नन्हे - मुन्ने शिशुओं की समस्याओ



आप का शिशु जब जन्म लेता है तो उसका मस्तिष्क सीखने के लिए तैयार होता है। जब वो आंखें खोलता है, उसकी बुद्धि अपने चारों ओर की चीज़ों को समझने के लिए तैयार हो जाती है। अब आप यह देखें कि इसमें आप उसकी किस प्रकार सहायता कर सकते हैं। शिशु का मस्तिष्क हर समय से अधिक पहले दो वर्षों में विकास करता है और आप की ओर से हर प्रकार का प्रोत्साहन उसके विवास में अधिक सहायक होगा। आप उसकी सहायता करते हैं कि आप के शिशु के स्नायु तन्ज की कोशिकाएं आपस में जुड़ जाएं और उसके जीवन में याद करने की शक्ति में वृद्धि हो। परन्तु वो आप को किसी कठिनाई में डालना नहीं चाहता, उसे केवल आप के प्यार की आवश्यकता होती है।


यहांपर हम बच्चों के मानसिक विकास के लिए कुछ आवश्यक बातों का वर्णन करना चाहें गे।
अपनेबच्चे से बातें कीजिए और उसके साथ सम्पर्क स्थापित कीजिए। बच्चे की स्मरण शक्ति में वृद्धि करने वाली सबसे महत्वपूर्ण चीज़ आंखों का सम्पर्क तथा उससे बात करना है। यहां तक कि आप का नवजात शिशु भी आप की बात करने की शैली को सीखता है और बाद में अपनी बोली में उसका अनुसरण करता और अपने मस्तिष्क में उसे संजोकर रखता है।


उससेथोड़ा रुक - रुक कर बात कीजिए ताकि आप का बच्चा बात करने की शैली सीख सके। इस प्रकार वो शीघ्र ही अपने गले से निकली हुई आवाज़ों द्वारा आप की बातों का जवाब देने लगगे गा। आप उससे बातें करते समय जो ध्वनि निकालते हैं उससे वो प्रेम करता है उसे आभास होता है कि आप ने उसे समय दिया। उसके साथ बात करने में आपको आनन्द प्राप्त होता है और यह उसमें आत्म विश्वास की भावना को उजागर करने के लिए बहुत आवश्यक होता है।

अपने शिशु को गोद में उठाइए

जी हां यह बिल्कुल स्वाभविक है कि नवजात शिशु रोए, परन्तु न तो शिशु इस काम से आनन्द प्राप्त करता हैं और न आप ही। इसलिए जब आप यह देखें कि आप का शिशु बहुत अधिक रो रहा है तो उसे गोद में उठा लिजिए, इसप्रकार वो तुरन्त यह समझ लेता है कि उसके परेशान होने से आप भी परेशान होते हैं और इसी कारण वो चुप हो जाता है।

बच्चेके लिए उचितखिलोनाख़रीदिए


खिलौनेख़रीदते समय उसपर लिखी हुई आयु सीमा पर अवश्य ध्यान दीजिए। उसके विकास के चरण के लिए उपयुक्त खिलौने ख़रीदने का बहुत महत्व है। क्योंकि यह खिलौने उसके लिए ख़तरनाक नहीं हैं और इनसे वो अधिक सीखता है। उदाहरण स्वरुप एक ५ महीने के बच्चे के लिए ऐसा खिलौना जो दबाने पर बजता या बोलता हो बेकार है क्योंकि बच्चा उसे दबा नहीं सकता परन्तु इस बच्चे के लिए कपड़े के या बुने हुए रंगारंग खिलौने अत्यधिक उपयुक्त हैं और वो उसे बहुत अच्छे लगते हैं।

अपनेबच्चे को सुन्दर चित्रों वाली किताब दिखाइए

बहुत छोटे बच्चे भी किताबों में रंगबिरंगे पशु - पक्षी या वो खिलौने जिनसे वो परिचित है देख कर ख़ुश होते हैं। मोटे गत्रे की या कपड़े की बनी किताबें इसके लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि उन्हें ऐसा बनाया जाता है जिसे बच्चा छू सके या मुहं में डाल सके।

बच्चेको नई चीज़ेंदिखाएं


प्रतिदिन उसे घर से बाहर ले जाइए, दुकानों, पार्कों या ऐसे स्थानों पर जहां अन्य माता - पिता अपने बच्चों को ले जाते हैं आप भी उसे ले जाइए। अपने मित्रों के घर मिलने जाइए, बच्चे के साथ बाहर जाइए ताकि वो नई - नई चीज़ें देखे और उनसे परिचित हो सके।
आइएअब थोड़ा सा बड़े बच्चों की बात भी करें। कभी - कभी घर से बाहर बच्चे को किसी आप्रिय घटना का सामना होता है। वो परेशान होता है और जब घर आता है तो माता - पिता उसकी यह दशा देख कर उसपर प्रश्नों की बोछार कर डालते हैं। परन्तु ऐसी स्थिति में अधिक प्रश्न न केवल यह कि बच्चे की परेशानी कम नहीं करते बल्कि स्थिति को और अधिक जटिल बना देते हैं और उस प्रकार बच्चा माता - पिता के सम्मुख प्रतिरोधक स्थिति में आ जाता है। हमें चाहिए कि ऐसी स्थिति में बच्चे को कुछ समय के लिए उसके हाल पर छोड़ दें।


अपनेकोपरिस्थितयोंके साथ सन्तुलित करने के लिए हर बच्चे को अलग - अलग समय अवधि की आवश्यकता होती है। क्योंकि हर बच्चे की भावनाएं तथा व्यक्तित्व उसी से विशेष होता है। यह अत्यन्त आवश्यक है कि जिस समय बच्चा अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा हो कदापि उसका मज़ाक़ न उड़ाएं। क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो फिर बच्चा अपने मन की बात आपको नहीं बताए गा।
इसबात को समझ पाना थोड़ा कठिन होता है कि कब बच्चे का बिगड़ा हुआ मूड मज़ाक़ करने से बदल जाएगा।


बातोंमें व्यंग के दो लाभ हैं। पहली बात यह कि बड़े अधिक सन्तोष या बिना तनाव के परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं। दूसरे यह कि बच्चे ऐसी स्थिति में कम प्रतिरोध दिखाते हैं। जब भी इस पद्धति का प्रयोग किया जाए तो ध्यान रखें कि व्यक्ति की मनोदशा के परिवर्तन का प्रयास हो न कि उसके व्यक्तित्व का। बच्चों को नियंजित करने की शक्ति, सदैव माता - पिता को सुरक्षित रखनी चाहिए। इसलिए मज़ाक़ में केवल परिस्थिति को बदलने का प्रयास होना चाहिए और थोड़ी सी अवधि के लिए ही हमें अपनी भूमिका बदलनी चाहिए, इससे माता - पिता की शक्ति को आघात नहीं लगना चाहिए। इसी प्रकार कभी कभी हम ऐसी बातों से बच्चों को दुखी कर देते हैं जिनका हमारे लिए कोई महत्व नही होता है।


अपनेबच्चों केलालन - पालन के प्रति हमें संदैव सर्तक रहना चाहिए और ऐसी कोई बात नहीं करनी चाहिए जो उसके नन्हें से हद्दय को ठेस पहुंचाए। यदि आप चाहते हैं कि आप का बच्चा बड़ा होकर समाज का एक शिष्ट और योग्य नागरिक बने तो जन्म के बाद से ही उसके प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा। वैसे भी हर माता - पिता की कामना यहीं होती है कि अपने बच्चों के विकास को देखें, तो इसके लिए उन्हें भी कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

महिला जगत -१४

मानव समाज के एक महत्वपूर्ण भाग के रुप में नि:स्न्देह महिलाओं के बारे में बात - चीत सामाजिक आवश्यकताओं में से एक है। विशेषकर कि जब आज सामाजिक विकास में उनकी भूमिका पर विशेष रुप से ध्यान दिया जा रहा है और साथ ही उनके विकास के मार्ग में अत्यधिक रुकावटें और रोड़े दिखाई देते हैं। परन्तु हमें आशा है कि इस संबंध में जो छोटे छोटे कार्य किए गए हैं उनसे महिला का वास्तविक मूल्य और स्थान स्पष्ट होगा।


यहांपर हमने उचित समझा कि इस कार्यक्रम की विशेषज्ञ से इस संबंध में बात चीत करें।
हमनेसुश्री असअदी से पूछा कि इस कार्यक्रम की रचना के पीछे आप का क्या उदेश्य है?

तोउन्हों ने कहा

महिला के विषय पर सदैव ही विभिन्न दृष्टिकोंण रहें है। इन्हीं विभिन्न दृष्टिकोंणों के कारण महिलाओं को अत्यधिक कठिनाइयों का सामना रहा है।
आज भीऐसेलोगोंकी कमी नहीं है जो महिलाओं की समस्याओं पर ध्यान देते हैं, और इन समस्याओं का समाधान करने के प्रयास में लगे हैं, परन्तु खेद से कहना पड़ता है कि उनके दृष्टिकोंणों का आधार सुदृढ़ नहीं है और वो ठोस नियमों पर आधारित नहीं हैं।
ये लोग नरतथा निरा की प्राकृतिक शारिरिक और आत्मिक विभिन्नताओं पर बिना ध्यान दिए यह चाहते हैं कि उनमें समानता उत्पन्न करें। स्पष्ट सी बात है कि महिला एवं पुरुष की स्वाभाविक विशेषताओं की उपेक्षा, स्वँय कुछ व्यक्तिगत व सामाजिक कठिनाइयों के उर्तपन्न होने का कारण बने गी। आप पश्चिम में देखें, महिलाओं को जो स्वतन्त्रता वहां पर दी गई है उसके कारण इन समाजों को अत्यधिक हानि उठानी पड़ रही है। महिलाओं को मानसिक शान्ति नहीं मिल पाती, परिवार बिखर रहे हैं और पति तथा पत्नी के बीच विश्वास एवं समरसता की भावना पारस्परिक उपेक्षा के कारण समाप्त हो गई है।


इनविषयों ने महिलाओं में एक आन्तरिक खोखलेपन की भावना उत्पन्न कर दी है। इस कार्यक्रम द्वारा हम यह सन्देश देना चाहते हैं कि महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा के लिए ऐसे क़ानून और नियम बनाए जाने चाहिए कि जो महिलाओं की मानवीय प्रवृत्ति से ताल - मेल तथा उसकी शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं के अनुकूल हों।
उचितहोगा यदि यह क़ानून व नियम धार्मिक विचारों से प्रेरित हों और महिला अधिकारों की सुरक्षा के लिए जो भी क़दम उठाया जाए वो ईश्वर को केन्द्र मान कर हो। निश्चित रुप से सभी - महिलाएं , यहां तक कि वो भी जो विदित रुप से नास्तिक हैं, आन्तरिक रुप से एक ऐसे उद्देश्य तथा आध्यात्मिकता की प्यासी हैं जो उनहें सफलता की ओर अग्रसर कर सके।

सुश्रीअसअदी ने आगे कहा

पुरुषकी भॉंति ही एक इन्सान के रुप में महिला भी ईश्वर की उत्तराधिकारी कही गई है, जिससे ईश्वर के सम्मुख उसकी प्रतिष्ठा और उच्चस्थान का पता लगता है। रचना की दृष्टि से वो ईश्वर के प्रेम व स्नेह का प्रतीक है।
ईश्वरभी इस संसार को इसी स्नेह व प्रेम द्वारा संचालित करता है और पवित्र क़ुरआन की बहुत सी आयतें प्रेम तथा उपकार का पाठ देती हैं।
इसलिएउचित यही है कि महिला के स्नेह, प्रेम एवं आत्मियता के स्रोत को ईश्वरीय प्रेम और मानवीय मूल्यों के विकास की दिशा में अग्रसर किया जाए ताकि धीरे धीरे वो उसके, उसके परिवार और अन्तत: सामाजिक विकास सफलता एवं स्वास्थय का कारण बन जाए।

महिला जगत -१५

धर्म और स्वस्थ मानसिकता

मनुष्य की मानसिक स्थिति पर पड़ने वाले धार्मिक विश्वासों के प्रभाव पर यद्यपि कम ही ध्यान दिया गया है, परन्तु इस संदर्भ में किए गए मूल्यांकनों ने दर्शा दिया है कि इन विश्वासों का जीवन के सभी पहलुओं पर गहरा प्रभाव पड़ता है और यह लोगों को मादक पदार्थों तथा शराब से दूर रखते हैं। दृढ़ धार्मिक विश्वास कारण बनते हैं कि लोगों पर मानसिक दबाव कम पड़े। हतोत्साह का शिकार कम हों, अपराधों की ओर उन्मुख न हों और उनके परिवारों में तलाक़ की बात बहुत कम हो। ईश्वरीय धर्मों में विश्वास रखने वाले आत्महत्या की ओर भी कम ही जाते हैं।


पश्चिमीमनोवैज्ञानिकोंने अपने एक अध्ययन द्वारा पता लगाया है कि जो लोग चर्च नहीं जाते वो उन लोगों की तुलना में आत्म हत्या करने की संभावना चार गुना अधिक रखते हैं जो निरन्तर चर्च जाते रहते हैं। क्योंकि काठिनाइयों से मुक़ाबले के लिए धार्मिक व्यक्ति आत्म हत्या के मार्ग को स्वीकार नहीं करते। जिन लोगों को धर्म में अधिक विश्वास नहीं होता वही अधिकतर आत्महत्या करते हैं।
अमरीकीअनुसंधानकर्ता स्टॉंक ने धार्मिक लोगों द्वारा आत्महत्या कम किए जाने के विभिन्न कारण बताए हैं जिनमें आत्म सम्मान की ठोस भावना और नैतिक दाइत्व को समझना प्रयुख हैं। उनका कहना है कि धर्म में विश्वास आत्म सम्मान में वृद्धि करता हैं और इस भावना की अनुमुति उन लोगों को नहीं हो पाती जिन्हें धर्म में विश्वास नहीं होता है।


मादकपदार्थोंकेप्रयोग के संबंध में किए गए अनुसंधानों में वही परिणाम सामने आए जो आत्महत्या के संबंध में सामने आए थे। उदाहरण स्वरुप २० प्रयोग करके अनुसंधान कर्ता इस परिणाम पर पहुंचे कि जिन लोगों को धर्म में विश्वास नहीं होता उनके लिए यह भविष्यवाणी की जा सकती है कि आगे चलकर वो मादक पदार्थों के आदी बन सकते हैं। कुछ अनुसंधान कर्ताओं ने तो पूरे विश्वास के साथ यह कहा है कि धार्मिक लोग मादक पदार्थों का प्रयोग नहीं करते हैं। १२ अनुसंधानों के परिणाम दर्शाते हैं कि धार्मिक विश्वास, मादक पदार्थों के प्रयोग में कमी का कारण बनते हैं। इस अनुसंधान के अन्य परिणामों में से यह है कि धार्मिक भावनाएं किसी व्यक्ति में जितनी मज़बूत होंगी, मादक पदार्थों के प्रयोग की संभावना उतनी ही कम होगी। यह विषय इस बात की पुष्टि करता है कि गहरे धार्मिक विश्वास लोगों को मादक पदार्थों की लत में पड़ने से रोक देते हैं।


अपराधीएवं धार्मिक भावना के बीच संबंध का मूल्यांकन दर्शाता है कि धार्मिक विश्वास रखने वाले लोग कम ही अपराध करते हैं। दूसरे शबदों में धार्मिक समोरोहों में भाग लेना और धार्मिक नियमों का पालन, अपराधों को रोकने वाला हो सकता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि सन्तुष्ट वैवाहिक जीवन और धार्मिक विश्वासों के बीच कोई संबंध है या यह कि क्या धार्मिक होना तलाक़ को रोकने का कारण बनता है?
क्याधार्मिकलोगों में तलाक़ की दर कम होने का अर्थ उनके वैवाहिक जीवन की सफलता के अर्थ में है या यह कि वे एक दूसरे के साथ दाम्पत्य जीवन से आनन्द नहीं उठा रहे हैं और विवशता से एक दूसरे के साथ जीवन बिता रहे हैं?


क्याधार्मिक होना कारण बनता है कि लोग अपने वैवाहिक जीवन से अधिक आनन्द उठाएं?
अनुसंधानकर्ताओं नेअपनेअध्यनों से दर्शा दिया कि दीर्घ काल तक दाम्पत्य जीवन व्यतीत करने का सबसे महत्वपूर्ण कारण उनके वैवाहिक जीवन की सफलता है। कुछ अन्य विद्वान अपने अनुसंधानों के बाद इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि विवाह के स्थाइत्व का सबसे महत्वपूर्ण कारक धर्म पर विश्वास है।
कुछविद्वानों ने वैवाहिक जीवन से सन्तोष और पति - पत्नि के धार्मिक होने के बीच संबंधों का मूल्यांकन किया है। यह अनुसंधान दर्शाते हैं कि धार्मिक होने तथा वैवाहिक जीवन से सन्तुष्ट होने के बीच सकारात्मक संबंध है। दूसरी ओर हम यह जानते हैं कि परिवारिक स्थाइत्व और तलाक़ की संभावनाओं में कमी, स्वयं परिवारों के मानसीक स्वास्थ्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक है। जो पति - पत्नी तलाक़ लेते हैं उनके मानसिक रोगों में गस्त होने की संभावना उन लोगों से कई गुना अधिक होती है जो कभी तलाक़ लेने की नहीं सोचते।


६५वर्ष से उपर की ऐसी ३० महिलाओं का विद्वानों ने अध्ययन किया जिनकी कूल्हे की हड्डी दूटने के कारण उनका आपरेशन किया गया था। इन सभी महिलाओं का धार्मिक विश्वास बहुत मज़बूत था और पता लगा कि इनमें हृत्दय रोग के कोई चिन्ह नहीं थे, बोध की दृष्टि से उन्हें कोई समस्या नहीं थी और यह सभी कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण अस्पताल में भर्ती थीं।
उक्तसभीअनुसंधानों के आधार पर हम कह सकते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में धर्म का विशेष स्थान है। इसी प्रकार धर्म संभावित आत्म हत्याओं में कमी का कारण बनता है, मादक पदार्थों के प्रयोग की संभावना कम करता है, युवाओं में अपराध की भावना में कमी लाता है, परिवारों में तलाक़ की संभावना समाप्त करता है, हतोत्साह की भावना उत्पन्न नहीं होने देता और अन्तत: परिवार में दम्पत्ति के सन्तोष और रुचि को बढ़ाता है। यधपि इस प्रकार के अनुसंधान हमारे देश में नहीं किए गए हैं परन्तु शायद हम कह सकते हैं कि ऐसा किए जाने पर हमारे सामने भी इन्हीं के समान परिणाम आएं गे।

महिला जगत -१६

ख़ुशी क्या है?


इससंदर्भ में डॉकटर ग़फ़्फ़ारी का एक साक्षात्कार
डॉकटरग़फ़्फ़ारी: ख़ुशी क्या है?
डॉकटरग़फ़्फ़ारी- मनुष्य के जीवन में ख़ुशी और दुख या भय और क्रोध जैसी बहुत सारी उत्रेजनाएं होती हैं, जिनमें से प्रसन्नता या ख़ुशी मानव जीवन की सबसे उचित उत्रेजना है और जब यह घर में व्याप्त हो जाती है तो बच्चे सुरक्षा का आभास करने लगते हैं तथा सुरक्षा का यह आभास उनके जीवन में विकास के लिए आवश्यक है।


यदिबचपन में सुरक्षा का आभास न हो तो बच्चे का विकास ठीक से नहीं होगा तथा दूसरों के साथ सहकारिता या सहयोग में भी उसे कठिनाइयों का सामना होगा। इस आधार पर हमें ख़ुशी की आवश्यकता है और ख़ुशी अपने आप ही पैदा नहीं होती।
ख़ुशीउत्पन्न करने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यकता होती है ?
डॉकटरग़फ़्फ़ारी- प्रसन्नता, प्राय: सूचनाओं की समीक्षा तथा व्याख्या करने से उत्पन्न होती है और ऐसी ख़ुशी गहरी और स्थाई होती है। जो चीज़ तर्क एवं बुद्धि पर आधारित नहीं होती वो मनुष्य में एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देती है, जिसे अकारण ख़ुशी कहा जाता है और ऐसा व्यक्ति समाज में सफल, सक्षम तथा लोकप्रिम नहीं होता है।
जहॉंदुख मौजूद होते हैं वहॉ ख़ुशी नहीं रहती। दुख तब उत्पन्न होता है जब मनुष्य विफलता का आभास करे। दुख की भावना से व्याकुल लोगों को हम बड़ी संख्या में अपने चारों ओर देख सकते हैं, यहॉ तक कि मनोवैज्ञानिक इसको मनोचिकित्सा का ज़ुकाम कहते हैं। जब एक व्यक्ति विजय का आभास न करे उसमें हतोत्साह उत्पन्न होता है।
इसकेएक भाग का संबंध उसके व्यक्ति तथा पारिवारिक जीवन से है और दूसरा भाग समाज से संबंधित है।


समाजमें किस प्रकार के क़ानून बनाए जाएं कि सभी प्रसन्नता प्राप्त कर सकें?
अवसरोंको इस प्रकार से विभाजित किया जाना चाहिए कि हर व्यक्ति को उसकी योग्यता, चेतना, आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सूचनाओं के आधार पर समाज में स्थान मिल सके।
इससंबंध में लोगों को तीन गुटी में बांटा जा सकता है।
१- कुछ लोगयह समझते हैं कि समाज में उन्हें उनके अनूकूल स्थान नहीं मिला है।
२- कुछलोगों की भावनाएं मध्यम स्तर की होती हैं।
३-तीसरे प्रकार के लोग यह समझते हैं कि यदि संसार का विभाजन न्यायपूर्ण रुप से किया जाता तो मुझे इससे कम ही मिलता और ऐसे लोगों में ऊर्जा भरी होती है, यह सदैव विजय की भावना से ओतप्रोत रहते हैं और जीवन को ख़ुशी से बिताते हैं।

मेरे विचार में बच्चों का प्रशिक्षण उसी समय उचित एवं श्रेष्ठ ढंग से हो सके गा जब परिवार दो उद्देश्यों को लेकर चलें और उन्हें अपने बच्चों के व्यवहार में रचा - बसा सकें।
एकउद्धेश्य क्षमता उत्पन्न करना है। अर्थात उन कठिनाइयों के समाधान की क्षमता उत्पन्न करना जिनका समाधान एक साधारण व्यक्ति कर सकता है न कि एक असाधारण व्यक्ति।
दूसराउद्धेश्य बच्चे के व्यवहार में अनुकूलता या सामन्जस्य की भावना उत्पन्न करना है। अनुकूल व्यवहार वाला व्यक्ति वो है जिसके सम्पर्क में यदि हम जाएं तो हमें उसकी अनुचित प्रतिक्रियाओं की चिन्ता न हो। एक अनुकूल व्यवहार वाले व्यक्ति से सरलता से बात की जा सकती है। उसकी आलोचना की जा सकती है और उसकी उपस्थिति में मनुष्य को किसी प्रकार के तनाव या दबाव का आभास नहीं होता। वो महान अवश्य है पर तानाशाह नहीं है। उसके सम्मुख हम ख़लकर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। हमें इस बात का भय नहीं होता कि कहीं वो हमारा अपमान न करदे।
प्रसन्नताया ख़ुशी उत्पन्न करने के लिए क्या करना चाहिए?



डॉकटरग़फ़्फ़ारी- प्रसन्नता के संबंध में दो विषय महत्वपूर्ण हैं
एक यह किलोग दुखी न हों और दूसरे यह कि कौन सी बातें उन्हें दुखी करती हैं। विफलता लोगों को दुख पहुंचाती है। इस आधार पर सबसे पहले समाज में कार्यक्रम इस प्रकार से बनाए जाएं कि हर व्यक्ति को मध्यम सीमा की सफलता अवश्य प्राप्त हो सके। चूंकि मनुष्य में मानसिक, स्वाभाविक सामाजिक तथा आध्यात्मिक आवश्यकताएं होती हैं इसलिए सामाजिक योजनाएं इस प्रकार की होनी चाहिए जो उसकी इन आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। यदि ऐसा न हुआ तो दो घटनाएं घटें गी। पहली यह कि यदि लोग अपनी स्वाभाविक इच्छाओं को दबाएं गे तो वे शारिरिक एवं मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाएं गे।
जबव्यक्ति विफल होजाता है तो पहले वह उद्धण्डं फिर हतोत्साहित और तीसरे चरण में उदासीन हो जाता है।


दूसरेयह कि जब मूल आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती तो कुछ लोग हतोत्साह का शिकार हो जाते हैं और फिर आत्म हत्या या नशे की ओर बदने लगते हैं।
इनसभी परिस्थितियों से बचने का पहला उपाय जनसंख्या पर नियंजण करना है।
यह अत्यन्तआवश्यक है कि समाज की संभावनाओं का न्यायपूर्ण विभाजने हो, परन्तु यदि जनसंख्या इसी प्रकार बढ़ती गई तो परिस्थितियां आधिक जटिल हो जाएं गी क्योंकि जितनी तेज़ी से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है संभावनाओं में नहीं हो रही है। जनसंख्या पर नियंजण द्वारा समाज के सभी लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके और इससे सफलता प्राप्त होगी और लोग प्रसन्न रहें गे।
स्वस्थसमाज वो समाज है कि जो अपने नागरिकों के लिए संभावनाएं इस सीमा तक उपलब्ध करवाए जिनके द्वारा लोग अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं से यथा संभव लाभ उठा सकें। जैसे ज्ञान, कला तथा व्यायाम या खेलों के क्षेत्र में ! इससे लोगों में सफलता की भावना उत्पन्न होती है।


स्वस्थसमाज की एक अन्य विशेषता यह है कि वो अपने नागरिकों को साक्षर करवाने के लिए पूंजीनिवेश करता है। उन्हें शिक्षित करने का प्रयास करता है। क्योंकि जब लोग शिक्षित होंगे तो तलाक़ की दर में कमी आए गी, विवाह सफल होंगे, जनसंख्या नियंजित रहे गी और चिकित्सा तथा दवाओं की आवश्यकता कम पड़े गी और इस प्रकार समाज में ख़ुशी व्याप्त हो जाए गी।

महिला जगत -१८

क्या आप ने कभी सोचा है कि आप को किस प्रकार के लोग अपनी ओर आकर्षित करते हैं? आप को प्रोत्साहित करते हैं? प्राय: जो लोग किसी काम को अत्यन्त उत्साह एवं रुचि से करते हैं वो लोग आप के भीतर इस प्रकार की भावना उत्पन्न करते हैं। ये लोग ऊर्जा से भरे हुए ज्वालामुखी होते हैं और जहां भी होते हैं लोगों में ऊर्जा  भर देते हैं। आप कभी यह नहीं चाहें गे कि उनसे अलग या दूर हो जाएं। आप सोचें गे कि काश इन लोगों की ऊर्जा का थोड़ा सा भाग आप के भीतर भी पहुंच जाता। जब कभी आप स्वंय को बड़ी ही उबाऊ या थकान वाली स्थिति में पाते हैं चाहे घर में हों या कार्य स्थल पर तो क्या यह सोचते हैं कि इस स्थिति को किस प्रकार से परिवर्तित किया जाए? आप किस प्रकार से थोड़ी ऊर्जा या थोड़ी सी आशा अपने जीवन में भर सकते हैं? आप किस प्रकार से अपने नकारात्मक विचारों से अपना पीछा छुड़ा सकते हैं।

सबसे पहले तो हमें यह जान लेना चाहिए कि यह हम स्वंय हैं जो अपने व्यवहार का चयन करते हैं, जब हमारा व्यवहार अच्छा और सही होगा, तो हमारे दृष्टिकोण भी परिवर्तित हो जाएं गे। यधपि संभव है कि हमारे विचार हमसे कुछ और ही कहें, परन्तु हम अपने व्यवहार को परिवर्तित कर लेते हैं।

यदि हम यह निर्णय कर लें कि ईश्वर द्वारा दर्शाए गए सकारात्मक मार्गों के बारे में विचार करेंगे तो फिर हमारे मन में बुरे विचारों का कोई स्थान ही नहीं रह जाए गा। यदि हम ईश्वर के आदेशों का पालन करें तो हमारे मन में स्वंय ही शिष्टाचार की भावना उत्पन्न हो जाए गी।


हमअपने ग़लतविचारों एवं विश्वासों को यदि परिवर्तित करें तो हमारा नया व्यवहार स्थाई होगा।

अधिकतर हम अपने मस्तिष्क के नकारात्मक विचारों पर इतना विश्वास कर लेते हैं कि स्वंय को यह अनुमति देते हैं कि उनके बारे में विचार करें क्योंकि उनसे हमें बड़ी अच्छी अनुभूति होती है। हममें से बहुत सारे लोगों ने अपने मस्तिष्क को इन विचारों से इतना अधिक भर लिया होता है कि हमारे लिए किसी दूसरे ढ़ंग से विचार करने का कोई मार्ग ही नहीं रह जाता है। हम इन सारे झूठों पर इतना विश्वास करलेते हैं कि इनके उचित या अनुचित होने को समझने का प्रयास ही नहीं करते।

अब प्रश्न यह उठता है कि हम अपने अन्दर परिवर्तन लाएं भी तो किस प्रकार? यदि हम अपने अन्दर परिवर्तन लाना चाहते हैं तो हमें अपने विचारों के दाइत्व को स्वीकार करना पड़ेगा।


हमेंस्वंय सेसंबंधित वास्तविकताओं का पता लगाने का प्रयास करना पड़े गा। हमें ईश्वर की ओर ध्यान देना पड़े गा ताकि हम यह देखें कि हमारे बारे में उसका दृष्टिकोण क्या है? यह ईश्वर है जिसने हमारी रचना की है और हमारे भविष्य के लिए उसने बहुत सारे वादे किए हैं। जब भी हम पवित्र क़ुरआन में ईश्वर के वादों पर पहुंचते हैं, तब हमें अपने आस पास एक दृष्टि दौड़ा लेनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि कुछ करें या नहीं?

जब हमें ईश्वर के प्रेम की अनुभूति होगी तो हम देखें गे यह प्रेम इतना व्यापक हो गया है कि हम सभी लोगों से प्रेम करने लगे हैं।

धार्मिक शिक्षाओं, अध्यात्मिक नियमों और ईश्वर द्वारा दर्शाए गए मार्गों पर चलकर हम शिष्टाचार के उच्चतम शिखर पर पहुंच सकते हैं। इसके बाद हमें यह देखना चाहिए कि ऐसी क्या चीज़ है जो हमें झिंझोड़ कर रख देती है, हमारे अन्दर ऊर्जा और स्फूर्ति की नई लहर दौड़ने लगती है। इस स्थिति को बनाए रखने के लिए हमें योजना बनानी चाहिए। हमें यह भली भांति ज्ञात होना चाहिए कि हमारी वास्तीवक रुचि किस चीज़ में है।


जबहमनिरन्तरअपनी रुचि के अनुरुप कार्य करें गे तो इसका प्रभाव हमारे पूरे अस्तित्व पर पड़ेगा। हमें स्वंय इस बात का ज्ञान होता है कि हमें किस कार्य में रुचि है और किसमें नहीं है। जब हम इस प्रकार जीवन व्यतित करना आरम्म करें गे तो बहुत सारे दुख और नकारात्मक विचार स्वंय ही समाप्त हो जाएं गे। हमें अपने कार्यों में अपने विश्वासों के आधार पर सुदृढ़ और स्थाई रहना चाहिए। जो भी क़दम उठाएं वो अडिग और ठोस हो।

महापुरुषों का कथन है कि जीवन में उचित मार्ग का चयन करना चाहिए। अपने अस्तित्व में ईश्वर की वास्तविकता को पहचानिए और समझिए।


ईश्वरकाध्यानकरने के लिए अधिक समय रखिए। स्वंय अपने अस्तित्व से उसका नाता जोड़ने का प्रयास कीजिए। जब आप ईश्वरिय इच्छा के अनुरुप जीवन बिताने का प्रयास करें गे तो निश्चित रुप से आप का अस्तित्व इतना निखर जाए गा कि हर व्यक्ति उसकी ओर आकार्षित होगा।

आप की रुचियों में दूसरों को भी रुचि होने लेगेगी और इस प्रकार आप जिस स्थान पर भी हों घर में, सड़क पर या कार्यालय में, दूसरों में ऊर्जा और स्फूर्ति भर देने में सक्षम हो जाएं गे।

महिला जगत -१७

रोज़गार एक ऐसा शब्द है जो आरम्भ से मनुष्य के साथ रहा है। इतिहास में पहली बार हमें यह शब्द अर्थ शास्त्रियों के बीच दिखाई दिया। साधारण शब्दों में रोज़गार में व्यस्त एक ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जिसमें रिस्क लेने की क्षमता हो और एक प्राथमिक विचार धारा को आर्थिक गतिविधि में परिवर्तित कर सकता हो। हम सभी रोज़गार के अवसर अपलब्ध कर सकते हैं चाहे हम कर्मचारी हों, किसान हों, कारीगर या मज़दूर हों या किसी भी पद या स्थान पर हों, हम अपने रचनात्मक विचारों को साकार रुप दे सकते हैं। जिस व्यक्ति में सृजनात्मक शक्ति होती है वो अपनी नई नई धारणाओं से नए अवसर उपलब्ध करवाता है और समाज में रोज़गार के अवसर उपलब्ध करवाता है। वस्तुत: यह एक प्रकार का सामाजिक निर्णय है।

रोज़गार के अवसर उपलब्ध करवाने वालों की विभिन्न परिभाषाएं की गई हैं। ऐसे व्यक्ति जिनमें सृजनात्मक शक्ति होती है, कुछ नया करना चाहते हैं या रोज़गार के नए अवसर उपलब्ध करवाने के मार्गों की खोज में रहते हैं, आत्म निर्भर रहना चाहते हैं। अपनी इस विशेषता के कारण वो जीवन की कठिनाइयों का सामना सरलता से कर लेते हैं। उपलब्ध अवसरों से अधिक से अधिक लाभ उठाते हैं। उनमें नए जोखिम स्वीकार करने का साहस होता है।

वो हर अवसर से लाभ उठाते हैं, चाहते हैं कि निरन्तर विकास की ओर बढ़ते जाएं। किन बातों को प्राथमिकता दी जाए, इसको समझने की क्षमता उनमें भरी होती है।

आशावान होना इन लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है इसी कारण अधिकांशत: ये लोग ऊर्जा से भरे हुए होते हैं।

जो लोग दूसरों को रोज़गार उपलब्ध करवाने की क्षमता रखते हैं उनमें स्वयं पर नियंत्रण प्राप्त करने की बड़ी शक्ति होती हैं। अधिकतर वो लोग लक्ष्य पर दृष्टि रखते हैं और उसे पूरा करने का प्रयास करते रहते हैं, जबकी अधिकांश लोग जब कोई कार्य करते हैं तो उनका ध्यान उसी पर रहता है न कि लक्ष्य पर। रोज़गार उपलब्ध करवाने वालों की एक अन्य विशेषता साहस है। ये लोग दूसरों के कार्यों में बड़ी ही सरलता से हाथ बटा सकते हैं और कुछ कार्य दूसरों से बेहतर ढंग से कर सकते हैं और स्वयं को नई परिस्थितियों के अनुकूल ढ़ाल सकते हैं।

मनुष्य में सृजनात्मक शक्ति की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। कुछ लोग समझते हैं कि सृजन या खोज करने की विशेषता कुछ लोगों तक ही सीमित है और वो इस क्षमता के साथ ही जन्म लेते हैं, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि यह योग्यता सभी में होती है, केवल आवश्यकता इस बात की है कि कुछ नियमों एवं तकनीकों का प्रयोग करके उनको विकसित्त किया जाए। कल्पना और सृजन, मनुष्य के मस्तिष्क की मूल शक्तियाँ हैं।


इससंबंध में विलियम शेम्सपियर ने कहा है-
किसीकार्य को आरम्भ करने की शक्ति ने मनुष्य को सृष्टि का सर्व श्रेष्ठ प्राणी बना दिया है।

महिलाओं के घर से बाहर काम करने के बारण माता- पिता की भूमिका में परिवर्तन आ गया है, अब माता- पिता अपने व्यवहार द्वारा बच्चों में आत्म विश्वास उत्पन्न करके उनके रोज़गार के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब बच्चा देखता है कि उसके माता- पिता कार्य एवं उत्पादन में प्रयासरत हैं और उनकी गतिविधियों द्वारा प्राप्त उपलधियाँ उसके सामने होती हैं तो उसके मन में नए विचार जन्म लेते हैं। वो अपने परिवार के साथ अपने रोज़गार के भविष्य पर विचार- विमर्श करता है। हो सकता है माता पिता के मार्गदर्शन से उसे लाभ हो और उनके दर्शाए मार्ग पर चल पड़े या फिर स्वंय अपने प्रयासों से किसी स्थान तक पहुंचने का प्रयास करे।

बच्चों की सृजनात्मक शक्ति की पहचान, माता- पिता के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। घर के भीतर का वातावरण और माता- पिता का दिशा निदेर्शन बच्चे को उस ओर ले जाता है जहां वो अपनी पहले वाली आदतें छोड़ कर नया व्यवहार अपनाए और स्वंय को सामाजिक व्यवस्था के साथ समनीवत करे। बहुत सारे बच्चे पढ़ाई लिखाई में कड़ा परिश्रम करके उच्च श्रेणी में पास होते हैं, उच्चतम शिक्षा प्राप्त करते हैं परन्तु कभी कभी उन्हें लगता है कि यह नौका, जिसने उन्हें एक सुखद यात्रा का वादा दिया था डूब गई या डूब रही है और अपना जीवन बचाने के लिए उन्हें हाथ पावं मारने पड़ें गे।

ऐसे समय में माता- पिता का मार्ग दर्शन बच्चे को उचित रोज़गार प्राप्त करने की दिशा में होना चाहिए, न केवल यह कि वो इस स्थिति से किस प्रकार उबर सके।

समाज में सकारात्मक आर्थिक गतिविधियों के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करके उन्हें उद्धेश्यपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर किया जा सकता है। उनको सिखाना चाहिए कि सामूहिक रुप से मिल जुल कर किस प्रकार काम किया जा सकता है। देशों के विकास का एक मापदण्ड उनके सामूहिक कार्य की संस्कृति हैं। पिघड़े हुए देशों में लोग सामूहिक रुप से काम करने में रुचि नहीं रखते जिससे कामों की गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों का स्तर नीचा रहता है। समाज के विकास के लिए सामूहिक गतिविधियां आवश्यक हैं, जिसकी भूमिका परिवार में बननी चाहिए। अब हम यह देखें गे कि यह कार्य किस प्रकार से किया जाए।

सबसे पहले तो बच्चों को अपनी आयु के बच्चों के साथ मिल कर कार्य करने पर तत्पर करना चाहिए।

उनका दिशा निदेर्शन करने के लिए बड़ों को भी उनके साथ सहकारिता करनी चाहिए। उनके उद्धेश्य का निर्धारण कीजिए, बड़ो को चाहिए कि बच्चों की रुचि जिन विषयों में हो उनसे संबंधित पुस्तकें उनको उपलब्ध करवाऍं। उनको कम्प्यूटर, इन्टरनेट तथा नए तकनीकी विकास से परिचित करवाएं।

हम एक व्यवसायिक युग में जी रहे है , इस व्यवसायिक युग में परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए निरन्तर प्रयास की आवश्यकता है। आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति के साथ क़दम बढ़ाने की आवश्यकता है।

हमारा उद्धेश्य बाहय सुन्दरता, धन- सम्पत्ति आदि नहीं होना चाहिए बल्कि हमारी दूर दृष्टि भविष्य पर लगी रहनी चाहिए। जब बच्चा माता पिता को निरन्तर आगे बढ़ने या कुछ नया करने में सदैव व्यस्त देखे गा तो स्वंय उसमें भी इसके लिए जिज्ञासा उत्पन्न होगी।

ऐसे परिवार में सदैव हर्ष व उल्लास तथा कुछ नया करने का उत्साह भरा रहता है। एक दूसरे के कार्यों की प्रसन्नता करके उनका प्रोत्साहन करते हैं। ये लोग निडर और साहसी होते हैं।

विफलताएं इनके मार्ग की बाधा नहीं होतीं बल्कि वो इनसे पाठ सीखते हैं। जीवन में निराशा का नाम तक नहीं होता। अपने हर विचार हर सपने को साकार करने में लगे रहते हैं।

उनके लिए खेलना, कूदना एक दूसरे के साथ मज़ाक़ करना, समय व्यर्थ करना नहीं है बल्कि मनोरंजन है जिसका मानव जीवन में बहुत महत्व है। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास भरा होता है, वे सदैव अवसर की खोज में रहते हैं क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि अवसर देर में हाथ आते हैं परन्तु हाथ से बड़ी जल्दी ही निकल जाते हैं।

महीला जगत−१९

सभी सामाजिक संबंधों का मुख्य आधार प्रेम करना और प्रिय होना होता है, विशेषकर दूसरों द्वारा पसन्द किए जाने की भावना और अधिक सफलताएं प्राप्त करने की भावना मनुष्य की आवश्यकता हैं। मनोवैज्ञानिकों के विचार में इस संदर्भ में माता - पिता के कॉधों पर भारी दाइत्व होता है। आज हम इसी संबंध में कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास करें गे।
अपनेअतीत में जाकर अपने माता - पिता और शिक्षकों को याद कीजिए, जिन्होंने आप से कहा हो कि " तुमपर मुझे गर्व है"। इस बात की याद से भी आप को कितनी ख़ुशी मिलती है और जब आप इसके बारे में सोचते हैं तो याद आता है कि उस क्षण आप को कितना आत्म विश्वास प्राप्त हुआ था और एक अनोखे अभिमान की भावना का आभास हुआ था।


नि:सन्देहंइन शब्दों ने आप के व्यक्तित्व पर स्थाई प्रभाव डाला है। तो फिर आप के बच्चों पर भी इसी प्रकार का प्रभाव अवश्य पड़े गा। अपने बच्चों में आत्म विश्वास की भावना पैदा करने के लिए पहले आप को उसपर विश्वास होना चाहिए।
क्योंकिहर बच्चे के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय माता - पिता का विश्वास प्राप्त करना है। आत्म विश्वास की भावना बच्चों में परिवार की ओर से पैदा करवाई जाती है।
माता- पिता द्वारा बच्चे को भले या बुरे नामों से पुकारने का प्रभाव उसके भविष्य पर पड़ता है बुरे नाम जैसे तुम मूर्ख हो, तुम अक्षम हो, तुमने कोई काम अबतक ठीक से नहीं किया है, तुम नासमझ हो , इत्यादि।
अच्छेनाम इस प्रकार के हो सकते हैं।
तुमसदैव बेहतरीन काम करते हो, मेरी समझदार बेटी या मेरे चतुर बेटे- शाबाश।
आइएअब देखते हैं कि परिवारों में प्रति दिन बच्चों को दी जान वाली इन संज्ञाओं का उनपर क्या प्रभाव पड़ता है। हो सकता है कि आप ने भी यह शब्द पहले सुने हों, यहां तक कि संभव है आप ने अभी हमारी यह चर्चा सुनने से पहले ही अपने बच्चे को इनमें से किसी नाम से पुकारा हो।
क्याआपने कभी सोचा है कि आप के अन्दर जितना आत्मविश्वास इस समय है, यदि उससे अधिक होता तो आप क्या - क्या काम करते? या यदि आप के माता - पिता या अन्य संबंधी अन्जाने में ऐसे शब्द न बोलते तो आज आप का जीवन कैसा होता?


अबहम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जीवन के भविष्य और अतीत पर शब्दों और वाक्यों का प्रभाव पड़ता है। जिन बच्चों को परिवार की ओर से बुरे या ग़लत नामों से पुकारा जाता है ऐसे बच्चे परिवार के बाहर के संसार में हर प्रकार की अपनी विफलता को बड़ा दिखाते हैं और एक गहरा मानसिक घाव उनको दुख देता रहता है।
क्योंकिइस प्रकार के बच्चों को अपने माता - पिता के जो मात्र वाक्य याद रहते हैं वो तुम मूर्ख हो आदि होते हैं। उनके मस्तिष्क में यह वाक्य जम जाते हैं और बाद के जीवन की विफलताओं में उसकी वृद्धि होती जाती है। इस प्रकार वे स्वंय को तुच्छ समझने लगते हैं और उनमें आत्म विश्वास की भावना समाप्त हो जाती है।
इसकेविपरितजो बच्चे अपने परिवारों द्वारा अच्छे नामों से प्रकारे जाते हैं, उनकी दृष्टि में कठिनाइयां और विफलताएं बड़ी नहीं होतीं और वे स्वंय इसका समाधान करने का प्रयास करते हैं।
वेअपने व्यक्तित्व की कदापि आलोचना नहीं करते बल्कि प्रयास करते हैं कि अपनी ग़लतियां सुधारें क्योंकि उन में आत्म विश्वास होता है।
नएजन्मलेने वाले शिशु को अपने अतीत या भविष्य के लिए कोई चिन्ता नहीं होती। ये बच्चा अपने आस - पास के लोगों को अपना आदर्श बनाता है। ये लोग जितना अधिक उसको महत्व देंगे उतना ही अन्जाने में वो अपना महत्व समझने लगेगा।


माताजब बच्चेकोदूध पिलाती है तो शिशु के साथ शरिरिक संबंध स्थापित होने के साथ ही शिशु के मन में आत्म विश्वास एवं शन्ति की भावना उत्पन्न होती है।
यादरखिए कि हर बच्चा अपने आप में अद्वितीय है। इसलिए यदि आप अपने बच्चे की व्यक्ति गत योग्यताओं का मूल्य समझें गे तो वो भी अपने अस्तित्व के मूल्य को समझे गा।
आपयदि चाहते हैंकिकिसी कार्य के लिए अपने बच्चे की प्रशंसा करें तो पहले उसे वो काम याद दिलवाइए फिर उस की शाबाशी वाले वाक्यों से प्रशंसा कीजिए। अपने बच्चे को सदैव अच्छे नामों से पुकारें और जिस क्षेत्र में भी उसे समर्थन या सहायता की आवश्यकता हो उसमें कभी कमी न करें। हर बच्चे में एक या कई क्षेत्रों में योग्यता होती है, प्रयास कीजिए कि उन योग्यताओं का पता लगाएं फिर उन योग्यताओं को विकसित करने की भूमि प्रशस्त कीजिए। अपने बच्चे के छोटे छोटे कार्यों को भी महत्व दीजिए ताकि भविष्य में वो भी दूसरों के कार्यों को महत्व दे।

अन्तमें हम आप को यह बताने का प्रयास करेंगे कि

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बच्चे अपनेमहत्व का आभास करते हैं।
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बिना भय केअपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
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उनकेकार्यों में विकास हो ।
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अपनी संवेदनाएंबड़ी हीसरलतासे व्यक्त करते हैं।
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जहांआवश्यकता हो वहां किसी का अपमान किए बिना आगे बढ़ जाते हैं
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दूसरों कीयोग्यताओं को देखते और उसे दूसरों से बयान करते है।
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अपनेअधिकारों की रक्षा करते हैं और दूसरों के अधिकारों का हनन नहीं करते।
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अपने उद्धेश्योंकी दिशा में बढ़ने वाले कार्यों का चयन करते हैं।

महीला जगत-२०

साबुन से निकले हुए बुलबुले गोल क्यों होते हैं?
हवाओंको कौन चलाता है? बर्फ़ सफ़ेद क्यों है? यह प्रश्नों के वो उदाहरण हैं जिनसे बच्चे, अपने माता - पिता को परेशान कर डालते हैं। अलबत्ता माता पिता इस बात से कि उनका बच्चा तेज़ बुद्धि वाला और हर बात को जानने के लिए उत्सुक होता है, ख़ुश होते हैं परन्तु दूसरी ओर जब बच्चे को देने के लिए उनके पास कोई जवाब नहीं होता तो तंग आ जाते हैं। हालांकि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस संबंध में निराश होना ठीक नहीं है। निश्चित रूप से माता - पिता इनसाइक्लोपिडिया अर्थात विश्व- कोष तो होते नहीं।


जोव्यक्तिभी इस बात को स्वीकार करता है कि वो सर्व बुद्धिमान नहीं है उसके व्यक्ति और स्थान से किसी चीज़ में कमी नहीं होती है। परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि माता - पिता यदि प्रश्न का उत्तर नहीं जानते तो उन्हें कम से कम इतना अवश्य करना चाहिए कि बच्चे के उस प्रश्न के बारे में उससे बात करें और उन्हें कदापि इसकी अनदेखी नहीं करना चाहिए। माता- पिता को यह जान लेना चाहिए कि जो बच्चा बहुत अधिक प्रश्न करता है वो बहुत सारी नई चीज़ों की खोज कर सकता है। प्रश्न करना बच्चे को चुस्त और चतुर बना देता है।
दूसराध्यान योग्य विषय यह है कि कई बार बच्चे एक के बाद एक प्रश्न करते जाते हैं परन्तु इसके पीछे उनका उद्धेश्य प्रश्न पूछना या उत्तर पाना नहीं होता बाल्कि वो इसके द्वारा अपने माता-पिता का ध्यान अपनी ओर आकार्षित करना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि वे उनके साथ समपर्क स्थापित कर सकें।


बच्चेके प्रश्नका उत्तर देते समय माता-पिता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बहुत तेज़ी से उत्तर न दें। जैसे इस प्रश्न का उचित उत्तर कि गोली पिस्तौल से कैसे निकलती है, समझा कर दिया जा सकता है कि कैसे गोली पिस्तौल में डाली जाती है और फिर कौन सा बटन दबाने से वो दग़ जाती है इत्यादि। बच्चे सोचते हैं कि खेल-खेल में माता-पिता से प्रश्न करके उनके साथ निकट संबंध स्थापित किए जा सकते हैं। इस आधार पर माता-पिता को तेज़ी से उत्तर देकर बच्चों के इस खेल में बाधा नहीं डालनी चाहिए न ही उसे समाप्त करना चाहिए।
प्रोफ़ेसरशेफ़र का कहना है कि आप अपने बच्चों के प्रश्नों पर स्वंय उनसे प्रश्न कर सकते हैं कि इस प्रश्न के उत्तर के बारे में तुम्हारा क्या विचार है।
बच्चाअपनी बात आप के सामने रखें गा और आप उसकी ग़ल्तियां उसे बताएं गे और उसे ठीक करें गे।


इसवार्तालाप में बच्चा न केवल यह कि नई नई चीज़ सीखता है बल्कि माता पिता भी अपने बच्चों को बेहतर रूप से समझ सकते हैं इस प्रकार वो जान पाते हैं कि उनका बच्चा इस विश्व को कैसा देखता या समझता है।
परन्तुकभी कभीअपने लगातार प्रशनों द्वारा बच्चा हमें परेशान कर डालता है। यह आदत उवर्ष के बच्चों में अधिक पाई जाती है। इस आयु में बच्चा एक के बाद एक प्रश्न करके अपने चारो ओर छाए हुए वातावरण की उथल पुथल और हलचल को शान्त करना चाहता है।
इसप्रकारबच्चासन्तुष्ट होकर आराम से और अधिक आत्म विश्वास के साथ जीवन व्यतीत कर सकता है। बेहतर है कि इस आयु के अपने बच्चे की बातों को बदार्श्त करें और धैर्य एवं संयम से काम लें। ऐसी स्थिति यदि कभी उत्पन्न हो जाए कि आप बच्चे के लगातार प्रश्नों से परेशान हो गए हों या उसको उत्तर देने का समय आप के पास न हो तो उससे कहिए कि अभी समय नहीं है जब मेरे पास समय होगा तो तुम्हारे प्रश्न का अत्तर देंगे। यह स्थिति लगभग ६ वर्ष की आयु तक चलती रहती है।
जबबच्चा ६ वर्ष का हो जाता है तो उसका मस्तिष्क समस्याओं और जटिलताओं को समझने के लिए अधिक तैयार होता है और इस आयु में उसके लिए अधिक गहरे और ज्ञान संबंधित प्रश्न उत्पन्न हो जाते हैं।
वोचाहता हैकिजो चीज़ें वो अपने आस पास देखता है उन्हें गहराई से समझे इसी लिए उनके बारे में विस्तार से जानना चाहता है और उनके बारे में प्रश्न करता है। इस चरण में तर्क के साथ की गई सभी बातों को वो स्वीकार कर लेता है।


मातापिता को चाहिए कि अपने बच्चे के हर प्रश्न का उत्तर देते समय ध्यान रखें कि कोई बात अतार्किक न हो। उन्हें यदि आवश्यकता पड़े तो इसके लिए इन्टरनेट या बच्चों से विशेष किताबों का सहारा भी लेना चाहिए। इस प्रकार बच्चे धीरे धीरे यह भी सीख जाते हैं कि अपने सवालों के जवाब किस प्रकार स्वंय ढूंढ़ सकते हैं।