लिये मीरास छोड़ा है।'' (सुम्मा ऐहतदयतो पेज 204)

मौसूफ़ ने शिया मज़हब के दिफ़ाअ में दर्ज ज़ैल किताबें भी लिखी हैं।

सुम्मा ऐहतदयतो, लअकूना मअस सादिक़ीन, फ़सअलू अहलज़ ज़िक्र, अश शियतो हुम अहलुस सुन्नह, इत्तक़ूल्लाह।

4.     मुआसिर मुवल्लिफ़, सायब अब्दुल हमीद

मौसूफ़ इराक़ की अज़ीम शख़्सीयत थे जिन्होने ईरान के सफ़र में बहुत ज़्यादा तहक़ीक़ात करने और ख़ुदा वंदे आलम के फ़ज़्ल व करम से अहले सुन्नत मज़हब को छोड़ कर शिया मज़हब इख्तियार कर लिया, चुनाँचे वह अपनी किताब के एक हिस्से में लिखते हैं:  मैं इक़रार करता हूँ कि मेरा नफ़्स मेरा दुश्मन था और मुझे ज़लील व रूसवा कर देना चाहता था, लेकिन ख़ुदा वंदे आलम के लुत्फ़ व करम और उसकी ईनायत ने मेरी मदद की, मैं इतमिनान के साथ होश में आया हालाँ कि मैंने अपने को कश्ती ए निजात में पाया, मैंने साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ पानी पीना शुरु कर दिया और अब आप हज़रात से इस गुलशन के बहारी साये के सिलसिले में गुफ़्तुगू करता हूँ।

इस ख़बर को सुन कर मेरे अहबाब व दोस्तों ने मुझे तर्क कर दिया और मुझ पर ज़ुल्म किया, उनका सबसे बड़ा आलिम मुझ से कहता है कि क्या तुम्हे मालूम है कि तुमने क्या किया हैमैने कहा, हाँ मुझे मालूम है कि मैने मज़हबे इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) बिन मुहम्मद बाक़िर बिन ज़ैनुल आबेदीन बिन सैयदे जवानाने बहिश्त बिन सैयदुल वसीयीन व सैयद ए ज़नाने आलमीन व बिन सैयदुल मुरसलीन (स) से तमस्सुक किया है, उसने कहा, क्यो आपने इस तरह हम को छोड़ दिया है? तुम जानते हो कि लोग हमारे बारे में क्या क्या बातें कर रहें हैं? मैं वही कहता हूँ जो रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया है। उसमे कहा, तुम क्या कहते हो, मैने कहा, मैं रसूले अकरम (स) के फ़रमान की बात करता हूँ कि आँ हज़रत ने फ़रमाया: मैं तुम्हारे दरमियान वह चीज़ छोड़े जा रहा हूँ कि अगर तुम ने उससे तमस्सुक किया तो मेरे बाद कभी गुमराह नही होगे, एक किताबे ख़ुदा, दूसरे मेरी इतरत, जो मेरे अहले बैत हैं, इसी तरह आँ हज़रत (स) का वह फ़रमान जो आपने अपने अहले बैत (अ) के बारे में फ़रमाया कि मेरे अहले बैत निजात की कश्ती हैं जो उसमें सवार हो गया वह निजात पा गया। () मंहज फ़िल इंनतेमाइल मज़हबी पेज 311

सायब अब्दुल हमीद ने अहले बैत (अ) और शिया मज़हब के दिफ़ाअ में बहुत सी किताबें लिखी हैं जिनमें से चंद दर्ज ज़ैल हैं।

मंहज फ़िल इंनतेमाइल मज़हबी, इब्ने तैमिया हयातुहू, अक़ायदुहू व तारीख़ुल इस्लामिस सक़ाफ़ी वस सियासी।

5.     उस्ताद सालेह अल वरदानी

मौसूफ़ भी उन्ही हज़रात में से हैं जिन्होने बहुत सी किताबों के मुतालआ के बाद मज़हबे शिया की हक़्क़ानियत को समझ लिया है, उन्होने भी सुन्नी मज़हब को छोड़ कर शिया मज़हब को इख्तियार किया है, मौसूफ़ उन लोगों में से हैं कि जो किसी ख़ौफ़ व खतर की परवाह किये बग़ैर शिईयत का ऐलान करते हैं और मिस्र के लोगों को भी इस मज़हब की दावत देते हैं।

मौसूफ़ अपनी किताब अल ख़दआ, रेहलती मिनस सुन्नह इलाश शिया में रक़्म तराज़ हैं: जब मैं सुन्नी था तो मैंने लोगों को अक़्ल पसंदी की दावत दी और अक़्ल का शेआर बुलंद किया, लेकिन मैं अपनी क़ौंम के दरमियान जगह न बना पाया और हर तरफ़ से अपने ख़िलाफ़ तोहमतें और इल्ज़ाम सुनने को मिले... मैं यह बात अच्छी तरह से जानता था कि अक़्ल से काम न लेना यानी गुज़श्ता लोगों की रव में बह जाना है, जिसके नतीजे में इंसान बग़ैर शख्सीयत के रहता है जो उसके लिये हक़ीक़त के रौशन करे... मैं कभी भी कोई बात बग़ैर तहक़ीक़ और ग़ौर व फ़िक्र के नही कहता... अक़्ल पसंदी ही शिया मज़हब और अहले बैत (अ) के रास्ते को इख्तियार करने में सबसे बुनियादी सबब है। () सालेहुल वरदानी, अल ख़दआ, अल अक़्लिल मुस्लिम बैना अग़लालिस सलफ़ व अवहामुल ख़लफ़।

6.  उस्ताद मोतसिम सैयद अहमद सूडानी

मौसूफ़ ने भी बहुत सी तारीख व हदीस की किताबों को पढ़ने के बाद मज़हबे अहले बैत (अ) की हक़्क़ानियत को इल्म हासिल कर लिया और अपने मज़हब को तर्क करके मज़हबे शिया को इंतेख़ाब कर लिया, मौसूफ़ अपनी किताब को बेनूरे फ़ातेमा ऐहतदयतो को नाम देने के सिलसिले में कहते हैं: ''हर इंसान अपने अंदर एक ऐसे नूर को महसूस करते है जो उसको हक़ व हक़ीक़त की तरफ़ रहनुमाई करता है लेकिन हवाए नफ़सानी और ज़न व गुमान की पैरवी उस नूर पर पर्दा डाल देते हैं, लिहाज़ा इंसान को हर वक़्त याद दहानी और बेदारी की ज़रूरत है, हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्ला अलैहा इस नूर की अस्ल हैं, मैंने इस नूर को हमेशा अपने वुजूद में महसूस किया है।'' () अल मुतहव्वलून जिल्द 1 पेज 123

नीज़ मौसूफ़ अदालते सहाबा के नज़रिये के सिलसिले में कहते हैं: ''अदालते सहाबा का नज़रिया वह नज़रिया है जिस को अहले सुन्नत ने अहले बैत (अ) की इस्मत के मुक़ाबले में गढ़ा है, उन दोनो के दरमियान कितना फ़र्क है, अहले बैत (अ) की इस्मत एक क़ुरआनी हक़ीक़त है और पैग़म्बर अकरम (स) ने भी इस पर ताकीद फ़रमाई है और हक़ीक़त में भी ज़ाहिर हुई है लेकिन अदालते सहाबा का नज़रिया क़ुरआन मजीद के मुख़ालिफ़ है जैसा कि ख़ुद पैग़म्बर इस्लाम (स) ने भी इसके बर ख़िलाफ़ वज़ाहत फ़रमाई है, बल्कि ख़ुद सहाबा हज़रात ने पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने में और आपके बाद ईजाद की हुई बिदअतों का इक़रार किया है।'' (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 126

नीज़ मौसूफ़ एक और मौक़े पर कहते हैं: ''मैं अपने अंदर एक ऐसी चीज़ महसूस करता हूँ जिसकी तौसीफ़ नही कर सकता लेकिन इस बारे में सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि अहले बैत (अ) की विलायत को क़बूल करने के बाद ख़ुदा वंदे आलम से क़ुरबत में हर रोज़ इज़ाफ़ा होता जा रहा है, जितनी भी उन हज़रात की अहादीस में गौर करता हूँ दीन के सिलसिले में मेरी मारेफ़त और यक़ीन में उतना ही इज़ाफ़ा होता जा रहा है, मेरा मानना तो यह है कि अगर मज़हबे शिया न होता तो ईमान की लज़्ज़त और यक़ीन की लताफ़त को अपने अंदर महसूस न करता और जब अहले बैत (अ) से मासूरा उन दुआयों को पढ़ता हूँ जो किसी भी मज़हब में नही पायी जाती तो अपने परवर दिगार से मुनाजात का मज़ा ही कुछ और होता है।'' (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 127)

. मशहूर व मारूफ़ मिस्री वकील दमरदाश ऐक़ाली

मौसूफ़ मिस्र की मशहूर व मारूफ़ शख्सीयत हैं और मुद्दतों से उनका मशग़ला वकालत रहा है, वह एक शरई मसअले में तमाम फ़िक्हों में मवाज़ना करते हैं और शिया असना अशरी फ़िक्ह को दूसरे मज़ाहिब से मुसतहकम देखते हैं जिस की बेना पर उनके दिल में शिया मज़हब की तरफ़ रग़बत की बिजली चमक उठती है और अजीब व ग़रीब वाक़ेया की बेना पर उनकी ज़िन्दगी बिलकुल बदल जाती है और वह शिया मज़हब को अपनाने का इफ़्तेख़ार हासिल कर लेते हैं, वह अजीब व ग़रीब वाक़ेया यह है कि जब ईरानी हुज्जाज ऐतेक़ादी किताबों के तकरीबन 20 कारटून लेकर सऊदी अरब जाते हैं तो सऊदी हुकूमत ने उन सारी किताबों को ज़ब्त कर लिया, ईरान के सफ़ीर ने मलिक फ़ैसल तक इस मौज़ू को पहुचाया, उसने भी सऊदी वज़ीरे दाखिला को हक़ीक़ते हाल की छान बीन का हुक्म सुनाया, जिसकी बेना पर वज़ीरे दाखिला ने हुक्म दिया कि तमाम किताबों की तहक़ीक़ की जाये, अगर उनमें कोई मुश्किल नही है तो उनके मालिकों को लौटा दी जायें, उस ज़माने में दमरदाश ऐक़ाली सरज़मीने हिजाज़ में थे, चुनाँचे उनसे उन किताबों की छान बीन की दरख़्वास्त की गई ताकि वह क़ानूनी हवाले से उन किताबों के बारे में अपना नज़रिया पेश करे, उन्होने उन किताबों के मुतालआ के बाद शिया मज़हब की हक़्कानियत का अंदाज़ा लगा लिया और उसी वक़्त से अहले बैत (अ) की राह पर क़दम बढ़ा दिया। (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 86 स् 87 ब नक़्ल अज़ सालेह अल विरदानी)

8.  अल्लामा डाक्टर मुहम्मद हसन शहाता

मौसूफ़ भी अल अज़हर युनिवर्सिटी के साबिक़ मुदर्रिस हैं उन्होने भी काफ़ी मुतालआ और तहक़ीक़ के बाद शिया असना अशरी मज़हब की हक़्क़ीनियत को समझ लिया है, चुनाँचे वह अपने ईरान के सफ़रे अहवाज़ में त़करीर करते हुए कहते हैं कि इमाम हुसैन (अ) की इश्क़ इस बात का सबब बना कि मैने अपने तमाम औहदा व मक़ाम को तर्क कर दिया।

इसके अलावा अपने एक औप बयान में कहते हैं कि अगर मुझ से सवाल किया जाये कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) को मशरिक़ या मग़रिब में तलाश किया जा सकता है तो मैं जवाब में कहूँगा कि इमाम हुसैन (अ) को मेरे दिल में देखा जा सकता है, ख़ुदा वंदे आलम ने हज़रत इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत का शरफ़ मुझे ईनायत किया है।

मौसूफ़ अपनी गुफ़्तुगू जारी रखते हुए कहते हैं कि 50 साल से हज़रत इमाम अली (अ) का शेफ़ता हूँ और सालों से हज़रत इमाम अली (अ) की विलायत के तवाफ़ से अपने अतराफ़ में नूर का हाला देख रहा हूँ। () जमहूरी इस्लामी अख़बार शुमारा 6771 से नक़्ल, अहवाज़ में मौसूफ़ की तक़रीर।

9. फ़िलिस्तीनी आलिम शेख मुहम्मद अब्दिल आल

मौसूफ़ भी मुद्दतों तहक़ीक़ और छानबीन के बाद शिया मज़हब की हक़्क़ानियत तक पहुच गये और उन्होने अहले बैत (अ) की इक्तेदा कर ली, मौसूफ़ अपने एक इंटरवीयू में कहते हैं: ''मैंने जिन किताबों को पढ़ा है उन में सबसे अहम अलमुराजेआत'' थी, जिससे मेरे ईमान में इज़ाफ़ा नही हुआ सिर्फ़ मेरी मालूमात में इज़ाफ़ा हुआ लेकिन जिस चीज़ ने मुझे अहले बैत (अ) की विलायत की तरफ़ रहनुमाई की वह यह है कि एक रोज़ फुटपाथ पर चहल क़दमी कर रहा था जब मैं अपने एक रिश्तेदार की दुकान पर पहुचा तो कुछ देर के लिये उनकी दुकान में बैठ गया, दुकान छोटी थी, कुछ देर बाद उन्होने अपने पोतों में से एक को बुलाया और कहा तुम मेरी जगह बैठ जाओ ताकि मैं नमाज़े अस्र अदा करने जाऊ, चुनाँचे मैने यह सुना तो फ़िक्र में डूब गया कि किस तरह एक शख्स अपनी छोटी सी दुकान को इतनी देर के लिये तंहा नही छोड़ता कि वह नमाज़ पढ़ ले औप अपनी जगह किसी को मुअय्यन करता है ताकि वह उसके सामान की हिफ़ाज़त करे तो फिर यह कैसे मुमकिन है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने अपनी उम्मत को बग़ैर किसी इमाम और जानशीन के छोड़ दिया हो, ख़ुदा की क़सम ऐसा हरगिज़ नही हो सकता।

जब उनसे सवाल किया गया कि क्या तुम अजनबी मुल्क लेबनान में ग़ुरबत और ख़ौफ़ व वहशत का अहसास नही करते हो तो उन्होने जवाब दिया हालाँकि तंहाई और ग़ुरबत के आसार संगीन होते हैं मगर मुझ पर उनका ज़रा सा भी असर नही है और हरगिज़ ख़ौफ़ व तंहाई को अहसास नही करता, क्योकि मेरे दिल में हज़रत अमीरूल मोमिनीन (अ) का कलाम महफ़ूज़ है कि आपने फ़रमाया,

हदीस

कभी भी राहे हक़ में अफ़रागद की कमी की वजह से ख़ौफ़ व वहशत न करो। (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 113)

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं लोग ख़ुद वख़ुद मज़हबे अहले बैत (अ) को कबूल करेगें, क्यो दीन फ़ितरी है लेकिन क्या करें कि यह दीन हुकूमतों के बुलंद जूतों के नीचे है।

इसी तरह जब मौसूफ़ से सवाल हुआ कि क्या विलायते अहले बैत (अ) के लिये किसी दलील की ज़रूरत हैतो उन्होने फ़रमाया हम इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि हर चीज़ के लिये किसी चीज़ की ज़रूरत है सिवाए अहले बैत (अ) की विलायत कि ख़ुद दलील उन हज़रात की मोहताज है। (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 117)

मौसूफ़ एक और मक़ाम पर फ़रमाते हैं जो शख्स ख़ान ए काबा का तवाफ़ करे, आलिम हो या जाहिल, इख़्तियारी हो या जबरी या उन दोनो के दरमियान की हालत हो, दर हक़ीक़त वह विलायत का तवाफ़ करता है, क्यो कि ख़ान ए काबा मज़हर है और उसमें पैदा होने वाला जौहर लिहाज़ा जो मज़हर का तवाफ़ करता है दर हक़ीक़त वह जौहर का तवाफ़ करता है। (अल मोतहव्विलून जिल्द 3 पेज 117)

10. फ़िलिस्तीनी मुजाहिद व रहबर मुहम्मद शह्हादा

मौसूफ़ ने इसराईली क़ैद की ज़िन्दगी में लेबनानी शियों से बहस व गुफ़तुगू और मुनाज़िरा करके शिया मज़हब के सही होने का अंदाज़ा लगा लिया और मज़हबे अहले बैत (अ) को कबूल करके फ़िलिस्तीनियों को अहले बैत (अ) कै मज़हब की तरफ़ दावत देने में मशग़ूल हो गये, हम यहाँ पर उनके लिये इंटरवीयू के बाज़ हिस्सों को नक़्ल करते हैं, चुनाँचे मौसूफ़ कहते हैं फ़िलिस्तीन को मुहम्मद (स) और अली (अ) की तरफ़ पलटना है, मैं दुनिया के आज़ादी ख़्वाह लोगों को आज़ादी ख़्वाह अफ़राद के इमाम व पेशवा हज़रत इमाम हुसैन (अ) की इक्तेदा और पैरवी की दावत देता हूँ।

नीज़ मौसूफ़ कहते है मैं पैगम्बरे अकरम (स) के अहलेबैत की मज़लूमियत के सिलसिले में बहुत ज़्यादा हमदर्दी रखता हूँ और अहसास करता हूँ कि हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) वाक़ेयन मज़लूम थे और जब भी फिलीस्तीन में ज़ुल्म व सितम और नाजायज़ कब्ज़े में इज़ाफ़ होता है तो इमाम अली (अ) की मज़लूमियत का अहसास मेरे दिल में बढ़ जाता है।

मैं चूँकि शियों के बारे में मालूमात नही रखता था जिसकी वजह से अपने उसी मज़हब पर बाक़ी रहा और उम्मीदवार हूँ कि मैं यह कहने वाला आख़री शख्स न हूँ सुम्मा ऐहतदयतो यानी फिर मैं हिदायत पा गया, मेरा शिया होने से उन सियासी मसायल का कोई ताअल्लुक़ नही है जो आज कल हमारे सामने मौजूद हैं, मैं भी दूसरे मुसलमानो की तरह जुनुबे लेबनान में कामयाबी और सरफ़राज़ी को अपने वुजूद में महसूस करता हूँ जिस इफ़्तिख़ार में सरे फ़हरिस्त हिज़्बुल्लाह लेबनान है लेकिन इसके यह मायना नही है कि मेरे शिया होने में सियासी मसायल बुनियादी सबब थे बल्कि अहले बैत (अ) के अक़ीदे को मेरे दिल कबूल किया और मैं किसी दूसरी चीज़ से मुताअस्सिर नही हूँ, अहले बैत (अ) का रास्ता हक़ है जिसको मैंने इख़्तियार किया है, मेरा शिया होना अक़ीदती लिहाज़ से है न कि सियासी लिहाज़ से, मैं बहुत जल्द ही फ़िलिस्तीन में शिया मज़हब फैलाने की कोशिश करूगा और इस सिलसिले में ख़ुदा वंदे आलम से दुआ करता हूँ कि इस काम में मेरी मदद करे।

इमामे ज़माना क़ायमे आले मुहम्मद (अ) की ज़ाते गिरामी हमारे लिये वाइसे ख़ैर व बरकत है जिसकी वजह से फ़िलिस्तीन में तहरीक आई है और हमारे दरमियान एक मख़सूस जोश व खरोश पैदा हो गया है कि नुसरत और कामयाबी को अपनी आँखों के सामने मुजस्सम देख रहे हैं और इमाम के ज़हूर का ज़माना नज़दीक देख रहे हैं इंशाअल्लाह मैं इमाम (अ) से बातिनी तौर पर राब्ता रखता हूँ और उनसे आहिस्ता आहिस्ता बातें करता हूँ, मैं उनसे चाहता हूँ कि इस हस्सास मौक़े पर हम पर मख़सूस तवज्जो फ़रमायें।

दुनिया भर के आज़ादी ख़्वाह लोग मख़सूसन मुसलमानों को उनके उनके इख़्तिलाफ़ात के वाबजूद नसीहत करता हूँ कि ज़ुल्म व सितम के ख़िलाफ़ हज़रत इमाम हुसैन (अ) के क़याम और आपकी तहरीक को अपने लिये सर मश्क़ क़रार दें और शैताने बुजुर्ग अमेरिका नीज़ इसराईल जो इस्लामी मुमालिक के दरमियान एक सरतानी ग़ुद्दा है, उसके ज़ुल्म के ख़िलाफ़ कभी भी ख़ामोशी इख्तियार न करें।

फिलिस्तीन में होने वाली कान्फ़ेरेन्सों और दीगर मुनअक़िद होने वाले जिन जलसात में मुझे त़करीर के लिये दावत दी जाती है हज़ारों लोगों के सामने अपनी तक़रीर के तमाम हिस्सों में सीरत अहले बैत (अ) को महवर क़रार देता हूँ और अहले बैत (अ) के सिलसिल में मेरी यह तक़रीरें फिलिस्तीनी मुआशरे में बहुत मक़बूल होती हैं, मैं इस तरीक़ ए कार को जारी रखूँगा यहाँ तक कि लोग इसकी क़दर पहचान लें और उन हज़रात की इक्तेदा करते हुए ख़ुदा वंदे आलम के इज़्न व मशीयत से कामयाबी से हम किनार हो जायें।

ख़ुदा वंदे आलम की इजाज़त से अपने मोमिन भाईयों के साथ मजहबे अहले बैत (अ) को बहुत जल्दी ही फ़िलिस्तीन में नश्र करूगा, यहाँ तक कि हज़रत इमाम मेहदी आले मुहम्मद (अ) ज़हूर फ़रमायें।

जिस वक़्त अल अज़हर युनिवर्सिटी मिस्र के सद्र ने तशय्यो के नश्र और उसके दिफ़ाअ पर ऐतेराज़ किया तो उसके जवाब में मैं मौसूफ़ ने कहा, मैं सिर्फ़ यही कहता हूँ ख़ुदावंदा मेरी क़ौम की हिदायत फ़रमा वह नही जानती, उसके बाद कहते हैं, मैंने जवाब में जो अलफ़ाज़ पर जारी किये वह यह कि मज़हबे शिया की निस्बत मेरी मालूमात इस बात की बाइस हुई कि मैं मज़हबे शिया इख़्तियार कर लूँ और मैं सिर्फ़ एक नुक्ते पर ताकीद करता हूँ कि दर हक़ीक़त यह शिईयत की निस्बत ला ईल्मी और जिहालत थी जिसने मुझे उस वक़्त तक अहले सुन्नत के मज़हब पर बाक़ी रखा लेकिन अब मैं हक़ व हक़्क़ानियत का ऐतेराफ़ करता हूँ।

(अल मोतहव्विलून जिल्द 1 पेज 462)

क़ारेईने कैराम, मज़हबे शिया की हक़्कानियत इस बात का सबब बनी कि बहुत से अहले सुन्नत या दूसरे अदयान व मज़ाहिब के मानने वाले इस मज़हब के दिलदादाह हा गये और पाक फ़ितरत इँसान और हकीक़त की तलाश करने वालों ने शिईयत की हक़्क़ानियत को देख कर इस मुक़द्दस मज़हब को अपना लिया।

यहाँ तक इस मुख़्तसर सी किताब में जो कुछ बयान हुआ है वह सिर्फ़ नमूने के तौर पर बयान हुआ है।

3.     दीनी मरजअ का इंतेख़ाब करना

मसअल ए इमामत के दो पहलू हैं, एक तारीख़ी और दूसरा दीनी पहलू, फ़र्ज़ करें कि इस मसअले का तारीख़ी ज़माना गुज़र गया है तो फिर भी दीनी पहलू के असर अब तक बाक़ी हैं और रोज़े क़यामत तक बाक़ी रहेगें, अगर इमामत व विलायत के सिलसिले में बहस करें तो उसका एक अहम हिस्सा यह है कि हमारा दीनी मरजा कौन है? क्या हम दीन और मआरिफ़ व तालिमाते इस्लामी को अबुल हसन अशअरी, इब्ने तिमिया जैसे लोगों से हासिल करें और फ़ुरूए दीन यानी शरई मसायल को चारो मज़हब के किसी एक इमाम से लें जैसा कि अहले सुन्नत और वहाबी लोग करते हैं या हम मासूम हज़रात की पैरवी करें कि जो अहले बैत (अ) के अलावा कोई नही हैं।

जिस चीज़ पर आयात व रिवायात बहुत ज़ोर देती हैं और शिया असना अशरी उस पर ताकीद करते हैं और वह यह कि चूँकि साहिबे रिसालत हज़रत पैग़म्बरे इस्लाम (स) को एक तवील ज़माना गुज़र गया है और मुसलमानों के मज़ाहिब में इख़्तिलाफ़े नज़र पाया जाता है, ऐसे मौक़े पर हर मुसलमान पर वाजिब है कि सुन्नते नबवी और दीनी तालिमात तक पहुचने के लिये ऐसे रास्ते को अपनायें जिस पर वह ख़ुद मुतमईन हो लिहाज़ा हज़रत अली (अ) को मक़ामे ख़िलाफ़त और विलायत पर मंसूब मानना सिर्फ़ यह कि पैग़म्बर अकरम (स) की वफ़ात के बाद इस्लामी हुकूमत और सियासी ऊमूर की शक्ल को दूर कर देता है उसके अलावा अपने दीनी मसायल और शरई अहकाम में इमाम अली (अ) को अपनी दीनी मुश्किलात में मरजअ क़रार देता है वह मुश्किलात जो पैग़म्बरे इस्लाम (स) की वफ़ात के बाद पैदा हुई या उनमें शिद्दत पैदा हुई, इसी वजह से हज़रत अली (अ) ने इस अहम मसअले पर ताकीद फ़रमाई और अहले बैते पैग़म्बर (स) की तौसीफ़ करते हुए लोगों से ख़िताब फ़रमाया:

1.      हदीस (नहजुल बलाग़ा, अबदहू, जिल्द 2 पेज 19)

तर्जुमा, ऐ लोगों कहाँ जा रहे हो, क्यो तुम हक़ से मुन्हरिफ़ हो रहे हो, हक़ का परचम क़ायम है और उसकी निशानियाँ वाज़ेह हैं, हालाँकि चराग़े हिदायत रास्ते को मुनव्वर किये हुए हैं लेकिन तुम गुमराहों की तरह किधर जा रहे हो, क्यो तुम सरगरदाँ व परेशान हो जबकि तुम्हारे पैग़म्बर (स) की इतरत और आपके अहले बैत तुम्हारे दरमियान मौजूद हैं वह हक़ के ज़ुमामदार, दीन के पेशवा और सिद्क़ की ज़बानें हैं।

2.      हदीस (नहजुल बलाग़ा, अबदहू, जिल्द 2 पेज 19)

तर्जुमा, ऐ लोगों अपने नबी के अहले बैत (अ) की तरफ़ नज़र करो और वह जिस तरफ़ कदम बढ़ायें तुम भी उनके नक़्शे क़दम पर चलो, वह तुम को हिदायत से बाहर और पस्ती व हलाकत में नही ले जायेगें अगर वह (किसी मसअले में) ख़ामोश रहें तो तुम भी ख़ामोश रहो और अगर वह क़याम करें तो तुम भी कय़ाम करो, उठ खड़े हो जाओ, लेकिन उनसे आगे आगे न चलो कि गुमराह हो जाओगे और उनसे पीछे भी न रह जाओ कि नीस्त व नाबूद हो जाओगे।

3.      हदीस (नहजुल बलाग़ा, अबदहू, जिल्द 1 पेज 278)

तर्जुमा, ऐ लोगों मैं अहले बैते पैग़म्बर, उनके जिस्म के लिबास की तरह, उनके हक़ीक़ी नासिर व मददगार, ख़ज़ानादारे ऊलूम, मआरिफ़े वहयी और उन मआरिफ़ में दाख़िल होने वाले दरवाज़े हैं, क्यो कि दरवाज़े के अलावा मकान में दाख़िल नही हुआ जा सकता और जो शख्स घर में दरवाज़े से दाख़िल न हो वह चोर कहलाता है।

4.      हदीस (नहजुल बलाग़ा, अबदहू, जिल्द 2 पेज 55)

तर्जुमा, कहाँ हैं वह लोग जो अपने को .......आयत गुमान करते हैं न कि हम को? कि उन्होने यह दावा ज़ुल्म व सितम और झूठ की बुनियाद पर हमारी ज़िद में किया है, ख़ुदावंदे आलम ने हम अहले बैत पैग़म्बर को बुलंद किया है और अपनी नेमतों के हरम में दाख़िल किया और उन (झूठा दावा करने वालो) को बाहर किया है, हमारी रहनुमाई के ज़रिये राहे हिदायत को तय करते हैं और कोर दिल हमारी रौशनी को तलाश करते फिर रहे हैं।

5.      हदीस (नहजुल बलाग़ा अबदहू जिल्द 5 पेज 362)

तर्जुमा बेशक मैं तुम्हारे दरमियान तारिकी चमकते हुए चिराग़ की तरह हूँ लिहाज़ा जो उस नूर की तरफ़ आये वह उस नूर से फ़ैज़याब हो जायेगा।

6.      हदीस (नहजुल बलाग़ा सुबही सालेह खुतवा 147)

तर्जुमा वह (अहले बैते पैग़म्बर) इल्म की हयात और जिहालत की मौत को राज़ है, उनका हिल्म उनके इल्म का, उनका ज़ाहिर उनके बातिन का और उनकी ख़ामोशी उनकी मंति़क़ की ख़बर देता है, वह न तो दीने ख़ुदा की मुख़ालिफ़त करतें हैं और न ही उसमें इख़्तिलाफ़ करते हैं।

5. इंसानी ज़िन्दगी पर ग़दीर का असर

हर दीन का एक इम्तियाज़ होता है कि इंसान के लिये बुलंद मक़सद पेश करता है और जब उस तक पहुचने के लिये एक रास्ता मुअय्यन करना चाहता है तो उसके लिये एक नमूना और आईडियल भी मुअय्यन करता है ताकि उसकी अमली सीरत को मद्दे नज़र रखते हुए उसकी पैरवी करते हुए इंसान बेहतर तौर पर मंज़िले मक़सूद तक पहुच जाये क्यो कि माहिरे नफ़सीयात के मुताबिक़ भी बेहतरीन नमूने के ज़रिये इंसान को हक़ व हक़ीक़त की तरफ़ बेहतर तौर पर रहनुमाई की जा सकती है।

ख़ुदा वंदे आलम ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) को मुसलमानों के लिये बेहतरीन नमूना क़रार देते हुए फ़रमाया:

आयत (सूरह अहज़ाब आयत 21)

तर्जुमा, मुसलमानों बेशक तुम्हारे लिये रसूल की ज़िन्दगी में बेहतरीन नमून ए अमल है।

मालूम होना चाहिये कि पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद ऐसे मवाक़े पेश आये जो आँ हज़रत (स) की ज़िन्दगी में पेश न आये थे ताकि आँ हज़रत (स) को उन मौक़ा व महल पर नमूना क़रार दिया जा सके, जिनमें से इमाम हुसैन (अ) के ज़माने में पेश आने वाला वाक़ेया है कि इस्लाम के नाम पर लेकिन इस्लाम का मुखालिफ़ यज़ीद इस्लामी मुमालिक का मालिक बन गया, इस मौक़े पर क़यामत तक के लिये इंसानी मुआशरे के लिये बेहतरीन नमूना पेश करने वाले हज़रते इमाम हुसैन (अ) हैंस जबकि अहले सुन्नत के पास ऐसा कोई नमून ए अमल नही है।

पैग़म्बरे अकरम (स) की वफ़ात के बाद इमामत व ख़िलाफ़त की बहस अगरचे एक लिहाज़ से तारीख़ी बहस है लेकिन यही सदरे इस्लाम की तारीख़ है जो इंसान की क़िस्मत को सँवारती है, आँ हज़रत (स) की वफ़ात के बाद इमाम की बहस दर हक़ीक़त उस मौज़ू की बहस है कि इमाम में इमामत करने की सलाहियत और क़ाबिलियत होना चाहिये और इमाम को ख़ुदावंदे आलम की तरफ़ से मंसूब होना चाहिये, यह बहस करना कि पैग़म्बर अकरम (स) के बाद इमाम कौन होना चाहियेदर हक़ीक़त बहस यह है कि इस्लामी मुआशरे बल्कि तमाम बशरियत के लिये क़यामत तक कौन नमूना क़रार पाये? क्या अली (अ) की तरह कोई नमूना है जिस में तमाम बेहतरीन सिफ़ात जमा हैं और जो शुजाअत, अदालत, सख़ावत, इबादत, ज़ोहद व तक़वा, इंकेसारी और दीगर सिफ़ात में बेनज़ीर हो या बाज़ वह लोग जो जंग व शुजाअत में कोई मक़ाम न रखते हों, उम्मते इस्लामिया सदरे इस्लाम के बुज़ुर्गों में किसी कामिल और जामेअ नमूने की मोहताज है जो रोज़े क़यामत तक के लोगों के लिये बाईसे तहरीक हो और लोग उनके हालात, फ़ज़ायल और कमालात को देखने के बाद उनको नमूना क़रार दें और हक़ व हक़ीक़त से नज़दीक हो जायें।

क्या ऐसा नही है कि महात्मा गाँधी हिन्दुस्तान में अंग्रज़ों के ख़िलाफ़ ऐलाने जंग में नमूना और आईडियल क़रार पाये? क्या बच्चों की किताबों में फ़िदाकार देहाती को ईसार व फ़िदाकारी का नमूना नही बयान किया जाता ताकि बच्चे शुरु से ही अपने ज़हनों में उस नौजवान की तसवीर कशी के ज़रिये ईसार व फ़िदाकारी का सबक़ लें तो फिर उम्मते इस्लामिया क्यो सोई हुई है जबकि इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने उनके शहरों और मुल्कों पर क़ब्ज़ा कर लिया है और उन पर ग़लबा हासिल किये हुए और उनके दीन और माल व दौलत को ग़ारत कर रहे हैं? क्या ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद नही फ़रमाता है:

आयत (सूरह निसा आयत 141)

और ख़ुदा वंदे आलम कुफ़्फ़ार के लिये साहिबाने ईमान के ख़िलाफ़ कोई राह नही दे सकता।

क्या पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने नही फ़रमाया है:

हदीस (बिहारूल अनवार जिल्द 39 पेज 44, कंज़ुल उम्माल जिल्द 1 पेज 166 हदीस 246)

तर्जुमा इस्लाम, हर दीन पर बरतरी रखता है और कोई भी दीन उस पर बरतरी नही रखता।

तो फिर मुसलमान, इसतेमार की ग़ुलामी क्यो कर रहे हैं, यहाँ तक कि दूसरे इस्लामी मुल्कों से सबक़त ले रहे हैं? क्यो एक इस्लामी मुल्क इस्तेमार की अच्छी ख़िदमत की वजह से एक इस्लामी मुल्क पर कब्ज़े करने के ईनाम में क़ब्ज़ा करने वालों को इफ़्तेख़ार का तमग़ा दे रहा है? हम क्यो सोए हुए हैं? और क्यों ग़ाफ़िल हैं? क्यो ताजिकिस्तान की क़ौम दो लाख शहीद देने और बीस लाख बेघर होने के बाद भी कामयाब न हो सकी लेकिन ईरानी क़ौम ने एक साल में बहुत कम शहीद देकर 2500 साला ताग़ूती हुकुमत को तख़्ता पलट दिया, उसका राज़ सिर्फ़ हज़रत अली (अ) और इमाम हुसैन (अ) जैसे नमूने हैं, कौन सा मुल्क है जो अपनी कामयाबी की इब्तेदाई ज़माने से इस्तेमार व इस्तिकबार की तरफ़ से थोपी गई जंग में आठ साल तक लड़ने के बाद सरफ़राज़ रहे? क्या यह इमाम हुसैन (अ) और अहले बैत (अ) को नमून ए अमल क़रार देने के अलावा किसी और चीज़ का नतीजा है और क्या हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास (अ) को नमून ए अमल क़रार देने के अलावा कोई और चीज़ है? यह मेरे अलफ़ाज़ नही है कि मैं एक शिया हूँ बल्कि यह दावा बहुत से इस्लामी मुल्कों की सियासी और इंक़ेलाबी शख्सियतों ने किया है जो अपनी उम्मत की बे हिसी से रंजीदा हैं, अफ़सोस के साथ हमने फ़िलिस्तीन के वाके़या को देखा है और देख रहे हैं कि बाज़ इस्लामा मुल्कों ने ज़रा भी रद्दे अमल भी ज़ाहिर नही किया यहाँ तक कि एक मुज़ाहिरे की हद तक भी नही जो ख़ुद उनके नफ़े में था, क्यो कि इसराईल तमाम इस्लामी मुल्कों पर नज़र जमाये हुए हैं लेकिन गोया फ़िलिस्तीन क़ौम के लिये कोई हादिसा पेश नही आया, जो ख़ुद उनकी तरह इंसान और उनके ही दीन से हैं, वह इस परिन्दे की तरह बने बैठे हैं जो अपने आशियाने में सर छुपाये बैठा है और शिकारी को नही देख रहा है और कहता है कि दुश्मन नही है यह लोग ऐश व इशऱत में मशग़ूल हैं लेकिन ग़फ़लत की वजह से अचानक दुश्मन उनके सर पर मुतल्लत हो जाता है और सबको शिकार कर लेता है और उनको नीस्त व नाबूद कर देता है।

लेकिन शिया असना अशरी मुसलमान शंहनशाही हुकुमत पर कामयाबी के बावजूद तमाम इस्लामी अक़वाम की फ़िक्र में हैं, फ़िलिस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, चेचेन और इराक़ से लेकर बोस्निया और दूसरे अक़वाम तक तमाम मुसलमान अक़वाम को हर मुमकिन तरीक़े से मदद पहुचाने की कोशिश में हैं, अगरचे ईरान इस राह में बहुत भारी क़ीमत भी अदा कर चुका है, यह सब कुछ नही है मगर इस वजह से कि शिया असना अशरी अपने लिये कुछ नमूने रखते हैं, जिन्होने तारीख़ के आख़िर तक के लिये यादगार दर्स छोड़ें हैं, शिया इमाम अली (अ) जैसे नमूने रखते हैं और ऐतेक़ाद रखते हैं कि अगर इंसान एक यहूदी औरत के पैर से पाज़ेब चोरी करने पर मर जाये तो उसके लिये मुनासिब है, शिया हुसैन (अ) की तरह नमूने रखते हैं जो फ़रमाते हैं अरबी हम ज़िल्लत को बर्दाशत नही कर सकते और जो फ़रमाते हैं सुर्ख़ मौत (यानी शहादत) ज़िल्लत की मौत से बेहतर है, जो इस बात पर अक़ीदा रखते हैं कि अम्र बिल मारूफ़ और नहयी अनिल मुन्कर के लिये कभी जान भी दी जा सकती है।

इस ज़माने में इमामत की बहस दर हक़ीक़त नमूने की बहस है, इमामत की बहस दर हक़ीक़त हर पहलू में नमून ए अमल की बहस है। इबादत का पहलू हो या घरेलू ज़िन्दगी, ज़ाती ज़िम्मेदारियो की बात हो या मुआशेरती उमूर का मसला, ख़ुलासा हमारे पास हर पहलू में नमूने मौजूद हैं और यही नमूने है जो इंसान की आईन्दा ज़िन्दगी की तसवीर कशी करते हैं और ज़िन्दगी के सफ़हात को खोलते हैं, जो बच्चा बचपन से (अरबी) की पट्टी सर पर बाँधता है और इमाम हुसैन (अ) की मजलिस में शिरकत करता है और इमाम हुसैन (अ) को अपने लिये नमून ए अमल क़रार देता है  तो ऐसा बच्चा बड़ा होकर कभी भी ज़िल्लत व रुसवाई को क़बूल नही कर सकता, जैसा कि उसके आक़ा व मौला हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने किया है, इंसान नमूने को अपना नसबुल ऐन क़रार देता है ताकि उसकी इक्तेदा करते हुए उसके नज़दीक हो जाये, उसकी नज़दीकी से ख़ुदा वंदे आलम की क़ुरबत हासिल होती है लिहाज़ा कितना अच्छा हो कि इंसान अपने लिये बेहतरीन नमूने का इंतेख़ाब किया जाये, वह जिन्होने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कोई भी गुनाह न किया हो और कभी किसी ग़लती और ख़ता के मुरतकिब न हुए हों, यह हक़ीक़ी इमाम की ज़ात होती है जो हक़ को बातिल से, नेक को बद से और मुफ़ीद को नुक़सान देह से अलग कर देती है, अगर मैं हुसैन इब्ने अली (अ) को पैरव हूँ तो फिर फ़ासिक़ व फाजिर हाकिम की बैअत के लिये हाथ नही बढ़ाऊगा लेकिन अब्दुल्लाह इब्ने उमर जैसे शख़्स की पैरवी करू तो फिर तारीख़ की मशहूर व मारूफ़ ख़ुनख्वार हुज्जाज बिन युसुफ़े सक़फ़ी के हाथों बैअत करूँगा, जैसा कि अहमद बिन हंबल ने अब्दुल्लाह बिन उमर को नमूना क़रार देते हुए मुतवक्किल की बैअत की, यह इमामत ही तो है जो मेयार और शेआर को मुअय्यन करती है लिहाज़ा इमामत और ग़दीर की बहस सिर्फ़ एक तारीख़ी और बेफ़ायदा नही है बल्कि एक ताज़ा बहस है, एक ज़िन्दा बहस है जिससे इस्लामी मुआशरा बल्कि बशरियत की हयात वाबस्ता है, इमामत उस चीज़ का नाम है जो इंसान की रूह और उसकी हक़ीक़त से राब्ता रखती है, इमामत इंसान के रास्ते को वाज़ेह करती है, इमामत इंसान की दुनिया व आख़िरत से राब्ता रखती है, इमामत उस हक़ीक़त को कहते हैं जो इंसान की ज़िन्दगी में क़दम क़दम पर मुवस्सिर वाक़े होती है।

दलील व बुरहान के साथ मज़हब का इंतेख़ाब

क्या हम में से हर शख्स ने अपने मज़हब को दलील व बुरहान और तहक़ीक़ के साथ इंतेख़ाब किया है, या हमको यह मज़हब मीरास में मिल गया है। क्यो कि हमारे माँ बाप इस मज़हब पर अक़ीदा रखते थे लिहाज़ा हम भी उसी मज़हब पर हैं? क्या इमामत उन्ही ऐतेक़ादी उसूल में से नही है जिन पर हमारे पास दलील होनी चाहिये? किन वुजुहात की बिना पर हम ने यह मज़हव क़बूल किया है? क्या वह असबाब क़ुरआनी, हदीसी या अक़ली है या वह असबाब नस्ल परस्ती है जिसकी कोई अस्ल व बुनियाद नही होती? किस दलील की वजह से दूसरे मज़ाहिब हमारे मज़हब से अफ़ज़सल नही हैं? क्या कल मैं अपने इन ऐतेक़ाद का ज़िम्मेदार नही हूँ? यह ऐसे सवालात है जो हर इंसान के ज़हन में पैदा हो सकते हैं और उनके जवाबात भी उसी को देना है, उनका जवाब इमामत की बहस के अलावा कुछ नही हो सकता। क्यो कि तमाम ही मज़ाहिब का महवर मसअल ए इमामत है।

अंधी तक़लीद

तक़लीद अगरचे बाज़ मका़मात पर सही और क़ाबिले तारीफ़ है जैसे शरई मसायल में जाहिल का किसी आलिम की तक़लीद करना, लेकिन यही तक़लीद बाज़ दूसरे मवाक़े पर सही नही है जिसकी शरीयत और अक़्ल ने मज़म्मत की है मसलन जाहिल का किसी दूसरे जाहिल की तक़लीद करना या किसी आलिम का किसी दूसरे आलिम की तक़लीद करना जबकि वह ख़ुद उसके बरखिलाफ़ नतीजे पर पहुच चुका हो लिहाज़ा क़ुरआने करीम मे इरशाद होता है

आयत (सूरह मायदा आयत 140)

तर्जुमा, और जब उनसे कहा जाता है कि ख़ुदा के नाज़िल किये अहकाम और उसके रसूल की तरफ़ आओ तो कहते हैं हमारे लिये वही काफ़ी है जिस पर हमने अपने आबा व अजदाद को पाया है चाहे उनके आबा व अजदाद न कुछ समझते हों और न किसी तरह की हिदायत रखते हों।

नीज़ क़ुरआने करीम में एक दूसरी जगह पर इरशाद होता है:

आयत (सूरह ज़ुख़रुफ़ आयत 23)

तर्जुमा, और इसी तरह हमने आपसे पहले की बस्ती में कोई पैग़म्बर नही भेजा मगर यह कि इस बस्ती के ख़ुशहाल लोगों ने यह कह दिया कि हमने अपने बाप दादा को इस तरीक़े पर पाया है और हम उनही के नक्शे क़दम की पैरवी करने वाले हैं।

नीज़ दूसरी जगह पर इसी तरह इरशाद होता है:

आयत (सूरह अहज़ाब आयत 66-68)

तर्जुमा, जिस दिन उनके चेहरे जहन्नम की तरफ़ मोड़ दिये जायेगें और यह कहेगें कि ऐ काश हमने अल्लाह और रसूल की इताअत की होती और कहेगें कि हमने अपने सरदारों और बुज़ुर्गों की इताअत की तो उन्होने रास्ते से बहका दिया। परवरदिगार, अब उन पर दोहरा अजाब नाज़िल कर और उन पर बहुत बड़ी लानत कर।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने फ़रमाया:

ऐसी उम्मत न बनो जो यह कहे कि अगर लोगों ने नेक काम किया तो हम भी करेगें और अगर लोगों ने ज़ुल्म किया तो हम भी करेंगें लिहाज़ा तुम अपने आप को तैयार कर लो कि अगर लोगों ने नेक काम किये तो तुम भी ऐसे ही नेक काम करो और अगर उन्होने बुरे काम अंजाम दिये तो तुम अँजाम न दो। (अत्त तरतीब वत्त तरग़ीब जिल्द 3 पेज 341)

7.     फ़िरका ए नाजिया कौन सा फ़िरक़ा हैं

हज़रत रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया:

अरबी (सुनने इब्ने माजा जिल्द 2 पेज 1322 हदीस 3992, सुनने तिरमिज़ी जिल्द 4 पेज 134, हदीस 2778)

यहूदी इकहत्तर फ़िरक़ों में बट गये जिनमें से सिर्फ़ एक फ़िरक़ा नाजिया (निजात पाने वाला) है और सत्तर फ़िरक़े आतिशे जहन्नम में जायेगें, इसी तरह नसारा भी बहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो गये, उनमें से इकहत्तर फ़िरक़े जहन्नम में जायेगें और एक फ़िरक़ा जन्नत में जायेगा, क़सम उस परवरदिगार की जिसके क़ब्ज़ ए क़ुदरत में मुहम्मद (स) की जान है मेरी उम्मत भी तिहत्तर फ़िरक़ों में तक़सीम हो जायेगी, जिनमे से एक फ़िरक़ा जन्नत में जायेगा बाक़ी बहत्तर फ़िरक़े आतिशे जहन्नम में जलेगें।

कारेईने केराम, हम इस बात को जानते हैं कि सबसे बड़ा इख़्तिलाफ़ इमामत के मसअले में है और इसी मसअले की वजह से इस्लामी मुआशरे में मुख़्तिफ़ फ़िरक़े बन गये लिहाज़ा फ़िरक़ ए नाजिया में शामिल होने के लिये ज़रूरी है कि इस्लामी मुआशरे की इमामत व रहबरी के सिलसिले में बहस करें।