इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के संबंध में विशेष कार्यक्रम



 

ईश्वरीय मार्ग दर्शक परिपूर्ण और चुने हुए महान व्यक्ति होते हैं जिनके कथन और सदाचरण, पवित्र मानव जीवन के लिए सर्वोत्तम आदर्श हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि ईश्वरीय मार्गदर्शकों से संबंध और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण जीवन को लोक-परलोक में सफल बनाने का एकमात्र मार्ग है। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ज्ञान, ईश्वरीय भय और परिपूर्णता की प्रतिमूर्ति हैं जिनका पावन अस्तित्व समस्त सदगुणों का प्रतीक है। आज हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस का शुभ अवसर है। आप ईश्वरीय मार्गदर्शकों एवं इमामों का परिचय इस प्रकार करते हैं" इमाम दया व कृपा के स्रोत, ज्ञान के खज़ाने, प्रतिष्ठा के स्तंभ, सच्चाई और पवित्रता के दीपक हैं।  हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जीवन में ज्ञान, पवित्रता और सर्वसमर्थ व महान ईश्वर से प्रेम इस प्रकार रचाबसा था कि इस्लामी इतिहासकार इब्ने शहर आशूब, मनाक़िब नामक अपनी पुस्तक में इमाम के बारे में लिखते हैं" हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम परिपूर्ण व्यक्ति थे। जब भी मौन धारण करते थे उनका वैभव स्पष्ट होता था और जब बोलते थे उनका अतुलनीय महत्व व  स्थान अधिक स्पष्ट होता था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेहि व सल्लम के वंश से संबंधित होने का चिन्ह आपके चेहरे से झलकता था। क्योंकि आप पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेहि व सल्लम की पवित्र संतानों में से चुनी हुई हस्ती थे।हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म १५ ज़िलहिज्जा सन् २१२ हिजरी क़मरी को मदीना नगर में हुआ था। आपने अपने पिता हज़रत इमाम मोहम्मद तक़ी अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद ३३ वर्षों तक मुसलमानों के मार्गदर्शन का ईश्वरीय दायित्व संभाला। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जीवन में मुतवक्किल सहित कई अब्बासी शासकों का राज रहा। वह समय राजनीतिक और वैचारिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता था। राजनीतिक दृष्टि से समाज में बहुत घुटन का वातावरण था। जितना समय बनी अब्बास के शासन का ग़ुज़र रहा था उसके शासन का प्रभुत्व उतना ही कम होता जा रहा था। इसका कारण समाज में व्याप्त नाना प्रकार की बुराई,भ्रष्टाचार और शासकों की अयोग्यता तथा जनता की अप्रसन्नता थी। दूसरी ओर समाज में ईश्वर पर आस्था के बारे में भी नाना प्रकार की अतार्किक एवं आधारहीन बातें प्रचलित हो गईं थीं। इस बीच यदि हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की दूरगामी सोच न होती तो मौलिक व आधारभूत इस्लामी आस्थाओं एवं शिक्षाओं को गम्भीर ख़तरे का सामना होता और धर्म में वे नई-२ बातें आ जातीं जिनका धर्म से कोई संबंध नहीं है।  आरंभ में हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम मदीना नगर में रहते थे। इस्लामी जगत में मदीना नगर ज्ञान व धर्मशास्त्र की शिक्षाओं का केन्द्र था और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम इस केन्द्र का संचालन व नेतृत्व करते थे। अब्बासी शासक मुतवक्किल के शासन काल में आपको मदीना नगर छोड़ने और वर्तमान इराक़ के सामर्रा नगर में रहने के लिए बाध्य किया गया। क्योंकि मुतवक्किल लोगों में इमाम के गहरे प्रभाव से भयभीत था। वह जनता के मध्य गहरी लोकप्रियता से इमाम को अलग करना चाहता था। इस प्रकार हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने अपनी इमामत के अंतिम १० वर्ष मुतवक्किल के शासन के केन्द्र सामर्रा नगर में बिताये।चूंकि अब्बासी शासन के कारिन्दे इमाम पर गहरी दृष्टि रखते थे इसलिए जनता से संपर्क के लिए आपने विशेष दल का गठन किया। आपने इस्लामी जगत के दूर की क्षेत्रों में अपना प्रतिनिधि चुनकर उनसे संपर्क का साधन उत्पन्न किया। इन प्रतिनिधियों का दायित्व जनता तक इमाम की बातों व शिक्षाओं को पहुंचाना तथा जनता की कठिनाइयों व समस्याओं से इमाम को अवगत कराना था। अलबत्ता कठिन राजनीतिक परिस्थिति के कारण ये प्रतिनिधि भी सरलता से इमाम से सम्पर्क नहीं कर पाते थे। यहां तक कि उनमें से कुछ विवश होकर अपना भेस बदलते और प्यापारी का रूप धारण करके इमाम की सेवा में उपस्थित होते थे। सामर्रा नगर में भी इमाम जनता के स्वागत एवं उसके ध्यान के केन्द्र रहे और मुतवक्किल अब भी जनता के निकट इमाम की लोकप्रियता को कम करने की चेष्टा में था। एक दिन मुतवक्किल के आदेश से इमाम को एक सभा में लाया गया जिसमें स्वयं मुतवक्किल, उसके कुछ दरबारी और धनाढ्य लोग उपस्थित थे। मुतवक्किल ने हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम से शेर पढ़ने के लिए कहा। पहले तो इमाम ने शेर कहने से इंकार किया परंतु मुतवक्किल के बार- बार के आग्रह तथा सभा की स्थिति के दृष्टिगत इमाम ने अत्याचारी शासकों के परिणाम के बारे में चेतावनी एवं सीख देने वाला शेर पढ़ा। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने जो शेर पढ़े उसके विषय व अर्थ कुछ प्रकार थे" शासकों ने ऊंचे-२ दुर्गों को अपने आवास के लिए चुना और सशस्त्र व्यक्तियों को उनकी रक्षा पर लगाया, सुरक्षा के साधनों को प्रबंध किया परंतु इनमें से कोई भी सोच व साधन उन्हें उनकी मृत्यु से न बचा सकी। उन्होंने अपने आवासों के निर्माण में कितना लम्बा समय लगा दिया कि वे घटनाओं से सुरक्षित रहें परंतु कूच करने अर्थात मृत्यु की आवाज़ सुनते ही उन्होंने अपने महलों व दुर्गों को छोड़ दिया। कितने सारे आबाद उनके आवास समय बीतने के साथ-२ मिट्टी के खंडहर में परिवर्तित हो गये"दिल को हिला देने वाली हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की बातें सभा में उपस्थित लोगों के दिल की गहराईयों में इस सीमा तक उतर गईं कि तानाशाह शासक मुतवक्किल भी प्रभावित हो गया। इसके पश्चात उसने आदेश दिया कि इमाम को उनके घर पहुंचा दिया जाये। ईश्वरीय मार्ग दर्शक एवं इमाम हलाल व वैध आजीविका कमाने के मार्ग में किये जाने वाले प्रयास को आवश्यक तथा मूल्यवान बताते थे। साथ ही वे धन- सम्पत्ति सहित सांसारिक ताम- झाम एवं दिखावे को महत्व नहीं देते थे। ईश्वरीय मार्गदर्शक अपना जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक मात्रा में उपलब्ध संसाधनों पर ही संतोष करते थे और अपने प्रयास व परिश्रम से कमाये गये धन के एक भाग से समाज के दीन- दुखियों एवं आवश्यकता रखने वाले व्यक्तियों की सहायता करते थे। सर्वसमर्थ व महान ईश्वर को पसंद इस पद्धति को हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जीवन में भलि-भांति देखा जा सकता है। समाज से निर्धनता एवं दरिद्रता कम करने में इमाम की सहायता की महत्वपूर्ण भूमिका थी। विस्तृत पैमाने पर आपके दान से लोगों को आशा बंधी रहती और आवश्यकता रखने वाले एवं दरिद्र लोगों के लिए आपका घर शरण स्थली था। क्षमाशीलता महत्वपूर्ण विशेषताओं में से है जो महान हस्तियों विशेषकर ईश्वरीय मार्गदर्शकों में पाई जाती है। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम जीवन की कठिनाइयों के मुक़ाबले में क्षमाशील एवं धैर्यवान थे। इस्लामी इतिहास में आया है कि मदीना से सामर्रा इमाम के निष्कासन से पूर्व बुरैह नाम का व्यक्ति मुतवक्किल से इमाम की बहुत शिकायत करता था और उसने मुतवक्किल को पत्र लिया" यदि तुम्हें मक्का और मदीना की आवश्यकता है तो अली बिन मोहम्मद अर्थात हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को इन दोनों नगरों से बाहर निकाल लो। क्योंकि वह लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और बहुत से लोग उनका अनुसरण करते हैं। अंतत: बुरैह की शिकायत के परिणाम स्वरूप मुतवक्किल ने इमाम को मदीना से सामर्रा बुलाया। बुरैह ने, जो स्वयं इस यात्रा में इमाम के साथ था, रास्ते में इमाम से कहा" मैं जानता हूं कि आपको सामर्रा भेजवाने में मेरी भूमिका है ऐसा न हो कि आप मुतवक्किल से मेरी शिकायत करें। यदि आपने ऐसा किया तो मदीना में आपकी सम्पत्ति को आग लगा दूंगा और आपके अनुयाईयों की हत्या कर दूंगा" हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने बुरैह पर अर्थपूर्ण दृष्टि डाली और उसके उत्तर में कहा, मैंने तेरी शिकायत गत रात्रि ईश्वर से कर दी। यह तेरी शिकायत का निकटतम रास्ता था। बुरैह ने जैसे ही इमाम की यह बात सुनी, व्याकुल हो गया। इमाम के पैरों पर गिर पड़ा और आपसे क्षमा याचना की। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने भी अपनी महानता, दया और क्षमाशीलता का परिचय देते हुए उसे माफ़ कर दिया। हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर एक बार फिर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और इमाम के कुछ सर्वणिम कथनों से कार्यक्रम का समापन कर रहे हैं। आप कहते हैं" ईर्ष्या अच्छाईयों को बर्बाद कर देती है/ झूठ शत्रुता लाता है/आत्म मुग्धता ज्ञान प्राप्त करने में बाधा है और कंजूसी सबसे अप्रिय आदत है"हज़रत इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम मुसलमानों को पवित्रता एवं सफाई का निमंत्रण देते हुए कहते हैं" ईश्वर सुन्दरता व सफ़ाई को पसंद करता है और मोमिन अर्थात ईश्वर पर आस्था रखने वाले के परेशान व अपवित्र ढंग से रहने को पंसद नहीं करता"

ईश्वर ने जो विभूति अपने बंदे को प्रदान की है उसे वह अपने बंदे में देखना चाहता है आप से पूछा गया कि बन्दा किस प्रकार विभूति व अनुकंपा के प्रभाव को स्पष्ट कर सकता है? आपने उत्तर दिया" बंदा अपने वस्त्र को स्वच्छ व पवित्र रखे, उसे सुगंधित करे और अपने घर को स्वच्छ रखे"