महिला जगत ११-१२



महिला जगत-११

कभी कभी हमारे जीवन में ऐसी घटनाएं घटती हैं कि जो जाने अन्जाने हमारी भावनाओं को उक्साने का कारण बनती हैं। इनमें से एक, कि जिसका सहन करना अत्यन्त कठिन होता है, हतोत्साह नामक स्थिति है। एकहतोत्साहित व्यक्ति बहुत ही सुस्त हो जाता है, उसे प्रसन्नता का आभास नहीं होता, वो समझता है कि अपने कार्यों के लिए उसके शरीर में पर्याप्त ऊर्जा नहीं है, वो थका थका सा और उद्देश्य हीन है, उसके हाथ - पैर शिथिल पड़े हुए हैं, उसे घुटन और घबराहट का आभास होता है, वो समझता है कि अपनी शक्ति और इरादा रखो चुका है, दूसरों के साथ मिलने जुलने पर उसे आनन्द प्राप्त नहीं होता और पहले यदि उसे कोई भोजन अच्छा लगता था, अब उसको खाने का मन नहीं करता या पहले यदि मित्रों के बीच और समोरोहों आदि में उसे आनंद आता था, तो अब उससे भागता है और अकेलापन उसे अच्छा लगता है। क्योंकि वो समझता है कि दूसरे आलोचना योग्य है।


यदिआप भी इस प्रकार के लक्षण देखें तो समझ लीजिए कि एक प्रकार के हतोत्साह का सामना हो सकता है। ऐसी स्थिति को यदि इसे बढ़ने की अनुमति दी गई तो आप को हतोत्साह की सीमाओं तक पहुंचा देगी। अब हमें ये देखना है कि इस स्थिति से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए। सबसे पहले हमें स्वंय को यह विश्वास दिलवाना चाहिए कि सभी चीज़ें हमारे विचारों और दृष्टिकोंणो पर निर्भर हैं।
किसीचीज़ को समझना,उसकेबारे में दृष्टिकोण अपनाना और हमारे विश्वास निर्णयक भूमिका निमाते हैं। महत्वपूर्ण ये है कि हम घटनाओं का मूल्यांकन किस प्रकार करते हैं और प्रितिदन अपने चारों ओर की घटनाओं , लोगों और विभिन्न चीज़ों को किस द्वुष्टि से देखते है।


यदिइस बात को हम और अधिक स्पष्ट शब्दों में कहना चाहें तो कहें गे कि इस प्रकार के विचार और दृष्टिकोंण, कि जो हमारे जीवन शैली का निर्धारण करते हैं और कारण बनते हैं कि हम जीवन के सुख - दुख को ईश्वर की ओर से एक वरदान समझें या ये कि एक सादी और छोटी सी घटना को अपने लिए एक बड़ी और असहनीय त्रासदी बना लें।


इसआधार पर नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक रुप में परिवर्तित करना एक निर्णयक मापदण्ड समझा जाता है। हतोत्साह की हालत में मनुष्य की भावनाओं पर एक गहरा नकारात्मक दबाव रहता है और इससे मनुष्य न केवल ये कि अपनी गतिविधियों, कार्यों, विचारों और अस्तित्व को मूल्यहीन और नकारात्मक समझता है बल्कि संसार को भी एक भयानक, अंधेरा और ख़तरनाक स्थान समझने लगता है।


यद्यपियह नकारात्मकभावनाएंलगभग सदैव ही निराधार हैं, परन्तु चूंकि यह भावनात्मक अनियमितताओं और नकारात्मक विचारों का कारण बनती हैं इसलिए उपचार करते समय इनपर ध्यान दिया जाता है।
यदिहम यह मान लें कि हमारे विचार हमारे जीवन को सुखी या दुखी बनाते हैं तो हम अपने सोचने की पद्धति में परिवर्तन करके, बिना भौतिक साधनों में परिवर्तन के ही सुख और कल्याण का आभास कर सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि अपनी कमियों का ही रोना रोते रहें। यदि हम ईश्वर के वरदानों और उपकारों पर विचार करें और दिल की गहराइयों से सोचें कि यदि यह चीज़ें हमें न मिली होती तो हम क्या करते? हमें चाहिए कि इन वरदानों के मूल्य और महत्व को समझें और अपनी भौतिक कमियों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर स्वंम को परेशानी के जाल में न फसाएं।


ईरानके विख्यात कवि सादी की गुलिस्तान में एक स्थान पर आया है- एक दिन जूता न होने के कारण मैं बड़ा दुखी था कि अचानक मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसके पैर ही नहीं थे। उस समय मैंने ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त किया और अपने पास जूता न होने पर संतोष कर लिया। स्वास्थ्य उन बड़े वरदानों में से है जो ईश्वर ने हमें प्रदान किए हैं और यह हमारे इतने निकट और सामने है कि इसका मूल्य हम नहीं समझ पाते और जब थोड़ी सी अवधि के लिए भी हम स्वास्थ्य के एक छोटे से भाग को भी गंवा देते हैं तब हमारी समझ में आता है कि ईश्वर के कितने बड़े उपहार से वंचित हो गए हैं।
वहीसमय है कि जब हम यह सोचते हैं कि काश हमारे पास सांसारिक पूंजी कुछ भी न होती परन्तु हमारा स्वास्थ्य बना रहता। यदि हम केवल अपने हाथ, पैरों, आंखों, नाक आदि पर ध्यान दें तो हमें पता चले गा कि ईश्वर ने हमें कितने वरदान दिए हैं और फिर छोटी छोटी बातों से हम परेशान नहीं होंगे।


अबहम यह देखने का प्रयास करें गे कि हतोत्साह की भावना की जड़ें कहां पर होती हैं। इसलिए स्थिति की क्षति पूर्ति और परिवर्तन के लिए नकारात्मक भावनाओं की जड़ों का पता लगाना चाहिए।
यहदेखना चाहिए कि हतोत्साह और उदासीनता के समय कैसे विचार मन में आते हैं, क्योंकि यही विचार मनुष्य की असली परेशानी और दु:ख़ का कारण होते हैं जो घटना घटी और उसके प्रति आप के विचारों की शैली ने इस घटना को दु:ख़दाई समझा है। इन विचारों में परिवर्तन से आप की आन्तरिक भावनाओं में भी परिवर्तन आएगा। क्योंकि यह घटनाएं नहीं हैं कि जो परेशानी का कारण बनती हैं बल्कि घटना के प्रति जो हमारी कल्पना है वही हमारी स्थिति और आन्तरिक भावनाओं को प्रभावित करती है। बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि दु:ख़ की स्थिति में, घटनाओं को नकारात्मक, अप्रिय और उपेक्षित समझते हैं और ग्लास के केवल आधे ख़ाली भाग को ही देख पाते हैं और उसके भरे हुए भाग पर विचार नहीं कर पाते।


हमेंचाहिए किनकारात्मकतत्थयों को हम बढ़ा चढ़ा कर न देखें, हर व्यक्ति के जीवन में विभिन्न प्रकार की अप्रिय घटनाएं घटती हैं। यह हम हैं कि छोटी सी बात का बतँगड़ बना कर राई का पर्वत बना देते हैं यहां तक कि हर साद्यारण सी घटना को एक असहनीय सँकट के रुप में देखने लगते हैं। एक हतोत्साहित व्यक्ति किसी भी वस्तु का वास्तविक मूल्याँकन नहीं कर पाता और उसे अपनी इस आदत में परिवर्तन करना चाहिए। प्राय: हतोत्साहित व्यक्ति घटनाओं के प्रति किसी भी प्रकार की सन्तुलित राय नहीं रख पाता है।


हमेंचाहिए कि कठिनाइयों को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने और एक तरफ़ा मूल्याँकन से बचें। निर्णय लेने में जल्दी न करें। प्राय: घटनाओं के प्रति हतोत्साहित व्यक्तियों के विचार नकारात्मक और चिन्ताजनक होते हैं। अधिकतर ऐसा लगता है कि कोई दुर्घटना घटने वाली है। यदि कोई काम होने वाला है तो सदैव यही समझा जाता है कि इसका परिणाम नकारात्मक ही होगा।
हरकार्य से पहले ही नकारात्मक निष्कर्ष न निकालें। क्योंकि यदि कोई अप्रिय घटना घटती है तो हम अकारण ही स्वंम को उसका दोषी ठहराते हैं और अपनी अक्षमता को इस अप्रिय परिणाम का ज़िम्मेदार समझते हैं। तो इसलिए आज से निर्णय लेने में जल्दी करना और स्वंम को उसके लिए दोषी ठहराना वर्जित।

महिला जगत- १२

अपनी पिछली चर्चा में हमने " ख़ुशी क्या है " इस विषय पर चर्चा की थी। आज हम यह बताने का प्रयास करें गे कि किस प्रकार से ख़ुश रहें।

हमारेजन्म के पहलेदिनही ईश्वर अपनी तत्वदर्शिता द्वारा हमसे कहता है कि जीवन मधुर है और हमें अपने जीवन काल में यह सीखने का प्रयास करना चाहिए कि उचित मार्ग कौन से हैं ताकि उसपर चलकर हम मधुर जीवन व्यतीत कर सकें। यदि हमारा मनोबल सुदृढ़ होगा और हम प्रसन्नचित रहें गे तो ईश्वर के इस वरदान द्वारा हम अपनी ख़ुशियों में दूसरों को भी भागीदार बना सकते हैं। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शन्ति एवं प्रसन्नता की भावना उत्पन्न करने के लिए आन्तरिक अभ्यास की आवश्यकता है। ख़ुश और प्रसन्नचित रहना संभव है एक अल्प अवधि के लिए हमें ख़ुश करे हंसा दे परन्तु आन्तरिक अभ्यास के बिना यह बड़ी जल्दी ही हमारी आत्मिक परेशानी एवं उदासीनता का कारण बन जाता है।


जीवनमें संभव है घर, गाड़ी या आधुनिक घरेलू उपकरण इत्यादि ख़रीदने पर हमें ख़ुशी हो परन्तु उल्लेखनीय है कि वास्तविक प्रसन्नता के लिए इन चीज़ों की आवश्यकता नहीं है। हमें ईश्वरिय वरदानों तथा विभूतियों को प्राप्त करके अधिक प्रसन्नता होनी चाहिए। दूसरों से प्रेम करना ,रिश्तेदारों से मिलना - जुलना, अपने परिवार और साथियों का सम्मान और नैतिक मूल्यों का पालन जीवन में वास्तविक प्रसन्नता का कारण बनता है। यहां पर हम मधुर जीवन व्यतीत करने की कुछ पद्धीतयों पर प्रकाश डाल रहे हैं।


हमेंपरिस्थितियों पर दृष्टि रखनी चाहिए। जैसे घर पर अपने परिवार वालों के साथ भोजन करते समय हमें अपने कल की परिक्षा की चिन्ता करने के स्थान पर अपने परिवार के सदस्यों के बारे में सोचना चाहिए, उनसे बात करनी चाहिए। जब हम किसी रोचक घटना को याद करके हंसते हैं तो प्रसन्नता उत्पन्न करने वाले हांरमोनों की संख्या में वृद्धि हो जाती है और तनाव उत्पन्न करने वाले हांरमोन कम हो हाते हैं।


वर्तमानसमय में अधिकांश लोग पूरी नींद नहीं सो पाते। हमें अपने सोने का समय निर्धारित करना चाहिए। जो कार्य हमें पसन्द नहीं या उसमें रुचि नहीं है उन्हें अपनी गतिविधियों से निकाल देना ही उचित है। जो कार्य करने हैं उनकी सूची बनाएं। इनमें से जो जो कार्य कर चुके हैं उनपर निशान लगा दें। इससे मनुष्य को शान्ति का आभास होता है। एक समय में एक ही काम करें। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जिन लोगों के कई व्यवसाय होते हैं उनको उच्च रक्त चाप का अधिक ख़तरा रहता है। यह याद रखिए कि टेलिफ़ोन पर बात करने के साथ साथ खाना बनाने या सफ़ाई करने से कहीं बेहतर यह है कि आप आराम से एक कुर्सी पर बैठ कर टेलिफ़ोन पर बात करें।


अपनेबगीचे में रुचि लीजीए। इससे ताज़ी हवा मिलने और शरीरिक सक्रियता के अतिरिक्त तनाव कम होगा और आप प्रसन्नचित होंगे। अपने हाथ से लगाए हुए पौधों को फूलते फलते देख कर कौन है जिसका मन फूला नहीं समाए गा नए अनुसंधानों से पता लगा है कि सुगंध मनुष्य में तनाव को कम करती है फूलों के बगीचे में टहलने से मनुष्य को अपूर्व शन्ति का आभास होता है। आज के इस शोरशराबे के जीवन में पुस्तकालय, संग्रहालय, बाग़ या धार्मिक स्थल शान्त स्थान समझे जाते हैं। शान्ति प्राप्त करने के लिए इनमें से किसी का भी चयन किया जा सकता है।


दूसरोंकी सहायताकरना,मनुष्यमें सहायता की भावना उत्पन्न करने के अतिरिक्त हमारे भीतर यह भावना भी उत्पन्न करता है कि हम अपनी समस्याओं को महत्वहीन समझें। प्रसन्नचित लोग दूसरों की सहायता के लिए अधिक तत्पर रहते हैं और दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहने वाले अधिक प्रसन्नचित रहते हैं। नि:सन्देह किसी की सहायता करके जो आनन्द प्राप्त होता है उसको वार्णित नहीं किया जा सकता है।


आपअवश्य ही जानते होंगे कि तनाव को दूर करने के लिए व्यायाम हर दवा से बेहतर है। आप अकेले टहलकर अपने बारे में सोच कर लाभ उठा सकते हैं। धीरे धीरे पैदल चलने से हत्दय की गति सुचारु रुप से चलती है, रक्त चाप नियंत्रित रहता है। अपने निकट संबंधियों के साथ अपने संबंधों को महत्व देना चाहिए।


विभिन्नआयु के १,३००पुरुष एवं महिलाओं पर अनुसंधान द्वारा पता चला है कि जिन लोगों के घनिष्ठ मित्रों की संख्या अधिक है उनमें रक्त चाप, रक्त की चर्बी, शरकरा तथा तनाव के हारमोन अपनी उचित सीमा में होते हैं। इसके विपरित अकेले रहने वाले या जिनके मित्र कम हैं ऐसे लोगों में समय से पूर्व मृत्यु का ख़तरा अधिक रहता है।


मनोवैज्ञानिकोंका मानना है कि जिन लोगों में मज़बूत धार्मिक आस्था है वे अधिक प्रसन्नचित होते हैं। ऐसे लोग कठिनाइयों का सामना करने में अधिक सक्षम होते हैं। ईश्वर पर आस्था द्वारा मनुष्य अपने जीवन का अर्थ समझ लेता है। यहां तक कि यदि मनुष्य को धर्म पर अधिक विश्वास न भी हो परन्तु आध्यात्मवाद में उसकी रुचि हो, फिर भी सकारात्मक विचारों द्वारा वो अपना जीवन मधुर बना सकता है।


अन्तमें हम यह कहें गे कि हमारे पास जो ईश्वरीय विभूतियां हैं यदि हम उनकी गणना करें तो हम देखें गे कि वो कृपालु तथा दयालु ईश्वर हमसे कितना प्रेम करता है। हमारा स्वास्थय, हमारे मित्र, हमारा परिवार, हमारी स्वतन्त्रता और शिक्षा इत्यादि हर चीज़ उसी की प्रदान की हुई विमूति है। जो लोग इन विभूतियों को दृष्टिगत रखते हुए ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं, वे अपने जीवन में सुखी रहते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर पर पूरा भरोसा रहता है।
औरइस प्रकार मनुष्य अपने जीवन की हर सफलता तथा विफलता को ईश्वर की इच्छा समझ

कर स्वीकार कर लेता है और इस प्रकार मनुष्य का जीवन मधुर हो जाता है।