महिला जगत २१-३1



महिला जगत- २१

किशोरावस्था की समस्याओं और किशोरों में आत्म विश्वास उत्पन्न करना
हमसब जानतेहैंकि एक किशोर की भावनाओं, अनुभूतियों, इच्छाओं, आकांक्षाओं यहॉ तक कि उसके शरीर में जो परिवर्तन उत्पन्न होते हैं उनकी पहचान प्राप्त करना किशोर के साथ उसके आस - पास के लोगों विशेषकर बड़ों और माता - पिता के बीच एक तार्किक संबंध उत्पन्न करने की कुन्जी है। यहॉ पर हम कुछ ऐसे बिन्दुओं की ओर संकेत करेंगे जिनपर ध्यान देकर किशोर तथा माता - पिता एक दूसरे के साथ अधिक निकटता का आभास करें।


मनुष्यअपनी पूरी आयु में प्रशिक्षण प्राप्त करता रहता है, दूसरे शष्दों में मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रशिक्षण की प्रक्रिया से गुज़रता रहता है जो उसके आस - पास के लोग एवं वातावरण उसे सिखाता है। अलबत्ता जीवन के आरम्भिक दिनों से लेकर युवावस्था तक प्रशिक्षण का विशेष महत्व होता है। इसलिए अच्छा है कि इसी आयु में हम अपने बच्चों को यह सिखाएं कि मनुष्य को अपने जीवन में कुछ चीज़ों पर विश्वास होना चाहिए और उनके प्रति उसे कटिबद्ध रहना चाहिए।
शिष्टाचारिकनियमों, सामाजिकरीति - रिवाजों और मनुष्य के विश्वासों को धर्म कहा जाता है। धर्म कारण बनता है कि मनुष्य भ्रष्टचार से बचे और जीवन में उसे कल्याण प्राप्त हो। यदि इसके विपरित हो तो मनुष्य एक ऐसे जीव में परिवर्तित हो जाए गा जिसे बुराइयों से कोई रोक नहीं सकता।
नि:सन्देह युवाओं में सही शिष्टाचारिक नियमों विशेषकर धार्मिक नियमों के प्रति कटिबद्धता की भावना उत्पन्न करके उसे बहुत सारी कठिनाइयों तथा युवावस्था की समस्याओं से बचाया जा सकता है। इससे माता - पिता के साथ उनकी सन्तान के संबंधों को बेहतर बनाने में भी सहायता मिलती है।
माता- पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए पवित्रता तथा नैतिकता का उदाहरण बने ताकि बच्चे उनसे इसे सीख सकें।


घरको एक शान्त एवं सुरक्षित स्थान में परिवर्तित करें ताकि युवा अपनी समस्याओं के समाधान के लिए घर ही की शरण में आएं।यदि हम युवा के साथ एक स्वस्थ और तार्किक संबंध स्थापित कर सकें तो हम उसके वैचारिक संसार में क़दम रख सकते हैं और यह उसके सफल प्रशिक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण क़दम है।
मनोविज्ञानने यह प्रभाणितकर दिया है कि जिस प्रकार बच्चे को माता के प्रेम व स्नेह की आव्श्यकता है उसी प्रकार उसे पिता के प्रेम की भी आवश्यकता होती है।


दूसरोंके सम्मुखयुवाओंका अपमान कदापि नहीं करना चाहिए। आप युवा को यह समझाएं कि उसके कोर्यों की ज़िम्मेदारी केवल उसी पर है और आप आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता कर सकते हैं।
युवाओंके अपने कुछ विशेष विचार होते हैं, उनके कोमल एवं सवेंदनशील संसार को कदापि तुच्छ न समझें हमें प्रयास करना चाहिए कि युवा की रुचि के अनुकूल उसके लिए उचित साधन जुटाएं ताकि उसे वैचारिक पथभ्रष्टता से बचा सकें। मित्र तथा युवा की आयु के उसके साथी, उसके व्यक्तित्व निर्भाण में बहुत प्रभावी भूमिका निमाते हैं। इसलिए हमें सर्तक रहना चाहिए कि उसके घनिष्ट मित्र कौन हैं, उनकी क्या विशेषताएं हैं और उनके परिवार पर किस विशेष संस्कृति का प्रभाव है। क्योंकि युवा अपने मित्रों का अनुसरण बड़ी जल्दी करने लगता है और यदि उसके मित्र विश्वसनीय और उचित न हों तो क्या हो सकता है यह आप स्वंम सोचें।


हमेंअपनी युवा सन्तानों का मित्र और साथी होना चाहिए। बजाए इसके कि उसके मुक़ाबले में खड़े हो जाएं या उसपर नियन्त्रण रखने के लिए निरन्तर उसका पीछा करते रहें या अकारण ही उसकी आलोचना करें जिससे केवल युवा की प्रतिक्रियाएं ही सामने आएं गी, हमें चाहिए कि उसके मित्र बनकर रहें।
युवाको ऐसे किसी की खोज होती है जो उसकी बातों को ध्यान से सुने और उसके विशेष संसार को पहचाने।
आइएहम युवा का विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करें।
जबकभी विचार विमर्श की बात होती है तो पहली चीज़ जो समझ में आती है वो यह है कि किसी को कोई परेशानी है और वो किसी ऐसे से विचार विमर्श करना चाहता है जो उससे अधिक जानकार हो ताकि उसकी समस्या का समाधान हो सके। मनुष्य की समस्याएं संभव है विभिन्न क्षेत्रों में हों। एक प्रश्न यहॉ पर यह उठता है कि क्या एक सन्तान सलाहकार के पास जा सकती है? या यह कि क्या एक सन्तान हमारी समस्याओं के समाधान में सहायक हो सकती है? हम माता - पिता को कभी कभी ऐसी कठिनाइयों का सामना होता है जिसे अपनी सन्तान के साथ सलाह - मशवरा करके हल किया जा सकता है और इस विचार विमर्श से समस्या के समाधान के अतिरिक्त कई और लाभ हैं।


माता- पिता, प्रशिक्षकया वो सभी,जिन्हेंकसी न किसी रूप से बच्चों तथा युवाओं से काम रहता है, कभी न कभी ऐसे स्थान पर पहुंच जाते हैं जहॉ उन्हें निर्णय लेना पड़ता है। स्वाभाविक है कि बड़ें यदि छोटों की सलाह के महत्व व भूमिका से अनभिज्ञ हों तो बड़ी सरलता से वो उनके लिए निर्णय ले सकते हैं।
परन्तुक्या सदैव यह निर्णय बेहतरीन और सबसे उचित निर्णय हैं? यदि ऐसा हो भी तो इससे बच्चे या युवा के आत्म विश्वास तथा व्यक्तित्व विकास को ठेस नहीं पहुंचेगी? अर्थात सन्तान क्या उस स्थान पर नहीं पहुंचे गी जहॉ उसे ऐसा लगने लगे कि जीवन में उसकी कोई भूमिका नहीं है और उसके लिए दूसरे निर्णय लेते हैं।


इसलिएहम माता - पिता और सभी बड़ों से यह आग्रह करते हैं कि अपने बच्चों से सलाह - मशरा करने को गंभीरता से लें और इसे उसके व्यक्तित्व के विकास का महत्वपूर्ण कारक समझें। विचार विमर्श या सलाह, बच्चे की आयु और उसके अनुभवों तथा सूचनाओं की मात्रा के अनुकूल होना चाहिए।
अर्थातजिन विषयों या मामलों का उससे संबंध नहीं है, या अपने विचार व्यक्त करने के लिए उसके पास पर्याप्त ज्ञान नहीं है। उन्हें उसके सामने नहीं रखना चाहिए।


ऐसेनियम जिनपर आप को विश्वास हो और जिनके बारे में आपके विचार परिवर्तित नहीं हो सकते उनपर भी किसी की राय मत लीजिए। अपने बच्चे के दृष्टिकोंण स्वीकार करने के लिए स्वंम को तैयार कीजिए। उसके सम्मुख दो मार्ग रखिए, वो जिसे चाहे कर ले। उदाहरण स्वरूप यह मत पूछिए कि तुम्हारे विचार में इन छुट्टियों में क्या किया जाए? बल्कि ऐसे दो कार्य जो कुद्धियों में किए जा सकते हैं , उसके सामने रखें और उससे कहिए कि किसी एक का चयन कर ले।
सलाह- मशवरेमें अपने बच्चे की सहायता कीजिए ताकि वो यह सीखे कि एक ही विषय के विभिन्न आयोमों पर पहले विचार फिर निर्णय लिया जाता है। उसे यह भी समझाइए कि कोई राय पेश करने का अर्थ यह नहीं है कि यही आन्तिम निर्णय है।

महिला जगत- २3

किशोरों के लिये स्वतन्त्रता की सीमा
किशोरोंके प्राय: यह शिकायत रहती है कि माता - पिता और अन्य बड़े लोग हमारी भावनाओं एवं इच्छाओं को समझते नहीं हैं, वे अपने विचारों को हमपर थोपते हैं, कहते हैं कि वे किसी अन्य पीढ़ी के हैं और उन्हें किशोरों तथा युवाओं की आवश्यकता का ज्ञान नहीं है, वे हमारे संसार की तुलना अपने जीवन से करते हैं। अधिकांश युवाओं का विचार होता है कि जो संसार उन्होंने अपने लिए बनाया है उसमें और उनके माता - पिता तथा बड़े लोगों के संसार में बहुत दूरी है। युवा, शिक्षा व ज्ञान की दृष्टि से अपने माता- पिता की शिक्षा को स्वीकार नहीं करते क्योंकि अधिकांश मामलों में युवा अपने ज्ञान को आधुनिक और अपने माता - पिता के ज्ञान से श्रेष्ठ समझते हैं और यह ऐसी स्थिति में है कि बड़े लोग अपने बच्चों के व्यवहार तथा विचारों को स्वीकार नहीं करते।


आजकल जब भी परिवार में वार्ताएं होती हैं तो माता- पिता अपने युवाओं के व्यवहार से अप्रसन्न मिलते हैं और कहते हैं कि वे उद्दण्ड हो गए हैं, छोटे , बड़ों का आदर ही नहीं करते, वो सोचते हैं कि जो वो सोचते हैं वही ठीक है , परन्तु जब उनको जीवन की वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है तब समझते हैं कि आज कल के जीवन का बोझ कमर तोड़ देता है। समझते हैं कि कम्प्यूटर और इन्टर नेट चलाना क्या सीख गए जीवन को भी पहचान गए हैं परन्तु अच्छे - बुरे में अन्तर तक नहीं पहचान पाते हैं।
अलबत्ताकिशोर अब वो छोटा सा बच्चा नहीं है कि जो माता - पिता के आदेशों का पालन करता रहे और अपनी बुद्दि से काम न लें परन्तु यह इस अर्थ में नहीं है कि उसे हर कार्य के लिए खुली छूट दे दी जाए क्योंकि यह भी एक प्रकार से गुमराही का स्रोत है और इससे सिवाए पश्चाताप के और कुछ हाथ नहीं आता।


अबहम यह देखेंगे कि स्वतन्त्रता और सीमाओं में क्या अन्तर है? एक ऐसे परिवार के बारे में सोचें कि जो इस भय से कि कहीं उसके बच्चे बिगड़ न जाएं, उनसे हर प्रकार के प्रयोग की संभावनाएं छीन लेते हैं और एक किशोर से बिल्कुल एक छोटे बच्चे की भांति व्यवहार करते हैं, इस प्रकार वस्तुत: वो उससे उसका आत्म विश्वास छीन लेते हैं। ऐसे माता - पिता बच्चों के सही प्रशिक्षण के स्थान पर एक अच्छे जेलर की भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार की सीमाओं में पले बढ़े बच्चे बड़े होकर समाज में अपना स्थान नहीं बना पाते और विफल रहते हैं। क्योंकि जीवन में उन्होंने केवल निर्मर रहना ही सीखा है। वो समझते हैं कि निणर्य लेने की क्षमता उनमें नहीं है और सदैव किसी सहारे और संरक्षक की खोज में रहते हैं।
इसकेविपरितकुछमाता- पिता आधुनिकता के नाम पर अपने युवाओं को सीमा से अधिक स्वतन्त्रता दे देते हैं। कुछ माता - पिता बच्चों को अनुभव प्राप्त करने तथा स्वतन्त्रता के बहाने खुली छूट दे देते हैं ताकि अच्छे व बुरे हर प्रकार के अनुभव प्राप्त कर सकें। प्रशिक्षण की यह शौली भी ग़लत, अतार्किक और सन्तुलन से दूर है। क्योंकि स्वतन्त्रता जब भी बिना किसी सीमा के दी जाती है तो उसका सन्तुलन दूट जाता है। किशोरों के बारे में अत्यधिक स्तर्क रहना चाहिए ताकि उसकी सीमाएं बहुत ही स्पष्ट रूप से उसे ज्ञात हों, वो समझ सके और यह ज्ञान ले कि इन सीमाओं से बाहर निकलना न केवल यह कि उसकी कोई सहायता नहीं करेगा बल्कि उसके लिए अत्यन्त हानिकारक भी है। क्योंकि किशोर यधपि अब छोटा सा बच्चा नहीं है कि निरन्तर आदेशों का पालन करता रहे, परन्तु चूंकि अभी उसके पास आवश्यक अनुभव नहीं हैं, अपने निणर्यों में वो अपनी भावनाओं तथा उत्तेजनाओं से प्रेरित होता है और कभी कभी जीवन में ऐसे निर्णय ले लेता है जिसकी क्षति पूर्ति करना असम्भव होती है।
युवाओंके साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखना चाहिए।


आयुका यह काल कुछ विशेष चारित्रिक विशेषताओं जैसे जल्दी दूसरों की बातों में आ जाना, भावनात्मक होना, तीव्र और कभी कभी अनुचित उत्तेजनाओं वाला होता है।
युवाबड़ी जल्दी दूसरों से प्रभावित हो जाता है और अपने कम अनुभव के कारण दूसरों के विचारों को बड़ी ही सरलता से स्वीकार कर लेता है। जीवन की समस्याएं और प्रतिदिन की कठिनाइयॉं बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देने का उचित बहाना नहीं हैं। क्योंकि इस प्रकार उनके ग़लत मार्ग पर चल पड़ने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि कुछ लोग देखने में तो बड़े भोले भाले लगते हैं परन्तु अन्दर से अत्यन्त भ्रष्ट होते हैं।
बारम्बारहमने समाज में ऐसी घटनाएं घटित होते देखी हैं। अत्यन्त सुशील व शिष्ट युवा बुरी संगत में पड़ कर भ्रष्टता के मार्ग पर चल पड़े और पतन के गढ़े में जा गिरे। इस प्रकार हमने देखा कि युवाओं के लिए कुछ सीमाएं निर्धारित करना एक अत्यन्य आवश्यक कार्य है।
अबहम देखेंगे कि बच्चों के लिए कुछ नियम बनाए जाने का प्रभाव क्या पड़ता है? हम माता- पिताओं को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हमारी सन्तान अब कोई छोटा सा बच्चा नहीं है और बार बार " यह करो - यह न करो " कहने का उसपर नकारत्मक प्रभाव पड़ेगा। हम हर बात के लिए उसे टोक नहीं सकते , परन्तु कुछ नियम और सीमाएं अवश्य होनी चाहिए ताकि युवा का शरीर, आत्मा तथा आचरण स्वस्थ और अच्छा रहे। घर का वातावरण शन्तिपूर्ण होना चाहिए जिसमें युवा को शन्ति व सुरक्षा का आभास हो। माता - पिता का व्यवहार उसके साथ मित्रों जैसा हो, जिनमें अपने मन की बात बताने में युवा को कोई संकोच न हो।


इस्लामीशिक्षाओं के आधार पर लड़के और लड़कियों के बीच अनैतिक संबंधों की भत्सर्ना की गई है और इसपर रोक लगाने का आदेश दिया गया है।
हमबड़ों के लिए इसके कारण भी पूर्णस्प से स्पष्ट हैं। अब यदि कोई युवा इन महत्वपूर्ण नियमों का पालन न करे, या मादक पदार्थों के सेवन जैसे अनुभव प्राप्त करना चाहे तो क्या आप उसे इस बात की अनुमति देंगे? स्वाभविक है कि बहुत सारे नैतिक, चारित्रिक तथा सामाजिक मामलों में युवा के सम्मुख टृढ़ता से खड़े हो जाना चाहिए। यह भी अत्यन्त आवश्यक है कि स्वतन्त्रता की सीमाएं हमें स्वंय ज्ञात हों ताकि अपने युवा के लिए उसे निर्धारित कर सकें।
आजके युवाकोसांस्कृतिक तथा चारित्रिक अतिक्रमणों का सामना है। हमें सीमाओं का निर्धारण करके, सांस्कृतिक तूफ़ान को रोकने के लिए परिवार में वातावरण का बॉंध बनाना चाहिए अपने लिए अपने बच्चों और अन्तत: एक स्वस्थ समाज के लिए यह समय की एक आवश्यकता है।

महिला जगत- २4

बच्चों के व्यक्तित्व
बच्चे जिस समय किशोरावस्था तक पहुंचते हैं, उनमें बहुत अधिक शारिरिक और भावनात्मक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं।


उनमें व्यक्तित्व और आत्म सम्मान की भावना पैदा होती है। किशोरावस्था में बच्चे प्राय: एक संकटमई स्थिति से गुज़रते हैं और स्वाभविक है कि ऐसे में वो एक डॉंवाडोल चरण में होते हैं। इस काल में हर ग़लती के लिए उनके मन में घृणा भाव जागृत होता है और यह कारण बनता है कि नए अनुभवों से उन्हें डर लगने लगे।
अलबत्ता माता - पिता के लिए भी यह अत्यन्त कठिन होता है कि अपने बच्चों को सकंट में देखें और उनकी सहायता न करें। उचित मार्ग यह है कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए ताकि अपने दाइत्वों का निर्वाह स्वंय करना सीखें। यहॉ तक कि यदि हमें यह वश्वास भी हो कि उन्हें विफलता का सामना होगा, फिर भी उनकी समस्याओं का समाधान करके उन्हें ख़ुश करना उचित मार्ग नहीं है। बल्कि उनके साथ ऐसी सहकारिता और समरसता का मार्ग सही है जिससे अन्तिम निर्णय लेने का दाइत्व स्वंय उनहीं पर छोड़ दिया जाए। यह वही चीज़ है जो उन्हें शक्ति, आत्म विश्वास और स्वावलम्बन प्रदान करती है और उनपर दाइत्व डालना उनके लिए सीमाएं उत्पन्न करने से बेहतर है।


किशोरावस्था का काल बचपन से युवावस्था में परिवर्तन और अन्तत: बच्चे के बड़े हो जाने का काल है और यह माता -पिता के लिए बहुत कठिन और परेशानी वाला होता है। यह वो समय है जब बच्चा अपनी पहचान की खोज में होता है परन्तु माता - पिता यह समझते है कि वो उनके प्रति लापर्वाह हो गया है। इस काल में प्राय: बच्चे माता - पिता का समर्थन चाहते हैं। इस समय उन्हें उनके व्यक्तिगत मामलों में माता - पिता के हस्तक्षेप और सहायता की आवश्यकता होती है।
अनुसंधानों से पता लगा है कि ७० प्रतिशत किशोरों को अपने मित्रों, शिक्षकों या दूसरों से अधिक अपने माता - पिता द्वारा की जाने वाली प्रशंसा की आशा होती है। अधिकांश किशोर चाहते हैं कि उनके माता - पिता उनसे प्रेम करें, उन्हें अपने पास बिठाएं, उनकी प्रशंसा करें और उनको महत्व दें। माता - पिता का समर्थन बच्चों के विकास एवं प्रगति में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


स्वाभाविक है कि बच्चों को यह अच्छा नहीं लगता कि अपने गुप्त मामलों को माता - पिता के सम्मुख रखें और ऐसा लगता है कि माता - पिता भी चाहते हैं कि अपने बच्चों के साथ अपना सम्पर्क बनाए रखें, परन्तु खेद की बात यह है कि वो उनकी सीमाओं का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि चाहते हैं कि उनकी हर बात की जानकारी प्राप्त कर सकें। कभी कभी ऐसा होता है कि बच्चे अकेले रहने या एकान्त को अधिक प्राथमिकता देते हैं, उस समय माता - पिता को जिज्ञासा उत्पन्न होती है और वो बच्चे का बैग, ड्रॉर यहॉ तक कि उसकी डायरी में इसका कारण खोजने लगते हैं और उनके फ़ोन तक सुनने का प्रयास करते हैं। सम्मान और विश्वास, बच्चे और माता - पिता के बीच अच्छे संबंधों के विस्तार का महत्वपूर्ण आधार है। एक अनुसंधान के आधार पर लगभग ८० प्रतिशत किशोर अपने माता - पिता का विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
माता - पिता समझते हैं कि विश्वास करने का अर्थ यह है कि बच्चे के खाने पीने , ख़र्च और एक सीमित स्वावलम्बन का ध्यान रखा जाए। अध्ययन दर्शाते हैं कि दोनों पक्षों के संबंधों को बनाए रखने का सबसे उचित मार्ग निकट संबंध है। आप के किशोर के साथ आपके आत्मीय संबंध अत्यधिक सन्तोषजनक होते हैं और जो बच्चे अपने माता - पिता के साथ मित्रतापूर्ण संबंध रखते हैं, उनके पथभ्रष्ट होने की संभावना बहुत कम होती है।


कभी कभी शायद आप को ऐसा लगे कि आप का किशोर ऐसा आभास क्यों करता है कि उसके पास भाग निकलने का कोई मार्ग नहीं है। किशोरावस्था में बच्चे को ऐसा लगता है कि वो एक गेंद की भांति इधर से उधर फेंका जा रहा है। यह भावना पूर्ण रूप से स्वाभाविक है। परन्तु माता - पिता के लिए यह मामला अत्यन्त थकाने वाला और निरर्थक होता है। एक अनुसंधान के अनुसार किशोरों का कहना है कि जब भी उन्होंने अपनी अप्रसन्नता का कारण माता - पिता के सामने रखने का प्रयास किया, या तो माता - पिता उससे इन्कार कर देते हैं या उनकी बातों को बिना महत्व दिए उसकी अनदेखी कर देते हैं।
जब बच्चे की परिस्थितियां और व्यवहार अपने उतार - चढ़ाव की सीमा पर पहुंच जाते हैं , उस समय वे अधिक दुखी और उदासीन होते हैं और माता - पिता के लिए यह बड़ी ही चिन्ता जनक बात होती है।
कभी कभी भावनाएं उनकी बुद्धि पर विजय प्राप्त कर लेती हैं और उनके मन में यह वाक्य उभरने लगता है " अब इस जीवन को सहन नहीं कर सकते" और यहीं से यह वाक्य उनके मस्तिष्क को प्रभावित करने लगता है। अलबत्ता यह केवल एक भ्रम है परन्तु उनकी बातों को सुना जाना चाहिए। अधिकतर युवाओं में आत्म हत्याएं इसी भावना के साथ होती है और उन्हें यह विश्वास नहीं होता कि उनके माता - पिता उन्हें समझने और उनके विचारों को महत्व देने का प्रयास करते हैं। प्राय: लड़कों में आत्म हत्या की दर लड़कियों की तुलना में अधिक होती है।


किशोरों के लिए मित्रता का बहुत अधिक महत्व है और उनके जीवन में सामान्य सी बात है। यह स्पष्ट है कि वो अपना अधिकॉंश समय मित्रों के साथ गुज़ारना चाहते हैं। अपने बच्चों को उनके मित्रों को आमंत्रित करने के लिए प्रोत्साहित करें और उनकी सही पहचान प्राप्त करने का यह उचित अवसर है। आप जितनी उनको इस बात की अनुमति देंगे कि अपने निर्णय स्वंय लें उतने ही अपने लिए उनके मन में अच्छे भाव पैदा होंगे।
किशोरों पर अधिक ध्यान दिया जाना अधिकतर प्रभावी रहा है और यह उनके जीवन पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव डाल सकता है। अपने बच्चों को ऐसे बच्चों से मित्रता करने की अनुमति मत दीजिए जिनका आचरण ठीक नहीं है।
आप को पता होना चाहिए कि आप के बच्चे के मित्र किस प्रकार के हैं, उनके परिवार वाले कैसे हैं, यदि संभव हो तो उनके माता- पिता से मिलने का प्रयास कीजिए। जिन बच्चों के माता- पिता उनके राज़दार हैं, वे अपने बच्चों के घनिष्ट मित्र समान होते हैं और यह , कारण बनता है कि बच्चे भी अपनी वास्तविकता पर विश्वास करें।

महिला जगत- २५

रात का समय था, चोर धीरे धीरे एक घर की ओर बढ़ रहा था, अचानक उसने देखा घर का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था वो धीरे से उसमें घुस गया। अन्दर कोई नहीं था। अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था, जल्दी जल्दी सामना उठाकर बाहर एक अंधेरे कोने में एकत्रित करने लगा। घर का स्वामि थोड़ी दूर पर खड़ा अपने एक मित्र से बात कर रहा था।



उसनेदेख लिया था कि चोर घर का समान ला लाकर बाहर रख रहा है। वो चुपके से घर में गया और कम्बल ओढ़ कर लेट गया। चोर जब अन्दर आया तो उसने उसे लेटा देख कर कहा कि तुम यहॉ पर क्या कर रहे हो?
वोव्यक्ति बोला कि मैने सोचा कि यदि तुम्हें सामान ले जाने में सहायता की आवश्यकता होगी तो में तुम्हारी सहायता कर दूंगा। यह मज़ाक़ सुनकर चोर लज्जित हुआ और उसका सभी सामान लाकर वापस रख दिया।



कुछलोगों का विचार है कि यदि कठोर और भारी भरकम शब्दों का प्रयोग नहीं करें गे तो कोई उनका सम्मान नहीं करे गा और उन्हें लोग कोई महत्व नहीं देंगे। परन्तु यह विचार सही नहीं है।
लोगऐसे लोगों को पसन्द नहीं करते जो सदैव गंभीर और गूढ़ बातें करते हैं। बात करते समय हल्के फुलके चुटकुलों का प्रयोग और मज़ाक़ करना अच्छी बात है। इस प्रकार की बातें करने वाले जिस स्थान पर भी बैठ जाएं स्भी को हंसाते हैं और लोग भी उनकी संगत को पसन्द करते हैं।
मज़ाक़करना या विनोदी स्वभाव का स्वामी होने का अर्थ यह है कि आप अपने अस्तित्व से बाहर आएं निष्पक्ष रूप से स्वंय पर दृष्टि डालें और स्वंय को गंभीरता से न लें या दूसरे शब्दों में आप स्वंय पर हंस सकते हों। ऐसा करने से जब आप को किसी गंभीर या बड़ी समस्या का सामना होगा तो आप उस समस्या और स्वंय के बीच एक दूरी निर्धारित करें और स्वंय को उससे संबंधित न मानें।
इसप्रकार यदि उस समस्या का सामना कुछ अन्य लोगों को भी हो तो उनसे निपटना उनके लिए भी सरल हो जाए गा।



सामान्यत:मज़ाक़ , इससेपहलेकि किसी को ज़ोर से हंसाए होठों पर मुस्कान ले आता है।
बहुतही कम ऐसाहोताहै कि हम बिनाठहाके लगाए हंसे। क्योंकि हंसी का अर्थ ही ठहाके लगा कर हंसना है, इससे हम अपनी बहुत सारी उन भावनाओं एवं कल्पनाओं को भूल जाते हैं जो हमें काफ़ी समय से परेशान किए हुए होती हैं। इसके अतिरिक्त जब कोई मज़ाक़ करता है तो उस क्षण मनुष्य पूर्ण रूप से स्वतन्त्रता का आभास करता है। जिन भावनाओं एवं विचारों ने हमें परेशान कर रखा था, हंसी और मज़ाक़ के विस्फ़ोट में दब जाती हैं और मनुष्य स्वंय को हल्का और दुखों से मुक्त पाता है।
अपनेको गंभीर और अलग थलग रखने वालों के लिए आप का विनोदी स्वभाव बहुत महत्वपूर्ण समाधान हो सकता है और उनके तनाव को समाप्त किया जा सकता है। यदि आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सम्पर्क स्थापित करना चाहते हैं तो मज़ाक़ सबसे उत्रम मार्ग है। इससे वो आप की ओर ध्यान देगा।



यदिआपचाहते हैं कि कोई ऐसा काम करें जिससे लोग आराम का आभास करें तो प्रेम से भरे हुए मज़ाक़ द्वारा आयु, शिक्षा स्तर, सामाजिक वर्ग और रूचियों जैसी रूकावटों को सरलता से भूलाया जा सकता है। यदि कोई ऐसा अवसर आ पड़े कि आप को किसी सभा में बोलना है और आप को घबराहट हो रही है तो मज़ाक़ करके घबराहट दूर कीजिए और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कीजिए। इस प्रकार हम देखते हैं कि मज़ाक़ , व्यक्तिगत संबंधों की सफलता की गारेन्टी है।
मज़ाक़की प्रवृत्रि जिन लोगों की होती है या जो विनोदी स्वभाव के होते हैं, उनमें रचनात्मक गुण होते हैं। अपनी इस प्रचृत्रि को विकसित करने के लिए मज़ाक़ करने और हंसने हंसाने को अपना अधिकार समझिए। यदि आप उन लोगों में से हैं जो दिन भर में कम से कम एक बार ह्रदय की गहराइयों से हैं, तो निश्चित रूप से आप का जीवन शन्ति एवं स्थिर्ता पूर्ण है। क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि मज़ाक़ दूसरों को हंसाने के लिए ही किया जाता है। यहॉ तक कि आप ने स्वंय यह अनुभव किया होगा कि किसी मज़ाक़ या चुटकुले को याद करके आप एकान्त में भी हंसने लगते हैं।



आजहम एक संकट गृष्त संसार में जी रहे हैं, प्रति दिन हमें ऐसे टृष्य दिखाई देते हैं जो अत्यन्त दुखदाई हैं जैसे अकाल, युद्ध, संक्रामक रोगों का फैलना, लोगों की हत्या, प्राकृतिक आपदाएं और ऐसी ही अनेक चीज़ें। इस आधार पर ख़ुश करने वाली बातें बहुत कम हैं। इसलिए मज़ाक़ करना और हंसना बहुत आवश्यक हैं। प्रयास कीजिए कि हंसने का कोई अवसर हाथ से न निकलने पाए। शायद कुछ लोग आप को हंसता देख कर हंसने लगें या कुछ कहें कि यह व्यक्ति पागल हो गया है। परन्तु आप को इन लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
किसीदुखी या परेशान व्यक्ति को हंसाने से उसमें एक ताज़ी जान पड़ जाती है। फिर वो अपनी समस्या का समाधान करने में भी सक्षम हो जाता है और दूसरों की सहायता भी कर सकता है।
वैसेभी घमण्डी या बुरे स्वभाव वाले व्यक्ति से सभी दूरी करते हैं। लोग ऐसे व्यक्तियों को अधिक पसन्द करते हैं जो परेशानियों में भी हंसते रहते हैं। ऐसे लोगों की संगत में आप अपनी परेशानियां भूल जाते हैं और जीवन का आनन्द उठा सकते हैं।



इसीलिए मज़ाक़ और हंसने का जीवन में बहुत महत्व है। मज़ाक़ यदि उचित स्थान और उचित समय पर किया जाए तो इससे कई झगड़ों को भी समाप्त किया जा सकता है। आप तो जानते ही हैं कि लड़ाई झगड़ों पर यदि नियंत्रण न किया जाए तो यह कितने ख़तरनाक हो सकते हैं। आप को अपने उद्देश्य तक पहुंचने से रोक देते हैं और कभी कभी किसी मित्र या प्रिय साथी को गंवा बैठने का कारण भी बन जाते हैं।
यदिआप चाहते हैं कि विनोदी प्रकृत्रि के बनें और दूसरों को अपने मज़ाक़ से हंसाएं तो सबसे पहले यह ध्यान रखिए कि आप के सामने वाला कोन हैं, उसका स्वभाव कैसा है और आप का मज़ाक़ किस सीमा तक उसको प्रभावित करे गा। कहीं ऐसा न हो कि जिससे आप मज़ाक़ कर रहे हों वो स्वंय को दूसरों की हसीं का कारण समझ कर दुखी हो जाए, ध्यान रखिए कि ऐसा मज़ाक़ न किया जाए जिससे कोई दुखी हो जाए। सबसे उपयुक्त यह है कि मज़ाक़ करते समय हम अपनी बात करें और दूसरों को हंसाएं। ऐसे मज़ाक़ प्रति दिन हम पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते और हंसते हैं। और चूंकि ये किसी विशेष व्यक्ति लिए नहीं होते इसलिए इनसे कोई दुखी भी नहीं होता।



मज़ाक़करते करतेव्यक्तिको इसमें दक्षता प्राप्त हो जाती है। फिर वो ये भी समझने लगता है कि किस स्थान पर कैसा मज़ाक़ किया जाए। लोग भी ऐसे व्यक्ति से प्रेम करते हैं। यहॉं तक कि वो मज़ाक़ में बहुत सी ऐसी बातें भी वह देता है जो सामान्य स्थिति में नहीं कही जा सकती थी। परन्तु याद रखिए कि मज़ाक़ करना एक ऐसी कला है जिससे आप अपने सहित दूसरों के जीवन में भी ख़ुशियां भर सकते हैं।

महिला जगत- २६

ग़रीबी या कमी मानव जीवन में एक बड़ा ही चिरपीरचित शब्द है जिसे सुनकर मन में पहला विचार जो आता है वो धन की कमी और आर्थिक समस्याओं के बारे में होता है। परन्तु यदि गहराई से देखा जाए तो हमें पता चले गा कि किसी भी चीज़ से मनुष्य का वंचित रहना ग़रीबी समझा जाए गा। इसी कारण इस शब्द के साथ विभिन्न शब्द हमारी भाषा से जुड़ गए जैसे संस्कृति की कमी, सक्रिथता की कमी, स्नेह की कमी और सम्पर्क की कमी आदि। इनमें से सबसे बुरी कमी जिसने आज के समाजों को जकड़ रखा है और जिससे पीछा नहीं छुड़ाया जा सका है वो स्नेह की कमी और अकेलेपन की भावना है। यहॉ तक कि कभी कभी भीड़ में रहते हुए भी मनुष्य स्वंय को अकेला पाता है।



अकेलापनअर्थात हम यह सोचें कि हमारा कोई सच्चा मिज नहीं है या यह कि किसी को दूसरे की चिन्ता नहीं है, स अपने आप में ही लगे हैं।
मनुष्यके सामाजिक संबंधों में जब स्नेह की भावना की कमी होती है तो वो अकेलेपन का आमास करता है। यह भावना मनुष्य को बन्तरिक रूप से इतना तोड़ देती है कि वो स्वंय को एक भयानक मरूस्थल में बिना किसी साथी या सहायक के समझने लगता है। उसे डर लगने लगता है और इस डर के साथ एक तीव्र नकारात्मक भावना जाग्रत होती है जिसे अवसाद कहते हैं। कुछ युवक इस दुखद भावना से बचने या छुटकारा पाने के लिए ऐसी दवाओं या पदार्थों का सहारा लेते हैं जो उन्हें पतन के मुहाने तक पहुंचा देते हैं और न केवल यह कि उनके अकेलेपन की समस्या का समाधान नहीं करते बल्कि उनको ढेरों अन्य समस्याओं में जकड़ देते हैं। इस मार्ग में न केवल यह कि पहली और अस्ली कठिनाई का समाधान नहीं होता बल्कि ढेरों ऐसी गंभीर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं जिनकी क्षति पूर्ति करना असंभव होता है।



यदिवास्तविकताओं के संसार में रहें और वास्तविकताओं को उसी प्रकार देखें वो हैं तो दूसरों की सहायता और सलाह मशवरे से अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। कभी कभी अकेलेपन को दूर करने के लिए अनुचित संबंध और सड़कों पर बेकार फिरने वालों के साथ मिजता पूर्ण संबंध स्थापित किए जाते हैं, परन्तु यह मनुष्य की अस्ली समस्या का समाधान नहीं है और इसी कारण इस मिजता के टूटने से युवाओं विशेषकर युवतियों के जीवन में एक खोखलापन उत्पन्न हो जाता है। इससे वे स्वंय को हारी हुई, धोखा खाई हुई अकेली तथा गहरे अवसाद में पाती हैं। यहॉ तक कि यह संबंध विपरित लिंग के साथ SMS के आदान प्रदान या इन्टरेनट तक भी सीमित रहें , फिर भी पाप के बाद पश्चाताप तथा ग्लानि की भावना से वो गृष्त हो जाते हैं। और इस प्रकार हम देखते हैं कि अकेलेपन को दूर करने के लिए यह मार्ग उचित नहीं हैं।



अकेलेपनको दूर करने के लिए ऐसे ढेरों मार्गों को अपनाया जाता है कि जो न केवल यह कि अकेलेपन के घाव पर मरहम नहीं लगाते बल्कि अपने नकारात्मक परिणामों के कारण समस्याओं को और अधिक जटिल बना देते हैं यहॉं तक कि यह व्यक्ति के जीवन को बर्बाद कर सकते हैं। अब हम यह देखें गे कि इस खोखले और अकेलेपन को समाप्त करने और इससे झुटकारा पाने के मार्ग क्या हैं? इसके लिए हमें गहरे और स्थाई संबंधों पर ध्यान देना होगा। ऐसे संबंध जो कदापि क्षतिगृस्त नहीं होते और मित्र भी ऐसा जो चाहे हम कितने भी स्वार्थी हो जाएं हमें छोड़ कर नहीं जाता। सृष्टि के रचयिता के साथ संबंध , सुन्दर और आन्तरिक संबंध है। इस संबंध को जोड़कर हमें अकेलेपन का अभास कदापि नहीं हो सकता है। क्योंकि हम जानते हैं कि ईश्वर संदव हमारे साथ है और वो हमारे शरीर, आत्मा के रहस्यों तथा आव्शयकताओं तथा इच्छाओं को पूरी तरह से जानता है। वो इतना सक्षम है कि उसका इरादा सभी समस्याओं का समाधान कर सकता है। यदि वो चाहे तो हर असम्भव को संभव बना सकता है।



जबहम ईश्वर को अपने निकट देखते हैं तो कंधों से अकेलेपन का बोझ स्वंय दूर हो जाता है।
अकेलेपनसे झुटकारा पाने के लिए किसी ऐसे गुट की सदस्यता प्राप्त की जा सकती है जिसकी गतिविधियों में आप को रूचि हो। ऐसी स्थिति में आप एक सकारात्मक गतिविधि में संलग्न होने के साथ ही ऐसे मित्रों को प्राप्त कर लेंगे जो आप की भांति ही विचार करते हैं और उनकी रूचियां भी आप की रूचियों के समान हैं। इसप्रकार आप स्वंय को उनके निकट समझें गे। किसी के लिए लाभदायक या सहायक होने की भावना अत्यन्त सुखद होती है। इससे आप के भीतर अपने प्रति सकारात्मक भावनाएं जागृत होंगी और आप को अपने जीवन से प्रेम हो जाए गा। चूंकि हर भले काम के बाद शान्ति का आभास होता है, इसलिए ईश्वर की डृष्टि में जो भले कार्य हैं उनको करने से मनुष्य की पवित्र प्रगृत्रि से निकटना होती है। और इससे हमें एक भान्त और सुखी जीवन का उपहार प्राप्त होता है।



क्षमाकीजिए और हमेंखेदहै जैसे शब्द शब्दकोष में लाए गए हैं ताकि यदि कभी हमसे कोई ग़लती हो जाए या किसी मिज़ का दिल दुखाया हो तो अपनी ग़लती को सुधारने का प्रयास करें और हमारे मैत्रीपूर्ण संबंध कटु होकर टूट न जाएं और हम अकेले रह जाएं। हम इन शब्दों को प्रयोग करने से इतना क्यों कतरोत हैं? क्या इन्हें इसलिए नहीं बनाया गया है कि हमारी ग़लतियां बहुत जटिल न हो जाएं।

महिला जगत- २७

किसी भी माली को इस बात के लिए बुरा-भला नहीं कहा जा सकता हैं कि उसने अपने बग़ीचे के चारों ओर बाढ़ क्यों बना रखी है। क्योंकि बिना बाढ़ का बग़ीचा सुरक्षित नहीं होता और इस प्रकार माली के लिए कोई फल या फ़सल नहीं बच सकती। कोई भी स्वतन्त्रता के नाम पर अपने घर की चहार दीवारी को नहीं हटाता।



क्योंकिचोरों काख़तरासदैव बना रहता है। कोई भी ख़ज़ाने या रत्नों का भालिक अपने हीरे जवाहर बिना सुरक्षा के आने जाने वालों के सम्मुख नहीं रख देता क्योंकि सम्भव है उसके अनमोल रत्नों को चुरा लिया जाए।
जबदूसरों के आने के मार्ग बन्द कर दिए जाते हैं तो वास्तव में हम अपने को सुरक्षित कर लेते हैं, न कि सीमित या जेल में बन्द हो जाते हैं।
इसप्रकार हम अनचाहे हस्तक्षेप करने वालों की दृष्टि से बच जाते हैं, बिना इसके कि हमने अपने को क़ैदी बना लिया हो।
अपनेस्थान को सुरक्षित रखने के लिए मनुष्य को एक चहार दीवारी की आवश्यकता होती है और महिला को भी अपनी विशेषताओं तथा स्थान के कारण, सुरक्षित रहना चाहिए और उसकी कोमलता के कारण उसकी पवित्रता का आदर होना चाहिए। उसका श्रृंगार यही है कि अपनी पवित्रता तथा सतीत्व के रत्न का आदर व सम्मान करे।



इसीआधार पर पवित्र कुरआन सूरए नूर की आयत २७,२८,३० और ३१ में कहता है: हे लोगों जो ईमान लाए हो, अपने घरों के अतिरिक्त दूसरे घरों में प्रवेश न किया करो जब तक कि अनुमति न ले लो और उन घरों के रहने वालों पर सलाम न भेज लो , यह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा है , कदाचित तुम याद रखो। फिर यदि उन घरों में किसी को न पाओ, तो उनमें प्रवेश न करो जब तक कि तुम्हें अनुमति न दी जाए। यदि तुमसे कहा जाए कि लौट जाओ, तो लौट जाया करो, यह तुम्हारे लिए अधिक पवित्रता की बात है, और अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो। हे पैग़म्बर ! ईमान वाले पुरूषों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपने गुप्त अंगों की रक्षा करें। यह उनके लिए अधिक पवित्रता की बात है नि:सन्देह अल्लाह उसकी ख़बर रखता है जो कुछ वे करते हैं। और ईमान वाली त्रियों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपने सतीत्व की रक्षा करें और अपना श्रृंगार न दिखाएं सिवाय उसके जो उसमें से प्रकट हो रहा हो।

महिला जगत- २८

आज कल T.V. , सिनेमा और कमप्यूटर गैम्स हमारे जीवन का अटूट अंग बन चुके हैं। हर परिवार में इनका प्रचलन है, शायद ही आज कोई ऐसा परिवार हो जो इस प्रकार के संचार माध्यमों से जुड़ा हुआ न हो। इन संचार माध्यमों के कार्यक्रमों में इतनी अधिक विविधता होती है कि लोग घंटों तक इनमें लगे रहते हैं। समय कैसे और कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता ।


हर घरमें T.V.अवश्यहोता है उसमें विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम दिखाए जाते हैं। कुछ अच्छे और लाभदायक तथा कुछ हानिकारक इन संचार माध्यमों के विषय पर सबसे अधिक जिन लोगों को चिन्ता होती है वो माता- पिता हैं। वे कुछ कार्यक्रमों को अपने बच्चों में हिंसा तथा अपराध में वृद्धि का कारण समझते हैं। क्योंकि बच्चे जो कुछ देखते हैं उसका अनुसरण करने का प्रयास करते हैं और जब वह हिंसा तथा अपराध के दृश्यों को देखते हैं तो परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उसका प्रभाव उनके मन पर अवश्य पड़ता है। आज इन कार्यक्रमों को तैयार करने वालों के बीच व्यापक प्रतिस्पर्धा पाई जाती है। फ़िलमों तथा कमप्यूटर खेलों के निर्माता, ग्राहकों को अकार्षित करने तथा इनकी मण्डीयों को हाथ में लेने के लिए अधिक से अधिक हिंसात्मक कार्यक्रमों को दिखाने करने का प्रयास करते हैं।



अलबत्ताफ़िल्मों कीसीडियां तथा कमप्यूटर गेम्स भी कारण बने हैं कि हिंसा, पहले से अधिक बच्चों के जीवन में प्रवेश करे। बच्चे जो कार्यक्रम या फ़िल्म देखते हैं उसका प्रभाव उनके मन पर इतना पड़ता है कि वे उस फ़िल्म के नायक का पूर्ण रूप से अनुसरण करने लगते हैं। उसके संवादों का एक एक शब्द याद करके उसे दोहराते हैं। यहॉं तक कि उनके बात करने के ढंग, उनके चलने फिरने और पहनावे का भी अनुसरण करने का पूरा प्रयास करते हैं। इन नायकों में जो आत्म विश्वास दिखाया जाता है वो भी बच्चों के लिए बहुत रोचक होता है। यदि वो किसी छत से छलांग मार कर दूसरी छत पर सरलता से पहुंच जाता है तो बच्चे भी ऐसा ही करने का प्रयास करते हैं।



अनुसंधानदर्शाते हैं कि बच्चे छोटी आयु में हिंसा सीख लेते हैं और जितने बड़े होते जाते हैं, उनके व्यवहार में परिवर्तन लाना उतना ही कठिन होता है। संभव है उनका यह व्यवहार बड़े होने तक उनके साथ रहे। प्राय: देखने में आता है कि बच्चे अपने खिलौने वाली बन्दूकें या पिस्तौल लेकर एक दूसरे पर फ़ायिरंग करने का खेल कर रहे हैं। या यह कि किसी मेज़ या सोफ़े पर चढ़ कर उसी प्रकार कूद रहे हैं जैसे फ़िल्म का नायक छतों से कूदता है। या फिर उसी नायक जैसे कपड़े पहनने की ज़िद करते हैं जिसे उन्होंने अपनी पसन्द के सीरियल या फ़िल्म में देखा होता हैं। बच्चे फ़िल्मी नायकों को ही अपना आदर्श बना लेते हैं और जीवन में उन्हीं की भांति बनने का प्रयास बरते हैं।



मनुष्यकीप्रवृत्तिहै कि जिस चीज़ को बहुत अधिक देखता है उसकी उसे आदत हो जाती है।
जब बच्चेछोटी आयु से ही हिंसात्मक दृश्य देखते हैं तो उस हिंसा तथा उसकी बलि चढ़े लोगों के प्रति उसके मन में सहानुभूति की भावना समाप्त हो जाती है। उसे फ़िल्म के हीरो से ही सहानुभूति होती है न कि उसकी हिंसात्मक कार्रवाइयों की भेंट चढ़े लोगों से। वे हिंसात्मक दृश्य देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि उनके लिए यह एक साधारण सी बात होती है। और किसी को गोली लगने, ख़ून बहने या मार पीट को ही वो जीवन की वास्तविकता समझते हैं।
वेस्वंय भी उस फ़िल्म के हीरो की भांति शक्तिशाली बनना चाहते हैं। आज कल T.V में बच्चों के लिए आदर्श कार्यक्रमों की भारी कमी है।
फ़िल्मया T.Vसीरियलमें आक्रमण्कारी जो हिंसात्मक कार्रवाई है वो अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। यहॉं तक के बड़े बच्चे भी आक्रमणकारी को ही अपना आदर्श बना लेते हैं क्योंकि इनको इस प्रकार से दिखाया जाता है कि लोग उन्हें पसन्द करते हैं। ऐसे हीरो जो हर लड़ाई या आक्रमण में विजयी ही रहते हैं - जाने अन्जाने दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। उनकी हिंसात्मक कार्रवाइयों को वे एक प्रकार से साहस और वीरता का प्रतीक समझते हैं। उनके हर ग़लत काम को इस प्रकार अच्छा और आकर्षक बनाकर दिखाया जाता है जैसे एक ख़तरनाक बम को एक अत्यन्त सुन्दर रंगबिरंगे काग़ज़ में लपेट कर किसी को उपहार स्वरूप दिया जाए।



हथियारोंतथा बड़े - छोटेशस्त्रों के प्रयोग का प्रदर्शन दर्शक पर प्रभाव डालता है। कुछ बच्चे शान्त प्रवृत्ति के होते हैं और कुछ क्रोधी प्रवृत्ति वाले।
परन्तुहिंसात्मक दृश्यों का प्रभाव दोनों ही प्रकार के बच्चों के मन पर पड़ता है। फ़िल्मों में जो हिंसा दूर से और थोड़े समय के लिए दिखाई जाती है उसका प्रभाव कम पड़ता है परन्तु जो हिंसात्मक दृश्य निकट से और देर तक दिखाए जाते है, उसका प्रभाव अधिक होता है। ऐसे ही दृश्यों को देखकर बच्चों के मन में हिंसा के विरोध जो भावनाएं एवं संवेदनाएं होनी चाहिए , धीरे धीरे उनका अन्त हो जाता है और बच्चा उसी का अनुसरण करने लगता है जिसे वो प्रतिदिन T.V पर या कमप्यटर खेलों में देखता है।
जोबच्चे अपनी पारिवारिक, सामाजिक या व्यक्तिगत कठिनाइयों के कारण क्रोधी प्रवृत्ति के होते हैं वे किसी T.V कार्यक्रम का अनुसरण करके उस क्रोध को बाहर निकालते हैं। इसप्रकार वे इन कार्यक्रमों से अधिक प्रभावित होते हैं। इस आधार पर बच्चों को एक ऐसे परिवार की आवश्यकता होती है जेसमें संबंध आत्मीय तथा प्रेम पूर्ण हों।


परन्तुजब उन्हें ऐसा वातावरण नहीं मिलता है तो इस प्रेम के रिक्त स्थान को अन्य चीज़ों से भरना चाहते हैं। यहीं पर वो शक्ति एवं हिंसा का व्यवहार करना सीख लेते हैं। वास्तविकता यह है कि संचार माध्यम , समाज तथा संस्कृति का केवल एक आयाम हैं और प्रभावित करने वाला यह एकमात्र कारक नहीं है।

महिला जगत- २९

आज हम बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े कुछ बिन्दुओं के बारे में चर्चा करेंगे। आशा है हमारा ये प्रयास भी आपको पसंद आयेगा।


बच्चोंके स्वास्थ्य की मूल शर्त ये है कि उनकी आत्मिक एवं भावानात्मक आवश्यकताओं की आपूर्ति के अतिरिक्त उनकी शारीरिक आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाये। यद्यपि समस्त माता-पिता इस बात से भलिभांति अवगत होते हैं कि बच्चों की आत्मिक एवं शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के विभिन्न पहलू हैं परंतु इस प्रक्रिया में भी उन्हें अच्छी तरह अवगत होना चाहिये कि बच्चों को स्वस्थ बनाने का एक तरीक़ा सही व उचित खाना है। सही खाने से तात्पर्य पौष्टिक खाना है। साथ ही खाने में दो मूल सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिये। प्रथम खाद्य सामग्री के प्रयोग में संतुलन और दूसरे इन पदार्थों के प्रयोग व सेवन में विविधता।
वास्तवमें बच्चे ६ महीने के बाद मां के दूध के अतिरिक्त कुछ दूसरी वस्तुएं भी खाना- पीना आरंभ कर देते हैं और एक वर्ष के पश्चात बच्चे घरवालों के साथ खाने की मेज़ या दस्तरख़ान पर भी बैठना आरंभ कर देते हैं।


उपरोक्तबिन्दु को ध्यान में रखना आवश्यक है परंतु बच्चों के लिए ये पर्याप्त नहीं है क्योंकि खाद्य पदार्थों में इस बात को ध्यान मंस रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि खाने में कौन सी चीज़ें बच्चों के लिए लाभदायक हैं और कौन सी लाभदायक नहीं हैं। तली हुई सब्ज़ियों और बहुत बारीक कटे हुए फलों का प्रयोग बच्चों के लिए अधिक लाभदायक नहीं है तो बच्चों के खाद्य पदार्थों में रोटी, गेहूं, जौ, चावल, फल, सब्ज़ी, दूध, दही, मांस और अंडे जैसी वस्तुओं का बहुत ध्यान रखना चाहिये। साथ ही इन वस्तुओं के प्रयोग के साथ साथ इनके प्रयोग की शैली भी सही व उचित होनी चाहिये। बच्चे का भरण-पोषण जिस परिवार में हो रहा है वास्तव में उस परिवार में माता- पिता खाद्य पदार्थों के प्रयोग में बच्चे के लिए सर्वोत्म आदर्श हैं।


ऐसेखानों के अधिक खाने से, जिनमें वसा अधिक हो, उसे तला गया हो, मसाले का अधिक सेवन किया गया हो या स्वाद बढ़ा देने वाले पदार्थों का प्रयोग अधिक किया गया हो, संभव है कि बच्चों को पौष्टिक खानों के बजाये चटपटे खाने पसंद आने लगें। उदाहरण स्वरूप यदि खाने का सालन बहुत खट्टा हो तो बच्चा आम पापड़ी जैसी वस्तुओं में रूचि लेने लगेगा। इसी प्रकार सास या विभिन्न प्रकार के मसालों के सेवन से स्कूल जाने वाले बच्चों का ध्यान सैंडविच आदि जैसी वस्तुओं की ओर आकृष्ट होगा परंतु चूंकि बच्चों में मोटापन उनमें कुपोषण का कारण बनता है और विभिन्न आयु वाले बच्चों में मोटापे, रक्तचाप के बढ़ जाने या बाज़ार की डिब्बा बंद वस्तुओं में प्रेज़रवीतिव की उपस्थिति के कारण नाना प्रकार की बीमारियों के उत्पन्न होने का कारण बनता है। अत: बच्चे में खाना खाने के प्रति चाव व रूचि उत्पन्न करने के लिए खाना के प्रकार पर ध्यान देना आवश्यक है पंरतु इसके लिए, कि किस प्रकार बच्चों का प्रशिक्षण किया जाये कि खाना खाने से इंकार करना छोड़ दें। माता-पिता को अपनी खाने पीने की आदतों पर ध्यान देना होगा क्योंकि बच्चों के लिए घर में सर्वोत्तम आदर्श माता-पिता हैं।


बच्चोंको ६ महीने का पूरा होने के पश्चात मां का दूध पीने के अतिरिक्त दूसरी पौष्टिक वस्तुओं को भी खाना चाहिये और उसी समय से बच्चों में स्वाद का भाव उत्पन्न होने लगता है। अत: ऐसी चीज़ें खाने से बचना चाहिये जिसमें नमक या मसाले आदि अधिक हों। क्योंकि ऐसे खानों से बच्चे पौष्टिक खानों की उपेक्षा करने लगते हैं।
किशोरऔर तरुण जब दिन को कुछ घंटों के लिए अपने साथियों के साथ घर से बाहर होते हैं और आर्थिक दृष्टि से वे धीरे- धीरे अपने पैर पर खड़े होने लगते हैं तथा इसी प्रकार बाज़ारों एवं रेस्टोरेंटों में खाने की सरल उपलब्धि, उनमें इस आयु में खाने के प्रति अनिच्छा में वृद्धि का कारण बनती है।
खानेके प्रति अनिच्छाविभिन्न बीमारियों के उत्पन्न होने का भी कारण बनती है। मोटामा, रक्तचाप का बढ़ जाना, मधुमेह, रक्त की वसा और नाना प्रकार के कैंसरों में वृद्धि आदि खाने के प्रति अनिच्छा के कुछ दुष्परिणाम हैं।

इस भाग में हम आपको हंसने के कुछ लाभों के बारे में बता रहे हैं। कृपया कार्यक्रम के इस भाग में भी हमारे साथ रहिये।
हमसबको याद रखना चाहिये कि क्रोधित होकर मुहं बनाने से हंसना, बहुत सरल है। ज़ायगोमेटिक्स ,,, चेहरे की महत्वपूर्ण मांसपेशी है जो विशेषकर हंसने में काम आती है और जब ये मांसपेशी सक्रिय होती है तो न केवल वो हंसने के कार्य को सुगम बना देती है बल्कि अच्छे व सकारात्मक रासायनिक पदार्थ भी छोड़ती व मस्तिष्क में भेजती है। आप अपने बच्चों के जीवन को सरल बनाइये। यदि उनके सामने हंसिये तो वे भी आप और दूसरों के साथ हंसना सीख लेंगे। केवल सोचें कि ये कार्य उनके भविष्य के लिए कितना लाभदायक है। हंसने व मुसकुराने से पूरे शरीर में सकारात्मक व अच्छे रासायनिक पदार्थों का संचार होता है और वे पदार्थ मस्तिष्क में सुविचारों का कारण बनते हैं।


संभवहै कि आप हर समय अपने बच्चे को उसकी समस्त भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर दें जहां आवश्यक हो उसे समझाइये, उसका मार्गदर्शन कीजिये ताकि वो इस तरह से व्यवहार करे कि उससे अधिक से अधिक लाभ उठाये। उदाहरण स्वरूप यदि आपका बच्चा किसी चीज़ से क्रोधित है और अपना नियंत्रण खो बैठा है तो उसे इस बात की अनुमति दीजिये कि वो अपने दिल की बात कहे अपने शरीर व मस्तिष्क को क्रोध की ज्वाला से ख़ाली करे। आप पत्थर की भांति कठोर बन जाइये परंतु उसके व्यवहार को परिवर्तित व उसे शांत करने का प्रयास मत कीजिये। हां, सार्वजनिक स्थानों पर जहां इस बात की संभावना हो कि वो दूसरों को या स्वयं को क्षति पहुंचा देगा वहां पर उसे नियंत्रित कीजिये। आप अपने आपको दु:खी मत कीजिये। जब कोलाहलपूर्ण समय बीत जाये और उचित समय आ जाये तो जो कुछ हुआ उसके बारे में बच्चे को डांटने- डपटने के बजाये उससे शरंतिपूर्ण ढंग से बात कीजिये। संभव है कि उसने जो व्यवहार किया है उससे भयभीत हो। आवश्यक है कि आप बच्चे को संतोष दिलायें कि उसका व्यवहार स्वाभाविक था।


बच्चेको अपने दिल की बात कहने का अवसर दीजिये। अपना उदाहरण पेशकर उसे समझाइये कि किस प्रकार प्रेम के साथ अपने मित्रों एवं चिर- परिचितों के साथ व्यवहार करे। चिंता एवं प्रेम को बच्चे को दिखाइये। इस प्रकार बच्चा आपको अपना आदर्श बनायेगा और अपने मित्रों के संदर्भ में अपनी भावनाओं को विशेषकर कठिन समय में सही एवं तार्किक ढंग से व्यक्त करेगा।

महिला जगत- ३०

आज हम आप को यह बताना चाहते हैं कि नवजात शिशुओं में भी भावनाएं होती हैं। संगति एक मॉं ने बताया कि वो घर से बाहर काम करती थीं उनकी बेटी ७ महीने की थी, उसी समय उन्हें कुछ दिनों के लिए कार्यालय के काम से कहीं बाहर जाना पड़ा उनका कहना है। पहली रात तो बीत गई। दूसरे दिन मैने अपनी बच्ची का हाल पूछने के लिए पति को फ़ोन किया - उन्होंने कहा मुझे लगता है कि बच्ची बहुत उदास और मुरझाई हुई है और अपनी दूध की बोतल भी नहीं ले रही है। हमारी हस मुख और चंचल बच्ची उदास सी हो गई। यद्यपि उसे ज्वर भी नहीं फिर भी हम लोग चिन्तित हो गए, यहां तक कि वो दूसरे दिन तक भी बेहतर नहीं हुई। मैंने अपनी यात्रा अधूरी छोड़ी और शीघ्र ही लौट गई। मेरे घर पहुंचने के कुछ ही घण्टों पश्चात, बच्ची बिल्कुल चुस्त हो गई। मेरे पति ने कहा-


ऐसालगताहै बच्ची तुम्हें देख कर प्रसन्न हो उठी है मेरे विचार में इसकी वो हालत तुम्हारी दूरी के कारण ही थी। पहले तो मुझे-विश्वास नहीं हुआ, मैंने सोचा कि इतना छोटा बच्चा उदास और दुखी कैसे हो सकता है?


अनेकप्रभाणों से ये पता चल्ता है कि बच्चे यहॉं तक कि नव-शिशु की जन्म लेते ही दुख व अनुभवों का आभास करते हैं। शिशुओं के विकास और मानसिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञों का विचार है कि यधपि वो अपने आभास को व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते परन्तु इसके विपरित दुख, हर्ष व क्रोध को गहराई से समझते हैं। आप ने भी ऐसे बच्चे देखे होंगे जो वातावरण के प्रति पूरी शक्ति से अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हैं। माता- पिता के लिए ये आवश्यक है कि इन संकेतों को पूर्ण रूप से समझें और उसका उचित जवाब दें। इस प्रकार बच्चे की बोल पाने की प्रक्रिया आरम्भ होने में सरलता होती है।
बच्चेएक मौन भाषा में अपनी अनुभूतियां और प्रेम की अभिव्यक्ति अपने हाव-भाव बदल कर करते हैं विशेषज्ञों का कहना है कि इसके बावजूद संभव है एक १८ महीने का बच्चा यह बता सके कि उसे क्या आभास हो रहा है। आप को समझाने के लिए यहॉं पर हम बच्चों की तीन मूल अनुभूतियों का वर्णन करेंगे गे। ख़ुश होना वो पहली अनुभूति है जो बच्चा अनुभव करता है। ६-७ सप्ताह का बच्चा माता पिता या नर्स को मुस्कुराते देख कर मुस्कुराता है। बच्चा जिनको पहचानता है उनसे निकटता का आभास करता है, उसकी पहली मुस्कुराहट कितनी आत्मिय होती है और उसका अर्थ कितना गहरा होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुस्कुराहट बच्चों के सामाजिक जीवन के आरम्भ की निशानी है। ख़ुश होने की प्रवृत्ति बच्चों में स्वंय ही विकसित होती है।


जैसेजैसे आप के बच्चे बड़े हों उनकी सहायता कीजिए और बताइए कि वो क्यों ख़ुश है। उदाहरण स्वरूप आप का दो वर्षीय बच्चा यदि अपने नाना या दादा को अचानक देख कर उत्साहित हो उठे तो उससे कहिए कि उन्हें देख कर तो तुम्हें ख़ुश होना ही चाहिए क्योंकि तुम उनको बहुत प्यार करते हो।
दूसरीअनुमूतिदुख व समरसता का आभास है। आप का शिशु यदि भूख या गीले होने के कारण रो रहा है तो शायद उसे अभी वास्तविक दुख की अनुभूति न हो क्योंकि बच्चे लगभग ६ महीने की आयु में वास्तविक दुख का आभास करते हैं।



कुछबच्चे यदि कुछ दिन मॉं से अलग रहें तो परेशान हो जाते हैं और तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, परन्तु कुछ बच्चों के लिए मॉं से चन्द मिनटों की दूरी असहनीय हो जाती है। दो वर्ष के बच्चे में प्रेम भावनाओं के विकास का दूसरा चरण होता है, पहली बार उनमें सहानुभूति की भावना आती है। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे बच्चे यदि अपनी मॉ को चोट लगते देखते हैं या चाक़ू से उसकी उंगली कटी देख लेते हैं तो उससे सहानुमूति व्यक्त करते हैं वो मॉं को चूम कर उससे अपनी सहानुमिति व्यक्त करते हैं।
तीसरीअनुभूति क्रोध की है। अनुसंधानों से पता लगा है कि जब बच्चे को कहीं दर्द हो रहा हो या दूध पीते समय मुंह से निपल निकल जाए तब वो क्रोधित हो उठता है। दूसरे शब्दों में शिशु जीवन के आरम्भिक महीनों से ही क्रोध की भावना का अनुभव करने लगता है।



बच्चाअपना क्रोधविभिन्न पद्धतियों द्वारा व्यक्त करता है। जब बच्चे की आयु लगभग १०वर्ष की हो जाती है तो वो कुछ कार्यों को अकेले ही करना चाहता है और जब वो विफल होता है तो क्रोधित हो जाता है। परन्तु धीरे धीरे वो उस क्रोध पर नियन्त्रण प्राप्त करना सीख लेता है। उससे आप यह मत कहिए कि क्रोधित मत हो, इसके स्थान पर आप उसे ऐसे मार्ग दर्शाएं जिससे वो अपनी भावानायें अभिव्यक्त कर सके। आप उससे कहिए कि जब तुम्हें किसी पर क्रोध आए तो बजाए मार-पीट करने के उससे इस संबंध में बात करो। अन्त में विशेषज्ञों का मानना है कि आप इस बात का ध्यान रखें कि स्वंय आप अपना क्रोध किस प्रकार व्यक्त करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि बच्चों के सामने माता-पिता को कभी भी वाद विदान नहीं करना चाहिए, बल्कि यह एक पाठ है ताकि वे सीखें कि बात चीत द्वारा किस प्रकार मतभेदों का समाधान किया जा सकता है। क्योंकि माता पिता बच्चों के सबसे पहले आदर्श होते है।

महिला जगत- ३1

ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता के पश्चात विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की गतिविधियों में वृद्धि हो गई क्योंकि उनके विकास तथा प्रगति के लिए उचित वातावरण उत्पन्न हो गया है। महिलाओं के वास्तविक रूप को इमाम ख़ुमैनी ने स्पष्ट किया जिसके कारण ईरानी महिला की एक विशेष छवि विश्व के सम्मुख स्पष्ट हुई।



इमामख़ुमैनीकहा करते थे - नारी मनुष्य का निर्माण करती है। नारी समाज की प्रशिक्षक है और उसके लिए आवश्यक है कि सामाजिक मंच पर उसकी रचनात्मक उपस्थिति हो। चारित्रिक मानदण्डों तथा आध्यात्मिक मूल्यों का ध्यान रखते हुए, समाज में ईरानी महिलाओं की उपस्थिति ने विश्व के डा अहमदीनेजाद करेंगे ब्राज़ील का दौरा एक नया आदर्श और समाज में महिला की भूमिका का भिन्न रूप प्रस्तुत किया। जो कि नि:सन्देह एक अध्ययन का विषय बन सकता है। इस संदर्भ में ईरानी महिलाओं की उपस्थिति तथा सहकारिता के केन्द्र ने महिलाओं की क्षमताओं से समाज को अवगत कराने का कार्य किया और एक कल्याणकारी कार्य के रूप में पिछले २१ वर्षों में ईरान की विख्यात महिलाओं के वैज्ञानिक, सांस्कृतिक तथा कलात्मक सम्मेलन का आयोजन किया। इस समारोह का उददेश्य जो स्वंय एक नए रूप का समारोह था, समाज की सफल महिलाओं का परिचय, महिलाओं में आत्म विश्वास उत्पन्न करना तथा उनकी प्रतिभाओं व योग्यताओं को प्रकट करना था।



इस्लामीसंस्कृति व शिक्षा के मंत्रि ने इस समारोह के अवसर पर कहा - सौन्दर्य प्रेम, बलिदान की भावना तथा ज्ञान प्राप्ति में रूचि वे विशेषताएं हैं, जो हर काल , हर धर्म और हर वर्ग के सभी लोगों में एक समान रही है। धर्म, चरित्र, ज्ञान, संस्कृति तथा कला में रूचि मनुष्यों की सभी समान आवश्यकताओं तथा उत्सुकता की भावना को सन्तुष्ट करती है तथा यह भावना आध्यात्मिक तथा उपासना की प्रवृत्ति का स्रोत है। इसी संबंध में हज़रत इमाम अली अलैहिस्सलाम ने फ़र्माया है- दो ऐसे भूखे हैं जिनकी भूख कभी नहीं मिटती- ज्ञान का भूखा तथा धन का भूखा।
इस्लामीशिक्षा वसंस्कृतिके मंत्री ने आगे कहा -

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ज्ञान कीभूख से कभी तृप्त न होने की भावना के उत्तर में, नि:सन्देह विश्वविद्यालयों, कलात्मक क्षेत्रों जैसे साहित्य, कला, निर्दोशन तथा दूसरे कलात्मक क्षेत्रों में इस्लामी देशों के बीच ईरानी महिलाएं बहुत आगे बढ़ी हैं, परन्तु ईरान की प्राचीन सम्यता को देखते हुए उन्हें और अधिक प्रयास करने चाहिए।
आजहम विवाह के मानदण्डों की चर्चा करें गे। इस संबंध में हम उन रूकावटों या दबावों का वर्णन करेंगे जो विवाह के मार्ग में प्राय: देखने में आते है।
वास्तविकतायह है कि अधि कांश माता-पिता अपनी युवावस्था के काल को मुला देते हैं। वो यह भूल जाते हैं कि स्वयं भी जब जवान थे तो विवाह में उनकी कितनी रूचि थी। और उन रूकावटों ने उन्हें कितना परेशान किया था जो उनके विवाह को रोक रही थी।
इसकारणवो विवाह के संबंध में अपने बच्चों की रूचि की उपेक्षा भी करते हैं और विभिन्न बहानों से अपने बच्चों के विवाह में रोड़े अटकातें हैं।


कहींकहीं बच्चोंको किसी से विवाह करने पर विवश किया जाता है। कुछ माता - पिता अपनी सन्तान के जीवन - साथी का चयन अपनी पसन्द व रूचि के आधार पर करते हैं और लड़के या लड़की की राय या पसन्द पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते । कभी कभी तो बिन उनसे पूछे कि विवाह के संबंध में जीवन साथी के चयन के लिए उनके क्या भानदण्ड हैं, स्वंय निर्णय ले लेते है।
कईसमाजों में इस प्रकार के उदाहरण देखने को मिलते हैं जिसके कारण परिवारों को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसमें बाल - विवाह या कम आयु की लड़कियों का ऐसे बड़ी आयु के व्यक्ति से विवाह जिसका पद ऊंचा हो या जिसके पास धन अधिक हो, जैसे विवाह संबंधों का नाम लिया जा सकता है।


नि:सन्देहहर माता - पिताअपनी सन्तान को सौभाग्यशाली देखना चाहता है। परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि विवाह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है जिसपर युवा को स्वयं विचार करके निर्णय लेना चाहिए। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेहि व सल्लम के काल में उनके पास एक लड़की आई और शिकायत की कि मेरे पिता ने बिना मेरी इच्छा के मेरे लिए वर चुन लिया और मुझे वो व्यक्ति बिल्कुल पसन्द नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम ने इस रिश्ते को तोड़ दिया और उस लड़की के माता- पिता से कहा कि विवाह से पूर्व लड़की से राय लें।
जीहां, इस्लाममें इस प्रकार की बातों और एक तरफ़ा निर्णय की आलोचना की गयी हालांकि इस्लाम माता - पिता के मूल्यवान अनुभवों का सम्मान करता है और विवाह के संबंध में माता - पिता के राय व सलाह को आवश्यक समझता है, परन्तु अन्तिम निर्णय लड़की या लड़के पर छोड़ता है ताकि एक स्वस्थ व रचनात्मक पीढ़ी के प्रशिक्षण का केन्द्र अर्थात परिवार का गठन घृणा या दबाव द्वारा न किया जाए।


निश्चितरूपसे विवाह के संबंध में निर्णय लेते समय जल्दी नहीं करनी चाहिए। बल्कि योग्य व्यक्ति का चयन करना चाहिए जिसमें आवश्यक मानदण्डों का भी ध्यान रखा गया हो। अनुभव और अध्ययन दर्शाते हैं कि इन मानदण्डों की उपेक्षा परिवारों में मतभेद व अस्त-व्यस्तता का कारण बनती है। इस संबंध में इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का कथन है- जब विवाह करने का निर्णय लें तो दो रकअत नमाज़ पढ़ें और ईश्वर से प्रार्थना करें कि आप को ऐसा जीवन साथी मिले कि जो शिष्टाचार, नैतिकता व अच्छी आदतों में एक आदर्श इन्सान हों।
इस्लामने जीवन साथी के चयन में कुछ मानदण्ड निर्धारित किए हैं। सबसे अधिक महत्व दोनों के मानसिक व सामाजिक स्तर और उनकी पारिवारिक मान्यताओं का है। पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है- मोमिन पुरूष मोमिन महिला का समकक्ष है। इस आधार पर मुसलमान किसी भी स्तर या वर्ग के हों एक दूसरे के समकक्ष हैं। इस्लाम का मूल आधार ईमान व धार्मिक मान्यताओं में समानता है।
परिवारके काल्याण में ईमान की मूल भूमिका है और यह जीवन साथी के साथ वफ़ादारी तथा ज़िम्मेदारी का सबसे महत्वपूर्ण विषय है। इसलिए मुसलमान अपनी बेटी का विवाह किसी भी ग़ैर- मुस्लमान से नहीं कर सकता।


मानवचरित्र और व्यक्तिगत मानवीय मूल्यों पर विवाह के संबंध में इस्लाम ने अत्यन्त बल दिया है। इस्लामी शिक्षाओं में बल देकर कहा गया है कि अशिष्ट या भ्रष्ट या धर्म की उपेक्षा करने वाले व्यक्ति से विवाह न करें। कड़वा स्वभाव और चिड़चिड़ापन जीवन को असहनीय बना देता है और परिवार के कल्याण के लिए ख़तरा है। यहां तक कि कहा गया है कि लापरवाह और मनमौजी व्यक्ति को बेटी न दें। इस्लाम बल देता है कि जीवन साथी के परिवार के बारे में जॉंच - पड़ताल करें, पवित्रता और ईश्वरिय भय जीवन साथी के चयन की शर्त होनी चाहिए। शारिरिक स्वास्थ्य , मानसिक स्वास्थ्य और लड़के - लड़की का वैचारिक समनवय भी जीवन साथी के चयन के निर्धारित मानदण्ड है।
आशाहै हमारे युवा इन मानदण्डों पर ध्यान देते हुए प्रेम, आत्मीयता व कल्याण के आधार पर जो वैवाहिक बन्धन स्थापित करें गे उसमें प्रशिक्षित पीढ़ी का लालन - पालन करके शिष्ट नागरिक समाज के हवाले करें गे।