लिबास के आदाब और आरास्तगी ए लिबास की फ़ज़ीलत



पहला बाब

लिबास के आदाब और आरास्तगी ए लिबास की फ़ज़ीलत

 

अकसर मोतबर हदीसों से साबित है कि अपने मुनासिबे हाल नफ़ीस और उम्दा लिबास, जो हलाल कमाई से मिला हो पहनना सुन्नते पैग़म्बर (स) और ख़ुदा की ख़ुशनूदी हासिल करने का सबब है और अगर तरीक़ ए हलाल से मयस्सर न हो तो जो मिल जाये उस पर क़नाअत कर ले। यह न हो कि तरह तरह के लिबास हासिल करने की फ़िक्र इबादते ख़ुदा में हरज पैदा करने लगे अगर हक़ तआला किसी की रोज़ी में इज़ाफ़ा करे तो मुनासिब है कि उसके मुताबिक़ खाये, पहने, ख़र्च करे और बरादराने ईमानी के साथ मेहरबानी करे और जिस की रोज़ी तंग हो उसे लाज़िम है कि क़नाअत करे और अपने आप को हराम और वह चीज़ें जिन के जायज़ होने का यक़ीन नही है उन से परहेज़ करे।

मोतबर हदीस में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से नक़्ल है कि ख़ुदा वंदे आलम अपने किसी बंदे को नेमत अता फ़रमाए और उस नेमत का असर उस पर ज़ाहिर हो तो उस को ख़ुदा का दोस्त कहेगें और उस का हिसाब अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करने वालों में होगा और अगर उस पर कोई असर ज़ाहिर न हो तो उसे दुश्मने ख़ुदा कहेगें और उस की हिसाब क़ुफ़राने नेमत करने वालों में होगा।

दूसरी हदीस में आप से नक़्ल किया गया है कि जब अल्लाह तआला किसी बंदे को नेमत अता फ़रमाए तो वह इस बात को दोस्त रखता है कि उसे नेमत का असर उस बंदे पर ज़ाहिर हो और वह (अल्लाह) देखे।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से नक़्ल है कि मोमिन के लिये ज़रूरी है कि वह अपने बरादरानी ईमानी के लिये ऐसी ही ज़ीनत करे जैसी उस बैगाने के लिये करता है जो चाहता हो कि उस शख़्स को उम्दा तरीन लिबास में अच्छी शक्ल या सरापे में देखे।

बसनदे मोतबर साबित है कि हज़रते अली बिन मूसा रेज़ा (अ) गर्मी के मौसम में बोरिये पर बैठा करते थे और जाड़े में टाट पर और जब घर में होते तो मोटे झोटे कपड़े पहना करते थे  मगर जब बाहर जाते तो अल्लाह की नेमत के इज़हार के लिये ज़ीनत फ़रमाते थे यानी अच्छा लिबास पहनते थे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ) से नक़्ल है कि हक़ तआला ज़ीनत और नेमत के ज़ाहिर करने को दोस्त रखता है और ज़ीनत के तर्क करने और बदहाली के इज़हार को दुश्मन और इस बात को पसंद करता है कि अपने नेमत का असर अपने बंदे इस तरह देखे कि वह नफ़ीस (अच्छी) पोशाक पहने, ख़ुशबू लगाये, मकान को आरास्ता रखे, घर का सेहन कूड़े करकट से साफ़ रखे और सूरज डूबने से पहले चिराग़ रौशन कर दे कि इससे पैसों की कमी मिटती है और रोज़ी बढ़ती है।

हज़रते अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि हक़ तआला ने एक ऐसी गिरोह भी पैदा किया है जिन पर अपनी ख़ास शफ़क़त (मेहरबानी) की वजह से रोज़ी तंग कर दी है और दुनिया की मुहब्बत उन के दिलों से उठा ली है वह लोग उस आख़िरत की तरफ़ जिस की तरफ़ ख़ुदा ने उन को बुलाया है, मुतवज्जे हैं और पैसों की कमी और दुनिया की मकरुह बातों पर सब्र करते हैं और न मिटने वाली नेमत अल्लाह ने उन के लिये तैयार की है उसका इश्तेयाक़ रखते हैं उन्होने अपनी जान ख़ुदा की मरज़ी हासिल करने के लिये दे डाली है उन का अंजाम शहादत है जब वह आलमे आख़िरत में पहुचेगें तो हक़ तआला उन से ख़ुश होगा और जब तक इस आलम में हैं जानते हैं कि एक दिन सब को मौत आना है इस लिये सिर्फ़ आख़िरत के लिये इंतेज़ाम करते रहते हैं, सोना चांदी जमा नही करते, मोटा झोटा कपड़ा पहनते हैं, थोड़ा खाने पर क़नाआत करते हैं और जा कुछ बचता है वह ख़ुदा की राह में दे डालते हैं कि यह अमल उन के लिये आख़िरत में काम आये, वह नेक लोगों के साथ ख़ुदा के लिये दोस्ती रखते हैं और बुरे लोगों के साथ ख़ुदा की मुहब्बत में दुश्मनी रखते हैं वह हिदायत के रास्ते के चिराग़ और आख़िरत में मिलने वाली नेमतों से मालामाल हैं।

युसुफ़ बिन इब्राहीम से रिवायत है कि मैं हज़रत अबी अब्दिल्लाह (अ) की ख़िदमत में जाम ए ख़ज़ पहन कर गया और अर्ज़ की कि हज़रत जामा ए ख़ज़ के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं? हज़रत ने फ़रमाया कोई हरज नही है क्यों कि जिस वक़्त हज़रते इमाम हुसैन (अ) शहीद हुए जाम ए ख़ज़ ही पहने हुए थे और जिस वक्त जनाबे अमीर (अ) ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास को ख़वारिजे नहरवान से गुफ़्तगू के भेजा तो वह उम्दा से उम्दा पोशाक पहने हुए थे  और आला दरजे की खुशबू से मुअतत्तर थे और अच्छे से अच्छे घोड़े पर सवार थे जब ख़वारिज के बराबर पहुचे तो उन्होने कहा कि तुम तो बहुत नेक आदमी हो फिर यह ज़ालिमों का सा लिबास क्यों पहने हो?  और ऐसे घोड़े पर क्यों सवार हो? आप ने यह आयत पढ़ी कुल मन हर्रमा ज़ीनतल लाहिल लती अखरज ले इबादे वत तय्यबाते मिनर रिज़्क। (कह दो कि अल्लाह ने हराम की है वह ज़ीनत जो उस की इताअत से रोके औप पाक है वह रिज़्क़ जो अल्लाह ने अपने बंदों के लिये ज़मीन से पैदा किया है।) आँ हज़रत (स) ने इरशाद फ़रमाया है कि उम्दा कपड़ा पहनो और ज़ीनत करो क्यों कि यह अल्लाह को पसंद है और वह ज़ेबाइश (सजावट) को दोस्त रखता है मगर यह ज़रुरी है कि वह हलाल की वजह से हो।

मोतबर हदीस में वारिद हुआ है कि सुफ़याने सूरी जो सूफ़ी शेखों में से है मस्जिदुल हराम में आया और जनाबे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) को देखा कि क़ीमती कपड़े पहुने हुए बैठे हैं तो अपने दोस्तों से कहने लगा वल्लाह मैं उन के पास जाकर इस लिबास के बारे में उन्हे सरज़निश (मना) करता हूँ यह कहता हुआ आगे बढ़ा और क़रीब पहुच कर बोला: ऐ फ़रज़ंदे रसूले ख़ुदा, ख़ुदा की क़सम न कभी प़ैग़म्बरे ख़ुदा (स) ने ऐसे कपड़े पहने और न आप के आबा व अजदाद (बाप-दादा) में से किसी ने, हज़रत ने फ़रमाया कि जनाबे रसूले ख़ुदा के ज़माने में लोग तंगदस्त थे यह ज़माना दौलतमंदी का है और नेक लोग ख़ुदा की नेमतों के सर्फ़ (ख़र्च) करने में ज़्यादा हक़दार हैं और उसके बाद वही आयत जिस का अभी ज़िक्र हो चुका है तिलावत फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया कि जो अतिया ख़ुदा का है गो उस के सर्फ़ करने में सब से ज़्यादा हक़दार हम हैं मगर ऐ सूरी, यह लिबास जो तू देखता है मैं ने फ़क़त इज़्ज़ते दुनिया के लिये पहन रखा है फिर उस कपड़े का दामन उठा कर उसे दिखाया कि नीचे वैसे ही मोटे कपड़े थे और इरशाद फ़रमाया कि यह मोटे कपड़े मेरे नफ़्स के लिये हैं और यह नफ़ीस लिबास इज़्ज़ते ज़ाहिरी के लिये। उस के बाद हज़रत ने हाथ बढ़ा कर सुफ़ियाने सूरी का जुब्बा (लम्बा कुर्ता) खींच लिया वह उस पुरानी गुदड़ी के नीचे नफ़ीस लिबास पहने हुए था, आप ने फ़रमाया वाय हो तुझ पर ऐ सुफ़ियान, यह नीचे का लिबास तूने अपने नफ़्स को ख़ुश करने के लिये पहन रखा है और ऊपर की गुदड़ी लोगों को फ़रेब देने के लिये।

हदीसे मोतबर में अब्दुल्लाह बिन हिलाल स मंक़ूल है कि मैं ने जनाबे इमाम रेज़ा (अ) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि लोगों को वह लोग बहुत ही अच्छे मालूम होते हैं जो फीका सीठा तो खाना खायें. मोटा झोटा कपड़ा पहनें और टूटे फूटे हाल में बसर करें, हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ अब्दुल्लाह, क्या तू यह नही जानता कि जनाब युसुफ़ (अ) पैग़म्बर भी और पैग़म्बर ज़ादे भी। इस के बा वजूद दीबा की क़बाएं पहनते थे जिस में सोने के तार बुने होते थे, आले फ़िरऔन के दरबार में बैठते थे, लोगों के मुक़द्देमात तय करते थे मगर लोगों को उन के लिबास से कुछ ग़रज़ न थी। बस वह यह चाहते थे कि अदालत में इंसाफ़ करे। इस लिये कि इस अम्र का लोगों के मामले से लिहाज़ा होना चाहिये वह सच कहने वाले हों, जिस वक़्त  वादा करें उसे पूरा करें और मामेलात में अदालत यानी इंसाफ़ करें बाक़ी ख़ुदा ने जो हलाल किया है उसे किसी पर हराम नही फ़रमाया है और हराम को चाहे वह थोड़ा हो या बहुत हलाल नही किया फिर हज़रत ने वही आयत जिस का ज़िक्र हो चुका है तिलावत फ़रमाई। बाक़ी हदीसें इस फ़स्ल के मुतअल्लिक़ हमने ऐनुल हयात में ज़िक्र की हैं।