उन कपड़ों का बयान जिनका पहनना हराम है



बाब 2

उन कपड़ों का बयान जिनका पहनना हराम है

 

मर्दों के लिये ख़ालिस रेशम के और ज़रतार (चमकीले तारों वाले) कपड़े पहनने हराम हैं और ऐहतियात इस में हैं कि टोपी और जेब वग़ैरह (यानी वह लिबास जो शर्मगाह छुपाने के लिये इस्तेमाल नही होता) भी हरीर (रेशमी) कपड़े का न हो और ऐहतियात यह चाहती है कि अजज़ा ए लिबास जैसे सन्जाफ़ (झालर, गोट) और मग़ज़ी (कोर पतली गोट) भी ख़ालिस रेशम की न हो और बेहतर यह है कि रेशम के साथ जो चीज़ मिली हुई हो वह मिस्ल कतान (एक क़िस्म का कपड़ा) या ऊन या सूत वग़ैरा के हो और उस की मिक़दार कम हो, यह भी ज़रुरी है कि मुर्दा जानवर की खाल का इस्तेमाल न हो चाहे उस की बग़ावत हो गई हो। यही उलमा में मशहूर है नीज़ उन हैवानात का पोस्त न होना चाहिये जिन पर तज़किया जारी नही होता जैसो कुत्ता वग़ैरह और जिन हैवानात का गोश्त हराम है मुनासिब है कि उन की खाल और बाल और ऊन और सींग और दांत वग़ैरह कुल अजज़ा (हिस्से) नमाज़ के वक़्त से इस्तेमाल न हों। समूर (लोमड़ी की तरह का एक जानवर जिस की खाल से लिबाल बनाया जाता है जिसे समूर कहते हैं।), संजाब (एक तरह का सहराई जानवर है जिस की खाल से कपड़ा बनाते हैं।) और ख़ज़ (एक क़िस्म का दरियाई चौपाया है।) के बारे में इख़्तिलाफ़ है और एहतियात इस में हैं कि इज्तेनाब करे गो बिना बर अज़हर संजाब व ख़ज़ में नमाज़ जायज़ है। बेहतर यह है कि जो कपड़े हराम जानवरों के ऊन के कपड़ों के ऊपर या नीचे भी पहने हों उन में भी नमाज़ न पढ़े कि शायद उन में बाल चिपक कर रहे गये हों।

नाबालिग़ बच्चे के वली यानी मालिक के लिये मुनासिब है कि उन को तला व हरीर पहनने से मना करे क्यों कि बसनद मोतबर जनाबे रिसालत मआब (स) से मंक़ूल है कि आप ने हज़रत अली से फ़रमाया ऐ अली, सोने की अंगूठी हाथ में न पहना करो कि वह बहिश्त में तुम्हारी ज़ीनत होगी और जाम ए हरीर न पहनना कि वह बहिश्त में तुम्हारा लिबार होगा।

दूसरी हदीस में फ़रमाया कि जाम ए हरीर न पहनो किहक़ तआला क़यामत के दिन उस के सबब जिल्द (खाल) को आतिशे जहन्नम में जलायेगा।

लोगों ने हजरत इमाम जाफरे सादिक़ (अ) से दरयाफ़्त किया कि क्या यह जायज़ है कि हम अपने अहल व अयाल (बीवी बच्चों) को सोना पहनायें? इरशाद फ़रमाया हां। अपनी औरतों और लौडियों को पहनाओ मगर नाबालिग़ लड़कों को न पहलाओ।

दूसरी हदीस में वारिद है कि आँ हज़रत ने फ़रमाया मेरे वालिद हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) अपने बच्चों और औरतों को सोने चांदी के ज़ेवर पहनाते थे और उस में कोई हरज नही है।

मुमकिन है किइस हदीस में बच्चों से मुराद बेटियां हों और यह भी हो सकता है कि नाबालिग़ लड़के भी इसमें शामिल हों मगर ऐहतेयाते यह है कि लड़कों को सोने को ज़ेवर न पहनायें।

 

तीसरा बाब

रूई, ऊन और कतान के कपड़े पहनने के बयान में

सब कपड़ो में अच्छा कपड़ा सूती है मगर ऊनी कपड़े को बारह महीने पहनना और अपनी आदत बना लेना मकरूह है। हाँ कभी कभी न होने के सबब से या सर्दी दूर करने की ग़रज़ से पहनना बुरा नही है चुनांचे बसनदे मोतबर हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि रूई का कपड़ा पहनो कि वह जनाबे रसूले ख़ुदा और हम अहले बैत की पोशिश हैं और हज़रत रसूले ख़ुदा (स) बग़ैर किसी ज़रुरत के ऊनी कपड़ा नही पहनते थे।

दूसरी हदीस में हज़रते इमाम सादिक़ (अ) से मंक़ूल है कि ऊनी कपड़ा बे ज़रुरत नही पहनना चाहिये।

दूसरी रिवायत में हुसैन बिन कसीर से मंक़ूल है वह कहता है कि मैंने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को देखा कि मोटा कपड़ा पहने हुए हैं और उस के ऊपर ऊनी कपड़ा, मैंने अर्ज़ की क़ुरबान हो जाऊँ क्या आप लोग पशमीने का कपड़ा पहनना मकरुह जानते थे? हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि मेरे वारिद और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ऊनी कपड़ा पहना करते थे मगर जब नमाज़ के लिये खडे होते तो मोटा सूती कपड़ा पहने होते थे और हम भी ऐसा ही करते हैं।

मंक़ूल है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया पाँच चीज़ें मरत वक़्त तक मैं तर्क नही करूंगा, अव्वल ज़मीन पर बैठ कर ग़ुलामों के साथ खाना खाना, दूसरा क़ातिर पर बेझूल के सवार होना, तीसरे बकरी को अपने हाथ से दुहना, चौछे बच्चों को सलाम करना, पांचवें ऊनी कपड़े पहनना।

इन सब हदीसों का ख़ुलासा और जमा करने का तरीक़ा यह है कि अगर मोमिनीन शाल और पशमीने को अपना शिआर (आदत) क़रार दें और इस कपड़े के पहनने का सबब अगर यह हो कि वह औरों से मुमताज़ रहें तो यह क़ाबिले मज़म्मत है। हां, अगर क़नाअत या ग़रीबी की वजह से या सर्दी दूर करने के लिये ऊनी कपड़ा पहनें तो कोई हरज नही है, और मेरे इस क़ौल की ताईद उस हदीस से होती है जो हज़रते अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी से मंक़ूल है कि हज़रते रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया कि आख़िरे ज़माना में एक गिरोह ऐसा पैदा होगा जो जाड़े और गर्मी में पशमीना ही पहन करेगें और यह गुमान करेगें कि इस कपड़ों की वजह से हमें औरों पर बरतरी और रूतबा हासिल हो मगर इस गिरोह पर आसमान और ज़मीन के फ़रिश्ते लानत करेगें।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि जाम ए कतान पैग़म्बरों की पोशिश है।

हज़रते इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) स मंक़ूल है कि कतान पहनने से बदन फ़रबा होता है।

दूसरी हदीस में आया है कि हज़रत अली बिन हुसैन (अ) जाम ए ख़ज़ हजार या पांच सौ दिरहम का ख़रीदते थे और जाड़े में उसे पहनते थे जब जाड़ा ख़त्म हो जाता था तो उसे बेच कर क़ीमत को सदक़े में निकाल देते थे।