चेहलुम का विशेष कार्यक्रम



 

       आज हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम का दिन है। आज का दिन उनके ऐतिहासिक आंदोलन के महान व उच्च लक्ष्यों के बारे में सोचने और उन्हें अच्छी तरह समझने का बेहतरीन अवसर है। एतिहासिक प्रमाणों के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन उन आंदोलनों में से है जो समय बीतने के साथ मज़बूत एवं प्रभावी होता जा रहा है। यद्यपि आशूरा की घटना हुए शताब्दियों का समय बीत चुका है परंतु यह आंदोलन भौगोलिक, राष्ट्र और समय की सीमा में सीमित नहीं हुआ तथा सूरज की भांति अपने प्रभाव को पूरे संसार में फैला रहा है।

        भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने देश के लोगों को जागरुक बनाने के लिए सफलता के एकमात्र मार्ग को हुसैन बिन अली का अनुसरण करना बताया और इस प्रकार कहा" मैं भारत के लोगों के लिए कोई नई चीज़ नहीं लाया हूं मैंने कर्बला के महानायक के जीवन के बारे में जो अध्ययन किया है उसके परिणाम को उनके समक्ष पेश किया हें। यदि हम भारत को स्वतंत्रता दिलाना चाहते हैं तो हमें भी वही रास्ता तय करना चाहिये जो रास्ता हुसैन बिन अली ने तय किया है"

 

चेहलुम जैसा दिन हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के इतिहास को जानने और उससे महानता का पाठ लेने का बेहतरीन अवसर है। श्रोता मित्रो इस दुःखद अवसर  पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक संवेदन प्रस्तुत करते हैं और कर्बला के महाआंदोलन के कुछ आयामों पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे।

 

कर्बला में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार एवं निष्ठावान साथियों की शहादत के पश्चात उनके परिजनों तथा आशूरा की घटना में बच जाने वालों को बंदी बना लिया गया। बंदी बनाये जाने वाले कारवां में सर्वोपरि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बहन हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा का नाम है। इतिहासकारों के अनुसार यज़ीद की सेना के कमांडर उमरे साद ने सबसे पहले शहीदों के सिरों को कूफे के शासक इब्ने ज़ियाद के पास भेजा और ग्यारहवीं मोहर्रम की दोपहर को बंदी बनाये गये कारवां के साथ कूफ़े की ओर चला। इतिहास में आया है कि शहीद होने वाले व्यक्तियों के पवित्र शव तीन दिनों तक कर्बला की तपती ज़मीन पर पड़े रहे यहां तक कि बनी असद क़बीले के लोग कर्बला पहुंचे। उन्होंने कर्बला के शहीदों के पावन शरीरों पर नमाज़ पढ़ी और उन्हें दफ्न किया। बंदियों के कारवां को बहुत ही हृदय विदारक स्थिति में पहले कूफे की ओर और फिर शाम अर्थात सीरिया की ओर ले जाया गया।

 

 सैयद इब्ने ताऊस "अल्लोहूफ" नामक पुस्तक में लिखते है" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों एवं कर्बला की घटना में बच जाने वालों को उमरे साद ने वहां से चलने का आदेश दिया। महिलाओं को ऐसे ऊंटों पर सवार किया गया जिनकी पीठों पर दरी का एक टुकड़ा डाल दिया गया था। इन ऊंटों पर न पालान था और न छाया। कारवां में अधिकांश संख्या बच्चों और महिलाओं की थी। पुरुषों में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के सुपुत्र हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन तथा हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के दो बेटे मौजूद थे। कारवां जैसे ही कूफा पहुंचा दूसरा आशूरा आरंभ हो गया"

 

अनगिनत कठिनाइयॉं सहन करने के कारण हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा बहुत ही विषम व हृदय विदारक स्थिति में थीं परंतु कूफ़ा में अभूतपूर्व साहस और अपने विवेकपूर्ण व्यवहार से बनी उमय्या के शासकों के विरुद्ध बाद के आंदोलनों की भूमि प्रशस्त कर दी। बशीर बिन ख़ज़ीम असदी कहता है" उस दिन अली की बेटी हज़रत ज़ैनब ने सबके ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था। क्योंकि ईश्वर की सौगन्द मैंने उनकी भांति किसी महिला को नहीं देखा था जो सिर से पैर तक लज्जा की प्रतिमूर्ति हो और इस वाक्पटुता तरह वैभवपूर्ण एवं स्पष्ट शब्दों में भाषण दे मानो भाषण देना अपने पिता हज़रत अली से सिखा हो"

 

हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने कूफा वासियों द्वारा वचन तोड़ने के बारे में उनके बीच भाषण दिया और बनी उमय्या की विदित जीत पर पानी फेर दिया। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा ने बिल्कुलस्पष्ट एवं नपा- तुला भाषण देकर कूफा वासियों की इस प्रकार भर्त्सना की रोने लगे। अपनी ग़लती समझ गये और अपने किये पर रोये। हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के ऐतिहासिक भाषणों ने कूफा वासियों के मन को ऐसा झिंझोड़ा कि कूफा में तव्वाबीन अर्थात प्रायश्चित करने वालों का आंदोलन अस्तित्व में आगया ।   हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा के भाषण के एक भाग में आया है: हे कूफा के लोगो। हे धोखा देने वालों! और बेवफा व विश्वासघाती क्या तुम लोग मेरी दशा पर रो रहे हो? हां तुम लोग अधिक रोओ और कम हंसो क्योंकि तुमने अपने दामन को डोसा कलंकित किया है कि उसका निशान सिट नहीं सकता। जान लो कि तुमने परलोक के लिए इतना बुरा कमर्पेत्र भेज दिया है कि तुम ईश्वर के क्रोध का पात्र बनोगे"

 

भ्रष्ट अमवी शासक यज़ीद की सरकार के केन्द्र शाम में भी इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम और जह़रत ज़ैनब सलामुल्लाह के जागरुकता लाने वाले भाषण जारी रहे। लोगों में जागरुकता से यज़ीद भयभीत एवं चिंतित हो उठा और उसने बंदियों के कारवां को मदीना पहुंचा देने का आदेश दिया।

 

 कुछ इतिहासकारों के अनुसार कर्बला की घटना के उसी वर्ष और कुछ अन्य के अनुसार इस घटना के अगले वर्ष बंदियों के कारवां को दोबारा कर्बला ले जाया गया। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों के साथ दूसरे शहीदों के परिजनों भी कर्बला गये। कर्बला की घटनाओं की याद उनके लिए बहुत ही कठिन व हृदय विदारक थी। हर कोई अपने शहीद की क़ब्र से लिपट कर रोरहा था। लोगों के रोने-पीटने की आवाज़ों से कर्बला का वातावरण गूंजने लगा। इस प्रकार इतिहास के सबसे महान एवं अमर शहीदों की क़ब्रों पर उनका पहला शोक संभा आयोजित हुई। हे हुसैन! आप पर सलाम हो, सलाम हो आप पर और उन पवित्र व्यक्तियों पर जिन्होंने आप पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिये"

 

कर्बला की घटना के बाद यज़ीद के क़बीले बनी उमय्या ने प्रचार की विभिन्न शैलियां अपना कर अपने विरोधियों को सत्तालोलुप एवं विद्रोही दर्शाने का प्रयास किया। बनी उमय्या ने लोगों के मध्य अफवाह फैलाकर एवं संदेह उत्पन्न करके कर्बला की घटना की वास्तविकताओं को छिपाने की चेष्टा की परंतु कर्बला की ऐतिहासिक घटना के आरंभिक दिनों से ही उनके प्रयास निरर्थक रहे। क्योंकि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एतिहासिक आंदोलन का संदेश पहुंचाने वाले महाविद्वान एवं समय की पहचान रखने वाले हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम और हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा थीं। इन दोनों महान हस्तियों ने उचित अवसरों पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का महत्व व उद्देश्य बयान किया तथा अमवी शासकों के चेहरों पर पड़ी नक़ाब को हटा दिया। यह रहस्योदघाटन उन आंदोलनों की भूमिका सिद्ध हुआ जो कर्बला की घटना के बाद हुए। क़ेयामे तव्वाबीन अर्थात प्रायश्चित करने वालों का आंदोलन, मदीना के लोगों का विद्रोह और इराक़ में मुख़्तार सक़ेफ़ी का आंदोलन, ये सबके सब कर्बला की घटना में शहीद होने वालों के ख़ून का बदला लेने के लिए हुए थे। समाज में जागरुकता की लहर वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के गहरे प्रभाव की सूचक थी। यह प्रभाव इतना विस्तृत था कि वह किसी काल व समय से विशेष नहीं रहा यहां तक कि आज तक उसके प्रभाव लोगों के मध्य दिखाई दे रहे हैं।

 

 इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन के आज तक बाक़ी रहने और उसके प्रभाव के रहस्य को उसके आंतरिक मूल्य में ढूंढ़ना चाहिये। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने आंदोलन के आरंभ से ही उन सिद्धांतों पर आग्रह करते थे कि हर पवित्र व जागरुक आत्मा वाला व्यक्ति उसे स्वीकार एवं उसकी सराहना करेगा। न्यायप्रेम, अत्याचार एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और ईश्वरीय मूल्यों को समाज में स्थापित व लागू करना, उनके मानव इतिहास के पवित्र एंव अमर सिद्धांत हैं।  हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का महाआंदोलन ऐसे विचारों एवं सिद्धांतों को समोए हुए है जिनकी ओर मनुष्य की बुद्धि एवं आकर्षित छोती है।

 

 इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बहुत ही उच्च विचार के स्वामी थे और वह मानवता को अज्ञानता व पथभ्रष्टता से छुटकारा दिलाना चाहते था। जो वस्तु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दुःख का कारण बनी वह लोगों की अनभिज्ञता व अचेतना थी। इसी कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने पावन जीवन के अंतिम क्षण तक भटके हुए लोगों के मार्ग दर्शन की ओर से चिंतित रहे। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का दयायु हृदय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के अनुयाइयों के प्रति चिंतित था। वे कर्बला में यज़ीद की राक्षसी सेना के साथ युद्ध में भी उसे नसीहत करते और लोक- परलोक की भलाई की ओर बुलाते थे। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के चेहलुम के दिन पढ़ी जाने वाली दुआ में हम पढ़ते हैं: ईश्वर, हुसैन ने अपने लहू को तेरे मार्ग में न्यौछावर कर दिया ताकि तेरे बंदों को अनभिज्ञता व पथभ्रठता से मुक्ति दिलायें पंरतु जिन लोगों को दुनिया ने धोखा दे दिया था और वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के विरुद्ध हो गये थे उन लोगों ने परलोक में सदैव रहने वाले लाभ को थोड़े से लाभ के बदल में बेच दिया। हे हुसैन हम गवाही देते हैं कि आप धर्म के मज़बूत स्तंभ हैं। हम गवाही देते हैं कि आप ईश्वर पर ईमान रखने वाले व्यक्तियों के लिए आश्रय और मार्ग दर्शन के चिन्ह हैं"              

 

हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समाज की पथभ्रठता एवं बुराई को धार्मिक शिक्षाओं से मुंह मोड़ लेने और ईश्वर के आदेश को स्वीकार न करने का परिणाम मानते हैं। मानवता के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का वही संदेश है जो ईश्वरीय दूतों एवं महान हस्तियों का संदेश था। हज़रत इमाम हुसैन अपने स्पष्ट वक्तव्य में मनुष्य की मुक्ति के मार्ग को न्यायप्रेम और स्वतंत्रता जैसे ईश्वरीय एवं मानवीय सिद्धांतों के प्रति वचनबद्ध रहने में मानते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कथनों एवं सदाचरण में उच्चतम मूल्य दिखाई पड़ते हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के लक्ष्य में सत्ता लोलुपता और विशिष्टता की प्राप्ति जैसी कोई भी वस्तु दिखाई नहीं पड़ती। जो भी है वह मानवता की भलाई एवं मुक्ति के लिए है। यही कारण है कि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम शताब्दियों से मानवता को प्रभावित कर रहे हैं।

 

 मुसलमान विचारक अल्लामा डाक्टर मोहम्मद हसन शहातह कहते हैं" यदि मुझसे पूछा जाये कि हुसैन बिन अली को पूरब या पश्चिम में ढ़ूढ़ा जा सकता है तो मैं कहूंगा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को हृदयों में ढ़ूढना चाहिये"

 निश्चितरूप से सर्वसमर्थ व महान ईश्वर की इच्छा यह है कि विश्व, सदगुणों एवं श्रेष्ठताओं का केन्द्र बने परंतु जब वातावरण इसके विपरीत दिशा में हो जाता है तो ईश्वर एवं वास्तविकता प्रेमी व्यक्ति संघर्ष के लिए उठ खड़े होते हैं और मानवता को अज्ञानता एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने के लिए अपने प्राणों तक की आहूति दे देते हैं। इस लिए है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम के नाती हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सदा के लिए इतिहास में अमर हैं।