इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत



 

 

ज़ीक़ाद महीने की सत्ताईस तारीख़ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही के परिजनों में से एक हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत का दिन है। वर्ष 220 हिजरी क़मरी में इसी दिन इमाम जवाद इस नश्वर संसार से परलोक सिधार गए और इस्लामी जगत इस महापुरुष के शोक में डूब गया।


पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही के परिजनों ने ईश्वर की ओर से उन्हें सौंपे गए दायित्व के निर्वाह के दौरान इस्लामी जगत में वैचारिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से गहरा प्रभाव छोड़ा है। यदि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही के परिजनों की जीवनी की समीक्षा करें तो इस तथ्य से अवगत होंगे कि उन्होंने धर्म की रक्षा में मूल्यवान योगदान दिया है। वे अत्याचार और भ्रष्टाचार के विरुद्ध डट गए और इस्लाम के मूल स्वरूप को अमर बनाने के लिए अत्या धिक संघर्ष किया।

इमाम जवाद अलैहिस्सलाम की इमामत अर्थात ईश्वर द्वारा उन्हें जनता के मार्गदर्शन के लिए सौंपे गए दायित्व का काल सत्रह वर्ष था। इस  दौरान उन्होंने इस्लाम के प्रसार और उसकी शिक्षाओं को समृद्ध बनाने के  अथक प्रयास किए।       इमाम जवाद अलैहिस्सलाम का एक कथन हैः यदि व्यक्ति में तीन गुण हों तो वह ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त कर सकता है। पहले यह कि पापों के लिए अत्याधिक पश्चाताप करे, दूसरे यह कि लोगों के साथ विनम्र रहे तीसरे यह कि अत्याधिक दान दक्षिणा करे।        इमाम जवाद अलैहिस्सलाम का कहना है कि जनसेवा और दीन दुखियों की सहायता से ईश्वरीय अनुकंपाएं प्राप्त होती हैं और यदि इस संदर्भ में कोई लापरवाही करे तो संभव है कि उसके पास से ईश्वरीय अनुकंपाएं चली जाएं। आप कहते हैं जब कोई व्यक्ति ईश्वरीय अनुंकपाओं का अत्याधिक पात्र बनता है तो लोगों की उससे आशाएं भी अधिक हो जाती हैं। यदि कोई, लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास न करे तो उसके पास से ईश्वरीय अनुकंपाओं के चले जाने का ख़तरा बना रहता है।   

इमाम जवाद इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के सुपुत्र हैं और वर्ष 195 हिजरी क़मरी को मदीना में आपका जन्म हुआ। आपका मुल्यवान जीवन कुल पच्चीस वर्षों का था और इस अल्पावधि में लोगों के वैचारिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए आपने प्रभावी भूमिका निभाई। इमाम जवाद ने इमामत अर्थात लोगों के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व आठ वर्ष की आयु में संभाला। इस कम आयु में उनकी इमामत पर कुछ लोगों को  संदेह था। इसका कारण यह था कि लोग सृष्टि की समीक्षा में भौतिक एवं विदित मापदंडों को ही दृष्टिगत रखते थे। जबकि सर्वसमर्थ ईश्वर के पास यह शक्ति है कि वह कम आयु के लोगों को परिपूर्णता तक पहुंचा दे। जैसाकि क़ुरआनी आयतों के अनुसार पहले की जातियों व राष्ट्रों में एसा हो चुका है।  बचपन में हज़रत यहया का नबी होना और हज़रत ईसा का पालने में बोलना महा ईश्वरीय चमत्कारों के नमूने हैं।  

            इमाम जवाद अलैहिस्सलाम बचपन और युवावस्था में ज्ञान, विनम्रता, ईश्वरीय भय और वाक्पटुता में सबसे आगे थे। वे कम आयु के बावजूद बुद्धि और वाकपुटता में अपने समय में विख्यात थे। इतिहास में है कि एक वर्ष हज यात्रा के पश्चात बग़दाद और अन्य नगरों के अस्सी विधि शास्त्री (ज्यूरिसप्रूडेंस) मदीना नगर गए और इमाम जवाद की सेवा में उपस्थित हुए। उन्होंने इमाम से अनेक प्रश्न किए और उसके संतोषजनक उत्तर प्राप्त किए। इस प्रकार उन विधिशास्त्रियों के मन में इमाम जवाद की इमामत को लेकर जो शंकाएं थीं वे दूर हो गईं। इमाम जवाद अलैहिस्सलाम विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ करते थे जिनमें से कुछ बहुत ही रोमांचक थे। उन शास्त्रार्थों में इमाम जवाद की वैज्ञानिक क्षमता बड़े रोचक ढंग से प्रकट होती थी।

उन शास्त्रार्थों में इमाम जवाद के तर्क ज्ञान की सीमा को लांग कर जटिल वैज्ञानिक गुत्थियों से पर्दा उठाते थे। इसलिए विद्वान यहां तक कि इमाम के विरोधी भी उनके आध्यात्मिक एंव वैज्ञानिक स्थान का लोहा मानते थे। एक दिन अब्बासी शासक मामून ने एक बैठक आयोजित की ताकि विद्वानों और ज्ञान का दावा करने वालों की उपस्थिति में एक शास्त्रार्थ में इमाम जवाद के ज्ञान की परीक्षा ले। उस बैठक में तत्कालीन विद्वान यहया बिन अक्सम ने कुछ प्रश्न किए। उसका प्रश्न थाः जिसने हज का विशेष वस्त्र धारण कर लिया है और पशु का शिकार कर ले तो इस संदर्भ में धर्म का क्या आदेश हैइमाम जवाद ने इस प्रश्न से लगभग बाइस उपप्रश्न निकाले जो सबके सब मुख्य प्रश्न से संबंधित थे। अलबत्ता इन सब प्रश्नों के उत्तर अलग अलग थे। उत्तर की यह शैली इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के हाथ में ज्ञान की कमान को दर्शाती है।

 
इस प्रकार बैठक में उपस्थित विद्वानों ने इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के ज्ञान का लोहा मान लिया और उनकी प्रशंसा की।  इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की इमामत वर्ष 203 से 220 हिजरी क़मरी तक सत्रह वर्षों तक रही। इस दौरान मामून और मोतसिम नामक दो अब्बासी शासक गुज़रे। ये शासक धर्म का दिखावे के लिए पालन करते और कभी कभी धर्म के आदेशों की अपने हितों में व्याख्या करते और उसमें परिवर्तन करते थे। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम इस व्यवहार पर चुप नहीं बैठे और उनके विरोध का जनता पर व्यापक प्रभाव पड़ा। जिसके पश्चात अब्बासी शासकों ने इमाम पर यातनाएं बढ़ा दीं और उनके मार्ग में बहुत सी रुकावटें खड़ी कर दीं। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम को तत्कालीन अब्बासी शासक मामून ने मदीना छोड़ कर अब्बासी शासन की राजधानी बग़दाद जाने के लिए विवश होना पड़ा।

इसके बावजूद इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम ने कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जनता के साथ संपर्क बनाए रखा और संघर्ष को जारी रखने के लिए भिन्न शैली अपनाई। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम पूरे इस्लामी जगत में अपने प्रतिनिधि भेजते थे। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के प्रतिनिधि बसरा, अहवाज़, हमेदान, कूफ़ा, क़ुम और रय जैसे बहुत से क्षेत्रों में फैले हुए थे। अलबत्ता अब्बासी शासन तंत्र में भी इमाम मोहम्मद तक़ी के अनुयाइ कार्यरत थे। कुछ के पास तो संवेदनशील पद भी थे। अहवाज़ के अली बिन मेहज़यार अहवाज़ी भी इमाम के एसे मानने वालों में थे जो अब्बासी शासन तंत्र में कार्यरत थे, किन्तु इमाम के बहुत ही निकटवर्ती अनुयाइ थे।
उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के अनुयाइयों की रक्षा में जिन पर अत्याचार किया जाता था, मूल्यवान क़दम उठाए।  

              
इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम ने जनता के मार्गदर्शन एवं वैचारिक स्तर को बढ़ाने के लिए अथक प्रयास किए। वे जनता से संबंधित मामलों में स्वंय की सक्रियता को कर्तव्य समझते थे। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के पिता इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम को पत्र में इस प्रकार वसीयत की हैः एसे मार्ग से गुज़रों कि लोग तुम्हारी ओर अधिक आकृष्ठ हों और अपने पास कुछ पैसा रखो ताकि निर्धनों की सहायता कर सको। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम लोगों के साथ बहुत की विनम्रता व शिष्टाचार से पेश आते और अधिक दान दक्षिणा करने पर उन्हें जवाद अर्थात दानी कहा जाने लगा।

     
इतिहास में है कि कुछ लोग सुदूर क्षेत्रों से इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की सेवा में मूल्यवान उपहार ला रहे थे कि मार्ग में डाकुओं ने उन्हें घरे लिया और उपहार छीन लिया। जिस व्यक्ति पर इमाम को उपहार पहुंचाने का दायित्व था उसने पत्र द्वारा इमाम को घटना से सूचित किया। इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलमा ने घटना से संबंधित पत्र के उत्तर में लिखाः निःसंदेह हमारे प्राण और माल ईश्वर की ओर से उपहार और अमानत हैं। यदि उससे लाभान्वित हों तो प्रसन्नता प्राप्त होती है और जो कुछ चला गया यदि उस पर धैर्य रखें तो इसका पुण्य मिलेगा। जो भी समस्याओं में धैर्यवान नहीं रहेगा उसका पारितोषिक चला जाएगा।  

               
   इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के जीवन के अंतिम दो वर्ष बड़ी कठिनाई में बीते। जब अब्बासी शासक मोतसिम सत्ता पर पहुंचा तो उसे इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के वैचारिक एवं आध्यात्मिक प्रभाव की ओर से चिंता होने लगी। इसलिए वह विभिन्न बहानों से जनता के साथ इमाम मोहम्मद तक़ी के संपर्क के मार्ग में रुकावटें पैदा करने लगा और इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम पर सरकारी जासूस नज़र रखने लगे। अब्बासी शासक इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम के लिए कठिन परिस्थितियां उत्पन्न किए जाने के बावजूद जनता के बीच इमाम की लोकप्रियता को कम न कर सके। जब भी इमाम थोड़े समय के लिए भी नगर में उपस्थित होते लोग उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ते थे। यहां तक कि छत पर खड़े होकर इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम का दर्शन करते थे।

     
कुल मिलाकर इमाम जवाद अलैहिस्सलाम का सुधारवादी आंदोलन और मन में उतर जाने वाली उनकी वाणी से लोगों में जागरुकता आ रही थी और दूसरी ओर अब्बासी शासक मोतसिम द्वेष की आग में जल रहा था। इसलिए उसने इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम को अपने मार्ग से हटाने का षड्यंत्र रचा। इस प्रकार इमाम पच्चीस वर्ष की  आयु में मोतसिम के षड्यंत्र से शहीद हो गए।  इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम उच्च आध्यात्मिक एवं मानवीय स्थान तक पहुंचने के लिए धर्म की सही शिक्षा की जानकारी को आवश्यक बताते हुए फ़रमाते हैः धर्म की पहचान हर उच्च स्थान तक पहुंचने की सीढ़ी है।  

इसी प्रकार इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम बुरे मित्र की संगत के बूरे प्रभाव और एसे मित्र से दूर रहने के महत्व के बारे में फ़रमाते हैः बुरे व्यक्ति की मित्रता से बचो क्योंकि वह उस तलवार की भांति होता है जो चमकती है किंतु ख़तरनाक होती है।